Canada PM Mark Carney Davos Speech : स्विट्जरलैंड के डावोस में आयोजित World Economic Forum में कनाडा के प्रधानमंत्री Mark Carney ने एक ऐसा धमाकेदार भाषण दिया जो पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। फ्रेंच भाषा में दिए गए इस भाषण में कार्नी ने न सिर्फ अमेरिका को आड़े हाथों लिया बल्कि पश्चिमी देशों की स्वार्थी नीतियों की भी खुलकर आलोचना की। भाषण खत्म होते ही पूरा सभागार खड़े होकर तालियां बजाने लगा और इसे इतिहास के शानदार भाषणों में गिना जाने लगा।
कमजोर की ताकत है ईमानदारी
कार्नी के भाषण की एक लाइन पूरी दुनिया में मशहूर हो गई है कि “जिसके पास कम शक्ति है, उसकी शक्ति ईमानदारी है।” इस एक पंक्ति के जरिए प्रधानमंत्री कार्नी ने उस मिथक को तोड़ दिया कि Donald Trump जो कर रहे हैं उस पर चुप ही रहना है। यह बड़े लोगों की लड़ाई है और हमें अलग किनारे बैठना है। कार्नी ने साबित कर दिया कि गंवाने का खतरा कनाडा के पास भी है लेकिन इसके बावजूद वे बोलने का साहस रखते हैं।
यह ट्रांजिशन नहीं रप्चर का समय है
कार्नी ने अपने भाषण में कहा कि यह संक्रमण का समय नहीं है बल्कि यह रप्चर यानी टूटने का समय है। दुनिया एक कमरे से निकलकर दूसरे कमरे में नहीं जा रही। कोई नई व्यवस्था नहीं बन रही बल्कि पूरा का पूरा मकान दरक गया है। व्यवस्थाओं की समाप्ति का समय आ चुका है।
उन्होंने सुपर पावर से लेकर मिडिल पावर सबको सबका इतिहास बताया और सबकी चुनौतियां गिनवा दीं। कार्नी ने उस झूठ का उदाहरण दिया जिसके आगे सब अपने-अपने फायदे के लिए चुप रहे लेकिन अब वह झूठ सबके गले की फांस बनता जा रहा है।
यूरोप में ट्रंप के खिलाफ बगावत
France के राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने ट्रंप को “बुली” कह दिया है और कहा है कि बुली के आगे नहीं झुकेंगे। European Union की अध्यक्षता ने कहा है कि हमें अमेरिका से स्थाई रूप से आजादी चाहिए होगी। अगर हम ट्रंप के जाने के बाद हालात सामान्य होने का इंतजार करते रहे तो और अधिक कमजोर हो जाएंगे।
बेल्जियम के प्रधानमंत्री डे वेवर ने डावोस में कहा कि ट्रंप ने बहुत सारी लक्ष्मण रेखाओं को पार कर लिया है। अब हालात यहां तक आ गई है कि आपको आत्मसम्मान को लेकर फैसला करना है कि आप उनके पीछे-पीछे चलना चाहते हैं या गुलाम बन जाना चाहते हैं। उन्होंने साफ कहा कि यूरोप ट्रंप का दयनीय गुलाम नहीं हो सकता।
नियम आधारित व्यवस्था थी आंशिक रूप से झूठी
कार्नी ने वो सच कह दिया जो दिखाई सबको दे रहा था मगर कहना कोई नहीं चाहता था। उन्होंने कहा कि नियमों पर चलने की जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाई गई थी वो आंशिक रूप से झूठी थी। जो ताकतवर हैं उन्होंने इन नियमों का फायदा अपने हिसाब से उठा लिया। अंतरराष्ट्रीय कानून पीड़ित की पहचान देखकर लागू किया जाता रहा।
पत्रकार Glenn Greenwald ने भी कार्नी के इस हिस्से को बेस्ट माना है और कहा कि उन्होंने इसे छिपाने की कोशिश नहीं की। यह सच बता दिया कि नियमों के आधार पर जो व्यवस्था बनी है वो ट्रंप के आने के बाद तबाह नहीं हुई बल्कि पहले से ही तबाह हो चुकी थी। यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन, कनाडा सभी देश इस झूठ पर पर्दा डालते रहे क्योंकि इससे उन्हें भी लाभ मिल रहा था।
इराक और अफगानिस्तान का सच
कार्नी ने याद दिलाया कि यूरोप केवल अपनी सुरक्षा के लिए NATO और अमेरिका पर निर्भर नहीं था बल्कि वह उन पापों में भी शामिल था जो अमेरिका ने किए। झूठ के आधार पर जिस अफगानिस्तान और इराक को घेर कर बर्बाद कर देने में यूरोप ने अमेरिका का साथ दिया, आज वही यूरोप खुद को इराक और अफगानिस्तान की स्थिति में पा रहा है।
सद्दाम के पास रासायनिक हथियार हैं यह झूठ था और जानते सब थे। लेकिन ब्रिटेन से लेकर तमाम देशों के प्रधानमंत्रियों ने अमेरिका के इस झूठ में साथ दिया और लाखों लोग बमबारी में मार दिए गए। भरा पूरा देश कब्रिस्तान में बदल दिया गया।
संप्रभुता का नाटक
कार्नी ने संप्रभुता और उसके नाटक को भी समझाया। उन्होंने कहा कि बड़ी ताकतें अकेले चल सकती हैं क्योंकि उनके पास बड़े बाजार हैं और बड़ी सेनाएं हैं। वे अपनी शर्तें मनवा सकते हैं। लेकिन मिडिल पावर देशों के पास ऐसी ताकत नहीं है। जब हम एक बड़ी ताकत के साथ बातचीत करते हैं तो कमजोर जमीन पर खड़े होते हैं।
उन्होंने कहा कि हम एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं कि कौन सबसे ज्यादा सुपर पावर की बात मानेगा। लेकिन यह संप्रभुता नहीं है। यह संप्रभुता का नाटक भर है, उसका प्रदर्शन भर है। एक बड़ी ताकत के सामने दबते हुए भी संप्रभुता का नाटक किया जा रहा है।
सब्जी वाले की कहानी
कार्नी ने चेक गणराज्य के विरोधी नेता वासलाव हावेल के लेख से एक उदाहरण दिया। कम्युनिस्ट शासन के समय चेक गणराज्य में एक सब्जी वाला था जो हर सुबह अपनी दुकान पर एक बोर्ड टांग देता था जिस पर लिखा होता था “दुनिया के मजदूरों एक हो।” लेकिन उसका इसमें कोई यकीन नहीं था। किसी का भी यकीन नहीं था। मगर झमेलों से बचने के लिए वह यह बोर्ड हर दिन टांग देता था क्योंकि सभी दुकानदार यही करते थे।
कार्नी ने कहा कि सिस्टम की जो शक्ति है वह सच से नहीं आती बल्कि उस झूठ से आती है जिसमें सभी शामिल होते हैं। अगर एक आदमी भी इस नाटक में भाग लेना बंद कर दे और झूठ को झूठ कह दे तो सिस्टम और उसकी ताकत का भ्रम टूटने लगता है। उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि कंपनियां और देश अपने-अपने बोर्ड हटा दें।
मेज पर बैठो या मेन्यू में शामिल हो जाओ
कार्नी ने सभी मिडिल पावर देशों को एक कड़ी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि सभी को मिलकर खड़ा होना होगा क्योंकि अगर आप मेज पर नहीं बैठे तो आपका नाम मेन्यू में दर्ज हो जाएगा। यानी आपको अपने लिए खुद खड़े होना ही होगा नहीं तो दुनिया की बाकी ताकतें आपके देश और आपकी जमीन पर घात लगाए बैठी हैं।
उन्होंने ईसा पूर्व पांचवी सदी के ग्रीक इतिहासकार थ्यूसिडाइडीज का उदाहरण दिया जिसने कहा था कि मजबूत कुछ भी कर सकता है और कमजोर को सब सहना होगा। कार्नी ने कहा कि हम तभी से इस कहावत को अनिवार्य मानकर चले आ रहे हैं लेकिन इसे मान लेने से सुरक्षा आने वाली नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं हो चुकी हैं ध्वस्त
कार्नी ने साफ-साफ कहा कि संयुक्त राष्ट्र, जलवायु संकट के लिए बनी कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टी (COP), WTO जैसी तमाम बहुद्देशीय संस्थाएं काफी हद तक ध्वस्त हो चुकी हैं। उन्होंने इनके विकल्प की बात करते हुए कहा कि मिडिल पावर देशों को एक दूसरे से अलग संबंध बनाने होंगे।
उन्होंने कहा कि हम जितनी ज्यादा दीवारें बनाएंगे उतने ही कमजोर होंगे। इसलिए सभी को मिलकर सुरक्षा कवच बनाने होंगे। दीवारें टिक नहीं पातीं।
ग्रीनलैंड और डेनमार्क के साथ खड़ा कनाडा
कार्नी ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर भी स्पष्ट रुख रखा। उन्होंने कहा कि कनाडा ग्रीनलैंड और डेनमार्क के साथ खड़ा है। ग्रीनलैंड का भविष्य क्या होगा यह तय करने का अधिकार केवल ग्रीनलैंड को है।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की जिद ने यूरोप को जगा दिया है। आज वही यूरोप जो पहले अमेरिका की हर बात मानता था, अब खुद को इराक और अफगानिस्तान की स्थिति में पा रहा है और नए सिरे से संप्रभुता को गढ़ने की बात कर रहा है।
भारत और मोदी पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, डेनमार्क और कनाडा के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बोल रहे हैं तो भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi कहां हैं? दुनिया में सबसे ज्यादा टैरिफ तो भारत पर ही लगाया गया।
क्या प्रधानमंत्री मोदी ट्रंप को बुली कहने का साहस रखते हैं? क्या वे ट्रंप का नाम लेकर उनकी विस्तारवादी नीतियों की आलोचना कर सकते हैं? क्या वे वसुधैव कुटुंबकम और शांति के पुजारी जैसे घिस चुके जुमलों के बिना कोई नई बात विदेश नीति के संदर्भ में कह सकते हैं?
कार्नी ने खुद लिखा अपना भाषण
एक पत्रकार को कार्नी ने बताया कि उन्होंने अपना भाषण खुद लिखा है। उन्होंने कहा कि कनाडा जैसे मिडिल पावर के लिए यह सवाल नहीं कि इस नई सच्चाई के अनुसार अपने आप को बदले या नहीं। बदलना ही होगा। सवाल यह है कि क्या हम अपने आप को सिर्फ दीवारें बनाकर बदलना चाहते हैं या फिर कुछ और महत्वाकांक्षी कदम उठा सकते हैं।
प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए कार्नी ने इन बातों को बोलकर अपने आप को इतिहास के पहले पन्ने पर दर्ज कर लिया है। एक तरह से उन्होंने स्वीकार कर लिया कि अब यह दुनिया बदल गई और कुछ नया सोचना और करना होगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- कार्नी का ऐतिहासिक भाषण – डावोस में कनाडा के PM ने पश्चिमी देशों की स्वार्थी नीतियों की खुलकर आलोचना की और कहा “जिसके पास कम शक्ति है, उसकी शक्ति ईमानदारी है।”
- यूरोप में ट्रंप के खिलाफ बगावत – फ्रांस के मैक्रों ने ट्रंप को “बुली” कहा, बेल्जियम के PM ने कहा यूरोप ट्रंप का गुलाम नहीं बनेगा।
- नियम आधारित व्यवस्था का पर्दाफाश – कार्नी ने माना कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था आंशिक रूप से झूठी थी और पश्चिमी देश इस झूठ में शामिल थे।
- मिडिल पावर देशों को चेतावनी – कार्नी ने कहा अगर मेज पर नहीं बैठे तो मेन्यू में नाम दर्ज हो जाएगा, सभी को मिलकर खड़ा होना होगा।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न








