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ड्राई आई सिंड्रोम का इलाज संभव! एम्स (AIIMS) में स्टेम सेल थेरेपी से 15 मिनट में लौटेगी रोशनी

Dry Eye Syndrome Treatment: एम्स (AIIMS) में हुआ सफल क्लिनिकल ट्रायल, स्टेम सेल से होगी सूखी आंखों की समस्या का समाधान

The News Air by The News Air
Saturday, 8th March, 2025
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AIIMS
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Dry Eye Syndrome Treatment:  ड्राई आई सिंड्रोम (Dry Eye Syndrome) यानी सूखी आंखों की समस्या से जूझ रहे मरीजों के लिए राहत की खबर है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के डॉक्टरों ने स्टेम सेल थेरेपी से इसका इलाज संभव कर दिखाया है। इस नई तकनीक से मरीजों की आंखों की रोशनी महज 15 मिनट में वापस आ सकती है। एम्स के डॉक्टरों के मुताबिक, यह भारत में पहली बार हो रहा है और इसके नतीजे काफी प्रभावी साबित हो रहे हैं।

कैसे होता है इलाज?

एम्स (AIIMS) के आरपी सेंटर में रेटिना विशेषज्ञ डॉ. राजपाल के अनुसार, ड्राई आई सिंड्रोम का अब तक कोई स्थायी इलाज नहीं था, लेकिन पहली बार भारत में स्टेम सेल इंजेक्ट किया गया है। इस प्रक्रिया में स्टेम सेल को सब-रेटिनल इंजेक्शन के जरिए डिफिशिएंसी वाले क्षेत्र में डाला जाता है, जिससे नई कोशिकाएं विकसित होती हैं। यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ 15 से 20 मिनट में पूरी हो जाती है, और 2-3 महीनों में मरीज की रोशनी में सुधार देखने को मिलता है।

अब तक दो मरीजों पर हुआ सफल परीक्षण

डॉ. राजपाल ने बताया कि अब तक दो मरीजों पर यह प्रयोग सफल रहा है। एम्स (AIIMS) इस थेरेपी पर क्लिनिकल ट्रायल कर रहा है, जबकि एलवी प्रसाद आई इंस्टीट्यूट (LV Prasad Eye Institute) और गणपत नेत्रालय (Ganpat Netralaya) में भी इस तकनीक पर परीक्षण जारी है। हालांकि, अन्य संस्थानों में ट्रायल पूरा होने में अभी 1-2 साल का वक्त लग सकता है।

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बेंगलुरु से आ रहा स्टेम सेल

एम्स (AIIMS) दिल्ली इस पूरी प्रक्रिया के लिए बेंगलुरु से स्टेम सेल मंगवा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि यह तकनीक पूरी तरह भारतीय रिसर्च पर आधारित है, जो इसे अधिक भरोसेमंद और कारगर बनाती है।

बायो सिंथेटिक कॉर्निया से बदलेगा इलाज का तरीका

एम्स (AIIMS) में कॉर्निया से जुड़ी बीमारियों के लिए भी एक नई तकनीक विकसित की जा रही है। एम्स की वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. नम्रता शर्मा के अनुसार, अब तक 70 मरीजों पर बायो सिंथेटिक कॉर्निया (Bio-Synthetic Cornea) का प्रयोग किया जा चुका है। यह कॉर्निया कोलैजिन से बना है और स्वीडिश रिसर्च लैब के सहयोग से तैयार किया गया है।

सिंथेटिक कॉर्निया कैसे करता है काम?

डॉ. नम्रता शर्मा ने बताया कि सिंथेटिक कॉर्निया कैरटोकॉनस (Keratoconus) जैसी स्थितियों में इम्प्लांट किया गया है, जहां कॉर्निया पतला हो जाता है और उसकी सतह बदल जाती है। यह तकनीक कॉर्नियल थिकनेस को बढ़ाती है और मरीज की नजर को पहले से बेहतर बनाती है।

भविष्य में कंप्लीट कॉर्निया बनाने की तैयारी

फिलहाल रिसर्च सिर्फ पार्शियल कॉर्निया पर केंद्रित है, लेकिन अब वैज्ञानिक कंप्लीट कॉर्निया बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। कॉर्निया में कुल 6 लेयर होती हैं, जिनमें से अब तक 4 को तैयार किया जा चुका है। एंडोथीलियल सेल (Endothelial Cell) बनाने की प्रक्रिया अभी जारी है, जो कॉर्निया की पारदर्शिता को नियंत्रित करते हैं।

ड्राई आई सिंड्रोम किसे ज्यादा प्रभावित करता है?

ड्राई आई सिंड्रोम किसी को भी हो सकता है, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ यह अधिक आम हो जाता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह बीमारी एक तिहाई वृद्ध लोगों को प्रभावित करती है। युवा आबादी में भी यह समस्या देखी जाती है, लेकिन महिलाओं में इसका खतरा पुरुषों की तुलना में अधिक होता है।

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