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The News Air - NEWS-TICKER - जब सीएम के बेटे को निर्दलीय गनपत सहाय ने धूल चटा दी थी, नौटंकी से जुटाते थे भीड़

जब सीएम के बेटे को निर्दलीय गनपत सहाय ने धूल चटा दी थी, नौटंकी से जुटाते थे भीड़

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 1 अप्रैल 2024
in NEWS-TICKER, सियासत
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जब सीएम के बेटे को निर्दलीय गनपत सहाय ने धूल चटा दी थी, यूं जुटाई भीड़
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पंडित नेहरू का आभामंडल और कांग्रेस के वर्चस्व का दौर. प्रांत और केंद्र दोनों स्थानों पर कांग्रेस की सरकारें. सत्तादल का हाईप्रोफाइल प्रत्याशी. सरकार और पार्टी की साझा ताकत प्रत्याशी की जीत के लिए जुटी. लेकिन स्थानीय और बाहरी के मुद्दे ने ऐसा जोर पकड़ा कि निर्दलीय प्रत्याशी बाबू गनपत सहाय के मुकाबले कृष्णचंद्र पंत को शिकस्त का सामना करना पड़ा. यह 1961 का सुल्तानपुर संसदीय सीट का उपचुनाव था.

1951-52 के पहले आमचुनाव में सुल्तानपुर संसदीय सीट से इलाहाबाद के एडवोकेट मोहम्मद अहमद काजमी को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया था. वे जीते भी थे. 1957 में कांग्रेस ने एक बार फिर बाहरी प्रत्याशी को तरजीह दी. इस बार पंडित मदन मोहन मालवीय के पुत्र गोविंद मालवीय को अवसर मिला. वाराणसी निवासी गोविंद के बारे में बताया जाता है कि यद्यपि वे सुल्तानपुर से सांसद चुने गए थे लेकिन सांसद रहते उनकी कोशिश से डीजल लोकोमेटिव कारखाना वाराणसी में स्थापित हुआ था. आगे पार्टी प्रत्याशी को इससे नुकसान हुआ.

बाहरी प्रत्याशी थोपे जाने से थी नाराजगी

जिले की दूसरी अमेठी लोकसभा सीट पहले आम चुनाव में सुल्तानपुर (दक्षिणी) और दूसरे चुनाव में मुसाफिर खाना नाम से थी. इन दोनों ही चुनावों में कांग्रेस ने महाराष्ट्रवासी बालकृष्ण विश्वनाथ केसकर को प्रत्याशी बनाया. जीतने के बाद केसकर केंद्र में सूचना-प्रसारण मंत्री भी बने. कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के एक हिस्से और वोटरों के बीच भी बार-बार बाहरी प्रत्याशी थोपे जाने के कारण असंतोष था.

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के. सी. पंत का वो पहला चुनाव

सुल्तानपुर के सांसद गोविंद मालवीय की असामयिक मृत्यु के कारण 1961 में उपचुनाव हुआ. उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और बाद में केंद्र में गृहमंत्री रहे पंडित गोविंद बल्लभ पंत का इस उपचुनाव के पूर्व निधन हो चुका था. पंडित नेहरू की पहल पर स्व. पंत के पुत्र कृष्णचंद्र पंत की संसदीय राजनीति में लॉन्चिंग के लिए सुल्तानपुर से उन्हें उम्मीदवार बनाया गया. एक बार फिर बाहरी प्रत्याशी को मौका दिए जाने के कारण स्थानीय कांग्रेसियों की नाराजगी सार्वजनिक होने लगी. बाबू गनपत सहाय ने इसकी अगुवाई की और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मुकाबले में सामने आ गए.

गनपत सहाय की थी जमीनी पकड़

बाबू गनपत सहाय एक मशहूर वकील थे. स्वतंत्रता संघर्ष में उन्होंने जेल यात्राएं की थीं. सुल्तानपुर जिला कांग्रेस कमेटी के वे प्रथम अध्यक्ष थे. जिला परिषद और नगर पालिका का भी अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने नेतृत्व किया. कांग्रेस से उनका जुड़ाव काफी पुराना था. एक काबिल वकील के तौर पर उनकी बड़ी ख्याति थी. शहरी ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी उनकी जमीनी पकड़ थी. उनके स्थानीय संपर्कों ने प्रचार में बड़ी भूमिका निभाई.

कांग्रेस की ओर से तमाम बड़े नेताओं की सभाओं की धूम थी. इन सभाओं में सुल्तानपुर के विकास को लेकर लम्बे -चौड़े वादे किए गए. इस बात पर काफी जोर था कि जिसकी सरकार होगी वही क्षेत्र के लिए कुछ कर सकेगा. बाबू गनपत सहाय के सामने सत्ता की ताकत के मुकाबले की बड़ी चुनौती थी.

सी.बी.गुप्त की प्रतिष्ठा का चुनाव

चंद्रभानु गुप्त उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. पार्टी के उम्मीदवार कृष्णचंद्र पंत की जीत सुनिश्चित करने की उनकी सीधी जिम्मेदारी थी. सरकार और संगठन के स्तर पर कोई कसर नहीं छोड़ी गई. असंतुष्ट कांग्रेसियों को संतुष्ट करने और वोटरों को लुभाने के भी खूब प्रयास हुए. मुख्यमंत्री, मंत्रियों और कांग्रेस के अन्य नेताओं की सभाओं में अच्छी भीड़ जुट रही थी. प्रतिद्वंदी निर्दलीय प्रत्याशी बाबू गनपत सहाय की ओर से भीड़ जुटाऊ नेता तो नहीं थे लेकिन इसकी काट के लिए उन्होंने दूसरा नुस्खा आजमाया.

अनेक गांवों में उन्होंने नौटंकी के आयोजन कराए. उन दिनों मनोरंजन के साधन सीमित थे. किसी गांव में नौटंकी की खबर मिलते ही पास-पड़ोस के अनेक गांवों की आबादी उसमें उमड़ती थी और पूरी रात इसका आनंद लेती थी. नौटंकी के ये कलाकार नाटक-प्रहसन के दौरान बाबू गनपत सहाय का प्रचार भी करते और कांग्रेस प्रत्याशी पर खूब कटाक्ष भी होते थे.

पंत की हार, बाहरी उम्मीदवार से कांग्रेस की तौबा

स्थानीय और बाहरी उम्मीदवार के मुद्दे ने चुनाव नतीजे में निर्णायक भूमिका निभाई. कड़े मुकाबले के इस चुनाव में बाबू गनपत सहाय को 37,785 और पंत जी को 36,656 वोट प्राप्त हुए थे. इस उपचुनाव में बाहरी प्रत्याशी की पराजय ने कांग्रेस नेतृत्व को बड़ी सीख दी. बाद के कई चुनावों में पार्टी ने जिले की दोनों सीटों से बाहरी उम्मीदवारों से तौबा की.

अगले 1962 के आम चुनाव में सुल्तानपुर से बाबू गनपत सहाय के पुत्र कुंवर कृष्ण वर्मा और मुसाफिरखाना (अमेठी) में अमेठी के राजा रणंजय सिंह को उम्मीदवार बनाया. कुंवर कृष्ण वर्मा की उम्मीदवारी का कारण था कि उपचुनाव में बाबू गनपत सहाय की बगावत के कारण पार्टी तत्काल बाद के चुनाव में सीधे उन्हें प्रत्याशी नहीं बनाना चाहती थी.

हालांकि पार्टी ने 1967 में बाबू गनपत सहाय को फिर उम्मीदवार बनाया और वे विजयी रहे. उधर, अमेठी में गांधी परिवार से जुड़ाव के पहले 1971 तक स्थानीय प्रत्याशियों को ही मौका मिलता रहा.

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