Iran Iraq War History आज फिर से चर्चा में है, क्योंकि मिडिल ईस्ट में एक बार फिर ईरान युद्ध की आग में जल रहा है। सितंबर 1980 में सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में इराकी सेना ने ईरान पर हमला कर दिया था। यह जंग पूरे आठ साल यानी 1988 तक चली और इसने न सिर्फ दोनों देशों को तबाह किया, बल्कि पूरे अरब वर्ल्ड और विश्व की स्थिरता को खतरे में डाल दिया था। शिया-सुन्नी टकराव, तेल के लिए होड़, जमीनी विवाद और महाशक्तियों की दखलंदाजी: इस युद्ध की हर परत आज भी मिडिल ईस्ट की राजनीति को समझने की चाबी है।
इराक ने ईरान पर हमला क्यों किया: सद्दाम हुसैन की गणना और डर
Iran Iraq War History को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर इराक ने ईरान पर हमले का फैसला क्यों किया। उस दौर में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के पास हमला करने के कई मजबूत कारण थे।
सबसे बड़ा कारण था ईरान से फैलते ‘मिलिटेंट इस्लाम’ का डर। 1979 में आयतुल्लाह खुमैनी की अगुआई में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई थी। खुमैनी और उनके कट्टर शिया समर्थकों ने ईरान को इस्लामिक रिपब्लिक में बदल दिया। उनका मानना था कि पूरे देश को इस्लामी कानून के अनुसार चलाया जाना चाहिए, जिसमें सख्त नैतिक आचार संहिता को कठोर सजाओं के जरिए लागू किया जाए। खुमैनी के अनुसार कानून बनाने का अधिकार सिर्फ अल्लाह के पास है।
शिया-सुन्नी टकराव: इराक के भीतर का डर
Iran Iraq War History में शिया-सुन्नी विवाद एक अहम कड़ी था। इराक की आबादी मुख्य रूप से सुन्नी मुस्लिमों की थी, लेकिन वहां बड़ी संख्या में शिया मुसलमान भी रहते थे। ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद सद्दाम हुसैन को गहरा डर सता रहा था कि ईरान की सीमा से होकर कट्टर शिया विचारधारा इराक में फैल सकती है और शिया मुसलमान उनकी सरकार के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं।
सद्दाम हुसैन की सरकार गैर-धार्मिक (सेक्युलर) थी। इस डर के चलते उन्होंने 1980 की शुरुआत में कई शिया नेताओं को फांसी दे दी। जवाब में ईरान ने इराकी सीमा पर सैन्य छापे (रेड्स) शुरू कर दिए। इस तरह शिया-सुन्नी तनाव इस युद्ध की एक प्रमुख वजह बना।
शत्त अल-अरब जलमार्ग: तेल और जमीन का विवाद
Iran Iraq War History का एक और बड़ा कारण था शत्त अल-अरब जलमार्ग को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद। यह जलमार्ग दोनों देशों के तेल निर्यात के लिए बेहद अहम था और दोनों की सीमा रेखा का हिस्सा भी।
एक समय पर शत्त अल-अरब पूरी तरह इराकी नियंत्रण में हुआ करता था। लेकिन 1975 में ईरान की सरकार ने इराक को मजबूर किया कि वह इसका नियंत्रण ईरान के साथ साझा करे। सद्दाम हुसैन इस अपमान को कभी भूल नहीं पाए और इसका बदला लेना चाहते थे।
इसके अलावा इराक का दावा था कि ईरान का सीमावर्ती प्रांत खुजेस्तान असल में इराक का होना चाहिए, क्योंकि वहां ज्यादातर अरब रहते थे। सद्दाम को उम्मीद थी कि ये अरब लोग इराक का साथ देंगे। यहां यह समझना जरूरी है कि ईरान के ज्यादातर लोग फारसी (पर्शियन) हैं, अरब नहीं।
सद्दाम की सबसे बड़ी गलती: ईरान को कमजोर समझना
सद्दाम हुसैन ने यह भी सोचा था कि इस्लामिक क्रांति के तुरंत बाद ईरानी सेना कमजोर और मनोबल टूटा हुआ होगी, इसलिए उन्हें जल्दी जीत मिल जाएगी। लेकिन Iran Iraq War History का सबसे बड़ा सबक यही है कि सद्दाम ने स्थिति का गंभीर गलत अंदाजा लगाया।
इराक ने हमले की शुरुआत विवादित शत्त अल-अरब जलमार्ग को कब्जे में लेकर की। लेकिन ईरान ने बहुत तेजी से खुद को संगठित किया। ईरानी रेवोल्यूशनरी गार्ड्स जो अपने धर्म से प्रेरित थे और शहीद होने के लिए पूरी तरह तैयार थे, उन्होंने जबरदस्त जुनून के साथ जवाबी हमला किया। उन्होंने भारी किलेबंद इराकी मोर्चों पर पैदल सेना के बड़े हमले किए।
कागज पर इराक मजबूत, जमीन पर ईरान का जवाब
कागज पर देखें तो इराक बहुत ज्यादा ताकतवर दिख रहा था। सोवियत संघ ने उसे टैंक, हेलीकॉप्टर गनशिप और मिसाइलें दी थीं। इसके अलावा कुछ ब्रिटिश और अमेरिकी हथियार भी उसके पास थे। लेकिन ईरानी रेवोल्यूशनरी गार्ड्स का धार्मिक जुनून और लड़ने का अदम्य साहस इराकी सैन्य ताकत पर भारी पड़ा।
कुछ समय बाद ईरान को भी आधुनिक हथियार मिलने लगे। एंटी-एयरक्राफ्ट और एंटी-टैंक मिसाइलें चीन और उत्तर कोरिया से आने लगीं। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि अमेरिका भी गुपचुप तरीके से ईरान को सैन्य उपकरण सप्लाई कर रहा था। यानी अमेरिका दोनों तरफ खेल रहा था। इससे ईरान की स्थिति धीरे-धीरे मजबूत होती गई।
युद्ध का विस्तार: बसरा पर मंडराया खतरा
जैसे-जैसे Iran Iraq War History में यह जंग लंबी खिंचती गई, इराक ने ईरान के तेल निर्यात को ध्वस्त करने पर जोर दिया, क्योंकि इसी से ईरान अपनी हथियारों की खरीदारी का खर्चा उठा पा रहा था। लेकिन ईरान ने भी पलटवार करते हुए इराकी जमीन पर कब्जा करना शुरू कर दिया।
1987 की शुरुआत तक हालात यह हो गए कि ईरानी सैनिक इराक की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण शहर बसरा से मात्र 10 मील की दूरी पर पहुंच गए। बसरा को खाली करने की नौबत आ गई थी। इस मोड़ पर जमीनी विवाद कहीं पीछे छूट गया और यह युद्ध गहरे नस्लीय और धार्मिक संघर्ष में बदल चुका था। खुमैनी ने कसम खा ली थी कि वह तब तक लड़ना नहीं छोड़ेंगे जब तक सद्दाम हुसैन की ‘नास्तिक’ सरकार पूरी तरह तबाह नहीं हो जाती।
अंतरराष्ट्रीय असर: पूरा अरब जगत बंट गया
Iran Iraq War History का एक सबसे अहम पहलू यह था कि इस युद्ध ने पूरे अरब जगत को दो खेमों में बांट दिया। सऊदी अरब, जॉर्डन और कुवैत जैसे रूढ़िवादी देश इराक को आर्थिक मदद दे रहे थे। वहीं सीरिया, लीबिया, अल्जीरिया और दक्षिणी यमन जैसे देश इराक की आलोचना कर रहे थे। उनका कहना था कि इराक ने ऐसे समय में युद्ध शुरू किया जब सभी अरब देशों को मिलकर इजराइल के खिलाफ एकजुट होना चाहिए था।
सऊदी अरब और गल्फ देश खुमैनी के कट्टर इस्लाम से खौफजदा थे और नहीं चाहते थे कि ईरान पर्शियन गल्फ पर अपना दबदबा बनाए। नवंबर 1980 में जॉर्डन की राजधानी अम्मान में होने वाली अरब शिखर सम्मेलन (समिट कॉन्फ्रेंस) नाकाम रही क्योंकि सीरिया के नेतृत्व में इराक-विरोधी देशों ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया। इस सम्मेलन का मकसद इजराइल से निपटने की नई रणनीति बनाना था। मतलब ईरान-इराक युद्ध ने अरब एकता की कमर तोड़ दी।
तेल युद्ध और महाशक्तियों का आगमन
Iran Iraq War History में तेल की राजनीति ने इस युद्ध को वैश्विक संकट में बदल दिया। इराक द्वारा ईरान के तेल निर्यात पर लगातार हमलों ने पश्चिमी देशों की तेल आपूर्ति को खतरे में डाल दिया। कई मौकों पर अमेरिकी, रूसी, ब्रिटिश और फ्रांसीसी युद्धपोतों को इस क्षेत्र में आना पड़ा, जिससे तनाव और बढ़ गया।
1987 में स्थिति और भी भयावह हो गई। पर्शियन गल्फ में तेल टैंकरों को समुद्री बारूदी सुरंगों (माइंस) से धमकाया जा रहा था, चाहे उनकी राष्ट्रीयता कोई भी हो। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि ये बारूदी सुरंगें किसने बिछाई हैं, इस पर कोई सहमति नहीं बन पाई। बसरा पर ईरान के बढ़ते खतरे ने सभी गैर-धार्मिक अरब सरकारों के कान खड़े कर दिए। यहां तक कि सीरिया के राष्ट्रपति हाफिज अल-असद, जो शुरू में ईरान के प्रबल समर्थक थे, वो भी चिंतित होने लगे कि कहीं इराक टूटकर एक और लेबनान न बन जाए, क्योंकि इससे सीरिया खुद अस्थिर हो सकता था।
युद्ध का अंत: 1988 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता
Iran Iraq War History के अंतिम अध्याय में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की अहम भूमिका रही। जनवरी 1987 में कुवैत में एक इस्लामिक कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई जिसमें 44 देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। लेकिन ईरान के नेताओं ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया और युद्ध खत्म करने पर कोई सहमति नहीं बन पाई।
बल्कि 1987 के अंत में युद्ध अपने सबसे भयानक दौर में पहुंच गया। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की राजधानियों तेहरान और बगदाद पर बमबारी शुरू कर दी, जिसमें हजारों निर्दोष नागरिक मारे गए। आठ साल तक चले इस युद्ध में कोई नतीजा नजर नहीं आ रहा था। कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं था। सद्दाम ‘पूर्ण विजय’ की बात करते थे और ईरान ‘पूर्ण समर्पण’ की मांग।
लेकिन युद्ध की कीमत बहुत बढ़ चुकी थी: आर्थिक रूप से भी और लाखों इंसानी जानों के संदर्भ में भी। अंततः यूएन ने दोनों पक्षों के साथ बैठकर सीधी बातचीत की और अगस्त 1988 में युद्ध विराम (सीजफायर) कराने में सफलता मिली। इसे यूएन सैनिकों द्वारा मॉनिटर किया गया। अक्टूबर 1988 में शांति वार्ता शुरू हुई और अंततः 1990 में दोनों पक्ष शर्तों पर सहमत हो गए। करीब दस साल बाद यह खूनी संघर्ष आखिरकार खत्म हुआ।
आज के मिडिल ईस्ट के लिए क्या सबक छोड़ गई यह जंग
Iran Iraq War History से मिलने वाला सबसे बड़ा सबक यह है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं करता, बल्कि और ज्यादा समस्याएं खड़ी कर देता है। सद्दाम हुसैन का ईरान पर हमला एक भयंकर गलती साबित हुई। इस गलती का खामियाजा सिर्फ इराक ने नहीं, पूरी दुनिया ने भुगता। आज भी मिडिल ईस्ट इतना अस्थिर क्षेत्र है कि अगर इस तरह की गलती दोबारा हुई तो उसके परिणाम पहले से कहीं ज्यादा भयानक हो सकते हैं।
आज जब ईरान एक बार फिर युद्ध के बीच में है और मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर है, तो 1980-88 के इस युद्ध की कहानी याद दिलाती है कि शिया-सुन्नी विभाजन, तेल की राजनीति और महाशक्तियों की दखलंदाजी कैसे एक पूरे क्षेत्र को दशकों तक अस्थिर कर सकती है। अमेरिका का दोनों तरफ खेलना, अरब एकता का टूटना और लाखों निर्दोषों की जान जाना: ये सब सबक आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने चार दशक पहले थे।
मुख्य बातें (Key Points)
- Iran Iraq War 1980 से 1988 तक आठ साल चला, जिसमें सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया लेकिन जल्दी जीत की उम्मीद धरी रह गई।
- युद्ध के मुख्य कारण शिया-सुन्नी टकराव, शत्त अल-अरब जलमार्ग विवाद, खुजेस्तान प्रांत पर दावा और ईरान की इस्लामिक क्रांति का डर था।
- अमेरिका, सोवियत संघ, चीन, उत्तर कोरिया सहित कई देशों ने दोनों पक्षों को हथियार सप्लाई किए और अमेरिका गुपचुप ईरान को भी मदद कर रहा था।
- अगस्त 1988 में यूएन की मध्यस्थता से सीजफायर हुआ और 1990 में शांति समझौता हुआ, लेकिन इस युद्ध ने पूरे अरब जगत और विश्व की स्थिरता को गहरा नुकसान पहुंचाया।








