Telangana Stray Dogs Mass Killing : तेलंगाना में एक अंधेरी घटना सामने आई है जहाँ एक महीने के अंदर 1,100 से ज्यादा आवारा कुत्तों की सामूहिक हत्या की गई है। यह कहानी शुरू होती है 19 जनवरी, 2026 को जब कांगा रेड्डी जिले के याचम गांव में 37 कुत्तों के शव पाए गए। लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। इसके बाद तेलंगाना के विभिन्न जिलों से खौफनाक खबरें आने लगीं।
तेलंगाना में भीषण कत्लेआम की शुरुआत
19 जनवरी को जब याचम गांव में इतने सारे कुत्तों की लाशें एक साथ मिलीं, तो पहली नजर में लगा कि किसी बीमारी का प्रकोप हो गया है। पुलिस ने 37 शवों को बरामद किया। लेकिन स्ट्रे एनिमल्स फाउंडेशन इंडिया के कार्यकर्ताओं का दावा था कि मरने वाले कुत्तों की संख्या 100 से भी ज्यादा थी।
याचम के गांववासियों ने बताया कि यह कोई बीमारी नहीं थी। इन कुत्तों को जानबूझकर जहरीली सुइयों से मार दिया गया था। सफाई कर्मियों की मदद से कई शवों को गायब कर दिया गया।
बहुजिला नरसंहार का संदर्भ
लेकिन याचम अकेला गांव नहीं था। जनवरी के महीने में तेलंगाना के अलग-अलग हिस्सों से एक ही तरह की खबरें आने लगीं। कामरेड्डी, जगत्याल, हनमकोंडा, नागरकुरनूल और निर्मल — इन सभी जिलों में आवारा कुत्तों की व्यवस्थित हत्या हुई।
आंकड़े काफी भयानक थे:
- कामरेड्डी: 14 जनवरी को 200 कुत्तों की हत्या
- जगत्याल: 22 जनवरी को 300 कुत्तों की हत्या
- हनमकोंडा: 6-9 जनवरी के बीच 300 कुत्तों की हत्या
- याचम और अन्य गांव: 70 से अधिक कुत्ते
कुल मिलाकर, सिर्फ जनवरी 2026 में तेलंगाना के इन अलग-अलग हिस्सों में 1,100 से अधिक कुत्तों की मौत हुई है।
चुनावी वादा, व्यावहारिक हत्या
यह संख्या सुनकर जो सवाल उठता है, वह है — आखिर ऐसा क्यों हुआ? किसने ये हत्याएं करवाईं?
जवाब काफी हद तक राजनीतिक था। प्रीति मुदवत, जो स्ट्रे एनिमल्स फाउंडेशन इंडिया से जुड़ी हैं, ने इस मामले में कानूनी केस दर्ज कराया। उन्होंने और साक्ष्य से पता चला कि दिसंबर 2025 में तेलंगाना में ग्राम पंचायत चुनाव हुए थे।
इन चुनावों में उम्मीदवारों ने आवारा कुत्तों और बंदरों की समस्या से निपटने का वादा किया था। वे गांववासियों से कहते रहे कि अगर उन्हें सरपंच चुना गया, तो वे गांव को इस “समस्या” से मुक्त कर देंगे। चुनाव के बाद, नए सरपंचों ने अपने चुनावी वादों को पूरा करने का फैसला किया — लेकिन तरीका बेहद क्रूर था।
सरपंचों ने करवाई जहरीली सुइयों से हत्या
याचम की नई सरपंच मास्कू अनीता शरणम और पंचायत सचिव किशन नायक पर इन कुत्तों की हत्या करवाने का सीधा आरोप है। गांववासियों के अनुसार, रात के अंधेरे में “किलिंग स्क्वाड” बुलाए गए। इन लोगों ने गलियों में घूमने वाले कुत्तों को जहरीली सुइयां लगा दीं।
कुछ ही घंटों में दर्जनों कुत्ते तड़पते हुए मर गए। पुलिस को जो 37 लाशें मिलीं, वो केवल जो दिखाई दे गई थीं। लेकिन गांववासियों का कहना है कि असली संख्या 70 से भी ज्यादा थी। बाकी को चुपचाप ठिकाने लगा दिया गया।
कुत्तों के हमलों की असल समस्या
अब सवाल यह उठता है — क्या याचम में कुत्तों की समस्या सच में इतनी गंभीर थी कि सामूहिक हत्या का सहारा लेना पड़ गया?
जवाब हाँ और ना दोनों में है।
याचम के प्राइमरी हेल्थ सेंटर के रिकॉर्ड के अनुसार, कुत्तों के हमलों के 667 मामले दर्ज किए गए थे। ये 19 अलग-अलग गांवों के मामले थे। सिर्फ याचम से ही 109 मामले दर्ज हुए। हाँ, समस्या थी।
लेकिन समस्या कहीं और थी। गांववासियों के मुताबिक, पोल्ट्री फार्मों से निकलने वाले गोश्त को खाकर ये कुत्ते आक्रामक हो गए थे। भूख से जूझते कुत्ते हिंसक बन गए। यह समस्या थी — मंजूरी देने वाली नीति की, सुव्यवस्था की कमी की।
व्यवस्था में बड़ा छेद
लेकिन गांवों की पंचायतों के पास ऐसी कोई सुविधा ही नहीं है। तेलंगाना पंचायत राज अधिनियम, 2018 के अनुसार, आवारा कुत्तों को पशु संरक्षण समिति को सौंप देना चाहिए। लेकिन यह समिति आखिर क्या है? इसके क्या अधिकार हैं? कानून में यह स्पष्ट ही नहीं लिखा गया है।
अलबत्ता, जीएचएमसी एक्ट, 1955 की धारा 249 के तहत कमिश्नर को यह अधिकार दिया गया है कि यदि आवारा कुत्तों से खतरा हो, तो उन्हें मार दिया जा सकता है। पंचायतों को ऐसा कोई अधिकार नहीं दिया गया है — फिर भी वे यह कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है मामला
आवारा कुत्तों की समस्या केवल तेलंगाना की नहीं है। यह मुद्दा भारत के सुप्रीम कोर्ट में भी चल रहा है। 28 जुलाई, 2025 को खुद सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के हमलों पर संज्ञान लिया था।
उस समय कोर्ट का आदेश आया कि दिल्ली एनसीआर के आवारा कुत्तों को शेल्टर होम में भेजा जाए। लेकिन इस फैसले के खिलाफ पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने जोरदार विरोध किया। आदेश पर “स्टे” लग गया। तब से यह मामला कोर्ट में पेंडिंग है।
राजनीति और पशु क्रूरता का घालमेल
तेलंगाना में जो हो रहा है, उसे समझने के लिए चुनावी राजनीति को भी देखना पड़ता है। 11 फरवरी, 2026 को तेलंगाना में मंडल और जिला स्तरीय चुनाव होने हैं।
नए सरपंचों को अपने इलाकों के लिए फंडिंग चाहिए होती है। यह फंडिंग मंडल और जिला परिषद के नए सदस्यों से ही आती है। इसलिए सरपंचों को इन नए चुने हुए अधिकारियों के साथ तालमेल बिठाना जरूरी होता है। शायद इसीलिए कुछ सरपंचों को अपने चुनावी वादों को “दिखाने” की जल्दबाजी दिख रही है।
लेकिन यह गलत है। जानवरों की सामूहिक हत्या करना केवल गलत ही नहीं — यह पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (Prevention of Cruelty to Animals Act) और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत अपराध है।
कानूनी कार्रवाई शुरू
इसी कारण विभिन्न जिलों में कानूनी कार्रवाई शुरू की गई है:
- कामरेड्डी: पाँच सरपंचों सहित छह लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया
- जगत्याल: सरपंच और पंचायत सचिव के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज
- हनमकोंडा: यहाँ भी सरपंच और पंचायत सचिव के खिलाफ कार्रवाई
लेकिन सवाल यह है — क्या ये दंड काफी होंगे? क्या सिर्फ कानूनी कार्रवाई से समस्या का समाधान हो जाएगा?
असली समाधान क्या होना चाहिए?
तेलंगाना की यह घटना एक बड़ी व्यवस्थागत कमी को उजागर करती है। आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए महज हत्या ही एकमात्र रास्ता नहीं है।
ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम की तरह, गांवों की पंचायतों को भी:
- कुत्तों को पकड़ने और स्टरलाइज करने की सुविधा दी जानी चाहिए
- एनजीओ के साथ काम करने की व्यवस्था की जानी चाहिए
- सुरक्षा मानदंड स्पष्ट किए जाने चाहिए
- स्पष्ट नियम बनाने चाहिए कि कब, कैसे और किसकी अनुमति से कार्रवाई की जा सकती है
लेकिन इससे पहले चुनावी राजनीति को इस गंभीर समस्या के रास्ते से हटना होगा। जनता के वोटों को जीतने के लिए जानवरों की जान लेना — यह कतई सभ्य समाज का काम नहीं है।
आम आदमी पर असर
याचम और अन्य गांवों के आम नागरिकों के लिए यह सूचना विरोधाभासी है। एक तरफ, वे कुत्तों के हमलों से बचना चाहते हैं। दूसरी तरफ, सामूहिक हत्या देखकर उन्हें खुद पर सवाल उठते हैं — क्या अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए ऐसी क्रूरता जायज है?
मुख्य बातें (Key Points)
- तेलंगाना में जनवरी 2026 में 1,100 से अधिक कुत्तों की सामूहिक हत्या की गई
- दिसंबर 2025 के पंचायत चुनावों के बाद नए सरपंचों ने अपने चुनावी वादे पूरे करने के लिए यह कार्रवाई की
- कुत्तों को जहरीली सुइयों से मार दिया गया और शवों को छिपाया गया
- विभिन्न जिलों में कानूनी केस दर्ज किए गए हैं
- समस्या का समाधान सामूहिक हत्या नहीं, बल्कि नसबंदी और वैज्ञानिक प्रबंधन में है








