Israel Iran Crisis America : दुनिया बदल रही है या दुनिया बदल चुकी है? ग्लोबल बैलेंस जो सात दशकों से कायम था, वह अब डगमगा रहा है या शिफ्ट हो रहा है। ये सारी परिस्थितियां बीते एक से डेढ़ बरस के भीतर की हैं और किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद से दुनिया को बांधे हुए ग्लोबल बैलेंस एक झटके में ऐसा डगमगाएगा कि मध्यपूर्व के भीतर बड़े-बड़े सवाल खड़े हो जाएंगे, नाटो देशों के भीतर उससे भी बड़े सवाल होंगे और यूरोपीय देश नए रास्तों को खोजने निकल पड़ेंगे।
Israel की साख बचेगी या नहीं?
सवाल सिर्फ टैरिफ वॉर के बाद शुरू हुई परिस्थितियों का बिल्कुल नहीं है। नया और बड़ा सवाल यह है कि क्या इजरायल की साख अब बचेगी या नहीं बचेगी? ईरान को लेकर जो अमेरिका ने रणनीति बनाई, वह रणनीति क्या फेल हो चुकी है और महज दिखाने और डराने भर के लिए दुनिया भर में यह मैसेज अमेरिका देना चाहता है कि अभी भी उसी की चलती है। अगर यह एक सवाल है तो अगला सवाल यह भी है कि बीते सात दशकों में कभी किसी यूरोपीय देश ने यह सोचा ही नहीं था कि चीन उसका साझेदार हो जाएगा। लेकिन बीते एक महीने के भीतर, चाहे फ्रांस के प्रधानमंत्री हों, चाहे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हों, चाहे कनाडा के प्रधानमंत्री हों या आइसलैंड के प्रधानमंत्री हों, एक लंबी कतार चीन की दिशा में बढ़ रही है।
इस परिस्थिति के भीतर ईरान को लेकर अभी तक जो सवाल इसलिए अनसुलझे थे—क्या वाकई चीन न्यूक्लियर तौर पर ईरान को मजबूत कर रहा है—उसके आगे का सवाल यह है कि इस दौर में रूसी अधिकारी ईरान के बुशहर शहर में, जहां परमाणु प्लांट है और जिसे 2025 में इजरायल ने हमला करते समय छोड़ दिया था, वहां रूसी अधिकारियों की मौजूदगी नजर आ रही है। अमेरिका के पास सैटेलाइट तस्वीरें निकलकर आई हैं, जिसमें खुले तौर पर अंदेशा दिया गया है कि जहां-जहां ईरान के भीतर न्यूक्लियर प्लांट हैं, वो बर्बाद नहीं हुए हैं और वहां हलचल तेज है।
Iran पर हमला न हो पाना Israel की बड़ी हार
तो क्या इन सवालों के बीच पहला बड़ा सवाल यही है? अभी तक इजरायल की जो मौजूदगी रही और इजरायल जिस तरीके से इस पूरे इलाके में—जिसके दायरे में मध्यपूर्व या एशियाई देश आते हैं—अमेरिका के लिए जो भी बिसात बिछा रहा था, इस वक्त ईरान पर हमला न हो पाना उसकी एक बड़ी हार होगी। अमेरिका अपनी स्ट्रेटजी के तहत जब आगे बढ़ रहा है तो मध्यपूर्व के देश खुले तौर पर कह रहे हैं कि हमारी जमीन का उपयोग मत कीजिएगा, अन्यथा मुश्किल होगी। यहां तक कि डेल्टा फोर्स जो अमेरिका की है, वह अजरबैजान भी पहुंची, लेकिन अजरबैजान के विदेश मंत्री ने भी कह दिया कि हमारी जमीन से ईरान पर हमला आप नहीं करेंगे।
इन सबके बीच नाटो देशों की कतार में तो तुर्की भी खड़ा है। तुर्की अपने तौर पर कह रहा है कि ईरान पर हमला घातक होगा, आप उस दिशा में न बढ़िए। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने बकायदा मध्यस्था का जिक्र किया, ट्रंप से बातचीत की और उसके बाद कहा कि रास्ता निकाल लीजिए, अन्यथा मुश्किल होगी। इन तमाम परिस्थितियों के बीच ईरान के भीतर 1000 से ज्यादा ड्रोन निशाने पर हैं और मध्यपूर्व के वे देश जहां अमेरिका का एयरबेस या नेवल बेस है, उन्हें निशाने पर ले लिया गया है। जो सबसे मारक बॉम्बर अमेरिका का है, उसकी काट भी, रिपोर्ट आ रही है कि चीन ने अब ईरान को दे दी है।
America अब बाहर कैसे निकले?
तो क्या यह एक ऐसी परिस्थिति इस दौर में आकर खड़ी हो गई है कि अब अमेरिका इस पूरी प्रक्रिया से बाहर निकले कैसे? या जो दुनिया के भीतर अभी तक जो बैलेंस बना आ रहा था, वो डगमगा रहा है और अगर डगमगा चुका है तो उसके बाद कौन सी नई परिस्थिति उभरने वाली है? अमेरिका अपने तौर पर नए रास्तों को बना रहा है। हमारी टीम ने इस पर जो अमेरिका के जरिए चीजें निकलकर आ रही हैं, उसमें साफ तौर पर बताया कि दरअसल मध्यपूर्व के विरोध के बाद पुर्तगाल में बकायदा वहां पर F-35A जो लाइटनिंग II फाइटर जेट होता है, जो 158 फाइटर विंग का हिस्सा है अमेरिकी एयरफोर्स का, उसकी तैनाती पुर्तगाल में हो गई है।
इसी तरीके से जो EA-18G ग्रोलर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर एयरक्राफ्ट है, वह वर्जीनिया से उड़ान भरता है और रोटा नेवल एयर स्टेशन स्पेन में चला जाता है। यानी स्पेन से निशाने पर ईरान को लिया जाएगा। जर्मनी के रैमस्टीन एयरबेस पर C-17 ग्लोबमास्टर III की तैनाती होती है जो एयरक्राफ्ट है। इसी तरीके से सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर यही C-17 ग्लोबमास्टर III एयरक्राफ्ट की तैनाती होती है। यही कुवैत में अली अल सलेम जो एयरबेस है, वहां पर C-17 की तैनाती होती है। मध्यपूर्व के भीतर AC-130J जो कॉम्बैट किंग II एयरक्राफ्ट माना जाता है, उसकी तैनाती होती है।
America के पांव पीछे नहीं खींच सकता
यह सारी परिस्थितियां बतला रही हैं कि क्या अमेरिका अब अपने पांव ईरान को लेकर पीछे खींच नहीं सकता है, क्योंकि यह पहला मौका होगा जब संयुक्त राष्ट्र दरकिनार है। दुनिया में शांति की खोज अमेरिका कर रहा है। अमेरिका अपने स्ट्रेटेजिक तरीके से इस मैसेज को कन्वे कर चुका है कि दरअसल आने वाले वक्त में यूक्रेन का युद्ध समाप्त होगा, रूस उनके साथ खड़ा है, रूस और अमेरिका युद्ध नहीं करेंगे, नाटो देशों की जरूरत नहीं है। यानी एक नए सिक्योरिटी आस्पेक्ट में अमेरिका अगर दुनिया को देख रहा है, तो क्या ईरान इस वक्त उस पोजीशन पर आकर अमेरिका को खड़ा कर चुका है कि इससे पहले जो वह ग्रीनलैंड को लेकर, यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने से लेकर जो धमकी दे रहा था, अब नई सिचुएशन में मध्यपूर्व और एशियाई देशों के भीतर इजरायल के सामने उसकी साख दांव पर होगी।
यह सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से यह पूछा गया कि दरअसल ईरान को लेकर आप क्या सोच रहे हैं, तो उन्होंने खुले तौर पर यह माना कि वहां पर हजारों प्रदर्शनकारियों की मौत हुई है। उन्होंने माना कि 837 से ज्यादा लोगों को हैंग किया गया है। लेकिन उनका कहना है कि दो ही संदेश ईरान को दिया गया— प्रदर्शनकारियों की मौत नहीं होनी चाहिए और न्यूक्लियर परीक्षण नहीं होना चाहिए, परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए। बावजूद इन सबके, क्या वाकई एटम परीक्षण करने की दिशा में ईरान बढ़ चुका है?
Trump की चुनौती: Iran की अर्थव्यवस्था कौन संभालेगा?
दुनिया भर के जितने भी अर्थशास्त्री हैं या जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में युद्ध को लेकर जिनकी विशेषज्ञता है, उनका बहुत साफ तौर पर एक ऐसी बात है जिस पर सबकी सहमति है। सबका यह मानना है कि जब ट्रंप टैरिफ वॉर के जरिए और आर्थिक नीतियों के जरिए अमेरिका को ग्रेट बनाने निकले हैं, तो दुनिया के किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को संभालने का जिम्मा वो कैसे लेंगे? यानी ईरान के भीतर मुश्किल हालात वहां की मौजूदा सत्ता के खिलाफ वो खड़ा तो कर सकते हैं, लेकिन उसे संभालने की जिम्मेदारी अमेरिका नहीं लेगा।
यानी अमेरिका को जहां-जहां जिस रूप में लाभ मिलेगा, वहां पर वह कदम बढ़ा रहा है। लेकिन ईरान की अर्थव्यवस्था को संभालना या वहां की तमाम आर्थिक परिस्थितियों का बोझ अमेरिका अपने कंधे पर ले ले या फिर इजरायल के साथ वो चीजों को संभालने लग जाए, यह बड़े मुश्किल हालात हैं। तब यहां पर अगला सवाल है कि अमेरिका क्या वाकई हमला करेगा या यह सब कुछ एक स्ट्रेटेजिकली चीजों को, दुनिया के बिगड़ते हुए ग्लोबल बैलेंस के भीतर अपने आप को स्थापित करने की दिशा में बढ़ा हुआ कदम है।
Iran के 1000+ ड्रोन और B-2 Bomber की काट
यहां पर भी क्या अमेरिका से कोई चूक तो नहीं हो गई? क्योंकि आज जब अमेरिका की तरफ से यह कहा गया कि जो रेवोल्यूशनरी गार्ड जो ईरान के भीतर हैं, जिनको IRGC कहा जाता है, वो सभी टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन के तौर पर अमेरिका मानता है, तो ईरान के भीतर इसके बाद 1000 से ज्यादा ड्रोन एक झटके में लगा दिए गए। वहां की मिलिट्री ने कुछ ड्रोन के हिस्सों को दिखाया भी, वहां के आसमान में ट्रायंगुलर तरीके के ये ड्रोन उड़ते हुए नजर भी आए। इसके ठीक पैरेलल में अमेरिका ने B-2 जो उसका B-2 बॉम्बर्स है, उसको भी दिखलाने की कोशिश की कि यह मारक है। इन सबके बीच चाइनीज मिलिट्री और ईरान की मिलिट्री के जरिए B-2 बॉम्बर को भी नुकसान पहुंचाया जा सकता है, इसको लेकर भी हथियार दिखा दिए।
तो क्या यह पूरी परिस्थिति इस दौर में सिर्फ और सिर्फ उस सामरिक नीति को आगे बढ़ा रही है, जिसमें ईरान की घेराबंदी अमेरिका जिस तरह से करना चाहता है, अगर वह नहीं कर पा रहा है तो फिर इजरायल के सामने बड़ा संकट यह भी है कि पिछले बरस हमले के बाद लगातार इजरायल ने एक मैसेज दिया कि यह युद्ध रुका नहीं है। अमेरिका ने भी अपने तौर पर मैसेज दिया कि अगर परमाणु हथियारों से ईरान लैस होता है तो फिर उसे बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन यह सारी परिस्थितियां धरी की धरी रह जा रही हैं।
Middle East देशों ने कहा- हमारी जमीन का इस्तेमाल नहीं होगा
यह इसलिए बड़ा सवाल है क्योंकि अजरबैजान में अमेरिका का जो कमांडो प्लेन है, जो उनकी अपनी टेंगो फोर्स है, उसको लेकर अजरबैजान अगर यह कह रहा है कि देखिए यह संभव नहीं है कि आप हमारी जमीन से हमला कीजिए, मध्यपूर्व के भीतर भी यही सवाल है। तो क्या इजरायल जो अभी तक सोच रहा था कि अमेरिकी दबाव वो आर्थिक, सैनिक क्यों न मजबूत हो, लेकिन उन सबके बावजूद भी इजरायल के पीछे तो अमेरिका खड़ा है और ईरान आज नहीं तो कल निशाने पर आएगा और वो तमाम देश जो ईरान के चारों तरफ मौजूद हैं और उनकी आर्थिक नीतियां अमेरिका के साथ जुड़ी हुई हैं, वो साथ खड़े होंगे। लेकिन यहां पर उन्हें झटका मिल रहा है।
Iran के परमाणु ठिकानों पर हलचल, रूसी अधिकारी Bushehr में
तब यहां पर कुछ सवाल ईरान के भीतर के। ईरान के परमाणु ठिकानों पर 408 किलोग्राम यूरेनियम की मौजूदगी का जिक्र अपने तौर पर CIA और मोसाद की रिपोर्ट कर रही है और खुद ईरान भी इसको इंडिकेट कर रहा है। रूस भी इस पर मुहर लगा रहा है और जो सैटेलाइट से तस्वीरें अमेरिका के पास आई हैं, उसमें नए निर्माण के संकेत ईरान के भीतर उसे दिखाई दे रहे हैं। अब अगला सवाल है कि क्या इन सबके बीच ईरान के परमाणु ठिकानों पर अगर हलचल है, 408 किलोग्राम यूरेनियम की मौजूदगी है, तो फिर इन सबके बीच रूसी अधिकारी जो बुशहर न्यूक्लियर प्लांट में, वहां पर रूसी स्टाफ क्यों पहुंचा है और ईरान के संकेत जो एटम बम के प्लान करने को लेकर हैं, उसमें चीन ने क्या वाकई बड़ी मदद की है?
इन दो सवालों के बीच में जरा कूटनीतिक नब्ज को भी पकड़ना होगा। तुर्की जिसका केंद्र है, अजरबैजान में सैनिक तौर पर हलचल है। तुर्की में ईरान के विदेश मंत्री आराघची पहुंचे, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन से उन्होंने मुलाकात की। एर्दोगन ने राष्ट्रपति ट्रंप से फोन पर बातचीत की, ट्रंप ने कुछ संकेत इजरायल के भीतर दिए और इन सबके बीच मध्यपूर्व में सक्रियता बढ़ी और उन्होंने कहा कि नहीं, युद्ध की परिस्थितियां बड़ी नाजुक होंगी। तब ऐसे में एर्दोगन ने कहा कि हम एक त्रिपक्षीय वार्ता रख सकते हैं, जिसमें मौजूदगी हो, इसके अलावा कौन सा उपाय हो जो ईरान के भीतर प्रदर्शनकारी और परमाणु हलचल को लेकर जो है, वो थम जाए।
Commando Operation की संभावना?
लेकिन अगला सवाल फिर वहीं आया। तो क्या इस पूरी परिस्थिति में कोई कमांडो ऑपरेशन की दिशा में अमेरिका तो नहीं बढ़ जाएगा? यह इसलिए सवाल है क्योंकि हवा में B-2 बॉम्बर बम्स जो अमेरिका के हैं और जो ईरान के ड्रोन्स हैं, इन दोनों की तस्वीर दोनों के सेनाओं के जरिए जारी तो हुई हैं। दरअसल इन तस्वीरों को देखकर एक बात तो साफ है कि हवा में उड़ते हुए विमान हों या ड्रोन हों, जमीन पर ड्रोन की मौजूदगी हो या फिर घेराबंदी अमेरिका की तरफ से हो, यह मैसेज अपने तौर पर बहुत साफ है कि युद्ध की परिस्थितियों को लेकर अमेरिका ऐसे कदम नहीं बढ़ाएगा जहां पर ईरान के निशाने पर वह तमाम देश आ जाएं जो कह रहे हैं कि हम इस युद्ध को रोकना चाहते हैं, इस युद्ध की दिशा में कदम बढ़ाना नहीं चाहते हैं, हमारे देश की जमीन का उपयोग नहीं होना चाहिए, स्थितियां भयावह होंगी।
इसीलिए हमने एक सवाल पहले खड़ा किया—क्या वाकई कोई कमांडो ऑपरेशन भी हो सकता है? क्योंकि इन सबके बीच ईरान की तरफ से उसका सरकारी विमान एक, मास्को में कल रात उतरता है और कहा जा रहा है कि ईरान के बड़े अधिकारियों की उसमें मौजूदगी भी थी। लेकिन अगला सवाल यह भी है कि रूस के कई बड़े अधिकारियों की मौजूदगी न्यूक्लियर प्लांट जो बुशहर में मौजूद है ईरान के, वहां पर नजर आई। यानी एक नया ट्रायंगल— चीन, रूस और ईरान को लेकर ठीक उसी तर्ज पर बना है, जिस तरीके से अमेरिका, इजरायल और नए तरीके से यूरोपीय देशों के भीतर वो जर्मनी है, वो स्पेन है, वो पुर्तगाल है, जहां पर अमेरिकी विमान, युद्धक विमानों की मौजूदगी इस दौर में हो रही है।
Global Balance अब कौन संभालेगा?
तो क्या अमेरिका के सामने ग्लोबल बैलेंस को बना पाना अब मुश्किल है? या फिर जिस बात का जिक्र उसने खुले तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने जब किया था कि अमेरिका ग्लोबल सिस्टम की लीडरशिप नहीं करेगा, यानी जो सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद की परिस्थितियां थीं, उसकी लीडरशिप वो नहीं संभालेगा। जाहिर है उस समय उसके जेहन में सिर्फ नाटो देश थे, यूरोपीय यूनियन रही होगी, एशियाई देशों में भारत के साथ टैरिफ को समझौता करना हो, चीन के साथ टैरिफ वॉर करना हो, मध्यपूर्व के साथ आर्थिक समझौते देख रहे हों, इस दिशा में अमेरिका सोच रहा था।
लेकिन उसने यह कल्पना कभी नहीं की थी कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टार्मर चीन चले जाएंगे, उससे पहले फ्रांस के मैक्रों चीन चले जाएंगे, कनाडा बकायदा स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप की दिशा में बढ़ जाएगा, ब्रिटेन चीनी दूतावास को मंजूरी दे देगा कि आप हमारे यहां खोल लीजिए, फिनलैंड और आयरलैंड की मौजूदगी हो जाएगी, चीन से भारत के साथ आर्थिक संबंध बड़े होंगे, ब्रिक्स नए तरीके से सक्रिय होकर डॉलर को चेताते हुए डिजिटल इकॉनमी की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। तो ग्लोबल बैलेंस को अपने अनुकूल बिगाड़ना या बनाने की सोच जो अमेरिका में थी, वह ग्रीनलैंड पर जिस तरीके से कब्जा करने या कब्जे की मांग उसने रखी, उससे पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठाया, नाटो की उपलब्धि या नाटो की मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए, पेरिस समझौते से बाहर हुआ, WHO खत्म किया, संयुक्त राष्ट्र हाशिए पर चला गया।
यूरोपीय देशों का संदेश- America के साथ स्थायी रिश्ता नहीं
इन तमाम परिस्थितियों में यूरोपीय देश ही नहीं, दुनिया के हर देश के सामने इस बिगड़े हुए बैलेंस में पहला सवाल यही निकलकर आया कि इस वक्त अमेरिका के साथ कोई साझेदारी या कोई निकटता आने वाले वक्त में किसी परमानेंट रिश्ते की मुहर नहीं लगाती और यह बात यूरोपीय देशों से निकलकर आई है, क्योंकि ग्रीनलैंड को लेकर जिस तरीके से टैरिफ यूरोपीय देशों पर लगाया गया, उसका मैसेज बहुत साफ है। और यह मैसेज संयोग से वह तुर्की हो, वह अजरबैजान हो, वो मध्यपूर्व के देश हों, सऊदी अरब और कतर ही क्यों न हों, भारत के भीतर तो यह सवाल पहले से उठ चुका है कि आखिर वो रास्ता अब क्या होगा अपनी आर्थिक नीतियों को सहेजने का भी और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में जो अमेरिका जिस लिहाज से कभी यूक्रेन को लेकर, कभी गाजा पट्टी को लेकर, कभी इजरायल को लेकर, कभी ईरान को लेकर जिस तरीके से चीजों को बढ़ा रहा है, उसमें भारत कहां पर खड़ा हो।
तो भारत अपने तौर पर अपने ऑर्गनाइजेशन को देखने में लग गया है। जाहिर है उस ऑर्गनाइजेशन का मतलब ब्रिक्स है, आसियान है, SCO है। लेकिन जो आखिरी सवाल इस दौर में सबसे अटका हुआ है, वह इजरायल को लेकर है। क्या इस पूरी प्रक्रिया में इजरायल की भूमिका अभी तक जो एशियाई देशों के भीतर थी, अब उसकी साख खत्म हो चली है।
Netanyahu के सामने बड़ा संकट
और अमेरिका अपनी पॉलिटिकल इकोनॉमी को लेकर और अमेरिका अपने इंटरनेशनल टैरिफ को लेकर, दोनों के बीच अपनी घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को मिला चुका है। तो ट्रंप की कूटनीति क्या इजरायल के भीतर नेतन्याहू के साथ खड़ी हो पाएगी या नहीं हो पाएगी? और नेतन्याहू के सामने इस समय बड़ा संकट यही है कि अगर उसकी अपनी मौजूदगी के पीछे अमेरिका न खड़ा हो, उसकी मौजूदगी के साथ ईरान पर अटैक न हो, तो फिर उसकी मौजूदगी का मतलब बचेगा क्या?
और यह भी बड़ा महत्वपूर्ण है कि अगले महीने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल यात्रा पर जा सकते हैं, जिस पर लगभग एक सहमति बनी है। 27-28 फरवरी के बीच जाने का विचार-मनन शुरू हो चला है। यानी एक ऐसे मौके पर जरा उस स्ट्रेटजी को समझिए कि अब इजरायल को भी क्या भारत की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि भारत इस दौर में चीन, रूस, ईरान से और मध्यपूर्व के देशों से कंपेटिटिवली ज्यादा करीब हो गया है।
क्या Global Leadership शिफ्ट हो रही है China की ओर?
आखिरी जो बड़ा सवाल इस दौर में है—क्या ईरान की भूमिका, जिसको ग्रीनलैंड में झटका खाने के बाद अमेरिका सोच रहा था कि ईरान को अगर अपने अनुकूल और सत्ता पलट वहां पर कर दिया जाए, वहां के प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों के जरिए जिस तरीके से बांग्लादेश में हुआ, और अगर वह संभव अब नहीं हो पा रहा है, तो जो साख अंतरराष्ट्रीय तौर पर दुनिया को एक तरीके से चलाने में अगुवाई करते हुए अमेरिका नजर आ रहा था, अब वह शिफ्ट होकर क्या चीन की तरफ जा रहा है?
यह सवाल दुनिया के भीतर इसलिए भी बड़ा है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कभी आक्रमक नजर आते हैं, कभी नाराज नजर आते हैं, कभी आत्मग्रस्त नजर आते हैं। लेकिन दूसरी तरफ शी जिनपिंग अगर उनको समझें तो वह ग्लोबल ट्रेड का जिक्र कर रहे हैं, वह दुनिया के भीतर अलग-अलग संस्थानों की महत्ता पर जिक्र करना चाहते हैं, अंतरराष्ट्रीय सहयोग का वह जिक्र कर रहे हैं।
यानी ग्लोबल सिचुएशन जो बीते सात दशकों से अमेरिका और रूस के बीच चली आ रही थी, ट्रंप की बिसात उसी युद्ध में एक सहमति के साथ खड़ी होने की दिशा में जैसे ही आगे बढ़ी, तो दुनिया के सामने या कहें यूरोपीय देशों के सामने यह संकट था—बाजार तो दो ही देशों के पास है, एक चीन है और दूसरा भारत है। और वह यूरोपीय देश जो अमेरिका के साथ चले आ रहे थे, उनमें एक व्यापक शिफ्ट नजर अब आने लगा खुलकर, जिससे दुखी और गुस्सा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को भी है।
असली सवाल- Iran को Nuclear Power बनने से रोकना
और इस पूरी परिस्थिति के साथ ईरान पर युद्ध हो या न हो, हमला हो या न हो या दिखाने के लिए स्ट्रेटेजिकली दुनिया के हर देश में अपने एयरबेस को बना लिया जाए, अमेरिका इस दिशा में बढ़ रहा है। शायद यही वह सवाल है कि अमेरिका अपनी ताकत दिखा तो रहा है, लेकिन उस ताकत का असर दुनिया पर कितना हो रहा है, वो कहीं ज्यादा दिखाई देने लग गया है। इसीलिए ईरान के भीतर हजारों ड्रोन की मौजूदगी, न्यूक्लियर प्लांट में सक्रियता, 408 किलोग्राम यूरेनियम के होने का जिक्र, रूस की मौजूदगी और इन सवालों के बीच अमेरिका लगातार एक ही संकेत दे रहा है कि किसी भी हालत में ईरान को न्यूक्लियर पावर बनने नहीं देना है।
यानी सवाल सत्ता पलट, तख्ता पलट, प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े होने का नहीं है। न्यूक्लियर पावर इसलिए नहीं होने देना है क्योंकि ईरान जिस दिन न्यूक्लियर पावर हो गया, उसके बाद इजरायल की मौजूदगी, उसकी ताकत, वो काफूर हो जाएगी। जो चेक एंड बैलेंस की स्थिति में इजरायल की मौजूदगी के साथ अमेरिका लगातार खड़ा रहता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- Israel की साख दांव पर: Iran पर हमला न कर पाना America और Israel की बड़ी हार होगी, मध्यपूर्व के देशों ने जमीन देने से इनकार किया
- Global Balance शिफ्ट: यूरोपीय देश China की ओर बढ़ रहे, ब्रिटेन-फ्रांस-कनाडा ने Strategic Partnership शुरू की
- Iran की परमाणु हलचल: Bushehr प्लांट में Russian अधिकारी, 408 kg यूरेनियम की मौजूदगी, 1000+ ड्रोन तैनात
- America की रणनीति: Europe में एयरबेस तैयार— पुर्तगाल, स्पेन, जर्मनी में F-35 और C-17 की तैनाती
- Netanyahu का संकट: America का समर्थन कमजोर, PM Modi की Israel यात्रा 27-28 फरवरी को संभावित








