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Amit Shah Missing : संसद से 10 दिन गायब! मोदी-बिरला के बाद राहुल ने शाह का भी नंबर लगा दिया?

बजट सत्र के सबसे तूफानी दौर में गृह मंत्री अमित शाह लोकसभा से गायब रहे, स्पीकर पर अविश्वास प्रस्ताव से लेकर एप्स्टीन फाइल्स तक — चाणक्य की खामोशी ने बीजेपी के भीतर भी सवाल खड़े किए

The News Air Team by The News Air Team
गुरूवार, 12 फ़रवरी 2026
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Amit Shah Missing
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Amit Shah Missing Parliament: ठीक 10 दिन पहले — 2 फरवरी को — जब राहुल गांधी ने दोपहर 1 बजे लोकसभा में भाषण देना शुरू किया, उस वक्त गृह मंत्री अमित शाह अपनी सीट पर बैठे थे, गुस्से में कुछ कह भी रहे थे। लेकिन उसके बाद से आज तक — न प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में कदम रखा, न रक्षा मंत्री आए, और न ही गृह मंत्री अमित शाह नजर आए। बीजेपी के “चाणक्य” कहे जाने वाले शाह की गैरमौजूदगी में संसद में जो कुछ घटा — स्पीकर पर अविश्वास प्रस्ताव, एप्स्टीन फाइल्स का जिक्र, ट्रेड डील पर हमला — वह भारत के संसदीय इतिहास का एक अभूतपूर्व अध्याय बन गया है।

चाणक्य की खामोशी — सामान्य बिल्कुल नहीं

सामान्य तौर पर लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका सिर्फ अपनी सीट पर बैठने तक सीमित नहीं रहती। उनकी टीम की मौजूदगी उस जगह बनी रहती है जहां से तमाम दिशा-निर्देश स्पीकर तक पहुंचते हैं। बीजेपी के सांसदों को बताया जाता है कि कब शोर मचाना है, कब सवाल उठाना है, कब विपक्ष को खामोश करना है, किसे निशाने पर लेना है। यह पूरी व्यवस्था पर्दे के पीछे से अमित शाह और उनकी टीम चलाती है।

लेकिन बजट सत्र के इस सबसे तूफानी दौर में — जब सरकार को चारों तरफ से घेरा जा रहा था — चाणक्य कहीं नजर नहीं आए। ऐसा नहीं है कि वे दिल्ली में नहीं थे। ठीक उसी दौरान दिल्ली में साइबर फ्रॉड पर एक सेमिनार चल रहा था जिसमें अमित शाह की मौजूदगी भी थी। जिस वक्त लोकसभा में स्पीकर संकट में थे, एप्स्टीन फाइल्स का जिक्र हो रहा था, ट्रेड डील पर सरकार घिर रही थी — उस वक्त गृह मंत्री साइबर फ्रॉड पर भाषण दे रहे थे।

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शाह की गैरमौजूदगी में संसद में क्या-क्या हुआ?

10 दिनों में जो कुछ हुआ उसकी गंभीरता को समझिए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक ऐसी बात कहनी पड़ी जो भारत के संसदीय इतिहास में पहले कभी नहीं कही गई — “अगर प्रधानमंत्री आ जाते तो उन पर हमला हो जाता।” किसने कहा स्पीकर से यह कहने के लिए? यह सवाल आज तक अनुत्तरित है।

उसके बाद पूरा विपक्ष एकजुट हो गया और स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव दाखिल कर दिया गया। स्पीकर ने तय किया कि जब तक अविश्वास प्रस्ताव से निपटा नहीं जाता तब तक वे लोकसभा में नहीं आएंगे। राहुल गांधी ने बजट पर बोलते हुए एप्स्टीन फाइल्स का जिक्र कर दिया, हरदीप सिंह पुरी और अनिल अंबानी का नाम लिया, अडानी के अमेरिकी अदालत के मामले का हवाला दिया, अमेरिका के साथ ट्रेड डील को “wholesale surrender” बताया। और इन सबके बीच — चाणक्य कहीं नजर नहीं आए।

किरण रिजिजू ने संभाला, लेकिन फंसते गए

अमित शाह की गैरमौजूदगी में संसद के भीतर का प्रबंधन संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू पर आ गया। रिजिजू एक वक्त अमित शाह के इशारे पर चलते थे — संसद में क्या करना है, कैसे करना है, सब तय होता था। लेकिन इस बार उन्होंने जो किया उससे सवाल और बड़े हो गए।

पहले रिजिजू ने राहुल गांधी से ऑथेंटिकेशन की मांग की — लेकिन जब राहुल तैयार हो गए दस्तावेज रखने को, तो चेयर ने कहा “हमने तो नहीं मांगा।” फिर प्रिविलेज मोशन की बात उठाई — वह भी दाएं-बाएं हो गई। फिर संसदीय मंत्री खुद वीडियो लीक करने लगे — जो उनका काम नहीं है। बाहर मीडिया में सवालों की दिशा तय करने लगे। यह सब वह बचकानापन था जो अमित शाह की मौजूदगी में कभी नहीं होता।

इसके बाद बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने एक और कदम उठाया — “सब्स्टैंटिव मोशन” का जिक्र किया और कहा कि राहुल गांधी की सदस्यता खत्म हो और वे जिंदगीभर चुनाव लड़ने से डिबार हों। यह एक इम्पॉसिबल मांग है — हर कोई जानता है। पहले ऑथेंटिफिकेशन, फिर प्रिविलेज मोशन, अब सब्स्टैंटिव मोशन — एक के बाद एक दांव चले गए और एक भी काम नहीं आया।

मोदी सरकार में इस्तीफे का इतिहास — कोई नहीं देता

प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल की एक खासियत रही है — कोई मंत्री इस्तीफा नहीं देता। चाहे CAG की रिपोर्ट आ जाए कि हेल्थ मिशन में गड़बड़ी है या सड़क बनाने में पैसा लूटा गया — इस्तीफा नहीं। रेल दुर्घटनाओं में सैकड़ों लोगों की मौत हो जाए — रेल मंत्री इस्तीफा नहीं देगा। एविएशन मिनिस्ट्री के दायरे में एयर इंडिया का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो जाए — दुनिया का सबसे दर्दनाक हादसा — और एयर इंडिया मारे गए लोगों के परिजनों से कहे कि 10 लाख ले लीजिए इस गारंटी के साथ कि अदालत नहीं जाएंगे — ब्रिटेन और इटली के अखबार छाप रहे हैं — फिर भी इस्तीफा नहीं।

एप्स्टीन फाइल्स में हरदीप पुरी का नाम आ गया — खुलेआम स्वीकार कर रहे हैं कि मुलाकात हुई — फिर भी कोई छूता नहीं।

मोदी सरकार में कौन सा मंत्री कितना ताकतवर?

इस संकट ने एक और बड़ा सवाल खड़ा किया — क्या मोदी सरकार में कोई ऐसा मंत्री बचा है जिसकी अपनी पहचान हो, जो अपने मंत्रालय का काम संभालता हो, जो सरकार के लिए संकट मोचक बन सके? जवाब है — नहीं।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर — नौकरशाह हैं। रूस से तेल खरीदने को लेकर जो बातें पहले कहते थे, डील के बाद न यूरोप दौरे में कह पाते हैं न अमेरिकी दौरों में। भारत की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति रूस, चीन और अमेरिका के बीच फंस गई है। गाजा, ईरान, फिलिस्तीन — सब कुछ उलझा हुआ है। लेकिन जयशंकर प्रधानमंत्री मोदी के इस वक्त सबसे करीबी हैं।

कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल — अमेरिका से डील की बातचीत के दौरान अमेरिकी अधिकारी ही नहीं चाहते थे कि भारतीय टीम में गोयल मौजूद रहें। उन्हें अमेरिकी अधिकारियों ने नेगलेक्ट किया।

हरदीप सिंह पुरी — तेल का मंत्रालय भी हाथ में, अर्बन डेवलपमेंट भी, और अब एप्स्टीन फाइल्स का संकट अलग। वे भी नौकरशाह हैं।

जे.पी. नड्डा — कल तक बीजेपी अध्यक्ष, आज मंत्री। सरकार के इतने अनुकूल हैं कि सबसे करीब नजर आते हैं। शिवराज सिंह चौहान — एग्रीकल्चर मिनिस्टर हैं, किसानों की बात करते हैं, लेकिन नीतियां साथ नहीं देतीं। धर्मेंद्र प्रधान और भूपेंद्र यादव — अरावली विवाद के दौरान लोग सड़कों पर निकल आए कि देश का एनवायरनमेंट मिनिस्टर कौन है, कोई जानता ही नहीं था।

राजनाथ सिंह — हमेशा प्रधानमंत्री के साथ खड़े रहे हैं। लेकिन वे उसी धारा में बहते हैं जिसमें PMO की हवा बहती है।

यानी पूरी फेहरिस्त गिनाने के बाद एक भी ऐसा नाम नहीं निकलता जो अपने बूते बीजेपी को चुनाव जिता सके — यहां तक कि खुद अपना चुनाव जीत सके। सारी चीजें केंद्रित हो जाती हैं प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर। और उनको संभालने के लिए अमित शाह की मौजूदगी जरूरी है — लेकिन वे गायब हैं।

बीजेपी संगठन के भीतर भी सवाल

यह संकट सिर्फ सरकार का नहीं, बीजेपी संगठन का भी है। बीजेपी के नए अध्यक्ष बने नितिन नवीन — किसी ने कल्पना नहीं की थी कि यह नाम आएगा। बड़े-बड़े अनुभवी नेता जो राज्यों की राजनीति छोड़कर दिल्ली आए, राष्ट्रीय संगठन से जुड़े — अब वे नितिन नवीन के मातहत काम करेंगे। क्या इस फैसले में अमित शाह से राय ली गई या आखिरी बैठक में सिर्फ जानकारी दे दी गई?

नेशनल वाइस प्रेसिडेंट में वसुंधरा राजे का नाम है — जो अपने बूते राजस्थान का चुनाव जिता सकती हैं। लेकिन न वे राजस्थान की रहीं, न बीजेपी के भीतर परिस्थितियां संभालने की स्थिति में हैं। नेशनल जनरल सेक्रेटरी में विनोद तावड़े, तरुण चुघ, सुनील बंसल, राधामोहन दास अग्रवाल जैसे नाम हैं — लेकिन सबके बॉस नितिन नवीन हैं।

मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को हटाकर मोहन यादव को बिठाया गया। राजस्थान में वसुंधरा राजे को दरकिनार कर भजनलाल शर्मा का नाम लाया गया। मुख्यमंत्री भी दिल्ली से तय हो रहे हैं, अध्यक्ष भी दिल्ली से तय हो रहे हैं — सब कुछ PMO से चल रहा है।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस — दोनों अपनी राह पर अपनी राजनीति साधना चाहते हैं। दिल्ली से तालमेल बिगड़ा रहता है। तो फिर सवाल घूमकर वापस अमित शाह की तरफ ही आता है।

राहुल गांधी ने कैसे पूरे विपक्ष को एकजुट कर दिया?

इस पूरे संकट में एक बात साफ है — राहुल गांधी अकेले नेता प्रतिपक्ष के रूप में बीजेपी और मोदी सरकार को घेरने में सफल रहे। जब जवाब नहीं दिया जा सका तो उन्हें संसद से निकालने की राजनीति शुरू हुई। पहले भी एक बार उनकी सदस्यता छीनी गई — सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट का फैसला पलटा और सदस्यता बहाल की।

राहुल ने मीडिया से भी सीधे सवाल किया — “You are not totally employed by the BJP. At least try doing a little bit of objective stuff. It gets really shameful. You have a responsibility to be objective. You can’t just take a word they give you, write everyday, and then run your whole show on that. You are doing a disservice to this country.”

इसके जवाब में रिजिजू ने कहा — “हमने कभी मीडिया से नहीं कहा कि आप कांग्रेस के कार्यकर्ता की तरह सवाल क्यों कर रहे हैं।” लेकिन यह जवाब अमित शाह की गैरमौजूदगी में डगमगाती सरकार की नब्ज बता रहा है।

राहुल गांधी ने कहा कि उनके पास अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस की फाइलें हैं जिनमें हरदीप पुरी और अनिल अंबानी का नाम है। अडानी का केस चल रहा है, समन जारी हुए हैं, भारत सरकार ने 18 महीने तक जवाब नहीं दिया। वे ये दस्तावेज सदन में रखने को तैयार हैं। और इन सबके बीच — विपक्ष स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ले आया, ट्रेड डील के खिलाफ “वापस लो, वापस लो” का नारा गूंजा, पूरा विपक्ष एकजुट होकर सड़कों पर उतरने लगा।

विश्लेषण: दो सवाल जो अब अनदेखे नहीं किए जा सकते

पहला सवाल — जब तक संसद के भीतर और बाहर दोनों जगहों पर मोदी और शाह की बराबर की सक्रियता रहती है, तब तक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं। लेकिन इस बार शाह गायब हैं। क्या मोदी-शाह की जोड़ी में कुछ बदला है? क्या बीजेपी अध्यक्ष का चयन, राज्यों के मुख्यमंत्रियों का चयन — सब कुछ सिर्फ PMO से तय हो रहा है और शाह को सिर्फ जानकारी दी जा रही है?

दूसरा सवाल — क्या यह संकट सिर्फ सरकार का है या बीजेपी संगठन का भी? बीजेपी के सांसद इस हकीकत को जान रहे हैं कि एक-एक करके हर पिलर गिर रहा है। गिरिराज सिंह नजर आए, निशिकांत दुबे बोले — लेकिन इनकी कोई साख नहीं है। जाना जाता है कि ये सिर्फ एक इशारे पर वो बातें बोलने निकल पड़ते हैं जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता।

अच्छी बात यह है कि संसद का कल आखिरी दिन है। लेकिन जो संकट खड़ा हुआ है वह संसद बंद होने से नहीं थमेगा। अमित शाह एकमात्र ऐसे वरिष्ठ नेता हैं जो विदेश की यात्रा पर नहीं गए — और विदेश की कूटनीति संभालने वालों की साख पहले ही डगमगा चुकी है। तो सवाल बना रहेगा — चाणक्य कहां हैं और क्यों खामोश हैं?


मुख्य बातें (Key Points)
  • 10 दिन गायब: 2 फरवरी के बाद से गृह मंत्री अमित शाह लोकसभा की कार्यवाही से गायब रहे — बजट सत्र के सबसे तूफानी दौर में चाणक्य की खामोशी ने सरकार और बीजेपी दोनों के लिए संकट बढ़ाया।
  • कोई संकटमोचक नहीं: मोदी सरकार में जयशंकर, पीयूष गोयल, हरदीप पुरी, नड्डा, शिवराज — किसी भी मंत्री की ऐसी साख नहीं कि अपने बूते चुनाव जिता सके या सरकार के लिए संकटमोचक बन सके।
  • विपक्ष की एकजुटता: राहुल गांधी ने अकेले नेता प्रतिपक्ष के रूप में एप्स्टीन फाइल्स, ट्रेड डील और अडानी केस उठाकर पूरे विपक्ष को एकजुट कर दिया — स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तक दाखिल हो गया।
  • बीजेपी संगठन में भी सवाल: अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, राज्यपाल — सब PMO से तय हो रहे हैं। मोदी-शाह की जोड़ी में सब सामान्य नहीं दिखता — यह बीजेपी के अपने सांसदों के लिए भी चिंता का विषय है।
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