Maharashtra BMC Election Results 2026: महाराष्ट्र में हुए निकाय चुनावों के नतीजों ने राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और एकनाथ शिंदे का गठबंधन 114 के हाफवे मार्क को पार करता दिख रहा है। अगर यह नतीजे पक्के होते हैं तो यह इतिहास बन जाएगा क्योंकि बीएमसी में पहली बार बीजेपी का मेयर होगा। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) का तीन दशकों से चला आ रहा वर्चस्व टूटता नजर आ रहा है।
शाम 4:30 बजे के रुझानों के अनुसार बीएमसी में शिवसेना उद्धव 41 सीटों पर और बीजेपी 45 सीटों पर आगे चल रही थी। बीजेपी और शिंद का गठबंधन मिलकर करीब 90 सीटों की तरफ बढ़ रहा था जो 2017 की तुलना में 8 सीटें ज्यादा हैं। हालांकि यह प्रचंड जीत नहीं कही जा सकती क्योंकि गठबंधन 114 के आंकड़े से एक-दो ही आगे निकल पा रहा था।
गौरी लंकेश हत्या का आरोपी जीता चुनाव, जालना में मना जश्न
इन नतीजों के बीच एक चौंकाने वाली खबर महाराष्ट्र के जालना से आई। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या का एक आरोपी श्रीकांत पनगरकर स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत गया। श्रीकांत इस समय जमानत पर बाहर है और 2024 में एकनाथ शिंद की पार्टी में शामिल हो गया था। जब इस पर हंगामा हुआ तो शिंद शिवसेना ने उनसे किनारा कर लिया था।
2017 में बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई थी। 9 साल बीत जाने के बाद भी कोर्ट का फैसला नहीं आ सका और जनता ने अपना फैसला सुना दिया। जालना में लोग उसकी जीत का जश्न मना रहे थे। यह घटना भारत की नगरपालिका से लेकर न्यायपालिका तक की स्थिति को दर्शाती है।
अजीत पवार का गेम ओवर, अकेले लड़ने का फैसला पड़ा भारी
अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) ने बीएमसी के चुनाव में अकेले लड़ने का फैसला किया था। पार्टी ने 94 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन नतीजे बेहद निराशाजनक रहे। उनकी हार उन पर लगे 7000 करोड़ के घोटाले से भी बड़ी लगती है जिसकी बात अब बीजेपी भी नहीं करती।
सवाल यह उठ रहा है कि क्या बीजेपी ने जानबूझकर अजीत पवार को अकेले लड़ाया? क्या यह बीजेपी की रणनीति का हिस्सा था? बीएमसी में अजीत पवार का गेम ओवर लगता है लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में वे बीजेपी के काम कई बार आ चुके हैं और आगे भी आते रहेंगे।
एकनाथ शिंद ने बचाई अपनी जमीन, ठाणे में दिखाया दम
कहा जा रहा था कि इस चुनाव में एकनाथ शिंद को भी निपटा दिया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एकनाथ शिंद ने अपनी जमीन बचा ली है। ठाणे में शिंद ने अकेले लड़कर अपना प्रभाव दिखा दिया और उनकी पार्टी वहां अच्छा कर रही है।
बीएमसी में बीजेपी के लिए शिंद जरूरी बने रहेंगे। अगर एकनाथ शिंद और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के प्रदर्शन को मिला दें तो बीजेपी को मंजिल तो मिल गई है मगर सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। दोनों खेमों के शिवसैनिक बड़ी चुनौती के रूप में मौजूद हैं।
भविष्य का सवाल यह है कि राज ठाकरे की तरह अगर किसी दिन एकनाथ शिंद ने शिवसेना से हाथ मिला लिया तब क्या होगा?
राज-उद्धव ठाकरे का गठबंधन फेल, 20 साल बाद की वापसी बेकार
20 साल बाद राज ठाकरे ठाकरे परिवार में लौटे और उनकी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) और शिवसेना उद्धव ठाकरे का गठबंधन हुआ। लेकिन दोनों ने कोई कमाल नहीं किया।
शिवसेना बीजेपी का विरोध करने की स्थिति में अब बचेगी या नहीं यह बड़ा सवाल है। कांग्रेस के साथ मिलकर वह बीजेपी को विधानसभा में नहीं रोक पाई। राज ठाकरे के साथ मिलकर बीएमसी में बीजेपी को नहीं रोक पाई।
कांग्रेस-अंबेडकर गठबंधन भी फ्लॉप, 25 साल की कोशिश बेकार
विधानसभा की तरह कांग्रेस इस गठबंधन में नहीं थी। उसका गठबंधन इस बार प्रकाश अंबेडकर की बहुजन विकास आघाड़ी के साथ हुआ। 1998 में बीजेपी को हराने के लिए बहुजन राजनीतिक दलों के चारों धड़ों का कांग्रेस से गठजोड़ हुआ था और उस समय महाराष्ट्र की 48 में से 38 सीटें कांग्रेस गठबंधन को मिली थीं।
फिर यह गठजोड़ बिखर गया और 25 साल की कोशिशों के बाद प्रकाश अंबेडकर के साथ कांग्रेस का समझौता हुआ जिससे कांग्रेस को कोई लाभ नहीं मिला। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के साथ आने का प्रयोग भी धड़ाम से फेल हो गया।
न्यूयॉर्क का मेयर बना मुंबई चुनाव का मुद्दा
बीएमसी का चुनाव न्यूयॉर्क के मेयर का चुनाव नहीं था लेकिन बीएमसी के चुनाव में न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी मुद्दा बन गए। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अमित सतम ने कहा कि आप मुंबई का मेयर किसे देखना चाहते हैं? खान या पठान को? मुंबई को किस रंग में देखना चाहते हैं? भगवा या हरा?
सतम ने कहा कि देखो न्यूयॉर्क और लंदन में क्या हो रहा है? क्या आप चाहते हैं मुंबई में ऐसा हो? उनका इशारा न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और लंदन के मेयर सादिक खान को लेकर था।
बीजेपी के कहने का मतलब था कि मेयर हिंदू होगा। तो एमएनएस और शिवसेना ने कहा मुंबई का मेयर मराठी होगा। कांग्रेस ने कहा मराठी दलित मेयर होगा। तो बीजेपी को लगा यह हो क्या रहा है? देवेंद्र फडणवीस ने बयान दिया कि मराठी हिंदू मुंबई का मेयर होगा।
पहचान की राजनीति में बंटा मुंबई का चुनाव
मुंबई का चुनाव भाषा, क्षेत्र, जाति और धर्म के आधार पर बंट गया। गुजराती बनाम मराठी, मराठी बनाम तमिल, मराठी बनाम हिंदी, हिंदू बनाम मुस्लिम। न्यूयॉर्क और मुंबई के चुनाव को एक साथ रखकर देखें तो लगता है मुंबई में ट्रंप के सारे इरादे सफल हो रहे हैं जबकि न्यूयॉर्क में ट्रंप की सारी राजनीति फेल हो गई।
न्यूयॉर्क ने जहां पहचान की राजनीति को हराया वहीं मुंबई में इतने स्तर पर पहचान की राजनीति को हवा दी गई कि वोटर को भी समझ नहीं आया होगा कि वह वोट डालते समय हिंदू मराठी है या केवल मराठी है, केवल मुसलमान है या केवल हिंदू है।
1996 से मुंबई का मेयर मराठी रहा है लेकिन उसके पहले मुंबई का मेयर पारसी भी हुआ, हिंदू भी हुआ, ईसाई और मुसलमान भी। उस मुंबई में बांग्लादेशी का भूत छा गया और तरह-तरह के भूत खड़े किए गए।
69 उम्मीदवार निर्विरोध जीते, चुनाव मजाक बनता जा रहा है
राज्य भर में 69 उम्मीदवार निर्विरोध जीत गए। इनमें से बीजेपी के 44 उम्मीदवार निर्विरोध जीते और शिंद के 22। कांग्रेस का भी एक उम्मीदवार निर्विरोध जीता। कहा जाता है ऐसा कभी नहीं हुआ क्योंकि पिछले दो निकाय चुनाव में यह संख्या 10 से 11 के आसपास थी।
कल्याण डोंबिवली में बीजेपी के महेश पाटिल के सामने एमएनएस के नगर प्रमुख मनोज घराट ने उम्मीदवारी वापस ले ली तो उन पर आरोप लगा दिया गया कि 5 करोड़ में बिक गए हैं। कल्याण डोंबिवली में बीजेपी और शिंद के 15 उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए गए।
इन इलाकों में रहने वाले लोगों को मतदान करने का अवसर ही नहीं मिला जो एक गंभीर चिंता की बात है।
स्याही मिटने का विवाद, चुनाव आयोग पर सवाल
मतदान के समय लोगों ने आरोप लगाया कि कैसी स्याही लगाई जा रही है जो सैनिटाइजर और एसीटोन से मिट जा रही है। विपक्ष ने आरोप लगाया कि इस तरह की स्याही लगाकर बार-बार वोट डालने का प्रयास किया जा रहा है।
राज्य निर्वाचन आयोग ने यहां तक कह दिया कि वोटर की जिम्मेदारी है कि वह अपनी उंगली से स्याही न मिटाए। बीएमसी ने कहा कि अगर इंक सूखने से पहले निशान हटाया गया तो कार्रवाई की जा सकती है। पहले बीएमसी ने इनकार किया और अब जाकर जांच की बात होगी।
वेबसाइट क्रैश, लाखों लोग नहीं डाल पाए वोट
मतदान के दौरान राज्य के निर्वाचन आयोग की वेबसाइट 10 में से 6 घंटे बंद रही। वेबसाइट क्रैश हो गई और लोग सूची में अपना नाम नहीं ढूंढ पाए। निर्वाचन अधिकारी दिनेश वाघमारे ने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा कि एक ही दिन में वेबसाइट को 2 करोड़ लोगों ने खोला जिस वजह से वेबसाइट बैठ गई।
लोगों के पूरे-पूरे परिवार वोट नहीं डाल पाए। 35-35 वर्षों से वोट करने वालों के नाम लिस्ट में नहीं थे। कुछ मामलों में जिन लोगों ने विधानसभा-लोकसभा के चुनाव में मतदान किया उनका नाम भी सूची से गायब दिखा।
नई PADU मशीन पर उठे सवाल, VVPAT नहीं दी गई
महाराष्ट्र के निर्वाचन अधिकारी ने मुंबई में एक नई बैकअप मशीन पेश कर दी। प्रिंटिंग ऑक्सिलरी डिस्प्ले यूनिट (PADU) नाम की इस मशीन के बारे में कहा गया कि यदि ईवीएम काम करना बंद कर देती है तभी इसका इस्तेमाल होगा। कुल 140 PADU मशीन को अलग-अलग बूथों पर भेजा गया।
शिवसेना ठाकरे और आम आदमी पार्टी ने इसका काफी विरोध किया। PADU मशीन भेजी गई मगर इस चुनाव में VVPAT पर्चियां जारी नहीं की गईं। विपक्ष के नेताओं ने सवाल उठाया कि चुनाव के आखिरी समय पर ऐसी मशीन क्यों लाई गई?
टर्नआउट के आंकड़े देर से जारी किए गए
नतीजे से 2 घंटे पहले तक टर्नआउट के आंकड़े जारी नहीं किए गए। 1 घंटा पहले आंकड़े दिए गए और उससे पहले रेंज के रूप में आंकड़े दिए जा रहे थे कि 40 से 50% मतदान हुआ। पत्रकार सोहित मिश्रा ने ट्वीट कर बताया कि 10:00 बजे होने वाली गिनती से 1 घंटा पहले नंबर दिया गया कि 52.94% मतदान हुआ है।
आखिर चुनाव आयोग ने समय पर आंकड़े क्यों नहीं जारी किए? लोकसभा चुनाव के दौरान भी ऐसे सवाल उठे थे।
राष्ट्रीय हिंदुत्व ने क्षेत्रीय हिंदुत्व को किया परास्त
महाराष्ट्र की राजनीति में बीजेपी का हिंदुत्व प्रयोग एक बड़े मुकाम पर पहुंचा है। इसे न तो शिवसेना चुनौती देती हुई लगती है और न बहुजन दलों के साथ कांग्रेस।
बीजेपी के राष्ट्रीय हिंदुत्व ने शिवसेना के क्षेत्रीय हिंदुत्व को परास्त कर दिया है। पहले उसे काट-छांट कर कमजोर किया। फिर उसके एक हिस्से को यानी एकनाथ शिंद को मिलाकर अपने आप को महाराष्ट्र और बीएमसी में मजबूत कर लिया।
हिंदुत्व के इस प्रोजेक्ट में अजीत पवार अब गैर जरूरी लगते हैं।
विश्लेषण: विपक्ष के पास दल नहीं, दुकानें बची हैं
इस चुनाव का सबसे बड़ा सबक यह है कि विपक्ष के खेमे में अब दल की नहीं दुकान बचाने की लड़ाई चल पड़ेगी। हर हार के बाद विपक्षी दल दल की तरह नहीं दुकान की तरह बचे नजर आते हैं। क्या इन तमाम दुकानों को जुटाकर विपक्ष विकल्प का मॉल बना सकता है?
बीजेपी के पास 10,000-100 करोड़ का चंदा है। राज्य सत्ता की ताकत अलग है। क्या इतने बड़े फंड से लैस बीजेपी से विपक्ष कभी लड़ पाएगा? विपक्ष के खेमे में अलायंस की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस भी राज्य दर राज्य कमजोर होती जा रही है।
भारत का चुनावी लोकतंत्र तमाम तरह की नैतिकताओं से मुक्त हो चुका है। बीजेपी के विरोधी खेमे की विचारधारा तारतार हो चुकी है मगर बीजेपी अपनी विचारधारा पर टिकी नजर आई।
मुख्य बातें (Key Points)
• बीएमसी में 30 साल बाद शिवसेना का वर्चस्व टूटा – बीजेपी-शिंद गठबंधन 114 के आंकड़े को पार कर रहा है और पहली बार बीजेपी का मेयर बनने की संभावना है
• गौरी लंकेश हत्या का आरोपी श्रीकांत पनगरकर जालना से जीता – जमानत पर बाहर आरोपी की जीत पर लोगों ने मनाया जश्न
• अजीत पवार का गेम ओवर – 94 सीटों पर अकेले लड़ने का फैसला भारी पड़ा, बीएमसी में करारी हार
• 69 उम्मीदवार निर्विरोध जीते – पिछले चुनावों में यह संख्या 10-11 थी, इस बार बीजेपी के 44 और शिंद के 22 निर्विरोध जीते
• चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल – वेबसाइट क्रैश, स्याही विवाद, PADU मशीन विवाद और VVPAT न होने पर उठे सवाल








