कहीं जिंक सप्लीमेंट तो नहीं ब्लैक फंगस होने का सबसे बड़ा कारण?


नई दिल्ली, 27 मई

ब्लैक फंगस के बढ़ते मामलों के बीच भारत में डॉक्टर का कहना है कि जिंक सप्लीमेंट की इस संक्रमण में भूमिका की जांच होनी चाहिए, क्योंकि ऐसा नज़र आ रहा है कि जिंक की भरपूर मात्रा संक्रमण को फैलने में योगदान दे रही है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गुरुवार को म्यूकरमाइकोसिस यानि ब्लैक फंगस से जुड़े मामलों की संख्या बढ़कर 11,717 पहुंच गई, जबकि मई तक ये संख्या 9000 थी. कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लोगों से इम्यूनिटी बढ़ाने को कहा गया, जिसके लिए मल्टीविटामिन का अच्छी खासी मात्रा में सेवन किया गया. कोविड-19 महामारी की शुरुआत से इनकी बिक्री में भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है. 2020 में विटामिन सी की बिक्री पिछले साल की तुलना में दोगुनी रही. एक रिपोर्ट के मुताबिक 2020 में करीब 185 करोड़ गोलियां लोगों ने खाई है. ये रिपोर्ट ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (एआईओसीडी) ने जारी की है.

रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल देशभर में विटामिन सी की 171 करोड़ गोली और विटामिन सी के साथ दूसरे मल्टीविटामिन वाली 13 करोड़ गोली बिकी. विटामिन सी के साथ साथ जिंक सप्लीमेंट की खपत भी संक्रमण के फैलने के साथ बढ़ी. जिंकोविट की बिक्री में 94 फीसद उछाल देखने को मिला और 2020 में इसकी करीब 54 करोड़ गोलियां खरीदी गईं. वहीं 2019 में ये आंकड़ा 28 करोड़ था. फरवरी 2021 में इसकी बिक्री में एक बार फिर तेजी दिखी और मार्च में विटामिन सप्लीमेंट की बिक्री में 22 फीसद उछाल आया.

ये सप्लीमेंट किसी भी दुकान से बगैर डॉक्टर के लिखे यानि प्रेस्क्रिप्शन के मिल जाती है, क्योंकि इन्हें फूड सप्लीमेंट के दायरे में रखा गया है ना कि दवा के, इसलिए इनका मिलना बहुत आसान होता है. लोगों ने इसकी खरीदारी करके इसे घर में स्टोर करके भी रख लिया था, कई मामलों में तो डॉक्टर ने इसे लेने की सलाह भी नहीं दी लेकिन सोशल मीडिया और फैलते संदेशों में इसे कोविड -19 के खिलाफ लड़ाई में कारगर इलाज बताया गया जिसे देखकर कई लोगों ने इन गोलियों की खरीदारी की. विशेषज्ञों का मानना है कि ये सप्लीमेंट उन लोगों के लिए ही होते हैं जिनमें या तो पोषकता की कमी हो या जिन्हें सप्लीमेंट लेने की सलाह दी गई हो. देश में कई डॉक्टर म्यूकरमाइकोसिस को जिंक के साथ जोड़ कर देख रहे हैं. उनका मानना है कि जिंक जो मल्टीविटामिन सप्लीमेंट में भी मौजूद रहता है उसका बेतहाशा उपयोग फंगल संक्रमण के लिए जिम्मेदार हो सकता है.
हालांकि इसे लेकर अभी तक कोई अध्ययन सामने नहीं आया है लेकिन डॉक्टरों का दावा है कि शुगर की ज्यादा मात्रा, आयरन और जिंक फंगस को बढ़ने में महती भूमिका निभाते हैं. कर्नाटक के डॉ. विक्रम सकलेशपुर ने ट्वीट किया है कि जिंक का ज्यादा इस्तेमाल म्यूकरमाइकोसिस के खतरे को बढ़ाने में सहायक होता है, इसके लिए उन्होंने कुछ पुरानी शोध का हवाला भी दिया. वरिष्ठ गेस्ट्रोइंट्रोलॉजिस्ट और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, कोचीन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राजीव टंडन ने ट्वीट करते हुए कहा कि एंटीबायोटिक्स, जिंक और भाप ये तीन मुख्य वजह हैं जिन पर गहन शोध किए जाने की ज़रूरत है.

इंदौर के महात्मा गांधी मेमोरियल शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय के डॉ. वी.पी.पांडे ने एक आकलन साझा करते हुए बताया, ‘210  मरीज, जिनमें 100 फीसद ने एंटीबायोटिक्स ली, 14 फीसद को स्टेरॉयड नहीं दिया गया, 21 फीसद डायबिटिक नहीं थे, 36 फीसद का घर पर ही इलाज हां, केवल 52 फीसद को ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ी, जिंक की भूमिका अब तक नहीं जांची गई है.’ जयादेवन ने कहा कि जिंक सप्लीमेंट खतरे की वजह हो सकता है इसकी जांच की जानी चाहिए. जिंक की भरपूर मात्रा फंगस को बढ़ने में मददगार होती है और स्तनपायी की कोशिकाएं फंगस से दूर रहने के लिए जिंक को दूर रखती हैं. यूएस की एक सरकारी एजेंसी नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) ने अपने दिशा निर्देश में जिंक की सलाह नहीं दी है. उनका कहना है कि कोविड-19 के उपचार में जिंक के इस्तेमाल करने और ना करने को लेकर पर्याप्त डाटा उपलब्ध नहीं है.

वहीं जामा नेटवर्क में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि जिंक, एस्कॉर्बिक एसिड या दोनों सार्स को वी -2 के लक्षणों पर कोई असर नहीं डालते हैं. वहीं इस दौरान देसी उत्पाद जो इम्यूनिटी बढ़ाने का दावा कर रहे हैं उन्होंने भी अच्छा बाज़ार बना लिया है. कोविड-19 के इलाज का दावा करने वाली कोरोनिल को 23 जून को बाज़ार में उतारा गया था. तब से अब तक इसकी मांग में भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है. इसके बाज़ार में आने के महज़ 4 महीनों के भीतर ही पंतजली आयुर्वेद ने करीब 25 लाख कोरोनिल किट बेची, जिसकी कीमत करीब 250 करोड़ थी. जबकि इसका अभी ठीक से क्लीनिकल ट्रायल भी नहीं हुआ है.


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