Strait of Hormuz पर हमलों का सिलसिला तेजी से बढ़ता जा रहा है और ईरान ने समुद्र के नीचे दर्जनों माइंस बिछाकर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बंधक बना लिया है। युद्ध के 13वें दिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही दावा किया कि हॉर्मुज से जहाज अब सुरक्षित गुजर सकते हैं, लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। ट्रंप के इस बयान के तुरंत बाद दो तेल टैंकरों पर सुसाइड बोट अटैक हुआ, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। इसके बाद तीन और विदेशी जहाजों पर बमबारी की खबरें आईं और दुबई के पास एक कंटेनरशिप पर भी हमला हुआ।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजेशकियां ने युद्ध रोकने के लिए तीन शर्तें रखी हैं: इसराइल और अमेरिका ईरान के वैध अधिकारों को स्वीकार करें, नुकसान का हर्जाना दें और आगे हमला नहीं करने की गारंटी दें। लेकिन इन शर्तों का मानना बेंजामिन नेतन्याहू कभी नहीं चाहेंगे, क्योंकि गाजा पर दो साल तक रोज बम गिराने वाले नेतन्याहू की इस युद्ध पर चुप्पी ही बता देती है कि वे इसे कहां तक ले जाने की सोच रहे हैं।
हॉर्मुज में ईरान ने बिछाईं खतरनाक समुद्री माइंस
Strait of Hormuz में ईरान द्वारा समुद्री माइंस बिछाने की खबर ने पूरी दुनिया के होश उड़ा दिए हैं। सीएनएन से लेकर वॉल स्ट्रीट जर्नल तक हर बड़े मीडिया हाउस में इस पर गहरा विश्लेषण छप रहा है। 11 मार्च को ट्रंप ने दावा किया कि ईरान के 28 ऐसे जहाजों को नष्ट कर दिया गया जो हॉर्मुज के पानी में माइन बिछा रहे थे, जबकि अमेरिका के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने एक दिन पहले सिर्फ 16 जहाजों को नष्ट करने की पुष्टि की थी।
वॉल स्ट्रीट जर्नल की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, “महम वन” नाम की ये समुद्री माइंस मात्र 1 मीटर गहरे पानी में लगाई जा सकती हैं। इन्हें चेन से बांधकर या समुद्र के फर्श से जोड़ दिया जाता है। एक माइन में 120 किलो विस्फोटक होता है जिसका एक ही धमाका पूरे जहाज को उड़ा सकता है। ईरान ने इस तकनीक को 1980 के दशक में इराक के साथ चले लंबे “टैंकर वॉर” के दौरान विकसित किया था।
रिपोर्ट में बताया गया है कि मछुआरों की साधारण नावों में बैठकर गोताखोर ये माइंस लगा आते हैं। इसके अलावा ऐसे टाइम बम भी होते हैं जो गोताखोर जहाज के अगले हिस्से पर चिपका देते हैं। अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिकी नौसेना को सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं समुद्री माइंस से हुआ है। और विडंबना देखिए कि पिछले सितंबर में अमेरिका ने अपने चार माइन डिटेक्शन जहाजों को डीकमीशन कर दिया, जिससे फारस की खाड़ी में माइंस निरस्त करने की उसकी क्षमता काफी कमजोर हो गई है।
ट्रंप के दावे हवा हुए: जहाजों पर हमले जारी
ट्रंप ने जब कहा कि Strait of Hormuz से जहाज अब सुरक्षित गुजर सकते हैं, तो कुछ तेल टैंकर उस रास्ते से निकले। इनमें “सेफसी विष्णु” और “जेफायरस” नाम के दो जहाज थे जो इराक से तेल लेकर आ रहे थे। हमला इराक के पानी में ही हो गया। बम से भरी एक नाव जहाज से टकरा गई और आग लग गई, जिसे सुसाइड बोट अटैक कहा जा रहा है।
28 फरवरी के बाद से Strait of Hormuz से केवल 66 जहाज ही पार कर पाए हैं। ईरान का इस जलडमरूमध्य पर कंट्रोल लगातार बढ़ता जा रहा है और अब तक 16 जहाजों पर हमले हो चुके हैं। हॉर्मुज के दोनों तरफ 500 कार्गो जहाज, 500 ऑयल टैंकर और 6 क्रूज शिप फंसे हुए हैं। द गार्डियन अखबार के अनुसार, पिछले साल के मुकाबले इस साल हर जहाज का बीमा रेट कई हजार डॉलर बढ़ चुका है।
11 मार्च को थाईलैंड के जहाज “मयूरी नारी” पर प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ, जिसकी जिम्मेदारी ईरान ने यह कहते हुए ली कि जहाज के क्रू ने चेतावनी नहीं मानी। यह जहाज भारत आ रहा था। भारत ने इस हमले की निंदा की और थाईलैंड के विदेश मंत्रालय ने ईरान के दूतावास अधिकारियों को बातचीत के लिए तलब किया।
भारत के दो जहाजों ने पार किया हॉर्मुज, लेकिन सवाल बाकी
भारत के लिए राहत भरी खबर यह रही कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास आराग़ची के बीच पिछले कुछ दिनों में तीन बार बातचीत हुई है। अंतिम बातचीत में शिपिंग की सुरक्षा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।
रॉयटर्स की रिपोर्ट में भारतीय सूत्रों के हवाले से कहा गया कि ईरान ने अनुमति दे दी है कि भारतीय झंडे वाले तेल जहाजों को Strait of Hormuz से गुजरने दिया जाएगा। लेकिन उसी रॉयटर्स की रिपोर्ट में ईरानी सूत्रों ने कहा कि ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ। भारत के विदेश मंत्रालय और ईरान के दूतावास ने इस खबर पर कोई टिप्पणी नहीं की।
फिर भी रिपोर्ट्स बताती हैं कि जयशंकर-आराग़ची बातचीत के बाद भारत के दो जहाजों “परिमल” और “पुष्पक” को हॉर्मुज से निकलने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा ईरान से तेल लेकर आ रहे “शेन लॉग स्वेज मैक्स” नाम के जहाज के मुंबई पोर्ट पहुंचने की खबर है, जिसे युद्ध के बाद हॉर्मुज पार करने वाला पहला जहाज बताया जा रहा है।
लेकिन हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकार अभिमन्यु कुलकर्णी की रिपोर्ट सवाल उठाती है। लाइबेरिया के इस जहाज ने 1 मार्च को सऊदी की राज तनूरा रिफाइनरी से निकलकर 8 मार्च तक सिग्नल प्रसारित किया, फिर अचानक सब बंद कर दिया। सभी मॉनिटरिंग सिस्टम से गायब हो गया। रिपोर्ट में लिखा गया कि हॉर्मुज के असुरक्षित इलाके से निकलने के दौरान जहाज “डार्क मोड” में चला गया। अगर जहाज वाकई सुरक्षित गुजर सकता था, तो अपना ट्रांसपॉन्डर बंद करने की क्या जरूरत थी?
तेल की आग से जल रही दुनिया की अर्थव्यवस्था
कच्चे तेल का भाव 101 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है और ईरान कई बार चेतावनी दे चुका है कि यह 200 डॉलर तक भी पहुंच सकता है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के 32 सदस्य देशों ने मिलकर अपने इमरजेंसी भंडार से कुल 40 करोड़ बैरल कच्चा तेल निकालने का फैसला किया है, जो इस बात का संकेत है कि यह युद्ध लंबा खिंच सकता है।
ऑस्ट्रेलिया का शेयर बाजार एक दिन में 1% और मार्च में कुल 6% गिर चुका है। ऑस्ट्रेलिया के ऊर्जा मंत्री ने तो यहां तक कहा कि तेल की सप्लाई बचाने के लिए कुछ दिनों तक “गंदे तेलों” का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। भारत का सेंसेक्स भी बुरी तरह गिरा है। 1 दिसंबर 2025 को 86,159 के ऑल टाइम हाई से सेंसेक्स 9,787 अंक तक नीचे आ चुका था। भारत ही नहीं, दुनिया भर के शेयर बाजार धड़ाम हो रहे हैं।
एलपीजी की सप्लाई रुकने और तेल टैंकरों के उड़ने से गैस का जो संकट आया है, उसने आम लोगों की रसोई से लेकर शादियों तक सब कुछ प्रभावित कर दिया है। कितने लोगों की दुकानें बंद हो गईं, इसकी गिनती अभी तक नहीं आई। आम आदमी गैस सिलेंडर के लिए लाइन में खड़ा है, जबकि ट्रंप भाषणों में तालियां बटोर रहे हैं।
खाड़ी के देशों पर ईरान की बमबारी: दुबई से बहरीन तक दहशत
ईरान ने Strait of Hormuz को हथियार बनाने के साथ-साथ खाड़ी के देशों को भी निशाने पर ले लिया है। 12 मार्च की सुबह सऊदी अरब की शाइबा ऑयल फील्ड पर तीन बार हमले की कोशिश हुई, जिसमें रक्षा मंत्रालय ने दो ड्रोन को इंटरसेप्ट कर नष्ट किया।
ओमान की सलाला पोर्ट पर ईंधन स्टोरेज टैंकों पर हमला और भी चिंताजनक है। जो लोग हॉर्मुज से तेल नहीं ले जा पा रहे थे, वे ओमान से ले जाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन इस हमले ने उनकी उम्मीदें भी तोड़ दीं। दो तेल टैंकरों में भीषण आग लगी है।
दुबई पर तो कोई ऐसा दिन नहीं जब हमले की खबर नहीं आती। क्रीक हारबर की एक रिहाइशी इमारत पर ड्रोन हमला हुआ, जिसके एक फ्लैट में आग लग गई। उस फ्लैट की कीमत 5 करोड़ रुपये से कम कुछ भी नहीं है। ईरान की रणनीति साफ है: दुबई में दुनिया भर के अमीरों के ठिकाने हैं, उनके पैसे से दुबई चमकती है, और अगर दुबई को डरा दिया तो एक साथ कई देशों को नुकसान पहुंचा सकता है।
बैंकों पर भी हमले का खतरा मंडराने लगा है। इसराइल ने तेहरान के एक बैंक पर हमला किया तो ईरान ने कहा कि अब वह भी बैंकों पर हमला करने के लिए स्वतंत्र है। इसके बाद कतर में HSBC ने अपनी सारी शाखाएं बंद कर दीं। सिटी बैंक और स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक ने भी दुबई की अपनी ब्रांचें खाली कर दी हैं। बहरीन के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास भी धमाके हुए और 12 मार्च को बहरीन ने चार लोगों को ईरान की जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया।
कुवैत में एक ड्रोन इंटरसेप्ट होने के बाद उसके मलबे ने बिजली की छह ट्रांसमिशन लाइनें ठप कर दीं। एक ड्रोन रिहायशी इमारत पर भी गिरा। इराक के अरक इलाके में छह ठिकानों पर हमला हुआ, जहां एक परमाणु कॉम्प्लेक्स भी है जिस पर इसराइल पहले हमला कर चुका है। इराक कुर्दिस्तान में इटली के सैन्य ठिकाने पर मिसाइलों से हमला हुआ।
यूरोप में टूटने लगा अमेरिका का गठबंधन
इस युद्ध का एक अहम पहलू यह है कि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी देश एक-एक करके अलग हो रहे हैं। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने साफ कह दिया कि इटली इस युद्ध में हिस्सा नहीं लेगा। यह वही मेलोनी हैं जिनकी राजनीति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति से मेल खाती है और मोदी ने इनकी किताब की भूमिका भी लिखी है। इटली में 70% लोग नहीं चाहते कि अमेरिका उनकी जमीन पर बने सैनिक अड्डों का इस्तेमाल ईरान पर बम गिराने के लिए करे। इटली ने ईरान के स्कूल पर बम गिराए जाने की भी निंदा की है।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी कहा कि कनाडा युद्ध में हिस्सा नहीं लेगा। स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज इन सबसे एक कदम आगे गए: उन्होंने ट्रंप को “युद्ध अपराधी” कह दिया और इसराइल से अपने राजदूत को स्थाई तौर पर वापस बुला लिया। स्पेन और इटली दोनों नेटो (NATO) के सदस्य हैं। सऊदी अरब का अमेरिका के साथ रक्षा समझौता है, लेकिन वह भी युद्ध में शामिल नहीं है।
एक अमेरिकी सर्वे के अनुसार 52% लोग इस युद्ध के विरोध में हैं और ट्रंप की लोकप्रियता लगातार गिर रही है। अल जजीरा की एक रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका के खुद के खुफिया विभाग का मानना है कि ईरान के जिस शासन को अमेरिका और इसराइल नष्ट करना चाहते थे, उसे कोई खतरा नहीं है।
B-2 बॉम्बर से लेकर स्लीपर सेल तक: युद्ध का खतरनाक विस्तार
ब्रिटेन के दक्षिणी मध्य इलाके फेयरफोर्ड के सैनिक अड्डे से अमेरिका का B-2 बमवर्षक विमान उड़ान की तैयारी कर रहा है। एक B-2 बॉम्बर में 24 मिसाइलें लादी जा सकती हैं। पिछले साल जून में इसी B-2 ने ईरान के बंकरों को नष्ट किया था और इस बार भी इसे काम पर लगाया गया है। अमेरिका के प्रेस सचिव के अनुसार 2000 पाउंड बम से हमला किया जा चुका है।
ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान के स्लीपर सेल अमेरिकी तंत्र में घुसने का प्रयास कर रहे हैं। बहरीन में पहले ही चार लोगों को ईरान की जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है। अमेरिका का दावा है कि ईरान का एयर डिफेंस 90% नष्ट हो चुका है, जबकि ईरान का कहना है कि यही उसकी रणनीति थी: पहले अमेरिका के रेडार सिस्टम को नष्ट करना, फिर जो चाहे हमला करना। युद्ध के 13वें दिन भी ईरान टिका हुआ है और जवाबी हमले जारी हैं।
चीन ने दोनों पक्षों की निंदा की है: खाड़ी देशों पर हमले के लिए ईरान की और ईरान पर हमले के लिए अमेरिका-इसराइल की। ईरान के राष्ट्रपति पजेशकियां ने रूस, पाकिस्तान, ओमान के सुल्तान, तुर्किया के राष्ट्रपति एर्दोआन और इराक के प्रधानमंत्री से बात की है, लेकिन अभी तक प्रधानमंत्री मोदी और पजेशकियां के बीच सीधी बातचीत की खबर नहीं आई है।
लेबनान का भुला दिया गया विनाश
जब Strait of Hormuz और ईरान-अमेरिका युद्ध की खबरें सुर्खियों में हैं, तब लेबनान का मामला मीडिया के सीन से लगभग गायब हो चुका है। अल जजीरा के आंकड़ों के अनुसार ईरान में 1300 से अधिक लोग मारे गए हैं, लेकिन कमजोर लेबनान पर इसराइल ने कहर बरपा दिया है। वहां 500 से अधिक लोग मारे गए, 8 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं और सवा लाख लोग 600 से कम सामूहिक शेल्टर में जिंदगी गुजार रहे हैं। बैरूत के पूरे-पूरे मोहल्ले बर्बाद कर दिए गए हैं और महिलाओं-लड़कियों के खिलाफ अपराध का खतरा बढ़ता जा रहा है।
आम आदमी की रसोई तक पहुंची युद्ध की आग
यह युद्ध सिर्फ मिसाइलों और बमों की तस्वीरों तक सीमित नहीं है। इसकी सीधी मार भारत समेत पूरी दुनिया के आम लोगों की रसोई पर पड़ रही है। कच्चे तेल की कीमतें 101 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा चुकी हैं, शेयर बाजारों में लाखों करोड़ डूब गए हैं और एलपीजी सिलेंडर के लिए लोग लाइनों में खड़े हैं। अमेरिका का इस युद्ध में 1 अरब डॉलर से अधिक खर्च हो चुका है, लेकिन इससे न तो गैस सिलेंडर सस्ता होगा और न ही आम आदमी की मुश्किलें कम होंगी। जब तक Strait of Hormuz खुला नहीं होता और तेल की सप्लाई सामान्य नहीं होती, तब तक यह संकट और गहराता ही जाएगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- Strait of Hormuz में ईरान ने दर्जनों समुद्री माइंस बिछाईं, 16 जहाजों पर हमले हो चुके हैं और 1000 से अधिक जहाज फंसे हैं
- ईरान के राष्ट्रपति ने युद्ध रोकने की तीन शर्तें रखीं, लेकिन नेतन्याहू की चुप्पी बताती है कि युद्ध जल्दी रुकने वाला नहीं
- भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से तीन बार बात की, दो भारतीय जहाज हॉर्मुज पार कर पाए
- इटली, कनाडा और स्पेन ने अमेरिका का साथ छोड़ा, स्पेन ने ट्रंप को “युद्ध अपराधी” कहा
- कच्चा तेल $101/बैरल के पार, भारतीय सेंसेक्स ऑल टाइम हाई से करीब 10,000 अंक गिरा, दुनिया भर के बाजार धड़ाम
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न








