Greater Israel Third Temple को लेकर अब दुनिया की राजनीति में एक ऐसा तूफान उठ रहा है जिसकी गूंज आने वाले दशकों तक सुनाई दे सकती है। एक तरफ जहां डोनाल्ड ट्रंप ईरान से युद्ध में उलझकर छटपटा रहे हैं और अमेरिकी मीडिया उनकी हार का पोल खोल रहा है, वहीं दूसरी तरफ इजराइल बिना किसी बेचैनी के चुपचाप अपना असली गेम खेल रहा है। बेंजामिन नेतन्याहू ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलेआम कहा है कि इजराइल अब रीजनल सुपरपावर ही नहीं, बल्कि कई मायनों में ग्लोबल सुपरपावर बन चुका है। Greater Israel Third Temple की यह पूरी कहानी सिर्फ जमीन के कब्जे की नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी धार्मिक भविष्यवाणी (Biblical Prophecy) को पूरा करने की कोशिश है जो पूरे मध्य पूर्व का नक्शा बदल सकती है।
ट्रंप छटपटा रहे, इजराइल चुपचाप काम कर रहा: युद्ध में कौन किसका मोहरा?
जो डोनाल्ड ट्रंप कुछ समय पहले “दो हफ्ते में जीत गया, मैं जीत गया” चिल्ला रहे थे, उनके सुर अब पूरी तरह बदल चुके हैं। ट्रंप इस बात से नाराज हैं कि ईरान के खिलाफ इस युद्ध में अमेरिका की मदद के लिए कोई सामने नहीं आ रहा। उन्होंने तो धमकियां देना शुरू कर दिया है कि “अगर तुम हमारी मदद नहीं करोगे, तो मैं तुम्हें बाद में देख लूंगा।” और तो और, ट्रंप अपने ही देश के मीडिया को फांसी देने की बात कर रहे हैं, क्योंकि कई अमेरिकी मीडिया संस्थानों ने ट्रंप की हार की असलियत सामने रख दी है, जिसे ट्रंप “Act of Treason” (देशद्रोह) बता रहे हैं।
लेकिन जहां ट्रंप बड़बड़ा रहे हैं और छटपटा रहे हैं, वहीं इजराइल को कोई खास बेचैनी नहीं है। अमेरिका इस युद्ध में इजराइल के कहने पर, तेल की लालच में और अपना वर्चस्व जमाने के लिए उतरा था। लेकिन इजराइल का एंड गेम ना तो तेल है, ना ईरान पर कब्जा करना है, और ना ही अमेरिका के वर्चस्व को बढ़ावा देना है। उसका तो बिल्कुल अलग ही खेल चल रहा है और वो बड़ी खूबसूरती से इस खेल को अंजाम दे भी रहा है।
लेबनान में गाजा पार्ट-2: दुनिया की नजरें ईरान पर, इजराइल का कत्लेआम जारी
जब पूरी दुनिया की नजरें ईरान पर टिकी हुई हैं, ठीक उसी समय लेबनान में एक “गाजा पार्ट-2” चल रहा है। लाखों लोगों को उनके घरों से बेदखल कर दिया गया है। व्हाइट फॉस्फोरस जैसे प्रतिबंधित रासायनिक हथियारों (Banned Chemical Weapons) का इस्तेमाल आम लोगों पर किया जा रहा है। इजराइल के लिए यह युद्ध यहूदियों और मुसलमानों के बीच एक धर्मयुद्ध है और इस धर्मयुद्ध का केंद्र है जेरूसलम (Jerusalem), जिसे दुनिया की सबसे पवित्र जगहों में से एक माना जाता है।
इस धर्मयुद्ध में इजराइल के पक्ष में कई अमेरिकी राजनेता खुलकर खड़े मिलते हैं। ट्रंप के करीबी लिंडसे ग्रैहम तो ऐसे लगते हैं जैसे वे अमेरिका के नहीं, इजराइल के लिए काम करते हैं। उन्होंने खुलेआम कहा है: “This is a religious war” (यह एक धार्मिक युद्ध है)। ग्रैहम ने इसे “radical Islamic terrorism” के खिलाफ लड़ाई बताया और कहा कि यह आने वाले हजारों सालों के लिए एक “Defining Moment” रहेगा। ग्रैहम पर यह आरोप भी लगे हैं कि उन्होंने ट्रंप को इस युद्ध में घसीटने में अहम भूमिका निभाई और इसके लिए उन्हें इजराइल में ट्रेनिंग भी मिली थी।
अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेक्सेथ ने Third Temple को लेकर क्या कहा था?
Greater Israel Third Temple के मामले में सबसे चौंकाने वाला बयान अमेरिका के मौजूदा यूनाइटेड स्टेट्स सेक्रेटरी ऑफ वॉर पीट हेक्सेथ का है। 2018 में जेरूसलम में एक कार्यक्रम के दौरान हेक्सेथ ने कहा था: “No reason why the miraculous re-establishment of the Temple on the Temple Mount can’t happen” (ऐसा कोई कारण नहीं है कि टेंपल माउंट पर दोबारा चमत्कारिक रूप से मंदिर न बन सके)।
हेक्सेथ यहां बात कर रहे थे Jewish Third Temple (यहूदी तीसरे मंदिर) की, जो एक ऐसी बाइबिल की भविष्यवाणी (Biblical Prophecy) है जिसका बहुत से यहूदियों के लिए गहरा धार्मिक महत्व है। हेक्सेथ ने उस कार्यक्रम में उपस्थित लोगों से यह भी कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ही उनके लिए सबसे अच्छा नेता है, क्योंकि ट्रंप के सत्ता में रहते हुए वे इस क्षेत्र में जो चाहें कर सकते हैं, क्योंकि वाशिंगटन डीसी में ऐसे “True Believers” (सच्चे विश्वासी) बैठे हैं जो उनका साथ देंगे।
Greater Israel: बाइबल की प्रोफेसी या विस्तारवादी परियोजना?
Greater Israel Third Temple को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि Greater Israel का कॉन्सेप्ट आया कहां से। इस विचार को सबसे पहले थिओडोर हर्ज़ल ने एक्सप्लोर किया था, जिन्हें “Father of Political Zionism” (राजनीतिक जायनवाद का जनक) कहा जाता है।
इस आइडिया का सबसे बड़ा विस्तारवादी संस्करण (Expansionist Version) बाइबल की Book of Genesis के एक श्लोक (Verse) में मिलता है। इसके मुताबिक ईश्वर ने अब्राहम (इब्राहिम) से एक समझौता (Covenant) किया था, जिसमें उनके वंशजों को नील नदी (Nile River) से लेकर फरात नदी (Euphrates River) तक की जमीन देने का वायदा बताया जाता है।
आज की तारीख में इस विशाल क्षेत्र में शामिल होते हैं: फिलिस्तीन, लेबनान, जॉर्डन, सीरिया, इराक, मिस्र (Egypt) और सऊदी अरब के कुछ अहम हिस्से। जो लोग Greater Israel Third Temple की इस अवधारणा में विश्वास रखते हैं, उनके लिए यह सिर्फ एक राजनीतिक या विस्तारवादी प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि एक “Divine Mandate” (ईश्वरीय आदेश) है, जिसमें उस जमीन को वापस पाने की कोशिश है जो उनके अनुसार उन्हीं की थी।
नेतन्याहू ने स्वीकारा ‘Promised Land’ का ताबीज: 31 देशों ने की कड़ी निंदा
Greater Israel Third Temple की दिशा में सबसे चौंकाने वाला कदम खुद नेतन्याहू ने उठाया। अगस्त 2025 में एक इंटरव्यू के दौरान, पूर्व राइट विंग सांसद शॉन गेल ने नेतन्याहू को “Promised Land” (वादा की गई भूमि) का एक Amulet (ताबीज) प्रस्तुत किया और नेतन्याहू ने इसे स्वीकार कर लिया। यह एक प्रतीकात्मक लेकिन बेहद महत्वपूर्ण कदम था, जिसने Greater Israel की अवधारणा को आधिकारिक रूप से मान्यता देने का संकेत दिया।
इस बयान के बाद 31 अरब और मुस्लिम देशों के एक गठबंधन ने नेतन्याहू की कड़ी निंदा की। उन्होंने इसे अरब देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता (Sovereignty) और क्षेत्रीय व वैश्विक शांति के लिए सीधा खतरा बताया। लेकिन इजराइल रुकने वालों में कहां था?
इजराइल के वित्त मंत्री बोले: दमिश्क तक फैलेगा इजराइल
Greater Israel Third Temple प्रोजेक्ट के तहत इजराइल के वित्त मंत्री बेजलेल स्मॉट्रिक का 2024 में एक वीडियो सामने आया जिसमें वे इजराइली सीमाओं को इतना विस्तारित करने की बात कर रहे थे कि उसमें सीरिया की राजधानी दमिश्क (Damascus) भी शामिल हो जाए। उनका तर्क था कि “यह लिखा हुआ है कि जेरूसलम का भविष्य दमिश्क तक विस्तारित होना है।”
स्मॉट्रिक ने कहा कि धीरे-धीरे इजराइल सिर्फ फिलिस्तीनी इलाकों पर ही नहीं, बल्कि जॉर्डन, लेबनान, मिस्र, सीरिया, इराक और सऊदी अरब के कुछ हिस्सों तक भी फैल सकता है। इससे पहले 2023 में भी स्मॉट्रिक पेरिस में एक मेमोरियल सर्विस के दौरान एक नक्शे के सामने खड़े होकर Greater Israel का आइडिया पेश कर चुके थे, जिसमें इजराइल की सीमा में जॉर्डन भी शामिल था।
अमेरिकी राजदूत हकाबी का बयान: नील से फरात तक इजराइल का हक
Greater Israel Third Temple के एजेंडे को सबसे खुला समर्थन इजराइल में अमेरिका के राजदूत माइक हकाबी की ओर से आया। ईरान पर हमले से ठीक एक हफ्ते पहले जब हकाबी से पूछा गया कि क्या वे इजराइल के उस दावे का समर्थन करते हैं जिसमें नील नदी से लेकर फरात नदी तक की जमीन पर इजराइल के नियंत्रण की बात की गई है, तो उन्होंने जवाब दिया: “बाइबल के मुताबिक तो यह जमीन इजराइल को दी गई थी।”
यह बयान सीधे-सीधे Greater Israel की ओर इशारा करता है और दर्शाता है कि अमेरिकी प्रशासन के भीतर बैठे कई अहम लोग इस विचारधारा का खुलकर समर्थन कर रहे हैं।
Temple Mount, Al Aqsa Mosque और Third Temple: जेरूसलम का सबसे विस्फोटक मुद्दा
Greater Israel Third Temple की पूरी कहानी का केंद्र है जेरूसलम का Temple Mount। यहूदी मान्यता के अनुसार यहां एक “Foundation Stone” (नींव का पत्थर) है, जिसके बारे में यहूदियों का विश्वास है कि इसी से दुनिया की शुरुआत हुई थी। यहूदी इस जगह को Temple Mount कहते हैं, जहां उनके अनुसार एक मंदिर (Temple) हुआ करता था जिसे इतिहास में दो बार तोड़ा गया।
पहला मंदिर (First Temple) करीब 1000 ईसा पूर्व से 586 ईसा पूर्व तक था, जिसे राजा सोलोमन (King Solomon) ने बनवाया था और बेबीलोन के लोगों ने ध्वस्त कर दिया। दूसरा मंदिर (Second Temple) करीब 515 ईसा पूर्व से 70 ईस्वी तक था, जिसे रोमन साम्राज्य ने ईसाई धर्म के आगमन के बाद तोड़ दिया।
आज इसी जगह पर खड़ा है अल-अक्सा मस्जिद (Al-Aqsa Mosque) कॉम्प्लेक्स, जो इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। मुसलमान इसे वह जगह मानते हैं जहां से पैगंबर मोहम्मद स्वर्ग (मेराज) की ओर गए थे। इस ढांचे का निर्माण उमय्यद खलीफा अब्दुल मलिक इब्न मरवान ने 691-692 ईस्वी के बीच करवाया था। दूसरे मंदिर का आज सिर्फ एक हिस्सा बाकी है जिसे Western Wall (पश्चिमी दीवार) या Wailing Wall कहा जाता है, जहां इजराइली और अमेरिकी नेता अक्सर माथा टेकते दिखते हैं।
Third Temple तभी बनेगा जब Al Aqsa गिराई जाए: कट्टर जायनवादियों की मांग
Greater Israel Third Temple की अवधारणा में सबसे विस्फोटक बात यह है कि कई कट्टर जायनवादियों (Extremist Zionists) का मानना है कि Third Temple (तीसरा यहूदी मंदिर) तब तक नहीं बन सकता जब तक Al Aqsa Mosque को गिराकर पूरे कॉम्प्लेक्स को “Purify” (शुद्ध) न किया जाए। दशकों से इस जगह को एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (International Arrangement) के तहत प्रशासित किया जाता रहा है, जो इसे विशेष रूप से “Islamic Religious Shrine” का दर्जा देता है।
हालांकि मुख्यधारा के यहूदी धार्मिक नेताओं ने Third Temple के आइडिया का विरोध किया है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में मस्जिद गिराकर Third Temple बनाने की मांग को धार्मिक और राजनीतिक दोनों तरह का समर्थन मिलता रहा है। यहूदी विद्वानों (Jewish Scholars) के अनुसार Third Temple तभी बन सकता है जब “Messiah” (मसीहा) आएगा और “Kingdom of God” (ईश्वर के राज्य) की शुरुआत करेगा।
नेतन्याहू ने युद्ध के बीच दिया बड़ा बयान: “Kingdom की तरफ बढ़ रहे हैं”
Greater Israel Third Temple की दिशा में नेतन्याहू के इरादे उनकी हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस से बिल्कुल साफ हो गए हैं। युद्ध के बीच नेतन्याहू ने कहा: “We are working against Iran in many ways and in ways that would be revealed at a later stage… Israel is much stronger, much greater than it has been in the past… We need to recognize this… that we are on the way to the Kingdom.”
यानी नेतन्याहू ने खुद स्वीकार किया कि वे “Kingdom” (राज्य) की स्थापना की दिशा में काम कर रहे हैं, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि “यह अगले गुरुवार को नहीं होगा।” उन्होंने यह भी कहा कि इजराइल अब रीजनल सुपरपावर है और कई मायनों में ग्लोबल सुपरपावर भी: “These achievements are increasing the status of Israel as a superpower more than ever. We are a regional superpower. And in many respects, a global superpower. We have the power to push away threats and ensure our future.”
सैनिकों की यूनिफॉर्म पर Third Temple के पैच: युद्ध कितना धार्मिक बन चुका है?
Greater Israel Third Temple का एजेंडा सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर भी इसके सबूत दिख रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इजराइली सेना के कुछ सैनिक और यहां तक कि कुछ अमेरिकी सैनिक भी अपनी यूनिफॉर्म पर Third Temple के पैच (Patches) लगाते हैं। इजराइली सैनिक अपनी सैन्य गाड़ियों पर Al Aqsa के Conquest (विजय) के बैनर लगाते देखे गए हैं।
सबसे स्पष्ट संकेत यह है कि इस युद्ध में अमेरिका-इजराइल का पहला लक्ष्य ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह खामेनेई थे, जो न सिर्फ ईरान के राष्ट्र प्रमुख थे, बल्कि दुनिया भर के शिया मुसलमानों के धार्मिक नेता भी माने जाते थे। उन्हें रमजान के पवित्र महीने में निशाना बनाया गया। क्या इसके परिणामों के बारे में सोचा गया था? क्या दुनिया भर के मुसलमानों, खासतौर पर शिया समुदाय में दशकों तक फैलने वाली नफरत इसी का मकसद था?
इजराइल का असली एंड गेम: अमेरिका और ईरान दोनों को कमजोर करना
विशेषज्ञों के मुताबिक Greater Israel Third Temple प्रोजेक्ट को समझने के लिए इजराइल की पूरी रणनीति को देखना होगा। इजराइल जानता था कि वह अकेले ईरान से लोहा नहीं ले सकता। इसीलिए उसने बरसों से एक ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति की तलाश की जो ईरान पर हमला करवा सके। कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों को प्रभावित करने की कोशिश की गई, और अंतत: उन्हें मिले डोनाल्ड ट्रंप, जिन्हें विश्लेषक “Useful Idiot” (इस्तेमाल होने वाला मूर्ख) बता रहे हैं, जिसने इजराइल का काम कर दिया।
विश्लेषकों का मानना है कि इजराइल दरअसल चाहता है कि ईरान और अमेरिका दोनों एक-दूसरे को भारी नुकसान पहुंचाएं, ताकि इस लड़ाई के बाद इजराइल और मजबूत और ताकतवर उभरे। ईरान पर जो हमला हुआ, गाजा में जो नरसंहार हुआ, लेबनान पर जो कब्जा चल रहा है, वेस्ट बैंक में जो आतंक चल रहा है, यह सब Greater Israel Third Temple प्रोजेक्ट का जीता-जागता हिस्सा है।
अब तो अमेरिकी नागरिकों को भी साफ दिखने लगा है कि उनका देश इजराइल चला रहा है, उनका राष्ट्रपति इजराइल का कठपुतली (Puppet) है, और अमेरिकी जनता के कल्याण (Welfare) से पहले इजराइल के कल्याण के बारे में सोचा जाता है।
1948 से अब तक: इजराइल ने कितनी जमीन पर कब्जा कर लिया?
Greater Israel Third Temple के सपने को समझने के लिए इजराइल के विस्तार का इतिहास देखना जरूरी है। आज का इजराइल 1948 में ब्रिटिश मैंडेट फॉर पैलेस्टाइन से बना। यह मैंडेट प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन के फिलिस्तीन पर कब्जे के बाद बनाया गया था। मैंडेट खत्म होने के बाद 1948 के अरब-इजराइली युद्ध में इजराइल ने लगभग पूरे मैंडेटरी पैलेस्टाइन पर कब्जा कर लिया, वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी को छोड़कर।
फिर 1967 में इजराइल ने अरब सेनाओं को हराकर वेस्ट बैंक, गाजा, मिस्र का सिनाई प्रायद्वीप (Sinai Peninsula) और सीरिया के गोलान हाइट्स (Golan Heights) पर भी कब्जा कर लिया। तब से लेकर आज तक इजराइल ने अंतरराष्ट्रीय कानून को दरकिनार करके फिलिस्तीनी और सीरियाई जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखा है (सिनाई प्रायद्वीप को छोड़कर जो 1982 में मिस्र को वापस कर दिया गया)। और पिछले कुछ सालों में इजराइल ने अपने पड़ोसी देशों की संप्रभुता को ताक पर रखकर सीरिया और लेबनान की जमीन पर भी कब्जा जमा लिया है।
क्या रोका जा सकता है Greater Israel का सपना?
Greater Israel Third Temple को लेकर जब क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई और धार्मिक भविष्यवाणी एक-दूसरे को ओवरलैप करने लगें, तो लड़ाइयां और भी जटिल हो जाती हैं। ऐसी लड़ाइयों का असर न सिर्फ एक क्षेत्र तक और न ही एक पीढ़ी तक सीमित रहता है। ये दशकों और सदियों तक महसूस की जा सकती हैं।
जेरूसलम और Al Aqsa सिर्फ जमीन के टुकड़े नहीं हैं। ये आस्था, पहचान और इतिहास का केंद्र हैं। अगर यह लड़ाई सच में एक धर्मयुद्ध बन चुकी है, तो इसका अंजाम सिर्फ मध्य पूर्व का भविष्य नहीं, बल्कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और वैश्विक स्थिरता का रुख बदल सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि इसे रोकना मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं। इसके लिए अमेरिकी जनता को जागना होगा और समझना होगा कि इजराइल उनके देश और उनके राष्ट्रपति को अपने मकसद के लिए कैसे इस्तेमाल कर रहा है।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
- इजराइल Greater Israel Third Temple प्रोजेक्ट के तहत नील नदी से फरात नदी तक की जमीन पर दावा कर रहा है, जिसमें फिलिस्तीन, लेबनान, सीरिया, इराक, जॉर्डन, मिस्र और सऊदी अरब के हिस्से शामिल हैं।
- नेतन्याहू ने युद्ध के बीच इजराइल को “Regional और Global Superpower” बताया और कहा कि वे “Kingdom” की स्थापना की दिशा में काम कर रहे हैं।
- अमेरिकी अधिकारी पीट हेक्सेथ और राजदूत माइक हकाबी ने खुलकर Third Temple और Greater Israel का समर्थन किया है।
- विशेषज्ञों के मुताबिक इजराइल चाहता है कि ईरान और अमेरिका दोनों एक-दूसरे को कमजोर करें, ताकि इजराइल सबसे ताकतवर उभरे।








