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The News Air - Breaking News - 30 साल बाद भारत को क्यों याद आ रहा है दुनिया का पहला एंटीबायोटिक पेनिसिलिन

30 साल बाद भारत को क्यों याद आ रहा है दुनिया का पहला एंटीबायोटिक पेनिसिलिन

The News Air Team by The News Air Team
मंगलवार, 5 मार्च 2024
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30 साल बाद भारत को क्यों याद आ रहा है दुनिया का पहला एंटीबायोटिक
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नई दिल्ली, 5 मार्च (The News Air) भारत इस साल जून से एंटीबायोटिक पेनिसिलिन का प्रोडक्शन शुरू करेगा. पेनिसिलिन का मतलब, हर जख्म, हर मर्ज की दवा. ऐसा भारत 30 सालों बाद करने जा रहा है. इसकी जरूरत भारत को अब क्यों पड़ी, उत्पादन किन वजहों से बंद हुआ था और आगे क्या बदलेगा

90 के दशक तक भारत में निर्मित दवाइयों में एक जाना पहचाना नाम हुआ करता था पेनिसिलिन. पेनिसिलिन का मतलब, हर जख्म, हर मर्ज की दवा. फिर धीरे धीरे प्रोडक्शन प्लांट बंद होने लगे. 1998 के उस साल पता चला, पेनिसिलिन का प्रोडक्शन भारत में पूरी तरह बंद हो गया. अब खबर है कि भारत में पेनिसिलिन G का उत्पादन नए सिरे से शुरू होगा वो भी 2024 के जून महीने से. अब जो चर्चा है के बीच यह जानना दिलचस्प होगा कि इसका भारत में बनना क्यों बंद हुआ था, अब इसकी जरूरत क्यों पड़ी? उससे पहले समझिए, पेनिसिलिन इतनी खास क्यों है?

पेनिसिलिन दरअसल एक एंटीबायोटिक है. इसका मतलब तो आज हर कोई जानता है. सर्दी बुखार से लेकर जख्म ठीक करने वाली दवाओं में सबसे पहले पहला नंबर इसी एंटिबायोटिक दावाओं का होता है. एंटीबायोटिक दो शब्दों एंटी और बायोस से मिलकर बना है, जिसका मतलब है एंटी लाइफ. यानी ये दवाएं बैक्टीरिया को नष्ट कर, उन्हें बढ़ने से रोकती हैं. मेडिसीन की दुनिया में एंटीबायोटिक्स की खोज सबसे क्रांतिकारी मानी जाती है. वो इसलिए क्योंकि इसके अविष्कार से पहले आम सर्दी-बुखार में भी इंसान की मौत हो जाती थी. चाकू का एक कट भी इंसान की जान लेने के लिए काफी था. इस जीवनरक्षक खोज का श्रेय जाता है साइंटिस्ट एलेक्जेंडर फ्लेमिंग को. साल 1928 का था और एंटीबायोटिक का नाम था पेनिसिलिन

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पेनिसिलिन की खोज कैसे हुई

यह जानकर आपको हैरानी होगी कि इसकी खोज एक्सीडेंटल थी यानी एलेक्जेंडर खोज किसी और की कर रहे थे लेकिन एंटीबायोटिक की कर दी. 1918 में स्पेनिश फ्लू दुनिया के कई देशों में फैला था. इसी बीमारी से लोगों को बचाने के लिए साइंटिस्ट एलेक्जेंडर फ्लेमिंग फोड़े और गले में खराश सही करने वाली दवा की खोज कर रहे थे. इस बीच वो कुछ दिनों के लिए छुट्टी पर चले गए लेकिन लैब की खिड़की बंद करना भूल गए. छुट्टी से जब वो वापस आए तो देखा कि उनकी एक्सपेरिमेंटल प्लेट पर धूल के साथ फंगस जम गया है. थोड़ा गौर करने पर पाया कि फंगस से एक तरह का जूस निकल रहा है. ये जूस आसपास के बैक्टीरिया को मार रहा था. यहां से फ्लेमिंग को आइडिया सूझा और वो खराश सही करने वाली दवा को छोड़ फंगस पर एक्सपेरिमेंट करना शुरू कर देिए. कुछ सालों बाद उन्होंने इस फंगस जूस को ‛पेनिसिलिन का नाम दिया. इस तरह दवाओं में क्रांति लाने वाले एंटीबायोटिक्स की खोज हुई.पेनिसिलिन की खोज ने इलाज के तौर-तरीके बदल दिए. तब से अब तक 100 से ज्यादा तरह की एंटीबायोटिक दवाएं बन चुकी हैं, जिनका इस्तेमाल अलग-अलग बीमारियों के इलाज में किया जाता है.

 

प्रोडक्शन क्यों बंद करना पड़ा?

एक जानकारी पेनिसिलिन के बारे में और, यह एक नैरो स्पेकट्रम एंटीबायोटिक है- यानी कुछ ही बीमारियों के लिए ही इस्तेमाल होती है. जैसे-सेफलिस, रुमैटिक हार्ट डिसीज, डेंगू आदी. कई सालों तक इस एंटीबायोटिक्स को पब्लिक सेक्टर कंपनी हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमीटेड यानी HAL बनाती थी. पर ग्रॉस मैनेजमेंट, करप्शन की वजह से धीरे धीरे भारत में प्रोडक्शन बंद हो गया. आज की डेट में 4 कंपनियां ही पेनिसिलिन का प्रोडक्शन करती है. इनमें से तीन तो चीन में ही स्थित है. ये हैं नॉर्थ चाइना फार्मास्युटिकल ग्रुप सेमीसिंटेक कंपनी लिमिटेड, सीएसपीसी फार्मास्यूटिकल्स ग्रुप लिमिटेड और जियांग्शी डोंगफेंग फार्मास्युटिकल कंपनी. चौथी कंपनी ऑस्ट्रिया में हैं जिसका नाम सैंडोज़ जीएमबीएच है.

सवाल है कि चाइना में ही मैन्युफैक्चरिंग अधिकतर क्यों होने लगी? इसके पीछे की वजह बताते हुए पब्लिक हेल्थ एक्टिविस्ट और द ट्रूथ पिल: द मिथ ऑफ ड्रग रेगुलेशन इन इंडिया के लेखक दिनेश एस ठाकुर कहते हैं कि,

”बाजार में पेनिसिलिन मंहगी नहीं बेची जाती है, चाइना में मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट बहुत कम होती है इसके चलते पेनिसिलिन के एक्टिव इंग्रेडियंट चाइना से खरीदी जाती है, लेकिन चाइना का दवाइयां बनाने का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है, कई नियम कायदों को तोड़ा गया . दवा पर प्रॉफिट कम मिलता है तो कंपनियां उत्पादन स्तर कम रखती हैं. दूसरी वजह थी पेनिसेलिन को बनाने का तरीका. इसे फरमेंटेशन के जरिए बनाया जाता है. HAL जब बनाती थी तब इसकी उपज 1 से 5 मिलीग्राम पर क्यूबिक डेसिमीटर हुआ करती थी. फिर एक समय ऐसा आया जब 10 से 15 गुना ज्यादा हो गई. यहां जरूरत थी पुरानी टेक्नोलॉजी को बदलने की लेकिन इतना ये आसान नहीं था क्योंकि निवेश की ज्यादा जरूरत थी”.

अब जब इस मेडिसिन की शॉर्टेज होने लगी तो डॉक्टर्स ने ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, जैसे एजीथ्रोमाइसिन जो सेक्शुअली ट्रांसमिटेड सिफलिस जैसी बीमारियों के इलाज में काम आती है. हालांकि एक समस्या ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स के साथ ये था कि अगर सिफिलिस जैसी बीमारियों के इनफेक्टेड एजेंट्स म्यूटेट करने लगे यानी अपना रूप बदलने लगे तो एजीथ्रोमाइसिन काम करना बंद कर देती है जिसके चलते एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस या कहीं कहां इसे एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस भी कहते हैं वो बढ़ने लगता है.

एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस क्या है?

अव्वल तो हम यह सुनते आए हैं बचपन से कि प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर यानी इलाज से बेहतर है एहतियात. हालांकि एंटीबायोटिक्स के केस में एक अजीब विडंबना दिखती है. बीमारी के बचाव पर इतना ध्यान दे दिया कि अब सूरत-ए-हाल यह है कि मरीजों का इलाज करना मुश्किल हो गया है. मरीजों पर अब ये दवाएं असर ही नहीं कर रही है. इसी कंडीशन को कहते हैं एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस. जब 1945 में फ्लेमिंग को इस खोज के लिए नोबेल पुरुस्कार मिला था तो उन्होंने दुनिया को इसके ज्यादा इस्तेमाल को लेकर चेतावनी भी दी थी. उन्होंने अपनी स्पीच में कहा था कि, ‘एक ऐसा समय आएगा जब पेनिसिलिन आम दुकानों में मिलेगी और इसे कोई भी खरीद सकेगा. समस्या ये होगी कि इंसान खुद को इसका ओवरडोज या अंडरडोज देगा. ऐसे में जीवाणुओं पर इसका असर होना बंद हो जाएगा.’ आज फ्लेमिंग की वो कही बात हकीकत बन चुकी है. इसे और विस्तार में समझते हैं…

2050 तक 10 लाख मौतों का अनुमान

पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट का मानना ​​है कि भारत में कई डॉक्टर बिना विचारे एंटीबायोटिक दवाइयां देते हैं. आप किसी भी दुकान पर जाइए केमिस्ट से लेकर डॉक्टर तक पर्ची पर एंटीबायोटिक्स खाने को कह देते हैं. उदाहरण के लिए, एंटीबायोटिक्स फ्लू या सामान्य सर्दी जैसी वायरल बीमारियों का इलाज नहीं कर सकते. अक्सर एंटीबायोटिक दवाई डेंगू और मलेरिया से पीड़ित मरीजों को दी जाती हैं. एंटीबायोटिक का इस्तेमाल बैक्टीरिया को मारने के लिए किया जाता है. लेकिन अगर आप बार बार एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करेंगे तो बैक्टीरिया उस दवा को समझ जाता है और उसके खिलाफ अपनी इम्युनिटी डेवलप कर लेता है. यानी खुद को और मजबूत बना लेता है. इसी कंडीशन को एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस कहते हैं. शॉर्ट फॉर्म- AMR.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2019 में एमआर को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए टॉप 10 खतरों में से एक में शामिल किया था. ये पब्लिक हेल्थ के लिए एक बढ़ता हुआ वैश्विक खतरा है. अनुमान है कि 2050 तक, इसके चलते 10 लाख मौतें हो सकती हैं. 2019 में दुनियाभर में 12 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई थी. साल 2021 में जब कोविड अपने पीक पर था तब उस वक्त 17,534 कोविड संक्रमित लोगों पर ICMR ने रिसर्च की थी. रिपोर्ट के मुताबिक आधे से ज्यादा ऐसे लोगों की मौत हो गयी जिन्हें एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस इंफेक्शन था. हैरत की बात है कि इतनी दिक्कतों के बाद भी जिन एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल सिर्फ बहुत गंभीर बीमारी के लिए किया जाना चाहिए भारत में उनका इस्तेमाल लगभग 75 फीसदी किया जाता है.

पेनिसिलिन की जरूरत क्यों है?

2015 में भारत में 1.19 लाख रुमैटिक हार्ट डिसीज के केसेस रिपोर्ट हुए. 73 फीसदी मौतें सिर्फ भारत में हुई. इसके बाद इंडोनेशिया, द डीआर कांगो, चाइना और पाकिस्तान थे. पेनिसिलिन दवाओं की कमी बरकार रही अगर तो मृत्यु दर बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता सिवाए पेनिसिलिन के क्योंकि जो अल्टरनेटिव दवाइयां मौजूद है वो लगातार इस्तेमाल होने की वजह से असर नहीं करती. उपर से महंगी होती है सो अलग. रुमैटिक हार्ट डिसीज के रिस्क पर ज्यादातर गरीब और बच्चे होते हैं. पेनिसिलिन इंजेक्शन 2 से 3 हफ्ते लगती है और सिर्फ इसकी कीमत 7 रूपए होती है लेकिन वहीं दूसरे विकल्प लोगों के पहुंच से बाहर है. हर दिन ये दवाएं लेनी पड़ती है और एक टैबलेट की कीमत 2 से 3 रूपए होती है,

दूसरी समस्या है सिफलिस की बीमारी जो सेक्शुअली ट्रांसमिट होती है. सिफलिस के लक्षण हर व्यक्ति में अलग अलग हो सकते हैं. ट्रेपोनेमा पैलीडम नाम का जो बैक्टीरिया शरीर में घुसता है वही सिफलिस की वजह बनता है. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीका ने अपने सैनिकों में सिफलिस की बीमारी को फैलते देख पेनिसिलिन की गोलियों के इलाज के तौर पर अपनाया. इससे सिफलिस की बीमारी पर काफी हद तक अंकुश लगा. इन गोलियों का असर ऐसा हुआ है कि 1947 से लेकर 1957 के बीच सिफलिस के मामले अमरीका में 95 फ़ीसदी कम हो गए. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 2020 में 7 लाख से अधिक वयस्कों को सिफलिस था. डब्ल्यूएचओ ने अनुमान लगाया था कि पेनिसिलिन का एक शॉट अगर समय से 2012 में 30 देशों के 53 हजार से ज्यादा शिशुओं को मिल जाता तो उन्हें बचाया जा सकता था. इतने बच्चों की सिफलिस की वजह से गर्भ में ही मौत हो गई थी.

चीन पर कम होगी निर्भरता

स्वास्थय मंत्री मनसुख मांडविया ने घोषणा कि अब आत्मनिर्भर भारत के तहत हम देश में ही पेनिसिलिन का प्रोडक्शन करेंगे. इसे PLI के तहत बनाया जाएगा. PLI का मतलब है- प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेन्टिव स्कीम. ये भारत सरकार की एक पहल है, जिसका मकसद विदेशी और देसी कंपनियों को देश में प्रोडक्शन बढ़ाने में मदद करना है. सरकार इसके तहत 4-6 फीसदी इन्सेन्टिव कंपनियों को देती है. मनसुख मांडविया ने कहा कि थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना से आयात निर्भरता कम होगी और सप्लाई चेन में लचीलापन आएगा. ब्रिटेन के स्कॉटलैंड में नेशनल हेल्थ सर्विस में काम करने वाले साइंटिस्ट डॉ. अविरल वत्स सरकार के इस फैसले को स्वागत योग्य बताते हैं.

”पेनिसिलिन जी हमारी नेशनल सिक्योरिटी के लिए काफी जरूरी है. इसके लिए हमें चाइना पर से निर्भरता कम करनी होगी. भारत को तीन काम करने की जरूरत होगी. पहला यह कि सरकार इस स्कीम की फंडिंग करते रहे ताकि समय के हिसाब से तकनीक में जिस भी तरह के बदलाव की जरूरत पड़े वो इसके प्रोडक्शन में बाधा न बने. दूसरा सरकार इसे बेसिक मिनिमम प्राइस के तहत के साथ इसे बनाए. नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग ऑथिरिटी को इस पर नजर बनाए रखें. तीसरा ये कि सरकार यह सुनिश्चित करें कि पब्लिक सेक्टर यूनिट्स फार्मा प्रोफेशनल्स ही बनाए न कि वो लोग जिन्हें दवाइयांबनाने का कोई अनुभव न हो. यह इसलिए जरूरी है ताकि हम वही गलतियां न दोहराए जो हमने 30 साल पहले की थी”.

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