Civic Sense in India: भारत की सड़कों पर कूड़े के पहाड़, गंदे पब्लिक टॉयलेट्स और बेतरतीब ट्रैफिक देखकर अक्सर कहा जाता है कि भारतीयों में सिविक सेंस नहीं है। लेकिन क्या सच में यही समस्या की जड़ है? डेनमार्क जैसे देशों की साफ-सुथरी सड़कों और अनुशासित समाज की तुलना में भारत की स्थिति देखकर सवाल उठता है कि आखिर ये फर्क क्यों है। क्या भारतीयों में जन्मजात ही कम सिविक सेंस है या फिर इसके पीछे कुछ और गहरे कारण हैं?
डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन में हर 5 मिनट की पैदल दूरी पर साफ-सुथरा पब्लिक टॉयलेट मिल जाता है। वहां की सड़कों पर कोई गड्ढे नहीं हैं। हर कोई गाड़ी लेन में रहकर चलाता है और ना ही कोई हॉर्न का शोर है। जेब्रा क्रॉसिंग पर गाड़ियां पैदल यात्रियों के लिए रुक जाती हैं। पूरा शहर इतना साफ है कि कहीं भी कूड़े का नामोनिशान नहीं दिखता। इतना ही नहीं, प्लास्टिक बोतलें वापस करने पर लोगों को पैसे भी मिलते हैं।
इसके विपरीत भारत के ज्यादातर शहरों में कूड़े के पहाड़ हैं। हर गली-नुक्कड़, चौराहे पर कूड़ा पड़ा मिलता है। गटर में घुसकर लोग सफाई करते दिखते हैं। पब्लिक टॉयलेट्स का हाल इतना बुरा है कि लोग सड़क के किनारे ही पेशाब करने लगते हैं। गाड़ियों के हॉर्न का शोर इतना ज्यादा है कि घरों में बैठे-बैठे भी सुनाई देता है। फुटपाथ्स और जेब्रा क्रॉसिंग्स आधी जगहों पर नजर ही नहीं आतीं।
जातिवाद और वर्ग भेद: सफाई की समस्या की पहली जड़
भारत में सिविक सेंस की समस्या तीन बड़े मुद्दों से जुड़ी है जिन पर ज्यादा बात नहीं होती। पहला और सबसे बड़ा मुद्दा है जातिवाद और वर्ग भेद। हमारे देश में जातिवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि सफाई कर्मियों के साथ आज भी भेदभाव होता है। दलित समुदाय से आने वाले ज्यादातर सफाई कर्मियों को आज भी गटर में घुसकर सफाई करनी पड़ती है। कई बार जहरीली गैस से उनकी मौत तक हो जाती है।
महात्मा गांधी ने कहा था कि सफाई कर्मी समाज के लिए मां की तरह हैं। जिस तरह मां अपने बच्चे को साफ रखकर बीमारियों से बचाती है, उसी तरह सफाई कर्मी समाज को बीमारियों से बचाते हैं। लेकिन लोगों ने उन्हें इतना नीचा समझा कि उनकी जाति को एक अपशब्द की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा।
झारखंड के धनबाद जिले में हाल ही में एक 46 वर्षीय दलित महिला के साथ मारपीट की गई और उसे जातिसूचक गालियां दी गईं। इसका कारण था कि इस महिला ने एक दुकानदार के लिए फ्री में सफाई करने से मना कर दिया था। यह घटना बताती है कि सफाई कर्मियों को आज भी किस तरह देखा जाता है।
जिस देश में सफाई कर्मी के साथ यह रवैया हो, जहां सफाई करने को शर्म की बात माना जाता हो, उस देश में सफाई कैसे होगी? विदेशों में बसे भारतीय अपने घर की सफाई खुद करते हैं क्योंकि वहां डोमेस्टिक वर्कर रखना महंगा है। लेकिन भारत में गरीबी और बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि बहुत कम पैसों में भी कोई मजदूर मिल जाता है।
सोसाइटीज में अलग लिफ्ट और अलग बर्तन
बहुत सी सोसाइटीज में घरेलू कामगारों के लिए अलग लिफ्ट बनाई जाती है। उनके लिए चाय-पानी के बर्तन भी अलग रखे जाते हैं। यह गलत माइंडसेट यहीं से शुरू होता है। लोग सफाई करने को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते। स्कूलों में, घरों में, ऑफिसों में हमेशा कोई और सफाई करने आता है।
जो लोग हमारे घरों से कूड़ा इकट्ठा करने आते हैं, हम उन्हें सफाई कर्मी नहीं बल्कि ‘कूड़े वाला’ कहते हैं। यह कमाल की विडंबना है – कूड़ा हम फैलाते हैं, लेकिन उन्हें कूड़े वाला कहते हैं। लोग मानसिक और शारीरिक रूप से अपनी पहचान को सफाई करने से पूरी तरह अलग कर लेते हैं।
यह कनाडा, जर्मनी, जापान या ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों से बहुत बड़ा फर्क है। वहां लोग अपना कूड़ा खुद अलग करते हैं। ज्यादातर लोग अपने घरों की सफाई खुद करते हैं। लेकिन हमारे देश में कोई इंसान कूड़े के पहाड़ पर खड़ा होकर कूड़ा बीनता है।
सरकारी सिस्टम की विफलता: दूसरी बड़ी समस्या
दूसरी बड़ी समस्या है सरकारी सिस्टम की विफलता। क्या आपने अपने शहर में साफ-सुथरे पब्लिक टॉयलेट्स देखे हैं? मॉल्स की बात नहीं, पब्लिक टॉयलेट्स की बात हो रही है। जो कुछ पब्लिक टॉयलेट्स हैं, उनमें आधे से ज्यादा में तो पानी तक नहीं आता। बदबू इतनी ज्यादा होती है कि या तो बदबू से मौत हो जाए या यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन हो जाए।
लोग कहते हैं कि लोगों में सिविक सेंस नहीं है, खुले में पेशाब करते हैं। लेकिन जरा सोचिए – जो स्ट्रीट वेंडर्स पूरे दिन घर से बाहर रहते हैं, वे कहीं ना कहीं तो पेशाब करेंगे ही। या तो उन्हें मॉल्स में साफ-सुथरे पब्लिक टॉयलेट्स का एक्सेस दें या फिर उनकी रेडी के लिए मार्केट में जगह देकर वहां कॉमन टॉयलेट्स लगा दें।
उनके दृष्टिकोण से सोचिए – जब कोई विकल्प ही नहीं बचेगा तो वे सड़क के किनारे ही पेशाब करेंगे। इसी तरह क्या सड़क के किनारे हर जगह फुटपाथ्स हैं? क्या सब जगह जेब्रा क्रॉसिंग्स बनी हुई हैं? नहीं। क्या सड़कों पर लेन मार्किंग्स और साइन बोर्ड्स अच्छे से लगाए जाते हैं? नहीं।
भारत में फ्लाईओवर्स की अजीब डिजाइन
उल्टा हमारे देश में ऐसे फ्लाईओवर्स बनते हैं जहां अचानक से 90 डिग्री का मोड़ आ जाता है। या फिर फ्लाईओवर जो चार लेन से अचानक दो लेन बन जाता है। इस सब इन्फ्रास्ट्रक्चर के बीच आप कैसे लोगों से उम्मीद कर सकते हैं कि वे लेन में गाड़ियां चलाएंगे?
हैरानी की बात है कि हमारे देश में उल्टी गंगा बह रही है। लोग अपना अधिकार नहीं मांग रहे। आपस में ही एक-दूसरे को दोष देने में लगे हुए हैं। माना कि बहुत से लोगों में सिविक सेंस नहीं है, लेकिन हर बात को बस यह कहकर साइड कर देना कि लोगों में सिविक सेंस नहीं है, इसका क्या मतलब बनता है?
नई जनता तो नहीं ला सकते, सिखाना ही होगा
कहीं से नई जनता तो नहीं ला सकते। जो इस देश के लोग हैं, उन्हीं को सिखाना पड़ेगा। लेकिन कौन सिखाएगा? कैसे आएगी सिविक सेंस? कुछ इन्फ्लुएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स अपने स्तर पर इस पर बात कर रहे हैं। लेकिन कोई जबरदस्ती तो नहीं सिखा सकता।
यह काम सरकार को ही करना होगा। चाहे स्कूल करिकुलम में सिविक सेंस का हिस्सा पढ़ाया जाए या फिर गंदगी फैलाने के लिए लोगों पर जुर्माना लगाया जाए। लेकिन गंदगी फैलाने के लिए भी फाइन तो तब लगाएंगे जब पहले कहीं सफाई हो, कहीं सिस्टम हो।
सोचिए, जो इंसान बदबूदार बस्ती में रहता है, जिसकी गली के कोने-कोने पर कूड़े के ढेर लगे हैं, गली में कीचड़ फैला है, गंदा पानी भरा है, मच्छर हैं, जिसके बच्चे के लिए सरकारी स्कूल में साफ टॉयलेट नहीं है – उसे क्या सिविक सेंस का पाठ पढ़ाएंगे?
पहले सिस्टम बनाओ, फिर लोगों को सिखाओ
एक बार उसकी जगह पर सफाई हो, तभी तो उसे कहेंगे कि गंदा मत करो। पहले डस्टबिन लगाया जाए, तभी उसे कहेंगे कि कूड़ा डस्टबिन में डालना है। पब्लिक टॉयलेट बनाए जाएं जहां सफाई हो, पानी हो, साबुन हो, तभी उसे कहेंगे कि टॉयलेट का इस्तेमाल करना है।
सड़क किनारे फुटपाथ हों, साइकिलिंग के लिए लेन हो, जगह-जगह पर सुंदर फूल लगे हों, तभी कहेंगे कि फूल मत तोड़ना। लेकिन अगर इसी गंदी बस्ती में रहने वाला इंसान किसी साफ-सुथरी महंगी सोसाइटी में जाए जहां उसे फूल दिखें, तो वह उन फूलों को तोड़ना चाहेगा क्योंकि उसके लिए यह पहला एक्सपोजर है सुंदरता का।
भेड़चाल की मानसिकता
लोगों में यहां एक भेड़चाल वाला रवैया होता है। जहां गंदगी है, सब गंदगी फैला रहे हैं, तो उन्हें भी अपनी कार की खिड़की खोलकर सड़क पर रैपर फेंकने में कोई हिचक नहीं होती। लेकिन जिस जगह पर सफाई हो, जहां उन्हें लगे कि मैंने गंदा किया तो सबकी नजर मुझ पर होगी, तो वही इंसान चिप्स का रैपर फेंकने से घबराता है।
इसका उदाहरण भारतीय शहरों में भी देखने को मिलता है। जैसे दिल्ली मेट्रो, एयरपोर्ट या मॉल्स में। कुछ एक ढीठ लोगों को छोड़ दें तो ज्यादातर लोग इन जगहों पर गंदगी नहीं फैलाते। उन्हें घबराहट होती है कि लोग उनके बारे में क्या सोचेंगे। ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि इन जगहों पर पहले से ही साफ-सफाई है। एक सिस्टम सेट है।
सरकार का पहला कदम जरूरी
इसलिए जब तक सरकार पहला कदम नहीं उठाती, कुछ भी हासिल करना बहुत मुश्किल है। दुर्भाग्य से हालत इतनी खराब है कि यह सरकार के चुनावी घोषणापत्र में भी नहीं होता कि आपके इलाके में सफाई करेंगे। जो गरीब लोग ₹10 में Zomato और Blinkit की डिलीवरी करते हैं, मुफ्त अनाज के लिए मजबूर हैं, उनके सपनों में भी यह नहीं होता कि गली में पेड़ लगेंगे, फूल होंगे, डस्टबिन होंगे।
बात बिल्कुल साफ है कि अगर सिस्टम सही हो, सही टूल्स हों तो नतीजे अपने आप आते हैं, भले ही लोगों का सिविक सेंस खराब हो।
एम्पैथी की कमी: तीसरी बड़ी समस्या
तीसरी बड़ी समस्या है एम्पैथी यानी संवेदनशीलता की कमी। जो अमीर लोग हैं, उन्हें इन बस्तियों से क्या? वे ऊपर-ऊपर से सफाई की बात करते हैं लेकिन कूड़ा कैसे कम किया जाए, वेस्ट डिस्पोजल मैकेनिज्म्स बेहतर हों, कंपोस्ट पिट्स बनाई जाएं, बेहतर अर्बन प्लानिंग हो – यह सब विस्तार से करने को तैयार नहीं हैं।
वे लोग अपने एक बबल के अंदर रहकर खुश हैं। करोड़ों रुपए के फ्लैट्स खरीद लेंगे, अपार्टमेंट के अंदर स्विमिंग पूल होगा, लॉन टेनिस ग्राउंड, जिम – सब कुछ होगा। लेकिन उसके आसपास की बस्तियां गंदगी से भरी होंगी, कूड़े के पहाड़ होंगे।
बहुत से शहरों की ड्रोन इमेजेस में हम अमीर और गरीब के बीच का फर्क साफ देख सकते हैं। एक दीवार साफ दिखाई देती है। इस दीवार के इस तरफ रहने वाले अमीर इंसानों ने कभी यह सपना नहीं देखा कि पूरा शहर ही सुंदर हो।
सामंती सोच और कम्युनिटी फीलिंग की कमी
सामंती सोच लोगों के दिमाग में गहरे तक घुसी हुई है। इनमें कोई कम्युनिटी की भावना नहीं है। सोचिए, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी जैसे अरबपतियों के पास इतना पैसा है कि वे पूरे शहर को नहीं तो कम से कम एक शहर के बहुत बड़े हिस्से को पूरी तरह साफ-सुथरा बना सकते हैं। लेकिन वे उस पर पैसा खर्च नहीं करेंगे।
वे बनाएंगे इस गंदगी के बीच में अपना एक बड़ा ऊंचा महल। अपने महल के अंदर सारी लग्जरी चीजें डाल लेंगे, लेकिन उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं होगी कि बाहर खिड़की से जो दिख रहा है – गंदगी और कूड़ा – सब चलता है।
छोटे बदलाव से शुरुआत करें
लोगों के अंदर यह कम्युनिटी की भावना डालने के लिए कोई भगवान आकर अवतार नहीं लेने वाले। दूसरों के प्रति एम्पैथी रखनी होगी। आपको यह सोचना होगा कि मेरा गंदा किया हुआ किसी और को साफ करना पड़ेगा, इसलिए मैं गंदा न करूं।
यह सोच घर से बाहर निकलने के बाद तो बाद में होगी। यह माइंडसेट आपका घर के अंदर भी होना चाहिए। जहां-जहां आप गंदगी फैलाते हैं – घर के अंदर बिखरा सामान, झूठे बर्तन, बाथरूम में जमा कैल्शियम – खुद इसकी जिम्मेदारी उठाएं।
होटल से चेक आउट करते समय अपनी खाली पानी की बोतल, खाली पैकेट्स खुद ट्रैश कैन में डाल दें। रेस्टोरेंट्स में खाना खाने के बाद अपने हाथों से सभी बर्तनों को टेबल के एक कोने में इकट्ठा करके रख दें जिससे वेटर के लिए आसानी हो।
अगली बार बिल्डिंग से बाहर निकलते वक्त अपने पीछे वाले के लिए दरवाजा पकड़कर रखें। जिस दिन ये छोटे-छोटे बदलाव आपके व्यवहार में आ गए, उस दिन आपकी एम्पैथी जाग उठेगी। दूसरों के लिए आपको चिंता होगी और उसी को सिविक सेंस कहते हैं।
स्कूलों में सिविक सेंस की शिक्षा जरूरी
अक्सर ऐसे वीडियोज पर लोग कमेंट करते हैं कि यह वीडियो जिन लोगों को देखनी चाहिए, वे इसे देख नहीं रहे। तो उन लोगों के लिए सरकार को ही यह काम करना होगा। स्कूल करिकुलम में सिविक सेंस का पाठ पढ़ाकर, क्लास में यह समझाकर कि जातिवाद एक मानसिक बीमारी है, सफाई करना शर्म की बात नहीं बल्कि गर्व की बात है।
यह सिखाया जाना चाहिए कि सफाई कर्मी का सम्मान करो। अपना कूड़ा किस तरह से अलग करना है। पब्लिक प्लेस में वीडियो देख रहे हो तो ईयरफोन्स लगाओ ताकि दूसरे डिस्टर्ब न हों। यह सब क्लास में पढ़ाना होगा।
सिस्टम और नियम दोनों जरूरी
दूसरी बात है पूरा सिस्टम बनाना और अंत में उस सिस्टम को बनाए रखने के लिए नियम बनाने होंगे। ढीठ लोग हर देश में होते हैं। विकसित देशों में भी होते हैं। लेकिन फर्क यह है कि वहां सिस्टम ऐसा बना है कि उन लोगों को सजा मिले और बाकी सब लोगों के लिए कोई दिक्कत न हो।
यहां कोई बहुत कड़ी सजा देने की जरूरत नहीं है। बल्कि सजा मिलने की संभावना बहुत ज्यादा करने की जरूरत है। भले ही आप सिर्फ ₹500 का फाइन रखें या सिर्फ एक दिन की जेल रखें। लेकिन इसकी हाई प्रोबेबिलिटी होनी चाहिए कि अगर किसी ने कहीं गंदगी फैलाई तो आप बच नहीं पाएंगे।
ऐसा करने से सिविक सेंस की आदत अपने आप आ जाएगी। धीरे-धीरे लोगों के अंदर दूसरों के लिए चिंता भी होगी और कम्युनिटी की भावना भी जागेगी।
डेनमार्क में सामाजिक जिम्मेदारी की भावना
डेनमार्क के लोगों में कम्युनिटी की भावना है। इसे कहा जाता है ‘सैमफुंडसिंद’ मतलब सामाजिक सोच। समाज के हित को खुद से ऊपर रखना। डेनमार्क में यह भावना कोरोना काल में भी देखी गई थी।
भारत में कुछ लोग बात करते हैं कि सिविक सेंस लाने के लिए डंडे मारे जाएं, फाइन लगाया जाए, जेल भेजा जाए। लेकिन इन सबसे 100 गुना ज्यादा प्रभावशाली चीज है एम्पैथी। लोगों के अंदर एक-दूसरे के प्रति एम्पैथी की भावना जगाना।
डेनमार्क में लोग एक-दूसरे के प्रति चिंतित रहते हैं। साझा स्थानों में नियम फॉलो करते हैं। पब्लिक हाइजीन बनाए रखते हैं। दूसरों के प्रति सम्मानपूर्वक व्यवहार करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके अंदर सामाजिक जागरूकता है। और यही काफी है सिविक सेंस लाने के लिए।
जातिवाद की अनुपस्थिति बड़ा फर्क
एक और कारण है कि वहां जातिवाद नहीं है। कोई गरीब इंसान हो, सफाई कर्मी हो, होटल में हाउसकीपिंग स्टाफ हो – उसे इंसान की नजर से देखा जाता है। वहां सफाई के काम को इज्जत दी जाती है।
भारत में अभी लोग कूड़े को सूखे और गीले कूड़े में ही सॉर्ट करने में कंफ्यूज्ड हैं। लेकिन डेनमार्क में 10 अलग-अलग कैटेगरीज में सॉर्ट किया जाता है कूड़े को – ग्लास के लिए अलग, मेटल के लिए अलग, प्लास्टिक के लिए अलग, पेपर अलग, फूड एंड ड्रिंक कार्टन्स अलग, कार्डबोर्ड अलग, टेक्सटाइल्स अलग, फूड वेस्ट अलग, हजार्डस वेस्ट अलग और रेसिडुअल वेस्ट अलग।
खुद कूड़ा सॉर्ट करना पड़ता है
लोग किसी का इंतजार नहीं करते कि कोई ‘कूड़े वाला’ आएगा और उनके कूड़े को 10 अलग-अलग तरीके से सॉर्ट करेगा। नहीं। लोग अपने घर पर ही 10 अलग-अलग तरीके से कूड़े को सॉर्ट करने के लिए डस्टबिन्स लगाते हैं।
और बात यहां खत्म नहीं होती। सिर्फ जो सबसे ज्यादा जनरेट किया जाने वाला कूड़ा है, उसे उठाने के लिए कोई आता है। लेकिन जो हजार्डस वेस्ट है, टेक्सटाइल्स है, इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट है – इन्हें इकट्ठा करके खुद रिसाइक्लिंग सेंटर में ले जाना पड़ता है।
एक शहर के अंदर आमतौर पर तीन से चार जगहों पर रिसाइक्लिंग सेंटर्स बने होते हैं। लोगों को खुद जाना पड़ता है उन रिसाइक्लिंग सेंटर्स में कूड़ा जमा करने के लिए। सोचिए, अगर यह चीज भारत में होती तो ज्यादातर लोग आलस्य में आकर हजार्डस वेस्ट को नॉर्मल कूड़े में डाल देते, जो कि अभी करते भी हैं।
स्विट्जरलैंड और जर्मनी का मॉडल
लेकिन डेनमार्क में लोग खुद से इतना कष्ट उठाते हैं रिसाइक्लिंग सेंटर में जाने के लिए क्योंकि वे जानते हैं कि अगर यह हजार्डस वेस्ट पर्यावरण में फैला तो उन्हें ही इसका नुकसान होगा। और बात यहां सिर्फ डेनमार्क की नहीं है। जर्मनी, स्विट्जरलैंड, न्यूजीलैंड – ज्यादातर विकसित देशों में ऐसा ही होता है।
स्विट्जरलैंड में ट्रैश डिस्पोजल की एक कॉस्ट है। आप अपने घर का कूड़ा केवल म्युनिसिपल बैग्स में ही डिस्पोज कर सकते हैं और आपको यह म्युनिसिपल बैग्स खरीदने पड़ते हैं। जबकि दूसरी तरफ आपको रिसाइक्लिंग की सुविधा फ्री में दी जाती है ताकि लोगों को प्रोत्साहित किया जा सके।
प्लास्टिक बोतलों का पैंट सिस्टम
रिसाइक्लिंग में सबसे बड़ा चैलेंज होता है प्लास्टिक बोतलें और एल्युमिनियम कैन्स। भारत में प्लास्टिक की समस्या इतनी बड़ी है कि चाहे लद्दाख की पैंगोंग लेक हो या चंडीगढ़ की सुखना लेक, चाहे केरल हो या मणिपुर – प्लास्टिक वेस्ट की समस्या सब जगह है।
लेकिन यह समस्या आपको ज्यादातर यूरोपियन देशों में नहीं मिलेगी क्योंकि डेनमार्क और जर्मनी जैसे देशों में प्लास्टिक बोतलों के लिए एक ‘पैंट सिस्टम’ होता है। आपने वेंडिंग मशीनें देखी होंगी जहां आप पैसे डालते हैं और बोतलें निकलती हैं। यहां रिवर्स वेंडिंग मशीनें लगी होती हैं। जहां आप खाली बोतल डालें और बदले में आपको कुछ पैसे मिलते हैं।
दरअसल, जब भी आप कुछ प्लास्टिक की बोतल में खरीदते हैं तो आपको कुछ एक्स्ट्रा पैसे हमेशा देने पड़ते हैं जो एक डिपॉजिट की तरह होते हैं। बाद में जब आप खाली बोतल लाकर वापस लौटाते हैं इन रिवर्स वेंडिंग मशीनों में, तब आपको वो पैसे, अपना डिपॉजिट वापस मिल जाता है।
जुर्माना नहीं, इनाम आधारित सिस्टम
यह पूरा सिस्टम जुर्माना आधारित नहीं बल्कि इनाम आधारित है। इससे हर कोई मोटिवेट होता है कि वो प्लास्टिक की बोतलों को कहीं भी नहीं फेंकेगा क्योंकि उनमें पैसे हैं। उन्हें वापस लौटाने पर पैसे मिलेंगे।
डेनमार्क का बोर्नहोल्म आइलैंड तो पूरी तरह से वेस्ट फ्री बनाने की कोशिश की जा रही है। यानी सब कुछ जो उस आइलैंड में प्रोड्यूस हो रहा है, उसे रीयूज या रिसाइकल किया जाएगा। इनका लक्ष्य है कि साल 2032 तक यह दुनिया की पहली वेस्ट फ्री कम्युनिटी बन जाएगी।
कोपनहेगन: साइकिल फ्रेंडली सिटी
यह रवैया डेनमार्क में हर चीज में देखने को मिलता है। डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन में साइकिलिंग बहुत आम है। यह दुनिया की सबसे साइकिल फ्रेंडली सिटीज में से एक है। 64% यात्री यहां सिर्फ साइकिल से ट्रैवल करते हैं।
साथ ही इन्होंने सस्टेनेबल ‘5 मिनट नेबरहुड्स’ बनाए हैं। जहां सिर्फ पब्लिक ट्रांसपोर्ट और साइकिल की मदद से आप अपने वर्क प्लेस, स्कूल, शॉपिंग – सब कुछ 5 मिनट के दायरे में कर सकते हैं। इससे लोगों का घूमना-फिरना ज्यादा होता है। लोग ज्यादा स्वस्थ रहते हैं और गाड़ियां बहुत कम यूज होती हैं।
डेनमार्क में CO2 एमिशन्स को कम करने के लिए क्लाइमेट फ्रेंडली एस्फाल्ट का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। सड़कों के किनारे पेड़ लगाए जाते हैं जिससे छांव मिले और तापमान को नियंत्रित रखा जा सके।
पैदल यात्री पहले: विकसित देशों की नीति
ज्यादातर विकसित देशों में ‘पेडेस्ट्रियन फर्स्ट’ की नीति है। यानी कोई भी पैदल यात्री सड़क पार करने निकला है तो गाड़ियों को उसके सामने रुकना ही होगा, चाहे कोई ट्रैफिक लाइट हो या न हो। इसके अलावा कोई भी हॉर्न नहीं बजाएगा।
वास्तव में यह हॉर्न वाली चीज तो इतनी दिलचस्प है कि भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से एक है जहां लोग हॉर्न हमेशा बजाते रहते हैं, बेवजह। दूसरे देशों में हॉर्न बजाना इतना दुर्लभ है कि आपको महीने में मुश्किल से एक-दो बार कभी हॉर्न की आवाज सुनाई देगी। इससे सड़क पर बहुत शांति रहती है।
क्लाइमेट पार्क्स: प्रकृति को बचाना
भारत में हम आमतौर पर देखते हैं कि किसी इलाके को तथाकथित विकास करने के लिए, रेजिडेंशियल एरियाज बनाने के लिए वहां से प्रकृति को पूरी तरह हटा दिया जाता है और फिर बिल्डिंग बनाकर उसके बीच घास के लॉन वाले पार्क्स बनाए जाते हैं।
लेकिन डेनमार्क में आपको ‘क्लाइमेट पार्क्स’ देखने को मिलते हैं। जहां प्रकृति को उसके प्राकृतिक रूप में रहने दिया जाता है। यह सारी चीजें एक तरह से समग्र समाधान का काम करती हैं। जिनके बारे में लोग तभी सोचते हैं जब लोगों के अंदर एम्पैथी होती है अपनी कम्युनिटी को लेकर, अपने आसपास के लोगों को लेकर।
पॉजिटिव फीडबैक लूप का निर्माण
यहां एक तरह से एक पॉजिटिव फीडबैक लूप भी बन जाता है। जब सफाई होती है, पर्यावरण अच्छा है, साफ हवा है, क्लाइमेट चेंज को रोकने की कोशिश की जा रही है, कहीं नॉइज पॉल्यूशन को कम करने की कोशिश की जा रही है – तो अपने आप लोगों के अंदर कम्युनिटी की भावना और भी ज्यादा बढ़ती रहती है।
सिंगापुर में रेस्टरूम एसोसिएशन ऑफ सिंगापुर है जो पब्लिक टॉयलेट्स को एग्जामिन करती है, उन्हें तीन, चार या पांच स्टार्स देती है। जो टॉयलेट अच्छा स्कोर करे, उसे ‘हैप्पी टॉयलेट’ का लोगो मिलता है और आरएएस अपनी वेबसाइट पर उन्हें प्रमोट भी करती है।
जापान में स्कूलों में सफाई की शिक्षा
जापान में सिविक सेंस स्कूल में सिखाई जाती है। बच्चे अपने क्लासरूम, कॉरिडोर्स और टॉयलेट्स को खुद साफ करते हैं। इसके लिए उन्हें लंच के बाद या स्कूल के आखिर में 15 से 20 मिनट दिए जाते हैं। इसे ‘ओसोजी’ कहा जाता है। यह चीज बौद्ध धर्म और शिंटो धर्म की फिलॉसफी से प्रेरित है। जहां साफ-सफाई, आपसी सद्भाव और साझा स्थानों के लिए सम्मान को प्रोत्साहित किया जाता है।
ठीक इसी तरह जर्मनी, स्वीडन, चेक रिपब्लिक, नीदरलैंड्स जैसे यूरोपियन देशों के स्कूलों में भी बच्चों को रिसाइक्लिंग और वेस्ट मैनेजमेंट प्रैक्टिसेस बचपन से ही सिखाई जाती हैं।
लाइन में लगना और एस्केलेटर एडिकेट
इसी तरह सही से लाइन में लगना इंग्लैंड के खून में दौड़ता है। सिटीजनशिप टेस्ट में आपसे बकायदा लाइन में लगने को लेकर सवाल पूछे जा सकते हैं। कनाडा के लोग बहुत साफ-सुथरी और व्यवस्थित कतार बनाने के लिए जाने जाते हैं।
रूस और यूएई जैसे कई देशों में हम एस्केलेटर एडिकेट देख सकते हैं। एक साइड खड़े होने के लिए और दूसरी साइड एस्केलेटर पर चलने वाले लोगों के लिए।
क्यू मैनेजमेंट सिस्टम की जरूरत
सिस्टम इस सब के लिए भी बनाया जा सकता है। जैसे कि फास्टैग वाले क्यू मैनेजर हैं, आपने एयरपोर्ट्स पर देखे होंगे। यही चीज रेलवे स्टेशन पर क्यों नहीं की जाती? किसी भंडारे में, किसी मंदिर की लाइन में – यह सब क्यों नहीं होता? क्यों हम सोचते हैं कि इन गरीब लोगों को तो चढ़ने दो एक-दूसरे के ऊपर? क्यों हम वहां भगदड़ होने देते हैं?
म्युनिसिपैलिटीज और पुलिस इसे अपने क्लीयरेंस प्रोसीजर्स का हिस्सा बना सकती हैं कि एंट्रेंस और एग्जिट प्लान दिखाओ, साइनेज प्लान दिखाओ, क्राउड मैनेजमेंट के मैकेनिज्म्स, क्यू मैनेजर्स – यह सब दिखाओ।
भारत में भी संभव है बदलाव
तो देख रहे हैं ना, यहां पूरी तस्वीर साफ है – साफ-सुथरी सड़कें जिसमें कोई गड्ढे न हों, जेब्रा क्रॉसिंग्स, फुटपाथ्स, हरियाली, पेड़, फूल, साफ हवा, शोर-शराबा न हो, सब जगह टॉयलेट्स और डस्टबिन्स हों, खुद का कूड़ा अपने आप अलग करना, रिसाइक्लिंग पर जोर देना। क्या यह सब भारत में नहीं हो सकता?
बिल्कुल हो सकता है। होने को कुछ भी हो सकता है अगर नेताओं की सही मंशा हो। बस इस तरीके से सिस्टम्स बनाने की जरूरत है और फिर उनको बनाए रखने की जरूरत है। और इसके लिए लोगों को रोजगार भी दिया जा सकता है।
मुख्यमंत्रियों से अपील
देश के सभी मुख्यमंत्रियों से अनुरोध है कि इस दिशा में आगे कदम बढ़ाएं। अपनी जगह को सुंदर करें। हमारे देश को सुंदर बनाएं। इससे देश के टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलेगा और लोग भी ज्यादा खुश रहेंगे। हमें यह सब करने की बहुत अर्जेंट जरूरत है।
अफ्रीका के ऐसे देश जो एक समय पर भारत से कितने पीछे हुआ करते थे, वे भी भारत से ज्यादा साफ-सुथरे बन चुके हैं। ऐसा ही एक देश है रवांडा जिसे अफ्रीका का सबसे साफ देश माना जाता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- भारत में सिविक सेंस की कमी के तीन बड़े कारण हैं – जातिवाद और वर्ग भेद, सरकारी सिस्टम की विफलता, और लोगों में एम्पैथी की कमी।
- डेनमार्क जैसे विकसित देशों में लोग अपना कूड़ा खुद 10 अलग-अलग कैटेगरीज में सॉर्ट करते हैं और रिसाइक्लिंग सेंटर्स में जमा करते हैं।
- भारत में पहले पर्याप्त पब्लिक टॉयलेट्स, डस्टबिन्स, फुटपाथ्स और जेब्रा क्रॉसिंग्स बनाने की जरूरत है, फिर लोगों से उम्मीद करनी चाहिए।
- स्कूलों में सिविक सेंस की शिक्षा देना और सफाई कर्मियों का सम्मान करना सिखाना जरूरी है।
- जुर्माने के बजाय प्रोत्साहन आधारित सिस्टम (जैसे प्लास्टिक बोतल वापस करने पर पैसे मिलना) ज्यादा प्रभावी होता है।








