US Iran War का एक महीना पूरा होने को है और नतीजे हर किसी को चौंका रहे हैं, खासकर खुद अमेरिका को। 28 फरवरी को जब अमेरिका ने ईरान पर सर्जिकल स्ट्राइक की और आयतुल्लाह खामेनेई समेत 40 शीर्ष नेताओं को मार गिराया, तो दुनिया को लगा कि ईरान की कहानी यहीं खत्म हो जाएगी। सड़कों पर क्रांति आएगी, सत्ता पलट होगी और डोनल्ड ट्रंप खुद को विजेता घोषित कर देंगे। लेकिन 28 मार्च आते-आते कहानी पूरी तरह पलट चुकी है।
आज की तारीख में अमेरिका को पीछे धकेल दिया गया है। ईरान तय कर रहा है कि युद्ध होगा या नहीं, सीजफायर होगा या नहीं। एक लंबे युद्ध की तैयारी साफ दिख रही है और ट्रंप को बूट्स ऑन द ग्राउंड यानी अपने सैनिकों को जमीन पर उतारने की जरूरत महसूस हो रही है।
क्या ईरान जीत सकता है यह युद्ध?
एक महीने पहले यह सवाल मजाक लगता, लेकिन अब यह सवाल पूछना जरूरी हो गया है कि क्या ईरान इस US Iran War को जीत सकता है? जीत का मतलब यह नहीं कि मुजतबा खामेनेई वॉशिंगटन डीसी में ईरान का परचम लहराएंगे। जीत का मतलब है कि ईरान की कुछ लीडरशिप सुरक्षित बच जाए, उसका कमांड एंड कंट्रोल स्ट्रक्चर बना रहे, वो अपने बैलिस्टिक मिसाइल स्टॉकपाइल को जब चाहे इस्तेमाल कर सके, जहां चाहे हमला कर सके और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को कंट्रोल करके ग्लोबल इकॉनमी को अपनी मर्जी से चोक कर सके।
अगर इसी पैमाने पर देखें तो ईरान इस वक्त तकनीकी रूप से यह युद्ध जीत रहा है। वो अमेरिका को डिक्टेट कर रहा है और ट्रंप बेबसी में कभी सीजफायर का ऑफर दे रहे हैं, कभी धमकी दे रहे हैं और कभी बिल्कुल भ्रमित बातें कर रहे हैं।
ट्रंप का 15 पॉइंट पीस प्रपोजल रिजेक्ट, कोई बातचीत नहीं
पिछले 24 से 48 घंटों में स्थिति और भी बदल गई है। ईरान ने ट्रंप के 15 पॉइंट पीस प्रपोजल को सिरे से खारिज कर दिया है। न कोई बातचीत हो रही है, न कोई डायलॉग चल रहा है। भारतीय मीडिया में इस मसले पर काफी कवरेज हुई थी लेकिन हकीकत यह है कि ईरान इस वक्त ट्रंप को गंभीरता से ले ही नहीं रहा है।
इस बीच भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी कहा कि भारत मीडिएशन नहीं कराएगा, जबकि पिछले साल तक भारत यही कह रहा था कि वही एक देश है जो यूक्रेन, रूस, इजराइल और ईरान सबसे बातचीत कर सकता है।
IRGC की खुली धमकी: UAE और बहरेन के होटलों पर हमले की चेतावनी
ईरान ने अमेरिका की बूट्स ऑन द ग्राउंड स्ट्रैटेजी सुनकर सीधे तौर पर यूएई को निशाने पर ले लिया है। ईरान ने साफ कह दिया है कि अगर अमेरिका ने जमीनी हमला किया तो वो यूएई पर धावा बोल देगा, उसे कैप्चर कर लेगा और जो भी देश अमेरिका के ग्राउंड इन्वेजन को सपोर्ट करेगा उस पर हमला कर देगा।
IRGC ने एक खुली धमकी दी है कि आने वाले घंटों में वो यूनाइटेड अरब एमिरेट्स, बहरेन और दमिश्क में उन होटलों पर हमला करेगा जहां अमेरिकी सैनिक छुपे हुए हैं। दरअसल ईरान ने पहले ही गल्फ में 13 अमेरिकी सैन्य अड्डों को नष्ट कर दिया है। वहां अमेरिकी सैनिक न रह सकते हैं, न काम कर सकते हैं। जो बचे हुए सैनिक हैं वो सिविलियन इलाकों और होटलों में छुपे हुए हैं। तकनीकी रूप से देखें तो अमेरिकी सैनिक अरब की नागरिक आबादी को ह्यूमन शील्ड की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
ईरान ने 10 लाख लड़ाकों को किया मोबिलाइज
US Iran War के एक महीने के भीतर ईरान ने युद्ध के दायरे को काफी बढ़ा दिया है। IRGC ने 10 लाख से ज्यादा लड़ाकों को मोबिलाइज किया है और यहां तक कि 12 साल के बच्चों को भी युद्ध में शामिल होने की अनुमति दे दी है। इस फैसले पर बहस हो सकती है कि यह सही है या गलत, लेकिन इजराइल जो लेबनान और गाजा में कर रहा है उसके सामने अच्छे-बुरे की सीमा रेखा पहले ही धुंधली हो चुकी है।
उधर IDF के चीफ ने खुद स्वीकार किया है कि इजराइल की सेना कोलैप्स कर सकती है क्योंकि उसके पास मैनपावर की भारी कमी हो रही है। दुनिया की सबसे ताकतवर मानी जाने वाली जेनोसाइड मशीनरी खुद को ओवरस्ट्रेच्ड महसूस कर रही है।
ट्रंप ने एनर्जी प्लांट पर बमबारी का प्लान 10 दिन के लिए टाला
पेंटागन 10,000 सैनिकों को ईरान भेजने पर विचार कर रहा है लेकिन अमेरिका रुक रहा है, सोच रहा है। बूट्स ऑन द ग्राउंड डालने से पहले शायद वो इतिहास को देख रहा है कि कहीं वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान जैसा हाल फिर से न हो जाए।
इसीलिए ट्रंप ने ईरान के एनर्जी प्लांट पर बम गिराने का जो प्लान था उसे 10 दिन के लिए टाल दिया है। नई डेडलाइन 6 अप्रैल तय की गई है। ट्रंप कह रहे हैं कि ईरान ने उनसे भीख मांगी है जबकि ईरान का जवाब है कि उसने कोई पॉज नहीं मांगा है। ईरान कह रहा है: “Come to Iran, Habibi”। उधर हूती भी कह रहे हैं कि वो रेड सी को ब्लॉक करने के लिए तैयार हैं।
अमेरिका हारा तो क्या होगा? छह बड़े खतरे जो बदल देंगे दुनिया का नक्शा
अगर ईरान इसी तरह अपनी पोजीशन बनाए रखता है और अमेरिका इस होल्ड को नहीं तोड़ पाता तो अमेरिका के भविष्य और उसकी ग्लोबल इमेज पर गहरा असर पड़ेगा। यह US Iran War सिर्फ स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खोलने की बात नहीं है, इसका दायरा बहुत बड़ा है:
पहला खतरा: पेट्रो डॉलर का क्षरण। जब ऑयल प्राइस इतनी अस्थिर होंगी और अमेरिका पर भरोसा कम होगा तो गल्फ देश अपनी सुरक्षा गारंटी के लिए रूस और चीन से बात करेंगे। सऊदी अरब चीन को युआन में तेल बेचना शुरू कर देगा। धीरे-धीरे अमेरिका की 1970 से चली आ रही वित्तीय सर्वोच्चता और डॉलर की वर्चस्वता खत्म होने लगेगी।
दूसरा खतरा: गल्फ सहयोगियों का भरोसा टूटना। गल्फ देशों को समझ आ चुका है कि अमेरिका पर अपनी सुरक्षा के लिए निर्भर नहीं रहा जा सकता। सऊदी अरब, यूएई और बाकी देश वॉशिंगटन से ध्यान हटाकर चीन और रूस से सुरक्षा की मांग करेंगे। इससे अमेरिका को गल्फ से धीरे-धीरे बाहर खदेड़ दिया जाएगा।
तीसरा खतरा: न्यूक्लियर प्रसार का संकट। ईरान अपने न्यूक्लियर रिकंस्ट्रक्शन को तेज करेगा। उसके पास पहले से ही इनरिच्ड यूरेनियम है जिसे ट्रंप नष्ट नहीं कर पाए हैं। इसे देखकर तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब भी कहेंगे कि उनके पास भी न्यूक्लियर विकल्प होना चाहिए। जो नॉन प्रोलिफरेशन रिजीम इतने सालों तक न्यूक्लियर हथियारों के प्रसार को रोके रखा, वो और कमजोर हो जाएगा। यह इजराइल के लिए सबसे बड़ा दुःस्वप्न है क्योंकि उसने हमेशा यही माना कि सिर्फ उसी के पास न्यूक्लियर हथियार हो सकते हैं।
चौथा खतरा: प्रॉक्सी नेटवर्क की वापसी। हिजबुल्लाह, हूती, हमास और इराक की मिलिशिया सब और भी ज्यादा ताकत से वापस आएंगे। चीन और रूस इन्हें हथियार भी सप्लाई कर देंगे। इसका मतलब है कि अमेरिकी संपत्तियों, इजराइली ठिकानों और ग्लोबल शिपिंग पर अनिश्चितकालीन छोटे-मोटे हमले चलते रहेंगे।
पांचवां खतरा: स्ट्रैटेजिक डिस्ट्रैक्शन। अगर अमेरिका इस युद्ध में फंसा रहा तो चीन पैसिफिक में अपना दबदबा कायम करेगा। बीजिंग बैठकर नोट्स ले रहा है कि अमेरिकी ताकत कितनी खिंची हुई है। एक लॉन्ड्री रूम में आग लगने से अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर वापस लौट रहा है, तो अमेरिकी शक्ति और अजेयता कितनी बड़ी दिखावा है यह चीन और रूस दोनों समझ रहे हैं। जापान, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया जैसे इंडो-पैसिफिक देश जो अमेरिका पर सुरक्षा के लिए निर्भर थे उन्हें अब कहीं और देखना पड़ेगा।
छठा खतरा: अमेरिकी घरेलू मोर्चे पर तूफान। अमेरिका में पेट्रोल के दाम पहले से बढ़ रहे हैं। अगर बूट्स ऑन द ग्राउंड किए गए तो सैनिकों की मौतें तय हैं। इससे अमेरिकी जनता और ज्यादा ट्रंप विरोधी हो जाएगी। मिडटर्म इलेक्शन में डेमोक्रेट्स ज्यादा ताकतवर हो सकते हैं, कांग्रेस फंडिंग काट सकती है और जैसा वियतनाम और अफगानिस्तान में हुआ था, अमेरिका को जबरन वापसी करनी पड़ सकती है।
ईरान की जमीन अमेरिका के लिए क्यों है मौत का जाल?
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेक्सेथ ने खुद कहा है कि यह युद्ध न इराक है न अफगानिस्तान और लंबे समय तक ईरान में रहने का कोई एजेंडा नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि ईरान की भौगोलिक स्थिति किसी भी जमीनी हमले को बेहद खतरनाक बना देती है।
ईरान इराक से चार गुना बड़ा देश है जहां 8 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। ज़ाग्रोस और अल्बुर्ज पर्वत श्रृंखलाएं देश के 50 प्रतिशत हिस्से को कवर करती हैं जो प्राकृतिक किल ज़ोन और चोक पॉइंट्स बनाती हैं। ईरान के शहर और न्यूक्लियर साइट्स देश के अंदरूनी हिस्सों में हैं जिन्हें यही पहाड़ी इलाका सुरक्षा देता है। अगर अमेरिकी सेना को जमीनी स्तर पर अंदर घुसना होगा तो उन्हें पूर्वनिर्धारित बॉटलनेक से गुजरना पड़ेगा और इन्हीं बॉटलनेक पर उन्हें मार गिराया जाएगा। यही समस्या 1980 में इराक को झेलनी पड़ी थी और 2000 साल पहले रोमन सेनाओं को भी।
अमेरिकी रणनीतिकार यह बात जानते हैं कि इराक की तरह यहां सपाट रेगिस्तान नहीं है। यह एक पहाड़ी-रेगिस्तानी हाइब्रिड नरक है।
खर्ग आइलैंड पर कब्जे का प्लान भी उतना आसान नहीं
अमेरिका की एक योजना यह भी है कि खर्ग आइलैंड को कंट्रोल कर लिया जाए और ईरान से ब्लैकमेल किया जाए कि जब तक हॉर्मुज नहीं खोलोगे तब तक हम यह द्वीप नहीं छोड़ेंगे। लेकिन यह सोचने में जितना आसान लगता है, लॉजिस्टिक रूप से उतना ही भयानक है।
एलीट यूनिट्स, मरीन्स, 82nd एयरबोर्न, स्पेशल फोर्सेज भेजे जा सकते हैं लेकिन इनका काम रेड करना होता है। अगर ईरान के अंदर लंबे समय तक बैठे रहना है तो एक मजबूत और लंबी सप्लाई सपोर्ट लाइन चाहिए। लेकिन ईरान ने साफ कर दिया है कि जिस देश से अमेरिका सप्लाई लाइन बनाएगा, ईरान उस देश पर ही हमला बोल देगा।
IRGC की मोज़ेक डॉक्ट्रिन: 40 साल से इसी दिन की तैयारी
IRGC की जो मोज़ेक डॉक्ट्रिन है वो इस युद्ध को अमेरिका के लिए और भी खतरनाक बनाती है। इसमें स्वतंत्र कमांड कंट्रोल स्ट्रक्चर है। प्रांतीय स्तर पर सबको खुली आजादी है कि जो सही समझो वो करो। कोई आदेश तेहरान से नहीं आएगा, जैसा स्थानीय कमांडर सही समझेगा वैसा करेगा। यह इराक की तरह ढहने वाली सेना नहीं है। यह ईरान की सेना है जिसने 40 साल से इसी दिन की तैयारी की है। ईरान-इराक युद्ध, सीरिया युद्ध और इराक की प्रॉक्सी जंगों से इन्होंने सीखा है।
इसीलिए ट्रंप जो लिमिटेड ग्राउंड प्रेजेंस की बात सोच रहे हैं वो गुरिल्ला वॉरफेयर के सामने बुरी तरह मात खाएगी। यह स्थिति वियतनाम और अफगानिस्तान से चार गुना ज्यादा जटिल है और चार गुना ज्यादा जानें जा सकती हैं। IRGC के कमांडर खुलेआम कह रहे हैं कि वो ईरान को अमेरिकियों के लिए कब्रगाह बनाकर रखेंगे।
याद रखिए कि ईरान को इस युद्ध को जीतने की जरूरत नहीं है। उसे बस अमेरिका पर इतनी भारी कीमत थोपनी है कि वो वापसी को मजबूर हो जाए। हॉर्मुज पर माइन बिछा दो, अमेरिकी बेस पर हिट एंड रन अटैक कर दो, प्रॉक्सी स्ट्राइक कर दो और स्पेशल फोर्सेज के कुछ सैनिकों को भी अगर मार दिया तो अमेरिका में हाहाकार मच जाएगा।
नेतन्याहू ने ट्रंप को बनाया पोपट, दोनों के मकसद अलग
इस US Iran War में एक बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि इजराइल और अमेरिका के मकसद अलग-अलग हैं। बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप को बड़े-बड़े सपने दिखाए कि सत्ता पलट हो जाएगी लेकिन वो हुआ नहीं। अब इजराइल कह रहा है कि वो रुकने वाला नहीं क्योंकि उसके लिए यह अस्तित्व का सवाल है। इजराइल जानता है कि अगर ईरान इस बार बच गया तो उसका जीना दुश्वार हो जाएगा।
इसीलिए इजराइल युद्ध को खींचने पर आमादा है और ट्रंप फंस चुके हैं। अगर पीछे हटें तो अमेरिका की पूरी इमेज और वर्चस्वता खत्म हो जाएगी। इसके लिए अगर अमेरिकी सैनिकों को मरना भी पड़े तो ट्रंप को यह मंजूर है।
रूस मुस्कुरा रहा है, चीन नोट्स ले रहा है, भारत को तैयार रहना होगा
इस पूरे संकट में रूस बैठकर मुस्कुरा रहा है। उसका ऑयल रेवेन्यू एक महीने के अंदर दोगुना होकर 24 बिलियन डॉलर हो गया है। चीन चुपचाप बैठकर नोट्स ले रहा है कि अमेरिका की असली क्षमता कितनी है ताकि जब ताइवान पर कब्जे का समय आए तो अमेरिका कुछ न कर सके।
भारत में भी तैयारी हो रही है एक बड़े ऑयल प्राइस हाइक के लिए। फिलहाल सरकार ने तेल पर ड्यूटी कम की है जिससे पेट्रोल पंप पर दाम स्थिर हैं, लेकिन चुनाव के बाद क्या होगा यह किसी को नहीं पता। US Iran War के धमाके पूरी दुनिया महसूस कर रही है। ऑयल की कीमतें, कच्चे माल की कमी, सप्लाई चेन टूट रहे हैं, कंपनियां एक देश से दूसरे देश भाग रही हैं।
अफगानिस्तान की गलती ईरान में दोहराने को तैयार नहीं अमेरिका
अफगानिस्तान को साम्राज्यों का कब्रिस्तान कहा जाता है। अंग्रेज आए, रूस ने कोशिश की, अमेरिका ने 20 साल कोशिश की। सबने सोचा कि कंट्रोल कर लेंगे, डेमोक्रेसी ला देंगे। लेकिन अफगान लोगों ने कहा कि मर जाएंगे लेकिन अपने ऊपर किसी को बैठने नहीं देंगे। आखिरकार अमेरिका को भी जाना पड़ा।
अब ईरान भी अमेरिकी साम्राज्य का कब्रिस्तान साबित हो सकता है। यही वजह है कि ट्रंप सोच रहे हैं, रुक रहे हैं, रीथिंक कर रहे हैं और रीइंफोर्समेंट्स मंगवा रहे हैं। 40,000 फीट की ऊंचाई से बम गिराना आसान है लेकिन सैनिकों को जमीन पर उतारना बिल्कुल अलग खेल है।
एक महीने बाद भी युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा
एक महीने बाद भी यह US Iran War खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। बल्कि यह एक और भीषण चरण में जाता दिख रहा है। ट्रंप का अमेरिका फर्स्ट एजेंडा इसी युद्ध की वजह से पटरी से उतर सकता है। ग्लोबल क्रेडिबिलिटी का सवाल सबसे बड़ा है। अमेरिका ने एक धारणा बनाई है कि वो दुनिया का यूनिपोलर बादशाह है लेकिन इस युद्ध ने दिखा दिया है कि वो कितना ओवरस्ट्रेच्ड है, कितनी तेजी से उसका पतन हो रहा है और उसके पास हथियार उतने नहीं थे जितनी हेकड़ी थी।
चीन, रूस और उत्तर कोरिया देख रहे हैं कि अमेरिका अजेय नहीं है। उसे आर्थिक रूप से भी कसा जा सकता है और सैन्य रूप से भी चुनौती दी जा सकती है। इस युद्ध का नतीजा जो भी हो, दुनिया का पावर इक्वेशन पूरी तरह बदलने वाला है।
मुख्य बातें (Key Points)
- US Iran War को एक महीना पूरा होने को है लेकिन अमेरिका ईरान को हराने में नाकाम रहा है, उलटे ईरान अमेरिका को डिक्टेट कर रहा है।
- ईरान ने ट्रंप के 15 पॉइंट पीस प्रपोजल को रिजेक्ट कर दिया है और IRGC ने UAE-बहरेन के होटलों पर हमले की खुली धमकी दी है।
- अगर ईरान इस युद्ध में टिका रहा तो पेट्रो डॉलर का क्षरण, न्यूक्लियर प्रसार, गल्फ सहयोगियों का भरोसा टूटना और अमेरिकी वर्चस्वता का पतन तय है।
- ईरान की पहाड़ी भौगोलिक स्थिति, IRGC की मोज़ेक डॉक्ट्रिन और 10 लाख मोबिलाइज्ड लड़ाके किसी भी अमेरिकी जमीनी हमले को मौत का जाल बना सकते हैं।







