पद्म पुरस्कार से सम्मानित हुए धरती के योद्धा; किसी ने जंगल उगाए, तो किसी ने फल बेचकर स्कूल बनवाया

सोमवार यानी 8 नवंबर को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्म पुरस्कार प्रदान किए। कुल 119 लोगों को ये पुरस्कार दिए गए। 10 लोगों को पद्म भूषण, 7 को पद्म विभूषण और 102 लोगों को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। सम्मान पाने वाले कुल 119 लोगों में 29 महिलाएं और एक ट्रांसजेडर भी शामिल है।

एक्ट्रेस कंगना रनोट, सिंगर अदनान सामी, स्पोर्ट्स पर्सनैलिटी पीवी सिंधु और मेरी कॉम, बिजनेसमैन आनंद महिंद्रा, शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र उन नामों में आते हैं जिनसे हर कोई वाकिफ है। इनकी उपलब्धियां सबको पता है; लेकिन कल कुछ ऐसे चेहरे और तस्वीरें लोगों के सामने आईं, जिन्हें कल से पहले शायद ही कोई जानता होगा, लेकिन आज ये शक्ति, सम्मान और नए भारत की तस्वीर बन गई हैं।

आइए आपको ऐसे ही पांच योद्धाओं के बारे में बताते हैं-

तुलसी गौड़ा: पद्मश्री

नंगे पैर खड़ीं कर्नाटक की 72 वर्षीय आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा की ये तस्वीर 1000 शब्दों के आगे भारी है। उन्हें कल पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वे कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन पौधों और जड़ी-बूटियों के ज्ञान के चलते उन्हें इन्साइक्लोपीडिया ऑफ फॉरेस्ट कहा जाता है।

नंगे पैर खड़ीं कर्नाटक की 72 वर्षीय आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा की ये तस्वीर 1000 शब्दों के आगे भारी है। उन्हें कल पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वे कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन पौधों और जड़ी-बूटियों के ज्ञान के चलते उन्हें इन्साइक्लोपीडिया ऑफ फॉरेस्ट कहा जाता है।

12 साल की उम्र से वे अब तक 30 हजार से भी ज्यादा पौधे रोप चुकी हैं। उन्होंने फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में अस्थाई तौर पर सेवाएं भी दीं और आज भी अपने ज्ञान को नई पीढ़ी के साथ बांट रही हैं। पर्यावरण के संरक्षण में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

12 साल की उम्र से वे अब तक 30 हजार से भी ज्यादा पौधे रोप चुकी हैं। उन्होंने फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में अस्थाई तौर पर सेवाएं भी दीं और आज भी अपने ज्ञान को नई पीढ़ी के साथ बांट रही हैं। पर्यावरण के संरक्षण में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

हरेकाला हजब्बा- पद्मश्री

मंगलोर के 68 वर्षीय फल विक्रता हरेकाला हजब्बा को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में जो योगदान दिया है, उसे जानकर आप दंग रह जाएंगे। संतरे बेचकर रोजाना 150 रुपए कमाने वाले हरेकाला हजब्बा ने एक प्राइमरी स्कूल खड़ा करवा दिया। राष्ट्रपति से पुरस्कार लेने के लिए वे सादी सफेद शर्ट और धोती पहनकर पहुंचे, तो हर कोई उनकी सादगी का कायल हो गया।

मंगलोर के 68 वर्षीय फल विक्रता हरेकाला हजब्बा को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में जो योगदान दिया है, उसे जानकर आप दंग रह जाएंगे। संतरे बेचकर रोजाना 150 रुपए कमाने वाले हरेकाला हजब्बा ने एक प्राइमरी स्कूल खड़ा करवा दिया। राष्ट्रपति से पुरस्कार लेने के लिए वे सादी सफेद शर्ट और धोती पहनकर पहुंचे, तो हर कोई उनकी सादगी का कायल हो गया।

हरेकाला के गांव न्यूपडपू में कई साल तक कोई स्कूल नहीं था। स्कूल का कोई बच्चा शिक्षा ग्रहण नहीं कर पा रहा था। ऐसे में हरेकाला ने साल 2000 में अपनी जिंदगीभर की कमाई लगाकर एक एकड़ जमीन पर बच्चों के लिए एक स्कूल बनाया। उन्होंने कहा था कि मैं कभी स्कूल नहीं गया, इसलिए चाहता था गांव के बच्चों की जिंदगी मेरे जैसी न बीते। आज इस स्कूल में कक्षा दसवीं तक 175 बच्चे पढ़ते हैं।

हरेकाला के गांव न्यूपडपू में कई साल तक कोई स्कूल नहीं था। स्कूल का कोई बच्चा शिक्षा ग्रहण नहीं कर पा रहा था। ऐसे में हरेकाला ने साल 2000 में अपनी जिंदगीभर की कमाई लगाकर एक एकड़ जमीन पर बच्चों के लिए एक स्कूल बनाया। उन्होंने कहा था कि मैं कभी स्कूल नहीं गया, इसलिए चाहता था गांव के बच्चों की जिंदगी मेरे जैसी न बीते। आज इस स्कूल में कक्षा दसवीं तक 175 बच्चे पढ़ते हैं।

मोहम्मद शरीफ- पद्मश्री

अयोध्या के रहने वाले 83 साल के साइकिल मैकेनिक मोहम्मद शरीफ को भी पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। उन्हें यह पुरस्कार समाज कल्याण के लिए दिया गया है। शरीफ चाचा के नाम से मशहूर मोहम्मद शरीफ ने अब तक 25 हजार से भी ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया है।

अयोध्या के रहने वाले 83 साल के साइकिल मैकेनिक मोहम्मद शरीफ को भी पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। उन्हें यह पुरस्कार समाज कल्याण के लिए दिया गया है। शरीफ चाचा के नाम से मशहूर मोहम्मद शरीफ ने अब तक 25 हजार से भी ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया है।

1992 में उनके बेटे की हत्या के बाद उसके शव को रेलवे ट्रैक के किनारे फेंक दिया गया था, जिसे अंतिम संस्कार नसीब नहीं हुआ। इसके बाद से शरीफ चाचा ने लावारिस लाशों के क्रिया-क्रम को अपनी जिम्मेदारी मान लिया। उन्होंने सिर्फ हिंदू और मुस्लिम ही नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लोगों के मृत शरीरों का उनके धार्मिक रिवाजों के मुताबिक अंतिम संस्कार किया है।

1992 में उनके बेटे की हत्या के बाद उसके शव को रेलवे ट्रैक के किनारे फेंक दिया गया था, जिसे अंतिम संस्कार नसीब नहीं हुआ। इसके बाद से शरीफ चाचा ने लावारिस लाशों के क्रिया-क्रम को अपनी जिम्मेदारी मान लिया। उन्होंने सिर्फ हिंदू और मुस्लिम ही नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लोगों के मृत शरीरों का उनके धार्मिक रिवाजों के मुताबिक अंतिम संस्कार किया है।

राहीबाई सोमा पोपेरे- पद्मश्री

बीज माता या सीड मदर के नाम से जाने जानी वाली राहीबाई सोमा पोपेरे को पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया। वे महाराष्ट्र के अहमदनगर की महादेव कोली आदिवासी जनजाति की किसान हैं। उन्होंने अपने परिवार से खेती की पारंपरिक विधियां सीखीं और जंगल के संसाधनों का ज्ञान एकत्र किया।

बीज माता या सीड मदर के नाम से जाने जानी वाली राहीबाई सोमा पोपेरे को पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया। वे महाराष्ट्र के अहमदनगर की महादेव कोली आदिवासी जनजाति की किसान हैं। उन्होंने अपने परिवार से खेती की पारंपरिक विधियां सीखीं और जंगल के संसाधनों का ज्ञान एकत्र किया।

दो दशक पहले उन्होंने देशी बीज तैयार करना और उन्हें दूसरों को बांटना शुरू किया। उन्होंने एक ब्लैकबेरी नर्सरी तैयार की, जहां सेल्फ हेल्प ग्रुप के सदस्यों को इसके पौधे तौहफे में दिए। इसके बाद उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूमकर देशी बीजों का संरक्षण करने का अभियान शुरू किया। यहीं से उन्हें बीज माता का नाम मिला। उनके पास एक बीज बैंक है जिसमें करीब 200 प्रकार के देशी बीज हैं।

दो दशक पहले उन्होंने देशी बीज तैयार करना और उन्हें दूसरों को बांटना शुरू किया। उन्होंने एक ब्लैकबेरी नर्सरी तैयार की, जहां सेल्फ हेल्प ग्रुप के सदस्यों को इसके पौधे तौहफे में दिए। इसके बाद उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूमकर देशी बीजों का संरक्षण करने का अभियान शुरू किया। यहीं से उन्हें बीज माता का नाम मिला। उनके पास एक बीज बैंक है जिसमें करीब 200 प्रकार के देशी बीज हैं।

हिम्मत राम भांभू जी- पद्मश्री

राजस्थान के नागौर जिले के रहने वाले हिम्मताराम भांभू पिछले 25 साल से पेड़ों के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। राजस्थान के कम पेड़ वाले जिलों जैसे नागौर, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, सीकर, अजमेर में वे अब तक साढ़े पांच लाख पौधे रोप चुके हैं। पर्यावरण को समर्पित इस अहम योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया।

राजस्थान के नागौर जिले के रहने वाले हिम्मताराम भांभू पिछले 25 साल से पेड़ों के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। राजस्थान के कम पेड़ वाले जिलों जैसे नागौर, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, सीकर, अजमेर में वे अब तक साढ़े पांच लाख पौधे रोप चुके हैं। पर्यावरण को समर्पित इस अहम योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया।

हिम्मताराम ने एक खास तरह का बायोडायवर्सिटी सेंटर बनाया है। नागौर के हरिमा गांव में बना यह सेंटर 6 एकड़ में फैला है और मोर, चिंकारा और कई दुर्लभ जंगली पशु-पक्षियों के लिए रिहैबिलिटेशन सेंटर बन गया है।

हिम्मताराम ने एक खास तरह का बायोडायवर्सिटी सेंटर बनाया है। नागौर के हरिमा गांव में बना यह सेंटर 6 एकड़ में फैला है और मोर, चिंकारा और कई दुर्लभ जंगली पशु-पक्षियों के लिए रिहैबिलिटेशन सेंटर बन गया है।

Leave a Comment