Saudi Arabia US Relations की कहानी दुनिया की सबसे चौंकाने वाली भू-राजनीतिक गुत्थियों में से एक है। एक ऐसा देश जिसके पास न परमाणु हथियार हैं, न चीन जैसी विनिर्माण शक्ति, और न ही खुद को टिकाए रखने लायक पानी, लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका उससे डरती है। 1990 में जब सद्दाम हुसैन ने सऊदी अरब को धमकी दी तो अमेरिका ने करीब 5 लाख सैनिक भेजकर इस रेगिस्तानी राज्य की रक्षा की। 9/11 हमले में 19 में से 15 अपहरणकर्ता सऊदी नागरिक थे, फिर भी अमेरिका ने सऊदी अरब पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया, कोई कार्रवाई नहीं की, बल्कि अफगानिस्तान और इराक में दशकों लंबी जंग लड़ी और सऊदी अरब के साथ रिश्ते जस के तस रखे। इसके पीछे छिपी है पेट्रोडॉलर की वो कहानी जिसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की किस्मत लिख दी।
दोहरा मापदंड: रूस पर प्रतिबंध, सऊदी को हथियार
Saudi Arabia US Relations का सबसे चौंकाने वाला पहलू अमेरिका का दोहरा मापदंड है। जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो अमेरिका ने 300 अरब डॉलर की रूसी संपत्ति जब्त कर ली, रूसी बैंकों को वैश्विक स्विफ्ट भुगतान प्रणाली से बाहर कर दिया और उसकी अर्थव्यवस्था को तबाह करने वाले प्रतिबंध लगा दिए। संदेश बिल्कुल साफ था कि अगर आप विनाशकारी युद्ध छेड़ोगे तो हम आपका देश बर्बाद कर देंगे।
लेकिन जब सऊदी अरब ने यमन पर सैन्य हमला किया तो क्या हुआ? 3 लाख 77 हजार लोग बमबारी, भुखमरी और बीमारियों से मारे गए। 2 करोड़ 10 लाख लोगों को अत्यंत मानवीय सहायता की जरूरत पड़ी। संयुक्त राष्ट्र ने इसे “दुनिया का सबसे बुरा मानवीय संकट” करार दिया। लेकिन अमेरिका ने क्या किया? कुछ नहीं। बल्कि उल्टा अमेरिका ने सऊदी अरब को सटीक निर्देशित बम बेचे, लक्ष्य निर्धारण के लिए खुफिया जानकारी दी और अमेरिकी वायु सेना ने हवा में ही सऊदी लड़ाकू विमानों में ईंधन भरा ताकि वे बमबारी जारी रख सकें।
अगर तेल से ताकत आती तो ईरान, वेनेजुएला, लीबिया भी सुरक्षित होते
यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर सिर्फ तेल किसी देश को ताकतवर बनाता तो ईरान, वेनेजुएला, लीबिया और इराक को भी वही सुरक्षा मिलनी चाहिए थी। इन सभी के पास तेल था। लेकिन जबकि इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर प्रतिबंध लगाए गए, उन्हें अस्थिर किया गया या उन पर सीधा हमला किया गया, वहीं अमेरिका बार-बार सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपनी सेना तक तैनात करता रहा।
तो फिर ऐसा क्या खास है इस रेगिस्तानी राज्य में कि दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु महाशक्ति तक उसकी हिफाजत करती है? इसका जवाब छिपा है 1971 की उस रात में जब अमेरिका दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया था।
1971: जब अमेरिका लगभग दिवालिया हो गया था
Saudi Arabia US Relations की जड़ें समझने के लिए हमें 1971 में लौटना होगा। दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्था में तीन बड़ी चीजें हुई थीं।
पहली बात, युद्ध के बाद अमेरिका के पास दुनिया का 70 प्रतिशत सोना था और बाकी सभी देश तबाही के कगार पर थे। इसलिए 1944 में अमेरिका ने सभी देशों को इकट्ठा करके कहा कि आपको अपनी तिजोरी में सोना रखने की जरूरत नहीं, आप अपने सभी अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल कर सकते हैं। और अमेरिका ने वादा किया कि हर 35 डॉलर के बदले एक औंस सोना दिया जाएगा। इसी ब्रेटन वुड्स प्रणाली की वजह से पूरी दुनिया ने अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल शुरू किया क्योंकि डॉलर सोने जितना भरोसेमंद था।
लेकिन दूसरी बात यह हुई कि अमेरिका ने इस भरोसे का फायदा उठाना शुरू कर दिया। अगले 25 सालों में अमेरिका ने कुछ ऐसा किया जो किसी पोंजी स्कीम से कम नहीं था। अगर अमेरिका ने 10 अरब डॉलर छापे हैं तो उसके पास 10 अरब डॉलर का सोना भी होना चाहिए था। लेकिन अमेरिका ने इतने पैसे छाप दिए कि 1970 तक जब दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों के पास 40 से 50 अरब डॉलर जमा थे, अमेरिका की तिजोरी में सिर्फ 10 अरब डॉलर का सोना बचा था।
यह एक खुला पोंजी स्कीम था। अगर तीन-चार देश मिलकर 12 अरब डॉलर लेकर आ जाते तो अमेरिका के पास देने को सोना ही नहीं होता और वो दिवालिया हो जाता।
फ्रांस ने शुरू की डॉलर की वापसी, ब्रिटेन ने दिया आखिरी झटका
1965 में फ्रांस के राष्ट्रपति ने अमेरिकी डॉलर पर भरोसा खोना शुरू कर दिया और डॉलर वापस करके सोने की मांग शुरू कर दी। फिर स्विट्जरलैंड ने भी यही किया। और आखिरकार अगस्त 1971 में ब्रिटेन ने अमेरिकी खजाने में 3 अरब डॉलर नकद रखकर सोने की मांग कर दी।
रिचर्ड निक्सन को समझ आ गया कि अमेरिका दिवालिया होने वाला है। 15 अगस्त 1971 की शाम निक्सन ने लाइव टेलीविजन पर आकर घोषणा कर दी कि अब डॉलर को सोने में बदलने की सुविधा बंद। यह निक्सन शॉक के नाम से जाना जाता है।
एक झटके में अमेरिकी डॉलर सोने जितना कीमती होने से गिरकर सिर्फ एक कागज का टुकड़ा बनकर रह गया। अब सवाल यह था कि अगर डॉलर बेकार है तो जापान, फ्रांस या जर्मनी अपनी मुद्रा क्यों न इस्तेमाल करें? अमेरिकी डॉलर क्यों? अगर उस वक्त दुनिया के देशों ने अपने 60 अरब डॉलर वापस कर दिए होते और बदले में कुछ ठोस मांगा होता तो अमेरिका में भयंकर महंगाई आती और उसकी अर्थव्यवस्था तबाह हो जाती।
सोने के बिना जी सकते हो, तेल के बिना नहीं: वो सच जिसने सब बदला
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि वॉशिंगटन के सबसे तेज दिमागों ने आधुनिक औद्योगिक दुनिया की एक बुनियादी सच्चाई समझ ली थी: कोई भी देश सोने की ईंटों के बिना जी सकता है, लेकिन दुनिया का कोई भी देश तेल के बिना नहीं जी सकता।
1970 के दशक में जापान, जर्मनी या ब्रिटेन को देखिए। आप अपना देश बिना सोने के चला सकते हैं, लेकिन अपने कारखाने, कार्गो जहाज और अपने घरों को गर्म करने के लिए आपको तेल चाहिए ही चाहिए। और अंदाजा लगाइए कि धरती पर सबसे बड़ा, सबसे सस्ता और सबसे मुनाफेदार तेल भंडार किसके पास बैठा था? सऊदी अरब के पास। दुनिया के ज्ञात तेल भंडार का एक चौथाई हिस्सा इसी रेगिस्तानी राज्य के नीचे दबा था।
1974 की गुप्त डील: सदी का सबसे बड़ा सौदा
Saudi Arabia US Relations का सबसे निर्णायक मोड़ 1974 में आया। अमेरिका के वित्त मंत्री विलियम साइमन को एक गुप्त मिशन पर जेद्दा भेजा गया ताकि वो सदी की सबसे बड़ी डील पेश कर सकें।
इस डील में अमेरिका ने सऊदी शाही परिवार को वो चीज दी जो किसी और देश ने नहीं दी थी: बिना शर्त सैन्य सुरक्षा और अत्याधुनिक अमेरिकी हथियार। और बदले में अमेरिका ने दो ऐसी शर्तें रखीं जिन्होंने अगले 50 सालों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय कर दी।
पहली शर्त: सऊदी अरब को अपने तेल की हर एक बूंद की कीमत सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी डॉलर में तय करनी होगी और सिर्फ डॉलर में ही बेचनी होगी।
दूसरी शर्त: सऊदी अरब को तेल से होने वाले अरबों डॉलर के मुनाफे को वापस अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में निवेश करना होगा। यानी वही पैसा अमेरिकी सरकार को वापस कर्ज के रूप में देना होगा। इसीलिए इसे “पेट्रोडॉलर रीसाइक्लिंग” कहा जाता है: पेट्रोलियम से कमाया गया डॉलर वापस अमेरिकी अर्थव्यवस्था में पहुंच जाता था।
जाल इतना पक्का कि निकलने का रास्ता ही नहीं
यह डील एक जबरदस्त मास्टरस्ट्रोक थी। भले ही जापान और फ्रांस अमेरिकी डॉलर से नफरत करते हों, लेकिन वे पूरी तरह फंस चुके थे। अगर जर्मनी को अपने ऑटोमोबाइल कारखाने चलाने के लिए सऊदी तेल चाहिए तो वो जर्मन मार्क में नहीं खरीद सकता था। उसे पहले अमेरिकी डॉलर खरीदना होता था।
और अगर कोई सोचे कि जापान या फ्रांस सीधे कुवैत या यूएई से तेल खरीद लें तो वो भी मुमकिन नहीं था। क्योंकि सऊदी अरब ओपेक (पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन) का नेता था, जिसमें कुवैत, इराक, ईरान और यूएई सब शामिल थे। तो चाहे आप कुवैत से तेल खरीदो या इराक से, भुगतान अमेरिकी डॉलर में ही करना होता था।
इसी तरह डॉलर दुनिया की आरक्षित मुद्रा बन गया और सऊदी अरब अमेरिका का सबसे बड़ा लीवरेज। यानी सऊदी अरब के बिना अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व एक दिन भी नहीं टिक सकता।
सऊदी अरब ने अमेरिका को कैसे अपनी मुट्ठी में रखा
Saudi Arabia US Relations की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सऊदी अरब के शासक जानते थे कि भू-राजनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। अमेरिका और सोवियत संघ ने मिलकर विश्व युद्ध लड़ा था लेकिन बाद में कट्टर दुश्मन बन गए। कल अगर तेल बेकार हो गया या अक्षय ऊर्जा सस्ती हो गई तो अमेरिका सऊदी अरब को छोड़ सकता है।
इसलिए सऊदी अरब ने तीन अविश्वसनीय रणनीतिक कदम उठाए ताकि अमेरिका उसे कभी छोड़ न सके।
पहला कदम: तेल कंपनियों को समझदारी से खरीदा, दुश्मनी से नहीं
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी और ब्रिटिश तेल कंपनियों ने अरबों डॉलर खर्च करके ईरान, वेनेजुएला, लीबिया और सऊदी अरब जैसे देशों में पाइपलाइन और बुनियादी ढांचा खड़ा किया था। लेकिन लीबिया और वेनेजुएला जैसे देशों ने क्या किया? उनके नेताओं ने “रॉबिन हुड” बनने की दौड़ में अपनी सेना भेजकर अमेरिकी कंपनियों को अपमानजनक तरीके से बाहर निकाल दिया। मुअम्मर गद्दाफी ने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया। कुछ ही सालों बाद गद्दाफी मारा गया। वेनेजुएला के ह्यूगो चावेज ने भी ऐसा ही किया। अमेरिकी कंपनियों को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ और अंततः अमेरिकी सरकार ने इन देशों को तबाह कर दिया।
लेकिन जब सऊदी अरब को अपना तेल वापस चाहिए था तो उसने सेना नहीं भेजी, एकाउंटेंट्स की टीम भेजी। और इन एकाउंटेंट्स ने अमेरिकियों को दुश्मन की तरह नहीं, बल्कि व्यापारिक साझेदार की तरह बरता।
तीन चरणों में खरीदा अरामको: कारोबारी दिमाग की मिसाल
1973 में सऊदी सरकार ने बोर्डरूम में जाकर अरामको में अमेरिकी शेयरधारकों से 25 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी, करीब 500 मिलियन डॉलर देकर। फिर 1973 में जब तेल की कीमतें 300 प्रतिशत बढ़ गईं तो उस मुनाफे से 1974 में और 35 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदकर अपना स्वामित्व 60 प्रतिशत कर लिया। और 1980 में बाकी बचे शेयर नकद भुगतान करके खरीद लिए और 100 प्रतिशत मालिक बन गए। कुल मिलाकर सऊदी सरकार ने अमेरिकियों को करीब डेढ़ से दो अरब डॉलर चुकाए।
और डील को और मीठा बनाने के लिए सऊदी शासक ने कहा: “देखो, तेल भले ही हमारा है, लेकिन जमीन से निकालने में आप अमेरिकी दुनिया में सबसे माहिर हो। तो आप हमारे लिए कारखाना चलाओ और हमारे साथ कमाओ।” इस तरह सऊदी अरब ने अमेरिकी कंपनियों को अरबों डॉलर की सर्विस फीस देनी शुरू की।
अमेरिका के नजरिए से देखें तो यह डील जीनियस थी
अमेरिकी नजरिए से इस सौदे में तीन बड़े फायदे थे। पहला, अरबों डॉलर नकद तुरंत मिल गए। दूसरा, हर बैरल तेल के उत्पादन पर अरबों डॉलर की गारंटीड, जोखिम-मुक्त सर्विस फीस मिलती रही। और तीसरा, अपनी वैश्विक रिफाइनरियों और गैस स्टेशनों के लिए कच्चे तेल की अंतहीन गारंटीड आपूर्ति मिल गई।
सत्ता का चक्र: तेल, चुनाव और सैन्य सुरक्षा का गठजोड़
Saudi Arabia US Relations में सबसे दिलचस्प है सत्ता का यह चक्र जो अमेरिकी राजनीति की नसों में इस कदर घुस चुका है कि उसे निकालना अब लगभग नामुमकिन है।
यह चक्र ऐसे चलता है: सऊदी अरब अमेरिकी तेल कंपनियों को अरबों डॉलर कमाकर देता है। ये तेल कंपनियां अपने मुनाफे का बड़ा हिस्सा अमेरिका में चुनावी चंदे में लगाती हैं। इससे उनके पसंदीदा अमेरिकी नेता सत्ता में बने रहते हैं। और सत्ता में बैठे ये नेता अमेरिकी सेना को सऊदी अरब की रक्षा के लिए तैनात रखते हैं ताकि तेल और चुनावी चंदे का प्रवाह बना रहे।
अगर कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति या सीनेटर सऊदी अरब को छोड़ने की कोशिश करे तो अमेरिका के सबसे ताकतवर कॉर्पोरेट लॉबिस्ट तुरंत उनके चुनावी फंडिंग पर कैंची चला देंगे और उनका राजनीतिक करियर खत्म कर देंगे।
27 ट्रिलियन डॉलर की तेल खदान का मालिक बना बिना एक गोली चलाए
आज सऊदी अरब की ताकत अमेरिकी अर्थव्यवस्था की बुनियाद में इस कदर गुंथ चुकी है कि उसे अलग करना नामुमकिन है। सऊदी अरब के पास 150 अरब डॉलर का अमेरिकी ट्रेजरी कर्ज है। उत्तरी अमेरिका की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी सऊदी अरब के पास है, जिससे उसे तेल की कीमतें प्रभावित करने की ताकत मिलती है। और उसके पास 1 ट्रिलियन डॉलर का पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड (PIF) है जिसमें उबर, ल्यूसिड और निंटेंडो जैसी कंपनियों में भारी हिस्सेदारी है।
इस तरह सऊदी अरब ने अपनी 27 ट्रिलियन डॉलर की तेल खदान का मालिकाना हक बिना किसी युद्ध के हासिल किया, अपने तेल का इस्तेमाल करके दुनिया के सबसे ताकतवर देश पर दबदबा बनाया, और धीरे-धीरे अपनी वित्तीय मांसपेशियों का इस्तेमाल करके अमेरिकी अर्थव्यवस्था के स्तंभों पर कब्जा कर लिया। अंततः सऊदी अरब दुनिया के सबसे सुरक्षित और शायद सबसे ताकतवर देशों में से एक बन गया।
सबक जो भू-राजनीति से परे है: आक्रामकता नहीं, जीत-जीत की डील काम करती है
Saudi Arabia US Relations की यह पूरी कहानी एक बेहद अहम सबक देती है। आक्रामकता अक्सर मूल्य को नष्ट करती है। लीबिया के गद्दाफी और वेनेजुएला के चावेज ने आक्रामक रुख अपनाया और अपने देशों को तबाही की कगार पर पहुंचा दिया। लेकिन जब आप एक ऐसी “जीत-जीत की डील” तैयार करते हैं जहां आपका साझेदार खुद चाहता है कि आप कामयाब हों, तो वो डील किसी भी हथियार से ज्यादा ताकतवर हो जाती है।
सऊदी अरब ने यही किया। उसने अमेरिका को दुश्मन नहीं बनाया, बल्कि ऐसा साझेदार बनाया जिसका अपना फायदा सऊदी अरब की सुरक्षा में था। और यही है असली ताकत बनाने का तरीका। यही वो सबक है जो हर देश को, हर कारोबार को और हर व्यक्ति को समझना चाहिए कि टिकाऊ शक्ति तलवार से नहीं, बुद्धि से बनती है।
मुख्य बातें (Key Points)
- 1974 में अमेरिका ने सऊदी अरब से गुप्त पेट्रोडॉलर डील की जिसमें सऊदी को बिना शर्त सैन्य सुरक्षा और हथियार मिले, बदले में सऊदी ने हर बूंद तेल सिर्फ डॉलर में बेचने और मुनाफा वापस अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में लगाने का वादा किया।
- 1971 में निक्सन शॉक के बाद डॉलर सोने से अलग होकर कागज का टुकड़ा बन गया था, पेट्रोडॉलर डील ने ही डॉलर को दुनिया की आरक्षित मुद्रा का दर्जा वापस दिलाया।
- सऊदी अरब ने 1973 से 1980 के बीच तीन चरणों में अरामको का 100% स्वामित्व खरीदा, लेकिन लीबिया-वेनेजुएला की तरह सेना भेजकर नहीं बल्कि व्यापारिक बातचीत से, अमेरिकी कंपनियों को सर्विस पार्टनर बनाए रखा।
- आज सऊदी अरब 150 अरब डॉलर अमेरिकी ट्रेजरी कर्ज, उत्तरी अमेरिका की सबसे बड़ी रिफाइनरी और 1 ट्रिलियन डॉलर के PIF फंड के जरिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था में इतना गहरा धंसा है कि कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति उसे छोड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता।








