HIV AIDS Awareness India: भारत में 25 लाख से ज्यादा लोग एचआईवी के साथ जी रहे हैं लेकिन इस बीमारी को लेकर आज भी जानकारी कम और गलतफहमियां ज्यादा फैली हुई हैं। उत्तर प्रदेश के एटा से एक दिल दहला देने वाला वीडियो सामने आया जिसमें एक बच्चा अकेले अपनी मां की डेड बॉडी लेकर जिला अस्पताल पहुंचा। पिता की पहले ही एड्स से मौत हो चुकी थी और अब मां भी टीबी और एचआईवी के इलाज के दौरान चल बसी। कोई हाथ लगाने को तैयार नहीं था।
यह घटना बताती है कि हमारे देश में एचआईवी के मरीजों को किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसी विषय पर डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (MSF) के साथ काम कर रहे डॉ. हिमांशु मोहन कुमार ने विस्तार से जानकारी दी है। फिलहाल वे पटना में एमएसएफ ओसीए के एडवांस्ड एचआईवी प्रोजेक्ट को लीड कर रहे हैं।
एचआईवी और एड्स में क्या है अंतर?
डॉ. हिमांशु के अनुसार एचआईवी एक वायरस का नाम है जिसका पूरा नाम ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस है। यह वायरस किसी भी दूसरे वायरस की तरह एक कीटाणु है जो आंखों से दिखाई नहीं देता।
जब यह वायरस किसी के शरीर में प्रवेश करता है तो वह तुरंत कोई समस्या नहीं करता। यह वायरस बिना किसी लक्षण के पांच से छह साल तक शरीर में रह सकता है।
इस दौरान एचआईवी धीरे-धीरे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यून सिस्टम को कमजोर करता रहता है। जब इम्यून सिस्टम पूरी तरह से कम हो जाता है तब साधारण बीमारियां भी खतरनाक रूप ले लेती हैं। इसी अवस्था को एड्स कहते हैं।
एड्स का पूरा नाम एक्वायर्ड इम्यूनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम है। यह कोई एक बीमारी नहीं बल्कि कई बीमारियों का समूह है जो इम्यून सिस्टम कमजोर होने पर होती हैं।
एचआईवी होने पर क्या लक्षण दिखते हैं?
जब एचआईवी एड्स की अवस्था में पहुंच जाता है तब मरीज बहुत कमजोर हो जाता है। उसकी दैनिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं और वजन तेजी से घटने लगता है।
छोटी-छोटी बीमारियां जो आम लोगों को आसानी से नहीं होतीं वे इस व्यक्ति को जल्दी लग जाती हैं। सामान्य इलाज से भी ये बीमारियां ठीक नहीं होतीं।
भारत में एड्स के मरीजों में टीबी सबसे आम समस्या है। खांसी, बुखार और वजन कम होना इसके प्रमुख लक्षण हैं। सामान्य टीबी का इलाज भी इन मरीजों पर जल्दी असर नहीं करता।
एचआईवी का टेस्ट कैसे होता है?
डॉ. हिमांशु के अनुसार एचआईवी का टेस्ट आजकल बहुत आसानी से हो जाता है। हाथ से खून का सैंपल लिया जाता है और तीन तरह के छोटे आरडीटी टेस्ट किए जाते हैं।
इस स्क्रीनिंग टेस्ट के लिए बड़ी लैब या महंगे उपकरण की जरूरत नहीं होती। किसी भी साधारण क्लीनिक में यह टेस्ट हो सकता है बशर्ते वहां प्रशिक्षित कर्मचारी हों।
अगर स्क्रीनिंग में रिजल्ट नेगेटिव आता है तो 15 से 20 मिनट में ही पता चल जाता है कि एचआईवी नहीं है। अगर पॉजिटिव आता है तो कंफर्मेशन के लिए एलाइजा टेस्ट किया जाता है जिसमें तीन से चार दिन लगते हैं।
भारत में हर गर्भवती महिला का पहले तीन महीने में अनिवार्य रूप से मुफ्त एचआईवी टेस्ट होता है।
एचआईवी कैसे फैलता है?
सेक्सुअल कॉन्टैक्ट के अलावा एचआईवी फैलने का मुख्य कारण खून से खून का संपर्क है। यह दो तरीकों से होता है।
पहला तरीका इंजेक्शन है। अगर किसी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति पर इस्तेमाल की गई सुई दूसरे व्यक्ति को लगाई जाए तो वायरस उस सुई पर बैठकर दूसरे व्यक्ति में पहुंच जाता है। यह बहुत आम तरीका है।
दूसरा तरीका ब्लड ट्रांसफ्यूजन है। जब किसी बीमारी या एक्सीडेंट के बाद खून चढ़ाया जाता है और वह खून किसी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति का हो तो एचआईवी फैल सकता है।
कई जगहों पर स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी, प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी या पैसा बचाने के चक्कर में एक ही सुई कई लोगों पर इस्तेमाल कर ली जाती है। कानूनी तौर पर यह बैन है लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी यह चलता है।
क्या एचआईवी छूने से फैलता है? जानिए सच
डॉ. हिमांशु ने साफ किया कि एचआईवी छूने से बिल्कुल नहीं फैलता। किसी एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति के साथ रहने से, खेलने से, साथ खाना खाने से या कोई भी सामान्य गतिविधि करने से यह नहीं फैलता।
थूक, लार या आंख के पानी से भी एचआईवी नहीं फैलता। बात करते समय अगर थूक लग जाए तो भी कोई खतरा नहीं है।
यह गलतफहमी ही है जिसके कारण भेदभाव और छुआछूत की समस्या पैदा हुई है। इससे मरीजों का हौसला टूटता है और उन्हें इलाज में भी दिक्कत आती है।
सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब यह गलतफहमी स्वास्थ्य कर्मचारियों में हो जाती है। कई बार वे इलाज देने से मना कर देते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि छूने से उन्हें भी हो जाएगा।
सर्जरी में क्या है रिस्क?
डॉ. हिमांशु ने बताया कि सर्जरी में थोड़ा रिस्क होता है क्योंकि नुकीले उपकरण इस्तेमाल होते हैं। कभी-कभी प्रिक इंजरी यानी चुभने वाली चोट लग सकती है।
अगर ऐसी चोट लग जाए और एचआईवी संक्रमित खून का संपर्क डॉक्टर के खून से हो जाए तो रिस्क है। लेकिन यह बहुत दुर्लभ घटना है।
इसका आसान उपाय है कि ग्लव्स पहनकर काम किया जाए। अगर डायरेक्ट कॉन्टैक्ट नहीं हुआ तो कोई खतरा नहीं।
एचआईवी से कैसे बचें?
प्रोटेक्टेड सेक्स सबसे पहला और सबसे जरूरी उपाय है। कंडोम का इस्तेमाल करने से 90 प्रतिशत तक सुरक्षा मिलती है। इससे सिफलिस और गोनोरिया जैसी अन्य यौन संचारित बीमारियों से भी बचाव होता है।
स्टेराइल सुई का इस्तेमाल दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है। जब भी कोई इंजेक्शन लगवाएं तो सुनिश्चित करें कि नई सुई इस्तेमाल हो रही है। पुरानी सुई का इस्तेमाल बिल्कुल न होने दें।
इंट्रावीनस ड्रग्स से बचें क्योंकि इसमें एक ही सुई कई लोगों में इस्तेमाल होती है। नॉर्थ ईस्टर्न स्टेट्स में यह एचआईवी फैलने का प्रमुख कारण है।
जो लोग हाई रिस्क ग्रुप में आते हैं उनके लिए प्रीवेंटिव दवाई भी उपलब्ध है। 30 दिन का कोर्स लेने से 95 प्रतिशत से ज्यादा सुरक्षा मिलती है। जल्द ही साल में सिर्फ दो बार लेने वाला इंजेक्शन भी भारत में आने वाला है।
ब्लड डोनेशन में क्या सावधानी रखें?
डॉ. हिमांशु के अनुसार जब भी खून चढ़वाना हो तो यह सुनिश्चित करें कि उस खून का एचआईवी टेस्ट हुआ है। टेस्ट रिपोर्ट देखकर ही खून चढ़वाएं।
ट्रस्टेड ब्लड बैंक से ही खून लें लेकिन वहां भी एचआईवी रिपोर्ट जरूर मांगें। बिना टेस्ट किया खून कभी न चढ़वाएं।
ब्लड डोनेशन कैंप में टेस्ट की सुविधा नहीं होती इसलिए अगर पहले से एचआईवी नेगेटिव स्टेटस पता हो तभी डोनेट करें।
मां से बच्चे में कैसे रोकें एचआईवी?
अगर गर्भवती मां एचआईवी पॉजिटिव है तो बिना इलाज के बच्चे को 100 प्रतिशत एचआईवी हो जाएगा। लेकिन अगर गर्भावस्था के पहले तीन महीने में दवाई शुरू कर दी जाए तो 99 प्रतिशत मामलों में बच्चा एचआईवी नेगेटिव पैदा होता है।
यह दवाई पूरी तरह सुरक्षित है और इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। इसी कारण हर गर्भवती महिला का पहले तीन महीने में मुफ्त एचआईवी टेस्ट होता है। अगर पॉजिटिव आए तो तुरंत प्रिवेंशन ऑफ मदर टू चाइल्ड ट्रांसमिशन प्रोग्राम के तहत इलाज शुरू होता है।
भारत में कहां है एचआईवी का बोझ सबसे ज्यादा?
आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तरी कर्नाटक और तमिलनाडु में एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। ये हाई बर्डन स्टेट्स माने जाते हैं।
नए संक्रमण के मामले में दिल्ली, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब और मणिपुर जैसे नॉर्थ ईस्टर्न स्टेट्स भी आते हैं।
अलग-अलग राज्यों में एचआईवी फैलने के कारण भी अलग हैं। जहां आर्थिक गतिविधि ज्यादा है और लोगों का आवागमन ज्यादा है वहां यह ज्यादा है। जहां स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर है वहां अनस्टेराइल इंजेक्शन और जानकारी की कमी मुख्य कारण है।
नॉर्थ ईस्टर्न स्टेट्स में इंजेक्टेबल ड्रग्स का इस्तेमाल सबसे बड़ा कारण है। पलायन करने वाले मजदूरों में भी यह ज्यादा देखा जाता है क्योंकि वे झोलाछाप डॉक्टरों से इलाज लेते हैं जहां अनहाइजीनिक सुइयां इस्तेमाल होती हैं।
इलाज में क्या हैं चुनौतियां?
सबसे बड़ी समस्या यह है कि हाई रिस्क ग्रुप्स तक डायग्नोस्टिक्स और इलाज नहीं पहुंच पाता। ग्रामीण इलाकों और गरीब समुदायों तक स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंची हैं।
जहां सुविधा है वहां स्टॉक आउट होता है या प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं। पिछड़े वर्ग, दलित समुदाय और प्रवासी मजदूरों में जानकारी की भारी कमी है।
इलाज तो आसान है। दो-तीन गोली रोज लेनी होती है जो सरकार मुफ्त देती है। लेकिन हर महीने या दो महीने में रिफिल लेने स्वास्थ्य केंद्र आना पड़ता है जो कई लोगों के लिए मुश्किल है।
दूसरी चुनौती अच्छे खाने की है। इलाज के साथ पौष्टिक भोजन जरूरी है जो गरीबी के कारण कई लोगों को नहीं मिलता।
एचआईवी के साथ जी सकते हैं सामान्य जिंदगी
डॉ. हिमांशु ने स्पष्ट किया कि 100 प्रतिशत गारंटी है कि अगर इलाज ठीक से लिया जाए तो एचआईवी के साथ पूरी जिंदगी सामान्य रूप से बिताई जा सकती है।
शादी हो सकती है। बच्चे पैदा हो सकते हैं और वो भी एचआईवी नेगेटिव। 20 साल पहले यह संभव नहीं था लेकिन आज नई दवाइयों और डायग्नोस्टिक्स ने यह मुमकिन कर दिया है।
सरकारी एआरटी सेंटर से हर तीन महीने में एंटी रेट्रो वायरल ड्रग्स मुफ्त मिलती हैं। नियमित रूप से दवाई लेने और साल में एक बार वायरल लोड टेस्ट कराने से एचआईवी पूरी तरह कंट्रोल में रहता है।
अब एक नई खोज यह भी है कि अगर दवाई से वायरल लोड जीरो हो जाए तो उस व्यक्ति से दूसरे को एचआईवी नहीं फैलता। इसे U=U यानी Undetectable=Untransmittable कहते हैं।
डॉक्टर ने सुनाया दिल छू लेने वाला अनुभव
डॉ. हिमांशु ने एक 25-28 साल की गर्भवती महिला का किस्सा साझा किया जो प्रेगनेंसी के आखिरी दिनों में आई। वह प्रवासी मजदूर परिवार से थी और पूरी प्रेगनेंसी में कोई जांच नहीं हुई थी।
जब टेस्ट किया तो एचआईवी पॉजिटिव निकली। बहुत देर हो चुकी थी। बच्चे को नहीं बचाया जा सका। मां की जान मुश्किल से बची।
पति का भी टेस्ट हुआ तो वो भी पॉजिटिव निकला। दोनों को उसी समय पता चला। उन्हें कोई लक्षण नहीं थे क्योंकि शुरुआती सालों में लक्षण दिखते ही नहीं। ये लोग इतने टूटे हुए थे मुख्यधारा से कि स्वास्थ्य व्यवस्था से कोई संपर्क ही नहीं था।
दूसरी तरफ एक सफल कहानी भी है। एक व्यक्ति को इंजेक्शन ड्रग यूज से एचआईवी हुआ। दो-तीन साल इलाज लेने के बाद उसका वायरल लोड जीरो हो गया। उसने शादी की और बिना प्रोटेक्शन के बच्चा पैदा किया। बच्चा एचआईवी नेगेटिव पैदा हुआ। यह भारत के किसी कोने से आने वाली सफलता की कहानी है।
भेदभाव क्यों नहीं करना चाहिए?
डॉ. हिमांशु का संदेश है कि एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति को दोषी नहीं मानना चाहिए। ज्यादातर मामलों में सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां जिम्मेदार होती हैं।
उन्हें अलग नहीं करना चाहिए। वे हमारे जैसे ही हैं, हमारे समाज का हिस्सा हैं। भेदभाव से उनका हौसला टूटता है और इलाज में रुकावट आती है।
जब एक व्यक्ति भेदभाव करता है तो दूसरे भी करने लगते हैं। इससे मरीजों को स्वास्थ्य सेवा नहीं मिलती। वे डर जाते हैं और इलाज नहीं लेते जिससे बीमारी और फैलती है।
स्वास्थ्य कर्मचारियों को भी यह समझना जरूरी है। एचआईवी कोई बड़ी या विदेशी बीमारी नहीं है। यह इन्फ्लुएंजा जैसा ही एक रोग है जिसका इलाज संभव है।
मुख्य बातें (Key Points)
एचआईवी एक वायरस है जबकि एड्स उस वायरस से होने वाली गंभीर अवस्था है जो 5-6 साल बाद विकसित होती है
एचआईवी सिर्फ अनप्रोटेक्टेड सेक्स, संक्रमित सुई और ब्लड ट्रांसफ्यूजन से फैलता है, छूने, साथ खाने या रहने से नहीं
नियमित इलाज से एचआईवी के साथ पूरी तरह सामान्य जिंदगी जी जा सकती है और एचआईवी नेगेटिव बच्चे भी पैदा हो सकते हैं
भारत में 25 लाख से ज्यादा लोग एचआईवी पॉजिटिव हैं और सरकार मुफ्त में इलाज देती है








