Airlines Free Seats Rule India: भारत सरकार ने एयरलाइंस की एक ऐसी प्रैक्टिस पर शिकंजा कस दिया है जिससे करोड़ों यात्री परेशान रहते थे। नागरिक उड्डयन मंत्री के. राम मोहन नायडू ने 18 मार्च 2026 को एक ऐतिहासिक फैसले की घोषणा करते हुए DGCA के माध्यम से निर्देश जारी किया कि अब सभी एयरलाइंस को हर फ्लाइट में कम से कम 60% सीटें बिना किसी अतिरिक्त चार्ज के यात्रियों को उपलब्ध करानी होंगी। यह नियम इंडिगो, SpiceJet समेत सभी लो-कॉस्ट और फुल-सर्विस एयरलाइंस पर लागू होगा।
₹3,999 की टिकट ₹5,500 कैसे बन जाती थी: एंसिलरी रेवेन्यू का खेल
अब तक आप जब भी फ्लाइट टिकट बुक करते थे तो स्क्रीन पर दिखता था ₹3,999। लेकिन जब पेमेंट गेटवे तक पहुंचते थे, तो रकम ₹5,500 हो जाती थी। यह ₹1,500 एक्स्ट्रा सीट सेलेक्शन, मील्स, बैगेज और अन्य ऐड-ऑन्स के नाम पर वसूले जाते थे। इसे एयरलाइंस एंसिलरी रेवेन्यू कहती हैं, लेकिन बिहेवियरल इकोनॉमिक्स में इसे डार्क पैटर्न कहा जाता है।
असल खेल यह था कि जब आप वेब चेक-इन करते थे, तो सिस्टम दिखाता था “Free Seats Not Available”। बची होती थीं सिर्फ पेड सीट्स। यह आर्टिफिशियल स्कार्सिटी का मैनिपुलेशन था, जिसमें फ्री सीटें जानबूझकर छुपा दी जाती थीं ताकि यात्री मजबूरन ₹500 से ₹1,200 तक एक्स्ट्रा दे। 2015 से एयरलाइंस को 100% सीटों पर चार्ज वसूलने की छूट थी, जिसका बेजा फायदा उठाया जा रहा था।
नया 60% फ्री सीट्स रूल: क्या बदलेगा
सरकार ने जो नया नियम लागू किया है, उसे समझना जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं है कि सीट मुफ्त मिलेगी, बल्कि इसका मतलब है कि सीट सेलेक्ट करने के लिए कोई अतिरिक्त फीस नहीं देनी होगी। यानी हर फ्लाइट की 60% सीटें “अनप्राइज्ड” होंगी, जहां यात्री बिना एक्स्ट्रा पैसे दिए अपनी पसंद की सीट चुन सकेंगे। बाकी 40% सीटों पर एयरलाइंस चार्ज लगा सकती हैं, जैसे प्रीमियम सीट्स, एक्स्ट्रा लेगरूम या एग्जिट रो सीट्स।
इसके अलावा एक और बेहद जरूरी बदलाव यह है कि एक ही PNR (Passenger Name Record) पर बुक किए गए यात्रियों को साथ-साथ एडजॉइनिंग सीट्स पर बैठाना होगा। यानी अगर कोई परिवार एक साथ बुकिंग कर रहा है, तो अब एक 5 साल का बच्चा अपने माता-पिता से अलग सीट पर नहीं बैठाया जाएगा, जब तक कि वे खुद ₹800 एक्स्ट्रा देकर साथ बैठने का ऑप्शन न चुनें।
DGCA के पास शिकायतों का अंबार: सरकार ने क्यों लिया यह फैसला
सरकार के इस कदम के पीछे कई ठोस कारण हैं। DGCA के पास यात्रियों की शिकायतों का अंबार लगा हुआ था। हिडन चार्जेस, मिसलीडिंग प्राइस डिस्प्ले और सीट सेलेक्शन में जबरदस्ती के आरोप लगातार बढ़ रहे थे। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत इस तरह की प्रैक्टिसेज अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिसेज की श्रेणी में आती हैं।
सरकार ने एयरलाइंस को यह भी निर्देश दिया है कि वे अपनी वेबसाइट, मोबाइल एप, बुकिंग प्लेटफॉर्म और एयरपोर्ट काउंटर पर यात्री अधिकारों की जानकारी प्रमुखता से प्रदर्शित करें। यह जानकारी क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध करानी होगी। इसके अलावा स्पोर्ट्स इक्विपमेंट, म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स और पालतू जानवरों को ले जाने की स्पष्ट पॉलिसी भी पब्लिश करनी होगी।
अनबंडलिंग ऑफ सर्विस: लो-कॉस्ट एयरलाइंस का बिजनेस मॉडल कैसे काम करता था
इसे समझने के लिए लो-कॉस्ट एयरलाइंस के बिजनेस मॉडल को जानना जरूरी है। इंडिगो, SpiceJet जैसी लो-कॉस्ट कैरियर्स ने सर्विसेज को “अनबंडल” कर दिया था। बेसिक टिकट में सिर्फ पॉइंट A से पॉइंट B तक की यात्रा शामिल होती थी। सीट, खाना, बैगेज सब अलग-अलग ऐड-ऑन्स के तौर पर बेचे जाते थे। तर्क यह था कि जो सुविधा लेगा वही पैसे देगा। लेकिन हकीकत यह थी कि सीट पर बैठना कोई “सुविधा” नहीं बल्कि मजबूरी है।
एंसिलरी रेवेन्यू एयरलाइंस के लिए प्रॉफिट लाइफलाइन बन चुका था। जब बेस फेयर कम रखकर ग्राहक आकर्षित किया जाता और फिर एक्स्ट्रा चार्जेस से वसूली की जाती, तो यह अनबंडलिंग नहीं बल्कि कन्वीनियंस प्राइसिंग थी।
वॉटरबेड इफेक्ट: एयरलाइंस के पास अभी भी हैं हथकंडे
बड़ा सवाल यह है कि क्या इस नियम के बाद एयरलाइंस सच में यात्रियों को राहत देंगी? इकोनॉमिक्स में इसे वॉटरबेड इफेक्ट कहते हैं, जहां एक जगह दबाव डालो तो दूसरी जगह फूल जाता है। एयरलाइंस के पास अभी भी कई तरीके बचे हैं। पहला, बेस फेयर बढ़ा सकती हैं: ₹4,000 की टिकट ₹4,500 कर दी जाए। दूसरा, सर्विस डिग्रेडेशन: फ्री सीट्स में कम कंफर्ट दिया जाए। तीसरा, एल्गोरिदम मैनिपुलेशन: फ्री सीट्स को सबसे आखिर में अनलॉक किया जाए ताकि ज्यादातर लोग पेड सीट खरीद चुके हों।
यानी नियम बदल गए हैं, लेकिन एयरलाइंस का इंसेंटिव स्ट्रक्चर वही है। आउटकम बदलना गारंटीड नहीं है।
ग्लोबल तुलना: भारत अकेला नहीं
भारत इस तरह का कदम उठाने वाला अकेला देश नहीं है। अमेरिका में “जंक फीस” (छिपे हुए चार्जेस) को डिस्क्लोज करना मैंडेटरी है। यूरोपीय संघ में फैमिली सीटिंग के लिए प्रोटेक्टिव कानून बने हुए हैं। लेकिन भारत एक अलग तरह का बाजार है, जहां ₹200 का फर्क भी यात्री का फैसला बदल सकता है। इसलिए यह नियम भारतीय मिडिल क्लास के लिए खासतौर पर राहत भरा है।
रेगुलेटरी डायलेमा: कंज्यूमर सोवरिनिटी vs ईज ऑफ डूइंग बिजनेस
यह मामला दो टकराती हुई विचारधाराओं का है। एक तरफ कंज्यूमर सोवरिनिटी है, यानी यात्री को पता होना चाहिए कि वह कितना पैसा दे रहा है और किस चीज के लिए दे रहा है। दूसरी तरफ ईज ऑफ डूइंग बिजनेस है, क्योंकि भारतीय एयरलाइंस पहले से ही ऊंची ATF (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) लागत और भारी कर्ज से जूझ रही हैं।
अगर सरकार प्राइसिंग में बहुत ज्यादा दखल देगी, तो यह लाइसेंस राज की दिशा में कदम माना जा सकता है। लेकिन अगर दखल नहीं देगी, तो एयरलाइंस कंज्यूमर राइट्स को ताक पर रखती रहेंगी। यही क्लासिकल रेगुलेटरी डायलेमा है, जहां सरकार को एक बहुत बारीक संतुलन बनाना होता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- DGCA ने 18 मार्च 2026 से नया नियम लागू किया: एयरलाइंस को हर फ्लाइट में 60% सीटें बिना एक्स्ट्रा चार्ज के देनी होंगी।
- एक ही PNR पर बुक यात्री अब साथ-साथ बैठेंगे, बच्चों को माता-पिता से अलग बैठाने का खेल खत्म।
- पहले एयरलाइंस 100% सीटों पर चार्ज वसूलती थीं, डार्क पैटर्न और आर्टिफिशियल स्कार्सिटी से यात्रियों से वसूली होती थी।
- एयरलाइंस बेस फेयर बढ़ाकर या सर्विस डिग्रेड करके हिसाब बराबर कर सकती हैं: वॉटरबेड इफेक्ट का खतरा बरकरार।







