इस बेटी ने बनाई ब्रेस्ट कैंसर वैक्सीन, ड्रग सेक्टर में कुछ नया करने का इरादा


The News Air – अमेरिका में ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के लिए वैक्सीन तैयार करने वाली टीम में अजमेर की बेटी डॉ. छवि जैन भी शामिल रहीं। इस वैक्सीन का जानवरों पर सफल ट्रायल होने के बाद अब महिलाओं पर क्लिनिकल ट्रायल शुरू किया गया है। इससे लाइलाज ब्रेस्ट कैंसर के इलाज की उम्मीद जगी है। छवि की कहानी अनोखी है।

छवि की मां का कहना है कि बेटी को कभी पढ़ते नहीं देखा, लेकिन जब भी सवाल पूछा तो सही जवाब दिया। हम भी हैरान हो जाते थे। छवि ख़ुद कहती हैं कि देर तक पढ़ाई मैंने कभी नहीं किया, लेकिन लर्निंग पावर अच्छा था। अमेरिका में रह रही अजमेर की इस बेटी की सफलता की कहानी, उसी की ज़ुबानी…

अजमेर के जवाहर लाल नेहरू हॉस्पिटल में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. संजीव जैन मेरे पिता हैं। मेरी मां डॉ. नीना जैन भी इसी हॉस्पिटल में हैं। वह एनिस्थिया विभाग में सीनियर प्रोफेसर और पूर्व HOD हैं। मेरी शुरुआती पढ़ाई सोफिया एंड मयूर स्कूल में हुई। इसके बाद पुणे के इंस्टीट्यूट ऑफ़ बायो इंफॉर्मेटिक्स एंड बायो टेक्नोलॉजी से एम.टेक और स्विटजरलैंड की स्विस फैडरल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलोजी (EPFL) यूनिवर्सिटी से PhD की डिग्री ली।

फ़िलहाल मैं अमेरिका के लर्नर इंस्टीट्यूट क्लीवलैंड क्लीनिक में हूं। यहां डॉ. थामस बड और डॉ. विनसेंट टूही की रिसर्च पर आधारित कैंसर वैक्सीन की ट्रायल टीम में मैं शामिल रही। वर्तमान में वह अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की फीमेल रिसर्चर एम्बेसेडर भी हैं।

लर्निंग पावर अच्छा है

मेरा लर्निंग पावर अच्छा था। एक बार पढ़ने से ही कोई भी चीज़ अच्छी तरह याद हो जाती थी। मेरी छोटी बहन ज़्यादा पढ़ती थी। मम्मी-पापा उससे मेरी तुलना करते होंगे। पढ़ती तो मैं भी थी, लेकिन उसके जितना नहीं। इसका कारण केवल इतना था कि एक जगह ज़्यादा देर बैठकर पढ़ना मुझे अच्छा नहीं लगता था।

पहले इंज़ीनियर बनने की इच्छा थी

मेरे कजिन इंजीनियर थे और मैं भी इंजीनियर बनना चाहती थी। मयूर स्कूल में 11वीं में मैथ्स सब्जेक्ट लिया। कुछ ही दिनों बाद बॉयो पढ़ने की इच्छा हुई तो स्कूल प्रबन्ध से इजाज़त लेकर एक दिन के लिए बायो की क्लास अटेंड की। वहाँ बहुत अच्छा लगा और सब्जेक्ट में रुचि भी बढ़ी। फिर रिक्वेस्ट करके मैथ्स के साथ बायो भी ले लिया। छुट्टियों में इंजीनियरिंग की कोचिंग शुरू की, लेकिन कुछ ही दिनों में मन बदल गया।

मेडिकल की कोचिंग जॉइन कर ली। उस वक़्त भी MBBS कर फिजिशियन बनने की इच्छा थी। बाद में पापा-मम्मी ने प्रोत्साहित किया कि मैं सेल एंड जीन थैरेपी में रिसर्च करूं और इस फ़ील्ड में आ गई। आज जो भी हूं वो पेरेंट्स के मोटिवेशन का रिजल्ट है।

ड्रग सेक्टर में कुछ नया करने का इरादा

आज-कल नई-नई बीमारियां आ रही हैं। ऐसे में ड्रग सेक्टर में ही कुछ नया करने का इरादा है। फ़िलहाल इंडिया आने का मन भी नहीं है और ऐसी परिस्थिति भी नहीं है। भविष्य में जरुर सोच सकती हूं कि भारत में आकर कुछ करूं।

अवार्ड भी अपने नाम किए

मेरे शानदार काम के लिए क्लीवलैंड क्लिनिक के शीर्ष नेतृत्व की ओर से एप्रीसिएशन एंड एक्सीलेंस अवार्ड और एम्प्लॉई ऑफ़ द क्वार्टर अवार्ड दिया गया। केस वेस्टर्न रिज़र्व यूनिवर्सिटी से फेलोशिप भी हासिल हुई। मुझे फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से मनुष्यों पर पहले अध्ययन की मंजूरी हासिल कराने में सफलता मिली है।

इससे पहले बचपन से छवि ने हर एक्टिविटीज में हमेशा अच्छा किया और स्कूल, कॉलेज लेवल पर कई अवार्ड जीते। वर्तमान में वह अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की फीमेल रिसर्चर एम्बेसेडर भी हैं।

शुरू से ही होशियार, लेकिन पढ़ाई करते कभी नहीं देखा

डॉ. छवि जैन की मां नीना जैन ने बताया कि बेटी पढ़ाई करती हुए कम ही दिखती थी, लेकिन होशियार थी। उन्होंने बताया कि छवि को जब भी वे पढ़ाई के लिए बोलतीं तो वह कहती थी कि आप तो कुछ भी पूछ लो। जब उससे पूछा जाता तो वह हर सवाल का सही जवाब देती।

नीना ने बताया कि छवि स्कूल और क्लास में हमेशा टॉपर रही, लेकिन आज तक हम हैरान हैं कि वह पढ़ती कब थी। इसके बारे में पूछे जाने पर उसका कहना था कि वह स्कूल में ही पूरा ध्यान लगाकर पढ़ती है। सब कुछ उसे एक ही बार में याद हो जाता है।

PhD के दौरान लैब भी चेंज की

डॉ. नीना जैन बताती हैं कि छवि 2010 में PhD के लिए स्विटजरलैंड गई। इसके बाद 2016 में उसकी शादी जबलपुर में हुई। छवि के पति डॉ. प्रांतेश जैन भी अमेरिका में डॉक्टर हैं। उसके बाद छवि भी वहीं सेटल हो गई। स्विटजरलैंड में PhD करते हुए उसने लैब चेंज किया। माना जाता है कि दूसरी लैब मिलना मुश्किल होता है, लेकिन उसकी मेहनत और पढ़ाई को देखते हुए दूसरी अच्छी लैब उसे मिल गई।

देखेंगे साइड इफेक्ट

वैक्सीन के जानवरों पर सफल ट्रायल के बाद अब मनुष्य पर इसका परीक्षण किया जा रहा है। क्लिनिकल ट्रायल के पहले चरण में ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर से प्रभावित 18-24 वर्ष की महिलाओं में दो सप्ताह के अंतर से तीन डोज़ दी जाएंगी। यह वैक्सीन अल्फा लेक्टलब्यूमिन नामक ब्रेस्ट कैंसर प्रोटीन पर प्रहार करती है।

ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर के 70% मामलों मे यह प्रोटीन बनाती है। टीम महिलाओं पर वैक्सीन के साइड इफेक्ट के साथ देखेगी कि क्या कैंसर के ख़िलाफ़ उनमें कोई प्रतिरोधक क्षमता बनी है।

अभी तक नहीं कोई कारगर इलाज

ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर की आशंका भारतीय महिलाओं में ज़्यादा है। इसकी मुख्य वजह जलवायु, जीवन शैली, मोटापा, कुपोषण और जेनेटिक परिवर्तन है। इसके लिए अभी तक कोई कारगर इलाज नहीं है। छवि की मा का कहना है कि ब्रेस्ट कैंसर तो कॉमन है, लेकिन जो ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर है, इसके केस भारत में भी बहुत हैं।


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