UGC Regulations Supreme Court: 13 जनवरी 2026 को इस देश के सामने यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन का प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026 आया था। सरकार ने इसे जारी किया और महज 15 दिनों के भीतर ही जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो आज 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी। पहली सुनवाई थी और पहली सुनवाई में ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया कि इसे इस देश में ऐसे लागू नहीं किया जा सकता। जो ड्राफ्ट बनाया गया, उस ड्राफ्ट के आधार पर इस देश के भीतर जातियों के बीच वैमनस्यता फैलेगी और टकराव बढ़ जाएगा।
महज 15 दिन की उम्र रही इस यूजीसी 2026 की। याद कीजिए एक वक्त सीएए का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कई सुनवाइयों के बाद भी रोक लगाने से इंकार कर दिया। याद कीजिए एसआईआर। बिहार इलेक्शन के ठीक पहले यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया था। रोक तो लगी नहीं। आज भी यह डामाडोल स्थिति में चल रहा है।
लेकिन बड़ा सवाल आज यह है कि महज 15 दिनों में ही सरकार ने अपने पांव पीछे क्यों खींच लिए? सरकार की तरफ से जो वकील सुप्रीम कोर्ट में मौजूद थे, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक भी शब्द क्यों नहीं कहा इस रेगुलेशन के पक्ष में?
सॉलिसिटर जनरल की खामोशी ने उठाए सवाल
वही सरकार रेगुलेशन लेकर आई। उसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के भीतर खामोशी बरत ली। तो क्या सरकार फंस गई थी? क्या सरकार के सामने अपने वोट बैंक को लेकर मुश्किल थी?
सुप्रीम कोर्ट ने बहुत साफ तौर पर कहा कि कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में भेदभाव रोकने के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम जो जारी किए, सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि इस मुद्दे पर कुछ संवैधानिक और कानूनी सवालों की जांच होनी बाकी है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता खामोश रहे। सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि वह अदालत को एक विशेषज्ञों की समिति का सुझाव दें जो इस मुद्दे की जांच करे। सॉलिसिटर जनरल फिर भी खामोश रहे।
विशेषज्ञ थे ही नहीं या नजरअंदाज किया गया?
यानी जो पूरी की पूरी गाइडलाइंस बनाई गई थी, उसमें कोई विशेषज्ञ था ही नहीं? या फिर पार्लियामेंट्री कमेटी और उसके बाद यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन और एजुकेशन मिनिस्ट्री जिस लिहाज से चल रही थी, उन सबके पीछे कौन था?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूजीसी को इन याचिकाओं पर अपना जवाब अब दाखिल करना चाहिए। तुषार मेहता यानी सॉलिसिटर जनरल यानी सरकार के वकील खामोश ही रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि नए नियमों का मसौदा तैयार करते समय कुछ पहलुओं को नजरअंदाज किया गया। संसदीय कमेटी की रिपोर्ट तैयार हो गई और नजरअंदाज कर दिया गया सब कुछ। यूजीसी ने अपने कुछ नए शब्दों के जरिए नई परिभाषाएं गढ़ीं।
चीफ जस्टिस: जाति विहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस जयमाल बागची भी शामिल थे। उनकी एक लकीर बहुत साफ थी कि जाति विहीन समाज की ओर हमें बढ़ना चाहिए। हम तो पीछे जा रहे हैं। सॉलिसिटर जनरल खामोश।
केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी किया गया है। 19 मार्च को अब सुनवाई होगी। सॉलिसिटर जनरल खामोश।
क्या सब कुछ इतना आसान है जो नजर आ रहा है? या हकीकत कुछ और है जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जरिए इस फैसले को रोका गया जो सरकार ने जारी किया था?
युवा बेरोजगारी: सरकार का सबसे बड़ा डर
इस देश के भीतर जो एजुकेशन का क्षेत्र है, जो छात्रों का क्षेत्र है और इस देश के भीतर सामाजिक आर्थिक परिस्थितियां जिस तर्ज पर मौजूदा मोदी सरकार के दौर में बतौर गवर्नेंस चल रही है, उसमें सरकार इस बात से घबराती है कि कहीं कोई ट्रिगर का काम ना कर जाए और इस देश के भीतर सत्ता के खिलाफ कोई आंदोलन खड़ा ना हो जाए।
यह सवाल बड़ा था क्योंकि सबको पता है इस देश के भीतर रोजगार है नहीं। शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल ट्राइब से जुड़े छात्र हों और उनके रोजगार की परिस्थितियां हों, स्थिति बहुत नाजुक है।
मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन की तरफ से जो पीरियडिक लेबर फोर्स सर्वे यानी पीएलएफएस लाया गया, उसके संकेत बहुत साफ थे कि इस देश में बतौर लेबर और बतौर रोजगार दोनों की परिस्थितियां चाहे वो एससी का समाज हो, चाहे एसटी का समाज हो, दलित हो या आदिवासी हो, ओबीसी हो या जनरल कैटेगरी हो, सरकार हर जगह फेल है।
55% युवाओं की कोई भागीदारी ही नहीं
लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन का आंकड़ा बताता है कि 50 प्रतिशत से ज्यादा, तकरीबन 55 प्रतिशत तक युवा कहीं हैं ही नहीं। अगर दलितों के बीच का सच है तो दूसरी तरफ ओबीसी का भी सच है कि लगभग 56 प्रतिशत कहीं हैं ही नहीं।
शेड्यूल ट्राइब के भीतर जरूर यह लगभग 47 प्रतिशत नहीं है। बाकी 53 प्रतिशत जो भी निकल कर आया, उसमें 53 प्रतिशत का पार्टिसिपेशन है जो मैक्सिमम है। लेकिन इस देश के भीतर 55 प्रतिशत का ओवरऑल पार्टिसिपेशन नहीं है।
अगर अपर कास्ट का भी जिक्र करेंगे तो 47 से 57 प्रतिशत का कहीं पार्टिसिपेशन है ही नहीं। स्थितियां कमोबेश हर जाति समुदाय के भीतर नाजुक हैं।
उत्तराखंड से लद्दाख तक युवा आंदोलन
पेपर लीक और रोजगार ना मिलने की परिस्थितियों में जो जिक्र कभी पटना का होता था, इलाहाबाद का होता था, बात बढ़ते-बढ़ते वो उत्तराखंड तक भी पहुंची। वहां पर जिस तरीके से युवा तबका सड़क पर आ गया, क्या वह छोटा था?
सोनम वांगचुक को लेकर लद्दाख के भीतर जो युवा तबका निकल कर आया, क्या उस तरीके से देखा जा सकता है कि सरकार अपने तौर पर गृह मंत्रालय के जरिए रिपोर्ट तैयार करवा रही थी?
राहुल गांधी विपक्ष के नेता के तौर पर एसआईआर के बाद हाथ खड़े कर चुके हैं कि उनसे अब यह राजनीति साधनी मुश्किल होगी, चुनाव लड़ना मुश्किल होगा। उन्होंने पब्लिकली खुले तौर पर सोशल मीडिया के जरिए, रैलियों के जरिए यह ऐलान कर दिया।
क्या यूजीसी गाइडलाइन ट्रिगर बन जाती?
तो क्या यह गाइडलाइन जो यूजीसी की है, वह इस देश के भीतर उस तबके को सड़क पर ले आती जो बीजेपी के साथ खड़ा है या बीजेपी की नीतियों के साथ अभी तक खड़ा था?
या मसला यह है कि कहीं यह ट्रिगर का काम ना कर जाए? क्योंकि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि एक यूजीसी की गाइडलाइंस आई और उसके बाद सिर्फ एक समुदाय के भीतर आक्रोश होगा। दूसरा समुदाय खुश होगा। उसकी अपनी परिस्थितियां भी नाजुक हैं।
यानी सरकार किसी भी हालत में यह बिल्कुल नहीं चाहती है कि इस देश के भीतर किसी मुद्दे को लेकर आंदोलन की शक्ल में इस देश का युवा सड़क पर आ जाए। आप उसको वोट बैंक के लिए जातियों में बांट सकते हैं। लेकिन हर जाति विशेष के भीतर का संकट भयावह है।
प्रधानमंत्री की जुबान पर हमेशा युवा
बीते 24 घंटों के भीतर दो जगह पर प्रधानमंत्री की मौजूदगी थी। एक फिट इंडिया को लेकर और दूसरी आज सुबह पार्लियामेंट के ठीक बाहर राष्ट्रपति के भाषण को लेकर भी उनकी जुबान पर पहला शब्द युवा ही था।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “140 करोड़ देशवासी और उसमें भी ज्यादातर युवा, उनके एस्पिरेशंस को रेखांकित करने का बहुत ही सटीक उद्बोधन।” उन्होंने यह भी कहा, “हमारी युवा शक्ति का बहुत बड़ा टेस्ट यह है कि हम आने वाले समय में कितने अधिक फिट होंगे।”
यह कोई बहुत गूढ़ सवाल नहीं है कि प्रधानमंत्री युवा को अपने भाषणों में, अपनी सरकार, अपनी नीतियों के आधार पर क्यों जोड़ रहे हैं।
30 करोड़ युवाओं के सामने शून्यता
इस देश की हकीकत तो यह है कि तकरीबन 30 करोड़ युवा तबके के सामने एक शून्यता है। रोजगार की कमी है। इस देश में डिग्री धारी युवाओं के सामने कोई रोजगार नहीं है और उनकी संख्या बतौर रजिस्टर्ड बेरोजगार के तौर पर 5 करोड़ से ज्यादा इस देश में हो चुकी है।
अंतरराष्ट्रीय तौर पर जो तकनीकी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए जो अब काम हो रहा है, भारत उसमें कहीं टिकता नहीं है। लेकिन भारत का युवा दुनिया के बाजार में चाहे वह अमेजन ही क्यों ना हो, एक बरस के भीतर अमेजन तक ने 3000 से ज्यादा लोगों को रोजगार से हटा दिया।
बीते एक महीने में 12000 युवाओं को हटाया गया। टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में तकरीबन बेरोजगारी की परिस्थितियां इस दौर में तकरीबन 3 महीने के भीतर 1 लाख से ज्यादा रोजगार कम हो गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट: नए नियम साफ नहीं, अस्पष्ट हैं
सुप्रीम कोर्ट कहता है कि नए नियम साफ नहीं हैं, अस्पष्ट हैं। नियमों का दुरुपयोग हो सकता है। जिन्हें सुरक्षा चाहिए, उनके लिए व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन एससी, एसटी और इन सबको लेकर जो आप व्यवस्था कर रहे हैं कि अलग हॉस्टल बना देंगे, ऐसा बिल्कुल मत कीजिए।
बकायदा चीफ जस्टिस कहते हैं कि अगर आप एससी स्टूडेंट्स के लिए अलग हॉस्टल की बात कर रहे हैं तो फिर समझिए कि आरक्षित समुदाय में भी ऐसे लोग हैं जो समृद्ध हो गए हैं। उनके पास दूसरों की तुलना में बेहतर सुविधाएं हैं। यह चीफ जस्टिस कह रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आरक्षित समुदाय में भी ऐसे लोग हैं जो समृद्ध हो गए हैं। कुछ समुदाय दूसरों की तुलना में बेहतर सुविधाओं का आनंद ले रहे हैं।
नियमों की परिभाषा स्पष्ट नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियमों की परिभाषा पूरे तरीके से स्पष्ट नहीं है। इसका दुरुपयोग हो सकता है। कुछ एक्सपर्ट इसमें संशोधन की सलाह दे सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम यूनिवर्सिटी में एक ऐसा समान वातावरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें ऐसा ना लगे कि लोग आपस में बंट रहे हैं।”
एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, “हम नियम 3 सी को चुनौती दे रहे हैं जो जाति आधारित भेदभाव को परिभाषित करता है। यह पूरे तरीके से संकीर्ण है। भेदभाव की परिभाषा व्यापक है।”
सामान्य वर्ग को बाहर किया गया
एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने कहा, “सामान्य वर्ग के सदस्यों के मामले में जब धारा 3E जो पहले से ही लागू है तो धारा 3C की क्या आवश्यकता है? इसमें मान लिया गया है कि केवल एक खास वर्ग ही जाति आधारित भेदभाव का सामना करता है।”
चीफ जस्टिस ने कहा कि हम केवल संवैधानिकता और वैधता की सीमा की यहां पर जांच कर रहे हैं।
चीफ जस्टिस ने एक उदाहरण देते हुए कहा, “मान लीजिए दक्षिण भारत या उत्तर भारत का कोई छात्र उत्तर भारत में एडमिशन लेता है या उत्तर पूर्व का दक्षिण या उत्तर पूर्व का कोई छात्र अगर उत्तर भारत में एडमिशन लेता है। ऐसे छात्र के खिलाफ कुछ व्यंग्यात्मक अपमानजनक टिप्पणियां की जाती हैं। यहां तक कि टिप्पणी करने वालों की पहचान भी अज्ञात है। क्या यह प्रावधान इस मुद्दे का समाधान करेगा?”
रैगिंग और क्रॉस केस की समस्या
वकील ने कहा कि रैगिंग का भी मुद्दा हो सकता है। जब मैं नया स्टूडेंट हूं तो मेरी शक्ल सूरत से पता चल जाएगा कि मैं नया हूं। अगर मैं विरोध करता हूं और शिकायत करने की हिम्मत करता हूं तो मुझ पर क्रॉस केस चलाया जाएगा। आरोप जाति आधारित भेदभाव का होगा।
चीफ जस्टिस ने कहा, “मान लीजिए अनुसूचित जाति के किसी छात्र ने दूसरे समुदाय के छात्र के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया तो क्या इसका कोई उपाय है?”
वकील ने कहा कि इस पूरे नियम को रद्द किया जाना चाहिए और हम चाहते हैं कि बेहतर ड्राफ्ट हो।
संवैधानिक मुद्दा, विशेषज्ञ समिति की जरूरत
चीफ जस्टिस ने कहा, “यह एक संवैधानिक मुद्दा है। आज हम कोई आदेश पारित करना नहीं चाहते। एक कमेटी गठित की जानी चाहिए जिसमें दो-तीन एक्सपर्ट्स हों जो सामाजिक मूल्यों और समाज की समस्याओं को समझते हों।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 19 मार्च को सुनवाई करेंगे। हम नोटिस जारी कर रहे हैं और तब तक के लिए इस पर पूरी तरीके से रोक लगा देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी रेगुलेशंस को स्टे कर दिया और उन्हें एबिएंस में रख दिया। सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए निर्देश दिया कि यूजीसी रेगुलेशंस 2012 अगले आदेश तक लागू रहेंगे।
पार्लियामेंट्री कमेटी के पीछे कौन था?
यहां दो सवाल वाकई बड़े हैं। पार्लियामेंट्री कमेटी जब बैठी तो जातीय भेदभाव को लेकर उसके जेहन में क्या सवाल थे?
दूसरी परिस्थिति है इस देश के भीतर 2024 के चुनाव के वक्त जो संविधान ही मुद्दा बना। उस संविधान के साथ कास्ट सेंसस को मुद्दा बनाया गया। उस कास्ट सेंसस के आधार पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जो उस पूरी चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की शुरुआत की, उसमें खुले तौर पर था कि इस देश में 90 प्रतिशत आबादी हाशिए पर है।
इस देश की मुख्यधारा में वह है ही नहीं और मुख्यधारा तो छोड़ दीजिए, जो अलग-अलग इंस्टीट्यूशंस काम करते हैं, वह नौकरशाही के हों, वह मीडिया के हों, वो चाहे जुडिशरी के हों, तमाम जगहों पर, यहां तक कि सेक्रेटरी लेवल का जिक्र हो, यहां तक कि इस देश के भीतर बजट बनाने वालों का जिक्र हो, इन जगहों पर जिन जाति समुदाय के लोगों की मौजूदगी है, उनकी भागीदारी समाज के भीतर 10 प्रतिशत है।
2024 चुनाव ने बदल दी तस्वीर
2024 के चुनाव ने एक झटके में उस बीजेपी को बहुमत से नीचे लाकर खड़ा कर दिया जहां पर वह कल तक अपने बूते खड़ी थी। इस पूरी प्रक्रिया के भीतर धीरे-धीरे भारत की राजनीति में यह सवाल बड़ा होने लगा कि क्या जाति आधारित परिस्थितियों के आधार पर राजनीति साधी जा सकती है या सत्ता में आया जा सकता है?
रिजर्वेशन को लेकर बहुत सारे सवाल इस देश के उस अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर भी हैं जो हिंदू या मुसलमान नहीं है। वो ईसाई है। वो किसी दूसरी जाति से जुड़ा है। वो सिख है। उनके भीतर भी कुछ सवाल हैं अपनी जातियों को लेकर, अपने समुदाय विशेष को लेकर।
यह सवाल धीरे-धीरे भारत की राजनीति में कैसे हथियार बनते चले गए? क्या विपक्ष ने 2024 के चुनाव के बाद की परिस्थितियों में मौजूदा सरकार को अंदर से हिला दिया?
यूजीसी नियम: वोट बैंक की राजनीति?
उसके बाद यूजीसी का यह पूरा कार्यक्रम लाया गया सोचकर कि इसको लेकर आएंगे तो वह तबका जो कल तक सोच रहा था कि सत्ता उसके साथ नहीं है, वो अपर कास्ट के साथ खड़ी है, तो देखिए हम आपके साथ खड़े हैं।
लेकिन एक पूरी प्रक्रिया में अगर ऊंची या स्वर्ण जातियों के भीतर का सवाल आंदोलन की शक्ल में उभर कर आ गया तो फिर अगला सवाल यह भी था कि पेपर लीक, नौकरियों का खत्म होना, इस देश की बनती आर्थिक फिलॉसफी में कॉर्पोरेट को लाभ होना लेकिन रोजगार पैदा नहीं होना।
डिसइन्वेस्टमेंट का नाम हो, प्राइवेटाइजेशन का नाम हो, मोनेटाइजेशन का नाम हो, आंकड़े बड़े-बड़े दिखाए गए लेकिन इन सबके पीछे रोजगार गायब। इस देश का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर गायब है। उत्पादन है नहीं। रोजगार कैसे मिलेगा?
कोई बोला नहीं, सब खामोश
यूजीसी के नए प्रावधानों को लेकर पॉलिटिशियन सामने नहीं आए। किसी भी पॉलिटिकल पार्टी के नेता खुले तौर पर बोलने से बचते रहे। वो बीजेपी हो, वह कांग्रेस हो, वो समाजवादी पार्टी हो या टीएमसी हो, वो शिवसेना हो या डीएमके हो, खुलकर कोई सामने आया नहीं।
वोट हर किसी का चाहिए। लेकिन सवाल है इस देश के भीतर की आर्थिक सामाजिक परिस्थितियां जो अभी तक नफरतों के दायरे में चली आ रही थीं, उसके सामने यह अगर सवाल जिंदगी को जीने के तरीके से लेकर, पढ़ने के तौर तरीकों से लेकर और रोजगार ना मिल पाने की परिस्थितियों से अगर जुड़ जाएगा तो क्या होगा?
एजेंसियां और मीडिया भी चुप
इस देश की एजेंसियां जो सरकार के लिए काम कर रही हैं, इस देश का मेन स्ट्रीम मीडिया जो सरकार के साथ खड़ा है, उसके बाद हर जानकारी तो छुपा ली जाती है। कोई सवाल करता नहीं है।
लेकिन ऐसी परिस्थिति में अगर जनता ही किसी भी मुद्दे को लेकर खड़ी हो गई तब क्या होगा? यह सवाल सरकार को डरा रहा है।
शायद इसीलिए जो रिपोर्ट सरकार के पास है, वह कमोबेश हर तबके के भीतर उफनते हुए उस आक्रोश को उभार रही है जहां पर सवाल यही है कि सरकार अपनी नीतियों के आधार पर इस देश के भीतर जिस इकॉनमी का जिक्र करती है, जिस एक्सपोर्ट इंपोर्ट का जिक्र करती है, जिस नए टैरिफ डील का जिक्र करती है, जो देश के भीतर विकसित भारत का जिक्र करती है, उसमें इस देश का आम आदमी कहां पर है?
बैंकों में लिक्विडिटी नहीं, शेयर बाजार में पैसा
बैंकों के भीतर की परिस्थितियां अब सामने आ रही हैं। आरबीआई पैसा डाल रहा है। लिक्विडिटी है नहीं। इस देश के सोशल सेक्टर को बचाने के बदले कॉर्पोरेट सेक्टर को बचाने के लिए शेयर बाजार में एसबीआई और एलआईसी सरीखे सार्वजनिक संस्थान पैसा डाल रहे हैं। जनता कहीं नहीं है।
तो क्या ऐसी रिपोर्ट सरकार के पास आ गई जिसने उसको इस दिशा में दखल देने से मना कर दिया कि आप खामोशी बरतिए? इसीलिए सॉलिसिटर जनरल सुप्रीम कोर्ट में खामोश रहे।
शिक्षा मंत्री गायब, पीएम चुप
इसीलिए 13 जनवरी को जो रेगुलेशंस बनते हैं, 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट उस पर रोक लगा देती है और सरकार चूं भी नहीं करती है। शिक्षा मंत्री गायब हैं। प्रधानमंत्री कुछ कहते नहीं। गृह मंत्री अपनी रिपोर्टों के आधार पर इस देश की राजनीति को साधने की दिशा में बढ़ते हैं।
सरकार की नीतियां मीडिया के भीतर आती हैं लेकिन वह सरकार के गुणगान की दिशा से आगे बढ़ नहीं पाती है। नौकरशाही घुटने टेके हुए है। वह जानती है सरकार के साथ खड़े होंगे तो पद पर बने रहेंगे अन्यथा मुश्किल है।
पॉलिटिशियंस जानते हैं कि दरअसल उनकी फाइल तो खुल जाएगी अगर वह कोई सवाल और विरोध करते हैं। बचा कौन? बची जनता।
जनता के सवालों से डरी सरकार
जनता के भीतर उठते हुए सवाल इस वक्त आज सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले या कहें इस निर्देश या कहें 15 दिनों के भीतर जो रेगुलेशंस लाए गए थे, उस पर जो रोक लगा दी गई, यह उसके खुले संकेत हैं जो शायद भारत की राजनीति में डराने वाले भी हैं।
सरकार को अच्छे से पता है कि अगर युवा सड़क पर आ गया, अगर यह आंदोलन की शक्ल ले ली, तो सत्ता की नींव हिल सकती है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कोई बचाव नहीं किया। इसीलिए महज 15 दिन में यह रेगुलेशन ठंडे बस्ते में चला गया।
यह केवल एक कानूनी मामला नहीं है। यह राजनीतिक रणनीति का मामला है। यह वोट बैंक के गणित का मामला है। और सबसे बड़ी बात, यह सत्ता के डर का मामला है।
मुख्य बातें (Key Points)
13 जनवरी को जारी हुए UGC प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026 पर महज 15 दिन में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में एक भी शब्द नहीं बोला, पूरी खामोशी बरती
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नियम अस्पष्ट हैं, जातीय विभाजन बढ़ा सकते हैं और जाति विहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति बनाने का सुझाव दिया और 19 मार्च को अगली सुनवाई तय की
55 प्रतिशत युवाओं की कोई लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन नहीं है, 5 करोड़ से ज्यादा रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं – सरकार को युवा आंदोलन का डर है








