LPG Crisis India के बीच देशभर में इंडक्शन कुकटॉप की मांग तेजी से बढ़ गई है। मिडिल ईस्ट में चल रही जंग की वजह से भारत के कई शहरों में एलपीजी सिलेंडर के लिए मारामारी मच गई है। लोगों को सिलेंडर मिलने में दिक्कत हो रही है और कीमतें भी बढ़ रही हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में लोग इंडक्शन कुकटॉप का रुख कर रहे हैं, जिसकी वजह से इनकी कीमतों में भी उछाल देखने को मिल रहा है। लेकिन इंडक्शन खरीदने से पहले कई जरूरी सवालों के जवाब जानना बेहद अहम है: गैस के मुकाबले इंडक्शन कितना सस्ता या महंगा पड़ता है, यह काम कैसे करता है और इसमें कौन से बर्तन इस्तेमाल करने चाहिए।
गैस में आधी ऊर्जा बर्बाद, इंडक्शन में 90 प्रतिशत काम आती है
LPG Crisis India के बीच अगर आप भी इंडक्शन खरीदने की सोच रहे हैं तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि गैस और इंडक्शन में ऊर्जा के इस्तेमाल का फर्क कितना बड़ा है। जब आप एलपीजी गैस से खाना बनाते हैं तो सिलेंडर से निकलने वाली गैस बर्नर में जलती है और इससे बर्तन गर्म होता है। लेकिन यहां एक बड़ी दिक्कत है।
जितनी गैस आपके सिलेंडर में होती है वो पूरी की पूरी बर्तन गर्म करने में इस्तेमाल नहीं हो पाती। इसे ऐसे समझिए कि जैसे आप डियोड्रेंट मारते हैं तो ज्यादातर हवा में चला जाता है और आपके शरीर पर बहुत कम लगता है। ठीक वैसे ही गैस से जो ऊर्जा निकलती है उसका सिर्फ 50 प्रतिशत ही असल में बर्तन गर्म करने में लग पाता है। बाकी ऊर्जा इधर-उधर आसपास की हवा में और बर्नर गर्म करने में बर्बाद हो जाती है।
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इंडक्शन में ऐसा नहीं होता। इंडक्शन कुकटॉप में 80 से 90 प्रतिशत ऊर्जा सीधे बर्तन को गर्म करने में इस्तेमाल होती है। यानी बर्बादी लगभग न के बराबर। यही वो सबसे बड़ा फायदा है जो इंडक्शन को गैस से बेहतर बनाता है।
स्टडी में साबित: इलेक्ट्रिक कुकिंग गैस से सस्ती
कीमत के मामले में भी इंडक्शन कई मामलों में गैस से बेहतर साबित होता है। इंस्टीट्यूट ऑफ एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) की दिल्ली में हुई एक स्टडी में पाया गया कि एलपीजी या पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) के मुकाबले इलेक्ट्रिक कुकिंग ज्यादा सस्ती पड़ रही थी।
हालांकि इंडक्शन के साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं जिन्हें समझना जरूरी है। आमतौर पर इंडक्शन कुकटॉप में एक ही स्टोव होता है, यानी एक बार में सिर्फ एक बर्तन रखा जा सकता है। जबकि गैस के ज्यादातर चूल्हों में दो या उससे ज्यादा बर्नर आते हैं। इसका मतलब है कि या तो आपको एक साथ दो इंडक्शन चलाने पड़ेंगे या फिर बारी-बारी करके खाना बनाना पड़ेगा।
खासकर रेस्टोरेंट और ढाबों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। गैस में बड़े-बड़े बर्नर मिल जाते हैं जिन पर भारी-भारी पतीले भी आसानी से लग जाते हैं। इंडक्शन में ऐसा करना मुश्किल है, जिसकी वजह से व्यावसायिक इस्तेमाल में यह महंगा पड़ सकता है। लेकिन सामान्य घरेलू इस्तेमाल के लिए इंडक्शन निश्चित रूप से किफायती विकल्प है।
इंडक्शन काम कैसे करता है: विज्ञान की कहानी
LPG Crisis India में अगर आप इंडक्शन खरीद रहे हैं तो यह जानना बहुत जरूरी है कि यह काम कैसे करता है, क्योंकि इसी से समझ आएगा कि इसमें कौन से बर्तन चलेंगे और कौन से नहीं।
अगर आपने कभी इंडक्शन को गौर से देखा हो तो उसके ऊपर एक गोला बना होता है। यह सिर्फ डिजाइन के लिए नहीं है। यह असल में वो जगह है जहां पूरी कहानी घटती है। इस गोले के ठीक नीचे तांबे की एक कॉइल होती है। जब आप इंडक्शन चालू करते हैं तो इस कॉइल में करंट दौड़ने लगता है।
इस करंट की वजह से कॉइल के चारों तरफ एक मैग्नेटिक फील्ड यानी चुंबकीय क्षेत्र बनता है। इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए: जब आप किसी नदी या झरने के पास जाते हैं तो महसूस करते हैं कि आसपास ठंडा-ठंडा लग रहा है। यानी नदी की धारा का असर पानी से दूर भी आप पर पड़ता है। कुछ वैसे ही कॉइल में करंट की वजह से आसपास चुंबकीय क्षेत्र बनता है जो ऊपर रखे बर्तन तक पहुंचता है।
फैराडे का सिद्धांत: इंडक्शन की असली ताकत
अगर आपने स्कूल में विज्ञान की क्लास में ध्यान दिया होगा तो माइकल फैराडे का नाम जरूर सुना होगा। फैराडे ने बताया था कि जब मैग्नेटिक फील्ड की दिशा लगातार बदलती रहती है तो इस बदलते हुए चुंबकीय प्रवाह (मैग्नेटिक फ्लक्स) की वजह से वोल्टेज और करंट पैदा होता है।
ठीक यही इंडक्शन में होता है। जब कॉइल से बनी मैग्नेटिक फील्ड ऊपर रखे बर्तन तक पहुंचती है तो बर्तन के अंदर करंट पैदा होता है। इसे “एडी करंट” कहते हैं। यही एडी करंट बर्तन को गर्म करता है। और सबसे अहम बात यह है कि सिर्फ बर्तन ही गर्म होता है, इंडक्शन कुकटॉप नहीं। इंडक्शन की सतह कांच या सिरेमिक से बनी होती है जिसमें करंट नहीं बनता। हां, बर्तन की गर्मी से यह सतह थोड़ी-बहुत गर्म जरूर हो सकती है।
यही वजह है कि इंडक्शन में ऊर्जा की बर्बादी लगभग न के बराबर होती है। गैस में आग चारों तरफ फैलती है और हवा भी गर्म होती है। लेकिन इंडक्शन में सारी ऊर्जा सीधे बर्तन में ही जाती है। और यह करंट सिर्फ बर्तन में ही रहता है, आपको इससे झटका नहीं लगेगा। फिर भी सतर्क रहने में ही भलाई है।
इंडक्शन पर कौन से बर्तन चलेंगे और कौन से नहीं
LPG Crisis India में इंडक्शन खरीदने से पहले सबसे जरूरी बात यह जानना है कि आपके किचन के सामान्य बर्तन इस पर काम नहीं करेंगे। इसकी वजह वही विज्ञान है जो हमने ऊपर समझा।
चूंकि इंडक्शन मैग्नेटिक फील्ड यानी चुंबकीय क्षेत्र के जरिए काम करता है, इसलिए बर्तन में भी चुंबक जैसी प्रॉपर्टी होनी चाहिए। तभी मैग्नेटिक फील्ड बर्तन में एडी करंट पैदा कर पाएगी और बर्तन गर्म होगा। हालांकि मैग्नेटिक फील्ड एल्युमीनियम जैसी धातुओं तक भी पहुंच सकती है, लेकिन इनमें उतनी ज्यादा गर्मी पैदा नहीं हो पाती जितनी खाना पकाने के लिए चाहिए।
इसलिए इंडक्शन पर ऐसे बर्तन रखने चाहिए जिनके तले में लोहा (आयरन) या स्टेनलेस स्टील जैसे फेरोमैग्नेटिक मटेरियल लगे हों। फेरोमैग्नेटिक का मतलब है ऐसी धातु जिसमें चुंबकीय गुण हों।
बर्तन खरीदते समय इन बातों का ध्यान रखें: बर्तन पर “इंडक्शन फ्रेंडली” लिखा हो या कॉइल का आइकन बना हो। बर्तन का तला चपटा (फ्लैट) होना चाहिए ताकि वो इंडक्शन की पूरी कॉइल के ऊपर अच्छे से फिट हो जाए और बेहतर तरीके से गर्म हो। गोल तले या उभरे हुए तले वाले बर्तनों में गर्मी ठीक से नहीं पहुंच पाती।
आम आदमी के लिए क्या मायने रखता है यह बदलाव
मिडिल ईस्ट में जारी जंग का असर सीधे भारतीय किचन तक पहुंच गया है। एलपीजी सिलेंडरों की किल्लत ने लोगों को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है। इंडक्शन कुकटॉप एक अच्छा विकल्प है, लेकिन इसके साथ कुछ शुरुआती खर्चे भी जुड़े हैं। इंडक्शन खरीदने का खर्चा, इंडक्शन फ्रेंडली बर्तनों का खर्चा और बिजली का बिल, ये सब मिलाकर देखना होगा। लेकिन लंबे समय में अगर बिजली की दरें स्थिर रहीं और एलपीजी की कीमतें बढ़ती रहीं, तो इंडक्शन निश्चित रूप से ज्यादा किफायती साबित होगा। ऊर्जा दक्षता के मामले में तो इंडक्शन पहले से ही गैस से कहीं आगे है।
मुख्य बातें (Key Points)
- मिडिल ईस्ट में जंग की वजह से भारत में कई शहरों में एलपीजी सिलेंडरों की किल्लत हो गई है, जिससे इंडक्शन कुकटॉप की मांग और कीमतें दोनों बढ़ गई हैं।
- गैस में सिर्फ 50% ऊर्जा बर्तन गर्म करने में लगती है जबकि इंडक्शन में 80 से 90% ऊर्जा सीधे काम आती है, IEEFA की दिल्ली स्टडी में भी इलेक्ट्रिक कुकिंग एलपीजी से सस्ती पाई गई।
- इंडक्शन मैग्नेटिक फील्ड और एडी करंट के सिद्धांत पर काम करता है, इसमें सिर्फ बर्तन गर्म होता है कुकटॉप नहीं, इसीलिए ऊर्जा की बर्बादी लगभग शून्य होती है।
- इंडक्शन पर सिर्फ लोहे या स्टेनलेस स्टील जैसे फेरोमैग्नेटिक तले वाले “इंडक्शन फ्रेंडली” चपटे बर्तन ही इस्तेमाल करने चाहिए, एल्युमीनियम या तांबे के सामान्य बर्तन इस पर काम नहीं करते।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सवाल 1: क्या इंडक्शन कुकटॉप गैस चूल्हे से सस्ता पड़ता है?
IEEFA की दिल्ली स्टडी के मुताबिक एलपीजी या पीएनजी के मुकाबले इलेक्ट्रिक कुकिंग ज्यादा सस्ती पड़ती है। इंडक्शन में 80-90% ऊर्जा काम आती है जबकि गैस में सिर्फ 50%। हालांकि शुरुआत में इंडक्शन खरीदने और इंडक्शन फ्रेंडली बर्तनों का अतिरिक्त खर्चा आता है, लेकिन लंबे समय में यह किफायती साबित होता है।
सवाल 2: इंडक्शन पर कौन से बर्तन काम करते हैं?
इंडक्शन पर सिर्फ वही बर्तन काम करते हैं जिनके तले में लोहा (आयरन) या स्टेनलेस स्टील जैसे फेरोमैग्नेटिक मटेरियल हों। बर्तन पर “इंडक्शन फ्रेंडली” लिखा होना चाहिए या कॉइल का आइकन बना होना चाहिए। बर्तन का तला चपटा होना जरूरी है। एल्युमीनियम, तांबे या मिट्टी के बर्तन इंडक्शन पर काम नहीं करते।
सवाल 3: इंडक्शन कुकटॉप कैसे काम करता है?
इंडक्शन के अंदर तांबे की एक कॉइल होती है जिसमें बिजली का करंट दौड़ता है। इससे चारों तरफ मैग्नेटिक फील्ड बनती है जो ऊपर रखे फेरोमैग्नेटिक बर्तन में “एडी करंट” पैदा करती है। यही एडी करंट बर्तन को गर्म करता है। सिर्फ बर्तन गर्म होता है, कुकटॉप नहीं, इसीलिए ऊर्जा की बर्बादी लगभग न के बराबर होती है।








