Bikram Singh Majithia Release: पूर्व मंत्री और शिरोमणि अकाली दल के सीनियर नेता बिक्रम सिंह मजीठिया की जेल से रिहाई को लेकर पंजाब की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। मजीठिया ऐसे समय में जमानत पर रिहा हो रहे हैं, जब 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय रह गया है। पटियाला की नाभा जेल से उनकी रिहाई के लिए कागजी कार्रवाई पूरी हो चुकी है और जेल के बाहर सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए हैं।
वहीं आम आदमी पार्टी को इससे बड़ा झटका लगा है। AAP के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल पिछली कुछ रैलियों में बिक्रम मजीठिया का नाम लिए बगैर ड्रग्स पर सरकार के एक्शन को भुना रहे थे कि किसी की हिम्मत नहीं थी लेकिन हमारी सरकार ने जेल में बंद कर दिया। अब यह नैरेटिव नहीं बन पाएगा।
2027 के चुनाव में कमबैक की उम्मीद लगाए बैठे अकाली दल के लिए बैक टू बैक अच्छी खबरें आ रही हैं। पहले तरनतारन उपचुनाव में उन्होंने AAP को कड़ी टक्कर दी। फिर जिला परिषद व ब्लॉक समिति चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया। अब मजीठिया के बाहर आने से उन्हें बेबाक नेता भी बोलने के लिए मिल जाएगा।
AAP का ड्रग्स नैरेटिव कमजोर पड़ेगा
आम आदमी पार्टी ने मजीठिया को ड्रग्स और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों से जोड़ते हुए उन्हें “ड्रग तस्करों का संरक्षक” बताकर पेश किया था। खुद AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल रैलियों में बिना नाम लिए मजीठिया को जेल भेजने का श्रेय लेते रहे हैं। जमानत मिलने से AAP का यह नैरेटिव कमजोर पड़ सकता है।
खासकर मजीठिया सीधे मुख्यमंत्री भगवंत मान को टारगेट करते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में बयानबाजी का घमासान देखने को मिल सकता है। यह AAP के लिए चुनावी रणनीति में बड़ी चुनौती बन सकता है।
AAP का काउंटर: बेल का मतलब बरी होना नहीं
AAP मजीठिया की जमानत और रिहाई को कैसे काउंटर करेगी, इसके संकेत मंत्री हरपाल चीमा ने पहले ही दे दिए थे। चीमा ने कहा कि बेल का मतलब बरी होना नहीं होता। मजीठिया के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं, आगे ट्रायल चलेगा और उसमें सरकार सारे सबूत पेश करेगी।
यह AAP की रणनीति का हिस्सा है कि वे मजीठिया को अभी भी आरोपी के रूप में पेश करते रहें और यह बताएं कि कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है। लेकिन राजनीतिक तौर पर यह नैरेटिव कितना कारगर होगा, यह देखना होगा।
अकाली दल को मिलेगी एग्रेसिव लीडरशिप
बिक्रम मजीठिया एग्रेसिव नेचर के नेता हैं। उनके बाहर आने से सरकार और उनके बीच टकराव बढ़ेगा। खास तौर पर मुख्यमंत्री भगवंत मान और मजीठिया के बीच सीधे जुबानी हमले होंगे। पॉलिटिकल सिनेरियो में अकाली दल की मौजूदगी बढ़ेगी।
सीएम और मजीठिया का सीधा टकराव हुआ तो इसका फायदा अकाली दल को ही मिलेगा क्योंकि वह अकाली दल ज्यादा सुर्खियों में रहेगा। चुनाव से पहले यह विजिबिलिटी अकाली दल के लिए बेहद जरूरी है, खासकर जब वे पिछले कुछ सालों से राजनीतिक रूप से कमजोर स्थिति में रहे हैं।
कांग्रेस को भी होगा नुकसान
कांग्रेस ने भी मजीठिया को NDPS एक्ट का केस दर्ज किया था। मगर मजीठिया को उसमें जमानत मिल गई। इससे कांग्रेस का मजीठिया को लेकर ड्रग्स स्मगलर का नैरेटिव पहले ही फेल हो चुका है।
कांग्रेस पहले ही प्रधान राजा वड़िंग की पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. बूटा सिंह पर बयानबाजी को लेकर दलित भाईचारे की नाराजगी भुगत रही है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी के पार्टी के बड़े पद दलितों को न मिलने के बाद यह मुद्दा और भड़का हुआ है। वहीं कांग्रेस गुटबाजी से भी जूझ रही है।
ऐसे में मजीठिया के आने से अकाली दल की मजबूती का सीधा असर अभी विपक्ष की भूमिका में बैठी कांग्रेस पर पड़ेगा। कांग्रेस के लिए यह दोहरी मार है – एक तरफ AAP से सत्ता में वापसी की लड़ाई और दूसरी तरफ अकाली दल का मजबूत होना।
डेरा ब्यास मुखी पर CM का तंज विवादास्पद
डेरा ब्यास सीधे तौर पर पॉलिटिक्स में इन्वॉल्व नहीं होता। हालांकि हर पार्टी के नेता डेरे में माथा टेकने जरूर जाते हैं। डेरा मुखी बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लो जेल में मजीठिया से मिले। जिसके बाद उन्होंने मजीठिया पर दर्ज केस झूठे बता दिए।
इसके जवाब में मुख्यमंत्री मान ने इशारों में तंज कस दिया कि अदालतों का भगवान ही रखवाला, जहां मुलाकाती ही जज बन जाएं। अगर डेरे के श्रद्धालुओं ने इसे नैगेटिव तौर पर लिया तो तय है कि इसका नुकसान 2027 में AAP को होगा।
डेरे का ज्यादा प्रभाव माझा इलाके में है लेकिन दोआबा और मालवा में भी उनके श्रद्धालु हैं। पंजाब की राजनीति में धार्मिक संस्थानों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है और CM का यह बयान उनके लिए राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है।
2027 चुनाव की तस्वीर बदल सकती है
मजीठिया की रिहाई से पंजाब की राजनीतिक तस्वीर में बदलाव आना तय है। AAP जो अब तक ड्रग्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई का श्रेय ले रही थी, उसका यह हथियार कमजोर पड़ गया है। अकाली दल को एक मजबूत और मुखर नेता मिल गया है जो सीधे सरकार पर हमला कर सकता है।
कांग्रेस के लिए भी यह चुनौती है क्योंकि अकाली दल की मजबूती का मतलब है विपक्षी वोटों का बंटवारा। 2027 के विधानसभा चुनाव में अब तीनों पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- बिक्रम सिंह मजीठिया की जमानत से AAP का ड्रग्स पर सख्त कार्रवाई का नैरेटिव कमजोर पड़ा
- अकाली दल को 2027 चुनाव से पहले एग्रेसिव और मुखर नेतृत्व मिला, जो सीधे CM भगवंत मान को टारगेट करेगा
- कांग्रेस के लिए दोहरी मार – AAP से सत्ता की लड़ाई और अकाली दल का मजबूत होना
- CM मान का डेरा ब्यास मुखी पर तंज AAP के लिए राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है
- पंजाब की राजनीति में 2027 चुनाव से पहले बयानबाजी और टकराव का दौर शुरू होने की संभावना








