Nuclear Emergency Gulf Countries की तैयारियां अब एक नए और चौंकाने वाले मोड़ पर पहुंच गई हैं। अमेरिका–ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच खाड़ी देशों ने संभावित परमाणु आपदा से निपटने की तैयारी तेज कर दी है। बहरीन स्थित एक फार्मा लायजनिंग एजेंट ने चंडीगढ़ की एक दवा कंपनी से संपर्क कर परमाणु हमले या रेडियोलॉजिकल आपदा में इस्तेमाल होने वाले प्रशियन ब्लू कैप्सूल्स के बारे में विस्तृत जानकारी मांगी है।
बात सिर्फ जानकारी मांगने तक सीमित नहीं है। एजेंट ने कंपनी से सीधे पूछा है कि क्या वह 1 करोड़ कैप्सूल बनाने में सक्षम है। इसके साथ ही अलग-अलग आयु वर्ग की आबादी के लिए डोज कितनी होगी और कंपनी की उत्पादन क्षमता क्या है, ऐसे कई गंभीर सवाल भी पूछे गए हैं। यह घटनाक्रम बताता है कि मिडिल ईस्ट में तनाव कितने खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है कि देश अब Nuclear Emergency के लिए दवाइयों का भंडार जुटाने में लग गए हैं।
बहरीन, कुवैत, कतर और जॉर्डन में हो सकती है सप्लाई
Nuclear Emergency Gulf Countries की तैयारियों के तहत इस डील का दायरा सिर्फ बहरीन तक सीमित नहीं है। चंडीगढ़ की दवा कंपनी की डायरेक्टर डॉ. वैशाली अग्रवाल के अनुसार इस विषय पर बातचीत जारी है। फिलहाल बहरीन का फार्मा एजेंट अपने देश के स्वास्थ्य मंत्रालय से इस बारे में चर्चा कर रहा है।
डॉ. अग्रवाल ने बताया कि अगर यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो इन जीवनरक्षक दवाओं की सप्लाई बहरीन के अलावा कुवैत, कतर और जॉर्डन जैसे खाड़ी देशों में भी की जा सकती है। यानी एक साथ कई देश Nuclear Emergency से निपटने के लिए भारत की ओर देख रहे हैं, जो भारतीय फार्मा इंडस्ट्री की वैश्विक साख को और मजबूत करता है।
चंडीगढ़ में मुख्यालय, हिमाचल के बद्दी में होता है उत्पादन
Nuclear Emergency Gulf Countries की मांग को पूरा करने वाली इस कंपनी का मुख्यालय चंडीगढ़ में है, जबकि इसकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट हिमाचल प्रदेश के बद्दी में स्थित है। बद्दी भारत का एक प्रमुख फार्मा हब है, जहां से देश-विदेश को बड़ी मात्रा में दवाइयों की सप्लाई होती है।
दिलचस्प बात यह है कि यह पहली बार नहीं है जब खाड़ी देशों ने इस दवा के लिए भारत से संपर्क किया है। जून 2025 में इजराइल-ईरान तनाव के दौरान भी इसी दवा की मांग सामने आई थी। उस वक्त भी बातचीत शुरू हुई थी, लेकिन 12 दिन में संघर्ष खत्म होने के बाद बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई। अब जब अमेरिका ने सीधे ईरान पर हमला किया है, तो स्थिति पहले से कहीं ज्यादा गंभीर है और इसीलिए इस बार खाड़ी देश ज्यादा गंभीरता से तैयारी कर रहे हैं।
क्या है प्रशियन ब्लू और कैसे बचाती है जान
Nuclear Emergency Gulf Countries द्वारा मांगी जा रही प्रशियन ब्लू कैप्सूल परमाणु हमले या रेडियोलॉजिकल आपदा के दौरान इस्तेमाल होने वाली एक बेहद महत्वपूर्ण और जीवनरक्षक दवा है। यह शरीर में प्रवेश कर चुके रेडियोएक्टिव तत्व सीजियम-137 और थैलियम के प्रभाव को कम करने का काम करती है।
इसकी कार्यप्रणाली काफी खास है। यह कैप्सूल आंतों में जाकर इन खतरनाक रेडियोएक्टिव तत्वों से जुड़ जाता है और फिर उन्हें मल के जरिए शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है। सीधे शब्दों में कहें तो यह दवा शरीर के अंदर घुसे हुए रेडिएशन के जहर को सोखकर बाहर फेंकने का काम करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर इमरजेंसी में उपयोग होने वाली जरूरी दवाओं की सूची में शामिल किया है, जो इसकी अहमियत को और बढ़ा देता है।
DRDO की तकनीक से बनती है यह दवा, भारत में दो साल पहले शुरू हुआ उत्पादन
प्रशियन ब्लू कैप्सूल अमेरिका और यूरोप में पहले से बनाई जाती रही है, लेकिन भारत में इसका कॉमर्शियल उत्पादन लगभग दो साल पहले ही शुरू हुआ है। यह दवा रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की दिल्ली स्थित प्रयोगशाला INMAS (इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड अलाइड साइंसेस) की तकनीक पर आधारित है।
DCGI (ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया) ने भारत की दो कंपनियों को इसके निर्माण और मार्केटिंग का लाइसेंस दिया है। इसमें अहमदाबाद की एक कंपनी को कच्चा माल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि चंडीगढ़ की कंपनी को उत्पादन और सप्लाई की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह भारत की रक्षा तकनीक का नागरिक उपयोग का एक बेहतरीन उदाहरण है।
पोटेशियम आयोडाइड की भी 1.2 करोड़ टैबलेट की मांग
Nuclear Emergency Gulf Countries की तैयारियां सिर्फ प्रशियन ब्लू तक सीमित नहीं हैं। बहरीन के फार्मा एजेंट ने पोटेशियम आयोडाइड (KI) टैबलेट को लेकर भी विस्तृत जानकारी मांगी है। इसके लिए करीब 1.2 करोड़ टैबलेट की संभावित मांग जताई गई है, जो यह दर्शाता है कि खाड़ी देश किस पैमाने पर Nuclear Emergency की तैयारी कर रहे हैं।
पोटेशियम आयोडाइड का उपयोग न्यूक्लियर इमरजेंसी में थायराइड ग्रंथि को रेडिएशन से बचाने के लिए किया जाता है। जब परमाणु विस्फोट या रेडिएशन लीक होता है, तो हवा में रेडियोएक्टिव आयोडीन फैलता है, जो सांस के जरिए शरीर में जाकर थायराइड ग्रंथि में जमा हो जाता है और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। पोटेशियम आयोडाइड टैबलेट लेने से थायराइड ग्रंथि पहले से ही सुरक्षित आयोडीन से भर जाती है, जिससे रेडियोएक्टिव आयोडीन उसमें जमा नहीं हो पाता। इसके अलावा इसका इस्तेमाल हाइपरथायरायडिज्म के इलाज और फेफड़ों में जमा बलगम को ढीला करने में भी किया जाता है।
खाड़ी देशों की यह तैयारी दुनिया को क्या संदेश दे रही है
Nuclear Emergency Gulf Countries की ये तैयारियां सिर्फ दवाइयों की खरीद-फरोख्त का मामला नहीं हैं, बल्कि यह मिडिल ईस्ट में बढ़ते परमाणु खतरे का सबसे ठोस और डरावना संकेत है। जब कोई देश 1 करोड़ प्रशियन ब्लू कैप्सूल और 1.2 करोड़ पोटेशियम आयोडाइड टैबलेट की मांग करता है, तो इसका मतलब है कि वह अपनी पूरी आबादी को संभावित परमाणु आपदा से बचाने की योजना बना रहा है।
भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर भी है। अगर यह डील अंतिम रूप लेती है, तो भारतीय फार्मा इंडस्ट्री को वैश्विक स्तर पर Nuclear Emergency दवाओं के प्रमुख सप्लायर के रूप में पहचान मिलेगी। DRDO की तकनीक पर आधारित यह दवा भारत की रक्षा और विज्ञान क्षमता का प्रमाण है। लेकिन बड़ा सवाल यह भी है कि जिस दवा की मांग खाड़ी देश कर रहे हैं, क्या भारत ने खुद अपनी आबादी के लिए इतने बड़े पैमाने पर इसका भंडार तैयार किया है? अमेरिका-ईरान तनाव अगर और बढ़ता है, तो इसका असर सिर्फ खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहेगा और भारत को भी अपनी Nuclear Emergency तैयारियों पर गंभीरता से विचार करना होगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- बहरीन के फार्मा एजेंट ने चंडीगढ़ की दवा कंपनी से 1 करोड़ प्रशियन ब्लू कैप्सूल की उत्पादन क्षमता के बारे में पूछा, डील पक्की होने पर कुवैत, कतर और जॉर्डन में भी सप्लाई संभव।
- प्रशियन ब्लू कैप्सूल DRDO की तकनीक पर आधारित जीवनरक्षक दवा है, जो शरीर से रेडियोएक्टिव तत्वों को बाहर निकालती है और WHO ने इसे जरूरी दवाओं की सूची में शामिल किया है।
- 1.2 करोड़ पोटेशियम आयोडाइड टैबलेट की भी मांग जताई गई है, जो थायराइड ग्रंथि को रेडिएशन से बचाने में काम आती है।
- जून 2025 में भी इजराइल-ईरान तनाव के दौरान यही मांग आई थी, लेकिन 12 दिन में संघर्ष खत्म होने से बात आगे नहीं बढ़ पाई।








