Greenland Trump NATO Crisis : डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की धमकी के बाद पूरे यूरोप में हड़कंप मच गया है। डेनमार्क ने ऑपरेशन आर्कटिक एंडोरेंस शुरू कर दिया है जिसके तहत स्वीडन, जर्मनी, फ्रांस और अन्य NATO देश अपनी सेनाएं ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए भेज रहे हैं। अगर अमेरिका ने यूरोप की जमीन पर हमला किया तो न सिर्फ NATO बिखर जाएगा बल्कि यूरोप का भविष्य भी दांव पर लग जाएगा। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस पूरे घटनाक्रम से सबसे ज्यादा फायदा व्लादिमीर पुतिन को होगा।
ग्रीनलैंड पर सैनिक घेराबंदी शुरू
ग्रीनलैंड को लेकर सैनिक घेराबंदी शुरू हो गई है। ट्रंप ने तो बयान ही दिए हैं लेकिन यूरोप के देशों ने अपने सैनिक ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए भेजने शुरू कर दिए हैं। डेनमार्क ने पिछले कुछ घंटों से अपना सैनिक बंदोबस्त बढ़ाने के लिए ऑपरेशन आर्कटिक एंडोरेंस शुरू कर दिया है।
अमेरिका ने जिस तरह से वेनेजुएला पर कब्जा किया उसके बाद लगता है कि ग्रीनलैंड पर कब्जा उतना आसान नहीं रहेगा। कभी यूरोप के इन देशों को बचाने के लिए अमेरिका ने अपनी सेनाएं भेजी थीं। फ्रांस को हिटलर के जर्मनी से बचाया था। लेकिन अब वही फ्रांस अमेरिका के खिलाफ अपनी सेना ग्रीनलैंड भेज रहा है।
नॉर्वे ने भी अपने दो सैनिक भेजे हैं। पिछले कई सालों से यूरोप ने बहुत से रणनीतिक मामलों पर सख्ती से बोलना और स्टैंड लेना बंद कर दिया था। लेकिन लगता है ग्रीनलैंड पर ट्रंप के दावों ने यूरोप को झटका दिया है।
ग्रीनलैंड कहां है और क्यों है खास
ग्रीनलैंड धरती के उत्तरी ध्रुव पर बसा हुआ है। दुनिया के पांच महासागरों में से एक आर्कटिक महासागर का इलाका जहां बर्फ जमी रहती है वहीं यह स्थित है। यहां मात्र 57,000 आबादी रहती है।
सर्दी में यहां का तापमान माइनस 9 से माइनस 40 डिग्री सेल्सियस हो जाता है। गर्मी की इतनी मेहरबानी होती है कि तापमान 5 से 10 डिग्री सेल्सियस रहता है। भारत से वहां के लिए कोई सीधी उड़ान नहीं है और 18 से 20 घंटे लगते हैं बदल-बदल कर जाने में।
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा टापू है लेकिन अपने आप में कोई देश नहीं। यह डेनमार्क का हिस्सा है फिर भी ग्रीनलैंड स्वायत्त है। इसके अपने प्रधानमंत्री हैं और संसद है। 1979 तक डेनमार्क का उपनिवेश रहने के बाद ग्रीनलैंड में होम रूल आया और 2009 में एक कानून के तहत ग्रीनलैंड को अलग होने का ब्लूप्रिंट दे दिया गया।
ग्रीनलैंड के 85 प्रतिशत लोग डेनमार्क के साथ
ग्रीनलैंड चाहे तो अलग हो सकता है लेकिन यहां के 85 प्रतिशत लोग डेनमार्क से अलग नहीं होना चाहते। डेनमार्क की सरकार से कई तरह की सुविधाएं यहां के लोगों को मिलती हैं।
शिक्षा मुफ्त है। स्कॉलरशिप मिलती है। यूनिवर्सल फ्री हेल्थ केयर है और सामाजिक सुरक्षा भी डेनमार्क की सरकार देती है। अगर ट्रंप ग्रीनलैंड पर हमला कर देंगे तो डेनमार्क अपने दम पर इसकी रक्षा कर पाएगा यह बड़ा सवाल है।
इसीलिए ट्रंप के संभावित हमले के कारण NATO के बिखर जाने की बात हो रही है। अगर ट्रंप यूरोप की जमीन पर हमला करते हैं तो NATO के बाकी यूरोपीय देशों को अपनी संप्रभुता बचाने के लिए आगे आना होगा और डेनमार्क की मदद करनी पड़ जाएगी।
ट्रंप का तर्क क्या है
सपाट नक्शे पर देखें तो लगता है रूस और अमेरिका दुनिया के दो अलग-अलग छोर पर हैं। दोनों के बीच में सफेद रंग की जो जमीन दिखती है वही ग्रीनलैंड है। इस नक्शे के हिसाब से देखें तो ट्रंप की बात सही लगती है कि अगर रूस ने ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लिया तो रूस ठीक अमेरिका के पड़ोस में आ जाएगा।
लेकिन जैसे ही आप ग्लोब पर ग्रीनलैंड को देखते हैं तो पता चलता है कि अमेरिका और रूस तो पहले से ही पड़ोसी हैं। अलास्का अमेरिका का हिस्सा है और उसके ठीक सामने रूस की जमीन है। यहां से मात्र 88 किलोमीटर की दूरी पर रूस का बॉर्डर है।
डायोमीट टापूओं के बीच में तो सिर्फ 4 किलोमीटर का फासला है। सर्दियों में जब पानी जम जाता है तब इस पर चलकर दोनों देशों के लोग आ-जा सकते हैं। जब ग्लोब पर रूस और अमेरिका इतने पास-पास दिखते हैं तो फिर ट्रंप रूस को खतरा क्यों बता रहे हैं।
डेनमार्क की सैन्य क्षमता
सैन्य रूप से डेनमार्क अमेरिका के सामने मजबूत देश नहीं है। पूरा यूरोपीय यूनियन कुल मिलाकर अमेरिका के सैन्य खर्चे का एक तिहाई ही अपनी सेनाओं पर खर्च करता है।
फिर भी डेनमार्क की प्रधानमंत्री और दूसरे नेता हर दिन ट्रंप के बयानों की निंदा कर रहे हैं। अपने देश की संप्रभुता और सम्मान की बात कर रहे हैं। जब भी ट्रंप ने कहा है कि उन्हें खुशी होगी कि ग्रीनलैंड खरीद लें या नहीं तो सैनिक दखल देंगे तब-तब डेनमार्क ने जवाब दिया है।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने कहा है कि अगर ऐसा होता है तो NATO सैन्य गठबंधन खत्म हो जाएगा। डेनमार्क को पता है कि उसके पास अमेरिका से लड़ने की क्षमता नहीं और यूरोपियन यूनियन का साथ मिल जाने से भी यह क्षमता नहीं आती। लेकिन नैतिक चुनौती देना भी एक तरह की सैनिक चुनौती मानी जाती है।
ग्रीनलैंड और डेनमार्क की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस
ग्रीनलैंड और डेनमार्क के प्रधानमंत्री ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने कहा कि हम डेनमार्क को चुनते हैं। जब इसके बारे में ट्रंप से पूछा गया तो उन्होंने कहा मैं नहीं जानता यह कौन है।
ट्रंप ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री को पहचानने से इंकार कर सकते हैं। लेकिन ट्रंप के दफ्तर वाइट हाउस में ग्रीनलैंड और डेनमार्क के विदेश मंत्रियों ने अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वैंस और विदेश सचिव मार्को रूबियो से मुलाकात की।
मगर डेनमार्क के प्रतिनिधि अधूरी बातचीत छोड़कर वापस आ गए। वे समझ गए कि ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर ट्रंप मूल रूप से अलग राय रखते हैं।
यूरोपीय यूनियन की प्रतिक्रिया
यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लायन ने कहा है कि आर्कटिक की सुरक्षा यूरोपीय यूनियन की प्राथमिकता है और इसे लेकर प्रतिबद्ध है। ग्रीनलैंड और किंगडम ऑफ डेनमार्क NATO के सदस्य हैं। अमेरिका भी NATO का सदस्य है।
यूरोप के देश अपनी रक्षा तैयारियों को बेहतर करते रहेंगे और निवेश करते रहेंगे इसकी बात की गई है। लेकिन ट्रंप ऐसे शब्दों को एक-दो शब्दों से ही उड़ा देते हैं।
यूरोप खुद इसके लिए जिम्मेदार है। कई दशक से अमेरिका का दरबारी बन गया था। उसे लगता था अमेरिका की हां में हां मिलाने से यूरोप की रक्षा होगी लेकिन हो गया उल्टा।
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों का बयान
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि अगर यूरोपीय देश और उसके सहयोगियों की संप्रभुता पर हमला हुआ तो अप्रत्याशित रूप से जवाब दिया जाएगा। फ्रांस स्थिति की गंभीरता पर नजर रख रहा है। डेनमार्क और उसकी संप्रभुता के साथ पूरी तरह खड़ा रहेगा।
ट्रंप की हां में हां मिलाने वाले मैक्रों लगता है समझ गए हैं कि अगर ग्रीनलैंड गया तो दुनिया भर में यूरोप हंसी का पात्र बन जाएगा।
आधुनिक संदर्भ में दुनिया को संप्रभुता, राष्ट्रवाद, नक्शा, भूगोल यह सब बताने वाला यूरोप खुद ही नक्शे से मिटता हुआ दिखाई दे रहा है।
NATO का क्या होगा
ग्रीनलैंड ने NATO के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। इसी NATO के दम पर रूस को चिढ़ाने की कोशिश की गई जब यूक्रेन को सदस्य बनाने की बात हुई। तब रूस ने कहा कि वह नहीं चाहता कि NATO की सेना उसकी सीमा पर आ जाए।
अब ट्रंप कह रहे हैं कि ग्रीनलैंड दे दो। हम नहीं चाहते कि रूस अमेरिका की सीमा पर आ जाए। NATO का खत्म हो जाना पुतिन की ऐतिहासिक जीत होगी।
1949 में NATO का गठबंधन बना। लेकिन ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि अमेरिका के बिना NATO बेकार है। उसे हथियार दिया है तो NATO को पैसे देने चाहिए। NATO के साथ किए गए कई समझौतों से ट्रंप बाहर आ गए हैं।
ग्रीनलैंड को लेकर जब यूरोप और अमेरिका की सेना आमने-सामने होगी तब NATO का क्या मतलब रह जाएगा।
ट्रंप को ग्रीनलैंड क्यों चाहिए
ट्रंप ग्रीनलैंड की बात ऐसे करते हैं जैसे प्लॉट हो। वो किराए की बात नहीं करते। करार की बात नहीं करते। न्यूयॉर्क टाइम्स से उन्होंने कहा कि ओनरशिप यानी मालिक होना बहुत जरूरी है। वहां सफल होने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से यह एहसास चाहिए कि आप ग्रीनलैंड के मालिक हैं। लीज या करार में वो बात नहीं।
ट्रंप को समझने वाले कह रहे हैं कि उनका कारोबार रियल एस्टेट का है और वे उसी समझ के आधार पर ग्रीनलैंड को देख रहे हैं। उन्हें नक्शा पसंद है। 2.166 मिलियन वर्ग किलोमीटर इलाके में यह आइलैंड है और उनकी नजर इस पर पड़ गई है।
अमेरिका का एक इतिहास रहा है 19वीं सदी का जब उसने दूसरे देशों से इलाके खरीदकर अपना विस्तार किया। 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लुइसियाना खरीदा। 1848 में मेक्सिको का नेवाडा और कैलिफोर्निया खरीद लिया। 1867 में रूस से अलास्का खरीद लिया।
ग्रीनलैंड में खनिज संपदा
9 महीने पुरानी गार्डियन अखबार की खबर है कि ग्रीनलैंड में यूरेनियम के एक बड़े भंडार में ऑस्ट्रेलिया की कंपनी खनन करना चाहती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर बाहर की कंपनियों ने आकर खनन शुरू कर दिया तो उनका पर्यावरण प्रभावित हो जाएगा।
Amazon के मालिक जेफ बेजोस, बिल गेट्स और माइकल ब्लूमबर्ग ने 2019 से ही यहां कोबोल्ट मेटल्स नाम की कंपनी में निवेश करना शुरू कर दिया जो दुर्लभ धातुओं को खोजती है।
ग्रीनलैंड के ग्लेशियर के नीचे ऐसे अनेक धातुओं के होने की बात कही जाती है। इन धातुओं को निकालना अरबों रुपए का काम है।
यूरोप के पास क्या विकल्प हैं
डेनमार्क, स्वीडन, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन के बीच मुलाकातों और चर्चाओं की खबरें अखबारों में भरी पड़ी हैं। NATO के सदस्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
पहला विकल्प है कि ग्रीनलैंड को इतना सशक्त किया जाए कि वह रूस और चीन के किसी आक्रमण का सामना कर सके। दूसरा विकल्प है कि ग्रीनलैंड में अमेरिका को सैनिक अड्डे बनाने का प्रस्ताव दिया जाए।
विश्व युद्ध के समय ग्रीनलैंड में अमेरिका के 17 सैनिक अड्डे थे। इस समय भी एक है उत्तर पूर्वी ग्रीनलैंड के पिटुफिक स्पेस बेस जिसे अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से काफी अहम माना जाता है।
1951 में डेनमार्क और अमेरिका के बीच डिफेंस ऑफ ग्रीनलैंड समझौता हुआ जिसके तहत अमेरिका और NATO को ग्रीनलैंड में सैनिक अभियान चलाने का अधिकार मिल गया। इस समझौते में यह भी था कि अमेरिका ग्रीनलैंड में सैनिक क्षेत्र बना सकता है। इसके लिए उसे किराया नहीं देना होगा न टैक्स लगेगा।
तीसरा प्रस्ताव है कि अगर बात खनिज के खदानों की है तो ग्रीनलैंड अमेरिका से समझौता कर ले कि वह उनके यहां आकर खनिज निकाल सकेगा और निवेश कर सकेगा।
2019 में भी ट्रंप ने जताई थी इच्छा
2019 में पहले ही टर्म में ट्रंप ने ग्रीनलैंड खरीद लेने की इच्छा जताई थी। तब लोगों ने समझा और भूल गए कि ट्रंप तो इस तरह की बातें करते रहते हैं।
उस समय डेनमार्क के पूर्व प्रधानमंत्री ने तो हैरानी जताते हुए कहा था कि यह तो अप्रैल फूल का लतीफा लगता है। अगस्त के महीने में अप्रैल फूल कहां से आ गया। भूल जाइए ट्रंप साहब कि ऐसा कुछ भी हो सकता है।
डेनमार्क के सांसद रासमस जारलोव ने कहा था कि अगर ट्रंप वाकई ऐसा सोच रहे हैं तो यही इस बात का अंतिम प्रमाण है कि वे पागल हो चुके हैं।
इटली की प्रधानमंत्री का बयान
इटली की प्रधानमंत्री की बात चर्चा में आई है। उन्होंने कहा है कि हमें रूस से बात करनी चाहिए। पुतिन इन सब बातों पर मुस्कुरा रहे होंगे।
कहीं ऐसा न हो जाए कि रूस और अमेरिका के बीच यूरोप का बंटवारा हो जाए। जियोपॉलिटिक्स के नाम पर बेवकूफ बनाने वालों ने कभी ऐसी किसी संभावना के बारे में बात जरूर की होगी।
विश्लेषण: संप्रभुता की अवधारणा पर हमला
ग्रीनलैंड, ताइवान, ईरान, वेनेजुएला, सोमालिया, गाजा इन सबको लेकर जो बात चल रही है उसमें एक चीज कॉमन है। जिस संप्रभुता की समझ यूरोप और दुनिया के देशों ने पिछले 200 साल से विकसित की और अपनी जनता को भी समझाया कि देश के लिए संप्रभुता से बड़ी कोई चीज नहीं, उस संप्रभुता की अवधारणा को ही ध्वस्त किया जा रहा है।
इराक, अफगानिस्तान, सीरिया जैसे देशों में संप्रभुता खत्म करने के लिए हथियारबंद गिरोह खड़े किए गए। फिर इन पर काबू पाने के नाम पर बम भी गिराए गए। तो संप्रभुता को कुचलने का यह अगला चरण दुनिया देखने जा रही है।
ट्रंप ने 66 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संधियों, संस्थानों और गठजोड़ों से अमेरिका को अलग कर दिया है और फंडिंग बंद कर दी है। ट्रंप इन संस्थाओं को बेकार बकवास कहते हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
- डेनमार्क ने ऑपरेशन आर्कटिक एंडोरेंस शुरू किया है जिसके तहत स्वीडन, जर्मनी, फ्रांस और अन्य NATO देश ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए सेना भेज रहे हैं
- ग्रीनलैंड के 85 प्रतिशत लोग डेनमार्क से अलग नहीं होना चाहते और वहां के प्रधानमंत्री ने कहा है कि हम डेनमार्क को चुनते हैं
- अगर अमेरिका ने यूरोप की जमीन पर हमला किया तो NATO टूट जाएगा और इससे सबसे ज्यादा फायदा पुतिन को होगा
- ग्रीनलैंड में यूरेनियम और दुर्लभ धातुओं के बड़े भंडार हैं जिसके कारण अमेरिकी अरबपति 2019 से ही यहां निवेश कर रहे हैं
- ट्रंप ने 66 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संधियों और संस्थानों से अमेरिका को अलग कर दिया है
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न








