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India EU Trade Deal : महा समझौता या सिर्फ हंगामा? जानें पूरी सच्चाई

ट्रंप के टैरिफ के बीच भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच हुआ ऐतिहासिक व्यापार समझौता, लेकिन लागू होने में लगेगा एक साल का समय

The News Air Team by The News Air Team
गुरूवार, 29 जनवरी 2026
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India EU Trade Deal
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India EU Trade Deal: भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच एक बड़ा व्यापार समझौता हुआ है जिसे मुक्त व्यापार समझौता यानी एफटीए (FTA) कहा जा रहा है। सरकार इसे ऐतिहासिक बता रही है, अखबार इसे मदर ऑफ डील्स लिख रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इस समझौते पर अभी साइन भी नहीं हुआ है। यूरोपियन यूनियन के 27 देश अपने-अपने स्तर पर इसे मंजूरी देंगे तब जाकर यूरोपियन संसद से यह पास होगा। इस पूरे काम में छह महीने से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है।

डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाया है। छह महीने बीत चुके हैं लेकिन अमेरिका से कोई समझौता नहीं हो पाया। ऐसे में भारत को दूसरे बाजारों की तलाश करनी ही थी। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की हरकतों से यूरोप भी परेशान था। यूरोप के देशों पर भी टैरिफ की मार पड़ी है। तो उनके लिए भी बेहतर यही था कि अपने बाजार भारत के लिए खोलें।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए 27 अलग-अलग भाषाओं में ट्वीट किया है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का दावा है कि सिर्फ टेक्सटाइल सेक्टर में 60 से 70 लाख नौकरियां पैदा होंगी। लेकिन विपक्ष के सवाल भी तेज हो गए हैं। कांग्रेस और सीपीएम ने चेतावनी दी है कि यह डील भारत के कई सेक्टरों को नुकसान पहुंचा सकती है।

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समझौते पर अभी साइन नहीं, लागू होने में लगेगा समय

भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच जो समझौता हुआ है उस पर अभी तक साइन नहीं हुआ है। यूरोपियन यूनियन के 27 अलग-अलग देश इस समझौते को अपने-अपने यहां कानूनी समीक्षा के लिए भेजेंगे। हर देश अपने स्तर पर इसे मंजूरी देगा।

तब जाकर यह समझौता यूरोपियन संसद से पास होगा और लागू होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया में छह महीने से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है। हिंदू बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार अगर साइन भी हो जाए तो निर्यातकों को असली फायदा मिलने में डेढ़ से दो साल लग जाएंगे।

लेकिन इसके पहले ही भारत के अखबारों में हेडलाइन दिवाली की झालर की तरह चमका दी गई है। कोई ऐतिहासिक लिख रहा है तो कोई महा समझौता। मदर ऑफ डील्स भी लिखा जा रहा है। जबकि अभी तो बस बातचीत पूरी हुई है।


ट्रंप के टैरिफ ने मजबूर किया दूसरे बाजार तलाशने को

1 अगस्त 2025 से डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया। तब से छह महीने बीत चुके हैं लेकिन अमेरिका से कोई व्यापार समझौता नहीं हो पाया। भारत को दूसरे बाजारों की तरफ देखना ही था।

ग्रीनलैंड के कारण यूरोप को भी लगा कि अमेरिका के साथ संबंध जल्दी नहीं सुधरेंगे। यूरोप के देशों पर भी टैरिफ की मार पड़ी है। तो उनके लिए भी बेहतर स्थिति यही थी कि अपने बाजार भारत के लिए खोलें और अपने लिए भी दुनिया में अमेरिका के अलावा दूसरे बाजार देखें।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर चीन गए नई संभावनाओं की तलाश में। ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन का सदस्य नहीं है लेकिन नेटो का सदस्य है। स्टारमर कह रहे हैं कि वे ब्रिटेन की जनता के लिए चीन आए हैं। इसके बाद भी यह भ्रम ठीक नहीं कि भारत ने इस डील के जरिए ट्रंप को जवाब दिया है।


ट्रंप को जवाब नहीं, बस एक विकल्प तलाशा

यह सोचना गलत है कि भारत ने इस डील के जरिए ट्रंप को कोई जवाब दिया है। ट्रंप के टैरिफ का नुकसान केवल आयात निर्यात तक सीमित नहीं है। अमेरिका में 50 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं और उन पर भी असर पड़ रहा है। उनकी हालत बहुत खराब है।

टैरिफ के कारण विदेशी निवेशक भारत से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। भारत का रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 92 रुपये तक पहुंच गया है। यूरो के मुकाबले भी रुपया कमजोर हुआ है। दो साल पहले एक यूरो 90 रुपये का था, आज 110 रुपये तक पहुंच गया है।

जिस ट्रंप के एक बयान का जवाब प्रधानमंत्री मोदी नहीं दे सके और चुपचाप सुनते रहे, वो यूरोपियन यूनियन के साथ कई महीने बाद होने वाली डील से ट्रंप को जवाब दे रहे हैं? इस बात को लेकर सीना फुलाने से कोई फायदा नहीं।


टेक्सटाइल सेक्टर को मिलेगा फायदा, लेकिन कितना?

भारत का टेक्सटाइल सेक्टर 38 अरब डॉलर का निर्यात करता है। इसमें से अमेरिका को 11 अरब डॉलर का निर्यात होता है। अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा बाजार है। सवाल है कि क्या यूरोपियन यूनियन से जो डील हुई है वो अमेरिका के बाजार की भरपाई कर पाएगी?

भारत इस समय यूरोपियन यूनियन को 5.5 बिलियन डॉलर का टेक्सटाइल निर्यात करता है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार 11 बिलियन डॉलर के निर्यात तक पहुंचने में यानी अमेरिका के बराबर पहुंचने में 5 साल लग जाएंगे। लेकिन वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल एक झटके में 30 से 40 बिलियन डॉलर तक पहुंचा देते हैं।

यूरोपियन यूनियन भारत के टेक्सटाइल पर 10 से 11 प्रतिशत का टैरिफ लगाता है। जबकि वियतनाम और बांग्लादेश के टेक्सटाइल पर जीरो टैरिफ है। अब भारत के टेक्सटाइल निर्यात पर भी जीरो टैरिफ होगा। लेकिन अभी नहीं, तब होगा जब इस समझौते पर साइन होगी।


पीयूष गोयल का दावा: 60 से 70 लाख नौकरियां

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का दावा है कि यूरोपियन यूनियन के साथ समझौते के कारण पहले दिन से टेक्सटाइल सेक्टर में भारत को काफी बड़ा फायदा होने जा रहा है। उनका कहना है कि केवल टेक्सटाइल सेक्टर में 60 से 70 लाख नौकरियां पैदा हो जाएंगी।

पीयूष गोयल जब भी नौकरियों की संख्या की बात करते हैं तो डर लगता है। जब रेल मंत्री थे तो एक इंटरव्यू में कह दिया कि रेलवे के इकोसिस्टम में एक साल में 10 लाख नौकरियां पैदा हो सकती हैं। हुई कि नहीं, इसका कभी हिसाब नहीं दिया।

2024 में कह दिया कि चमड़ा और जूता सेक्टर में 1 करोड़ नौकरियों का सृजन हो सकता है। अब कह रहे हैं कि यूरोपियन यूनियन से समझौता हुआ है, जो लागू ही सात आठ महीने बाद होगा, उससे टेक्सटाइल सेक्टर में 60 से 70 लाख नौकरियां पैदा होंगी।


2016 के 1 करोड़ नौकरियों का वादा कहां गया?

2016 में मोदी सरकार ने टेक्सटाइल सेक्टर के लिए 6000 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की थी। तब दावा किया गया कि अगले 3 साल में यानी 2016 से 2019 के बीच इस पैकेज के कारण टेक्सटाइल सेक्टर में 1 करोड़ नौकरियां पैदा होंगी। 74000 करोड़ रुपये का निवेश आएगा और 2 लाख करोड़ रुपये का निर्यात होगा।

क्या 1 करोड़ नौकरियां पैदा हो गईं? निर्यात बढ़ गया? 74000 करोड़ का निवेश आ गया? उस पैकेज से क्या फायदा हुआ? वो पैसा कहां गया? और उस पैसे से पैदा होने वाली 1 करोड़ नौकरियां कहां हैं? कोई हिसाब नहीं देता।

तब टेक्सटाइल मंत्री संतोष कुमार गंगवार थे। इस समय गिरिराज सिंह हैं। लेकिन नौकरियों के दावे और वास्तविकता में जमीन आसमान का फर्क है।


भारत का टेक्सटाइल सेक्टर पिछड़ा क्यों है?

क्या भारत के टेक्सटाइल सेक्टर का सारा संकट केवल टैरिफ है या क्वालिटी भी एक समस्या है? भारत के पड़ोसी देशों में गारमेंट का निर्यात जिस प्रकार से बढ़ा है, भारत में क्यों नहीं बढ़ पाया?

2024 में चीन ने 301 अरब डॉलर का टेक्सटाइल निर्यात किया। वियतनाम ने 44 अरब डॉलर का, बांग्लादेश ने 39 अरब डॉलर का निर्यात किया। और भारत ने करीब 37 अरब डॉलर के गारमेंट का निर्यात किया।

हाल ही में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हरियाणा की एक टेक्सटाइल फैक्ट्री का दौरा किया। इस फैक्ट्री के मालिक ने बताया कि ट्रंप ने चीन पर भी उतना ही टैरिफ लगाया जितना भारत पर। मगर एक अंतर है, चीन भारत से 20 से 25 प्रतिशत सस्ता बना रहा था। तो उस पर भारत जितना असर नहीं हुआ।


बांग्लादेश से भारत 100 साल पीछे?

फैक्ट्री के मालिक ने राहुल गांधी से कहा कि यहां जो मशीनें रखी हैं वो चीन से आई हैं। उन्होंने कहा कि चीन से भारत 100 साल पीछे है। बांग्लादेश में महिलाओं के काम करने से लागत कम है। जाहिर है महिलाओं को कम मजदूरी देनी पड़ती होगी।

लेकिन उन्होंने कहा कि हरियाणा में महिलाओं को देर तक नहीं रख सकते क्योंकि कोई सेफ्टी नहीं है। इसलिए उन्हें शाम में घर भेजना होता है। कोई बड़ा ऑर्डर आ जाए तो मुश्किल होती है। इसलिए वे मध्य प्रदेश में ऑल वुमेन कैंपस शुरू कर रहे हैं जहां महिलाएं कैंपस में ही रहेंगी।

बांग्लादेश में 90 प्रतिशत महिलाएं काम करती हैं और उनकी सुरक्षा का भी इंतजाम है। भारत में महिलाओं के लिए सुरक्षा की कमी टेक्सटाइल सेक्टर की बड़ी समस्या है।


यूरोप के बाजार में चीन से होगी टक्कर

वाणिज्य मंत्री ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में बांग्लादेश का उदाहरण दिया। बांग्लादेश को एलडीसी कहा यानी लीस्ट डेवलप्ड कंट्री। भारत चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है। उसकी तुलना बांग्लादेश से होनी चाहिए या चीन से?

2024 की तुलना में 2025 के पहले हिस्से में यूरोपियन यूनियन के देशों में चीन के टेक्सटाइल का निर्यात 20 प्रतिशत की दर से बढ़ गया है। यूरोपियन यूनियन के मार्केट में सबसे बड़ा निर्यातक चीन है। यूरोप में भारत अपना कंपटीशन बांग्लादेश से क्यों देख रहा है? चीन से क्यों नहीं?

ट्रंप के टैरिफ के बाद चीन ने भी अपने निर्यात के लिए यूरोपियन यूनियन को साधा है। भारत को यह समझना होगा कि यूरोप के बाजार में चीन के साथ मुकाबला कर पाएगा या नहीं।


फायदा भारत को या यूरोप को?

यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि इस डील से भारत को ज्यादा फायदा होगा या यूरोपियन यूनियन के देशों को? प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि अगले 10 साल में यूरोपियन यूनियन को उसके 90 प्रतिशत उत्पादों के लिए भारत का बाजार मिल जाएगा।

भारत ने यूरोपियन यूनियन के सामने कई सेक्टरों में ड्यूटी में भारी कमी का वादा किया है। ऑटोमोबाइल पर लगने वाली ड्यूटी 110 प्रतिशत से घटकर 40 प्रतिशत हो जाएगी। आयरन और स्टील से ड्यूटी 22 प्रतिशत से शून्य हो जाएगी। दवाओं से ड्यूटी 11 प्रतिशत से शून्य होगी।

वाइन और शराब से ड्यूटी 150 प्रतिशत से घटकर 40 प्रतिशत पर आ जाएगी। प्रोसेस्ड फूड से ड्यूटी 50 प्रतिशत से घटकर जीरो हो जाएगी। यूरोपियन यूनियन का दावा है कि भारत के ड्यूटी घटाने से कुछ साल के भीतर उसका निर्यात 107 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा।


सीपीएम ने कहा: भारत का पूरी तरह सरेंडर

सीपीएम ने एक बयान जारी करके कहा है कि भारत ने यूरोपियन यूनियन के सामने पूरी तरह से सरेंडर कर दिया है। इस डील के कारण भारत के ऑटोमोबाइल, दवा, मशीनरी उद्योगों को नुकसान हो सकता है।

सीपीएम का कहना है कि इसका असर भारत में इन सेक्टरों में रोजगार पर भी पड़ेगा। कार और शराब की कीमत कम होगी तो क्या उससे आम आदमी को फायदा होगा या कुछ लोगों को ही फायदा होगा?

सीपीएम ने एक और बात के लिए इस डील की आलोचना की है। कहा है कि एफटीए का लक्ष्य यह भी है कि इसराइल के पोर्ट हाइफा से निर्यात आयात होगा। दुनिया इसराइल से दूरी बना रही है और भारत सरकार नजदीक होने का रास्ता बना रही है।


कांग्रेस के भी कई सवाल

कांग्रेस के जयराम रमेश ने विस्तार से लिखा है कि 2007 में 27 देशों वाले यूरोपियन यूनियन से बातचीत शुरू हुई। 16 दौर की बातचीत के बाद जब कई मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई तो 2013 में स्थगित हो गई। जून 2022 तक स्थगित ही रही। उसके बाद इसे फिर से शुरू किया गया।

जयराम ने इस दावे को चुनौती दी है कि यह अब तक की सबसे बड़ी व्यापारिक डील है। उनका कहना है कि यूरोपियन यूनियन से आयात दोगुना हो जाएगा और भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है।

जयराम यह भी कहते हैं कि भारत कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म से भारत के एलुमिनियम और स्टील निर्माताओं को छूट नहीं दिला सकी। यूरोपियन यूनियन को भारत का एलुमिनियम और स्टील निर्यात पहले ही 8 अरब डॉलर से घटकर 5 अरब डॉलर पर आ गया है।


युवाओं को यूरोप में नौकरी के मौके?

प्रधानमंत्री मोदी ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि यह एफटीए भारत के युवाओं को सीधे यूरोप के जॉब मार्केट से जोड़ता है। विशेष रूप से इंजीनियरिंग, ग्रीन टेक, डिजाइन, लॉजिस्टिक्स और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग में अनेक अवसर बनेंगे।

यूरोपियन यूनियन के साथ समझौते में वीजा नियमों को बेहतर बनाने की भी बात की गई है। छात्रों और भारत के पेशेवर लोगों को वीजा मिलने में आसानी होगी। लेकिन वीजा नियम किस तरह के बनते हैं, वहां इमीग्रेशन को लेकर क्या शर्तें होंगी, कितने साल तक नौकरी करने की इजाजत दी जाएगी, यह सब तब साफ होगा जब समझौते पर साइन होगी।

यूरोप के देशों में भी अमेरिका की तरह इमीग्रेशन के खिलाफ और माइग्रेंट्स के खिलाफ नफरत की आंधी चल रही है। ऐसे में भारतीय युवाओं को वहां जाकर कितनी आसानी होगी, यह देखना बाकी है।


यूरोप की यूनिवर्सिटी भारतीय छात्रों पर निर्भर

ट्रंप के कारण भारत के छात्रों के लिए अमेरिका की शानदार यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिलना मुश्किल हो गया है। अब अमेरिका की तरफ जाना कम हो रहा है। छात्रों ने इस समझौते से पहले ही जर्मनी और दूसरे यूरोपीय देशों की तरफ जाना शुरू कर दिया था।

हर साल 50000 छात्र जर्मनी जाने लगे और अब फ्रांस जाने वाले छात्रों की संख्या भी हजारों में पहुंचने लगी है। पौने दो लाख छात्र ब्रिटेन में पढ़ते हैं। यूरोप के देशों की यूनिवर्सिटी की आर्थिक हालत खराब हो रही है। उन्हें खुद को चलाए रखने के लिए विदेशी छात्रों से पैसे कमाने हैं।

तो पहले से भारतीय छात्रों पर नजर है। यह संख्या और बढ़ेगी तो फायदा किसे होगा? यूरोप को होना चाहिए। भारत की यूनिवर्सिटी को तो बचा नहीं सके, अब भारत के छात्र अपने पैसे से यूरोप की यूनिवर्सिटी को बचाएंगे।


ऑटोमोबाइल सेक्टर में यूरोप को ज्यादा फायदा

चीन की इलेक्ट्रिक कारों का यूरोपियन यूनियन के बाजार पर कब्जा हो गया है। यूरोपियन यूनियन के मार्केट में टेस्ला भी चीन की बीवाईडी का मुकाबला नहीं कर पा रही। यूरोपियन यूनियन की अपनी कारें बीवाईडी का मुकाबला नहीं कर पा रही हैं।

लेकिन भारत में बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज और फॉक्सवैगन का आकर्षण अभी भी है। तो यूरोपियन यूनियन अपना मैदान हारकर भारत के मैदान में किस्मत आजमाना चाहती है। यूरोपियन यूनियन की लग्जरी कारें सस्ती होंगी भारत में जिसका फायदा भारत के कुछ अमीर लोगों को होगा।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी लिखा है कि भारत के कारण यूरोपियन यूनियन की थकती कार इंडस्ट्री को कुछ लाभ हो सकता है। वैसे भी अमीर लोग आज भी बढ़े हुए दामों पर बीएमडब्ल्यू बहुत आराम से खरीद रहे हैं।


बीजेपी की 2013 में क्या राय थी?

दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी की वेबसाइट पर पार्टी का एक बयान आज भी मौजूद है। 2013 में जब भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच एफटीए को लेकर बातचीत चल रही थी, तब मुरली मनोहर जोशी ने कहा था कि यह डील भारत की खाद्य स्वायत्तता और उसकी खाद्य सुरक्षा को सीधे-सीधे नुकसान पहुंचाएगी।

बीजेपी की वेबसाइट पर इसे लेकर बकायदा एक प्रेस नोट जारी हुआ था जिसमें कई तरह की चिंताएं व्यक्त की गईं। संसद में डिबेट की मांग की गई थी। जैसे अब सीपीएम ने मांग की है।

सवाल है कि क्या मोदी सरकार ने यूरोपियन यूनियन की डील से पहले संसद में बहस की या अब होगी? सीपीएम ने मांग की है कि इस डील का पूरा ब्यौरा संसद में पेश किया जाए और उस पर व्यापक चर्चा हो।


अमेरिका के ट्रेजरी सचिव नाराज

अमेरिका के ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट का दिल थोड़ा जल गया है। बेसेंट ने कहा कि वे इस फैसले से खुश नहीं कि यूरोप ने भारत के साथ डील की है। क्योंकि यह दिखा रहा है कि यूरोप ने यूक्रेन के लोगों के हितों के आगे व्यापार के हित को प्रमुखता दी है।

यूरोप ने भारत पर टैरिफ नहीं लगाया क्योंकि यूरोप अलग से भारत के साथ डील की तैयारी कर रहा था। यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सला वॉन देर लाइन और यूरोपियन काउंसिल के प्रेसिडेंट अंटोनियो कोस्टा दोनों ने कहा है कि भारत को मॉस्को पर दबाव डालना चाहिए कि वह यूक्रेन पर हमला बंद करे।

यह तो अमेरिका की भी लाइन है। तो इस डील के राजनीतिक और कूटनीतिक पहलू भी हैं जिन पर ध्यान देना होगा।


यूएई से डील का उदाहरण चिंताजनक

भारत का संयुक्त अरब अमीरात से एफटीए मुक्त व्यापार समझौता 2022 में ही हुआ था। लेकिन इसके बाद भी निर्यात में तेजी से वृद्धि नहीं हुई। 2015 में भारत यूएई को 33 बिलियन डॉलर का निर्यात करता था। 2025 में बढ़कर 36 बिलियन ही पहुंचा तो खास फायदा नहीं हुआ।

लेकिन एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि यूएई एक छोटा मार्केट है और यूरोपियन यूनियन दुनिया के बड़े बाजारों में से एक है। तो यूरोपियन यूनियन से ज्यादा फायदा होने की उम्मीद की जा सकती है।

वियतनाम और यूरोपियन यूनियन के बीच 2019 से एफटीए है। इसके तहत वियतनाम यूरोपियन यूनियन के सामान पर 65 प्रतिशत टैरिफ की छूट देता है। एफटीए के बाद से दोनों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।


शेयर बाजार में कोई उत्साह नहीं

मिंट अखबार ने लिखा है कि शेयर बाजार में इस डील के कारण कोई खास उत्साह नहीं दिखा। यह बताता है कि निवेशक और विशेषज्ञ इस डील को लेकर उतने आश्वस्त नहीं हैं जितना सरकार बता रही है।

फाइनेंसियल टाइम्स ने इस डील की तारीफ की है और ट्रंप की नीतियों को कोसा है। वॉल स्ट्रीट जर्नल में सदानंद धूमे ने लिखा है कि भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच की यह डील महत्वपूर्ण कामयाबी है। लेकिन जो दावे किए जा रहे हैं, वह कुछ ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर किए जा रहे हैं।

अभी डील पर साइन भी नहीं हुआ है। लागू होने में एक साल लग सकता है। फायदे दिखने में कई साल लगेंगे। तब तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बहुत कुछ बदल सकता है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर अभी साइन नहीं हुआ है, लागू होने में छह महीने से एक साल का समय लगेगा

  • वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का दावा है कि टेक्सटाइल सेक्टर में 60 से 70 लाख नौकरियां पैदा होंगी लेकिन 2016 के 1 करोड़ नौकरियों के वादे का कोई हिसाब नहीं

  • सीपीएम और कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि यह डील भारत के ऑटोमोबाइल, दवा, स्टील सेक्टर को नुकसान पहुंचा सकती है क्योंकि यूरोपियन यूनियन के सामान पर ड्यूटी भारी मात्रा में कम होगी

  • यूरोप के बाजार में भारत को चीन से टक्कर लेनी होगी जो भारत से 20 से 25 प्रतिशत सस्ता उत्पादन करता है

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