किसान नेताओं का सियासी रुझान आया सामने, टिकैत इनेलो तो चढूनी कांग्रेस के पक्ष में बैठते आए नज़र

नई दिल्ली, 2 नवंबर (The News Air)
किसान आंदोलन के बीच हरियाणा की ऐलनाबाद विधानसभा सीट पर हुए उप चुनाव के परिणाम पर पूरे देश की नज़र रही। उप चुनाव को किसान आंदोलन के लिटमस टेस्ट के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं यह चुनाव आंदोलन में शामिल दो बड़े किसान नेताओं राकेश टिकैत और गुरनाम सिंह चढ़नी के सियासी रुझान को भी सामने लाया है। दोनों के बीच राजनीतिक मतभेद के क़यास लगातार लगते रहे हैं। टिकैत जहां इनेलो वहीं चढूनी कांग्रेस के पक्ष में खड़े नज़र आए।

राकेश टिकैत ने ऐलनाबाद उपचुनाव प्रचार ख़त्म होने की शाम जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि झोला देकर गया था, अब सवाया कर वापस कर दो। उनका इशारा सीधे इनेलो के अभय चौटाला की ओर था। इनेलो ने भी विज्ञप्ति जारी कर राकेश टिकैत के बयान को प्रचारित किया और इस बयान का पूरा फ़ायदा उठाने का प्रयास किया। वहीं, गुरनाम सिंह चढूनी ने वीडियो संदेश जारी कर भाजपा के लिए वोट न देने की अपील की थी। उनका कांग्रेस प्रेम कई बार सामने आ चुका है।

किसान नेता अब कर रहे राजनीति

राजनीतिक समीक्षक वीरेंद्र सिंह के अनुसार किसान नेता अब राजनीति कर रहे हैं। ऐलनाबाद उप चुनाव इसका उदाहरण बन कर सामने आया है। गुरनाम सिंह चढूनी तो लगातार राजनीति में सक्रिय होने की बात करते रहे हैं। पंजाब विधानसभा चुनाव लड़ने की बात भी कह चुके हैं। चढूनी की इस मांग पर उन्हें संयुक्त किसान मोर्चे से सस्पेंड भी किया जा चुका है। सस्पेंशन के बाद भी वह अपनी इस मांग पर अडे़ रहे। ऐलनाबाद उपचुनाव में भी उन्होंने उम्मीदवार उतारने की बात कही थी।

पहले भी सामने आ चुके मतभेद

गुरनाम चढूनी और राकेश टिकैत के बीच मतभेद पहले भी नज़र आ चुके हैं। इससे पहले भी जब हरियाणा में चढूनी किसान पंचायत कर रहे थे तो राकेश टिकैत को किनारे करने की कोशिश हुई। लेकिन जाट बिरादरी से होने के कारण टिकैत की पकड़ जाट बाहुल हरियाणा में बहुत अच्छी है। इसलिए टिकैत अक्सर चढूनी पर भारी पड़ जाते हैं। वहीं, राकेश टिकैत ख़ुद को गैर राजनीतिक कहते हैं। फिर भी उन्होंने इनेलो के पक्ष में जिस तरह से खुल बयान दिया वह उनके लंबे सियासी समीकरण बनाने की ओर संकेत है। ओम प्रकाश चौटाला तीसरे मोर्चे पर बात कर रहे हैं और इनेलो को राकेश टिकैत के समर्थन के पीछे यह भी एक वजह है। टिकैत की इस प्रयासों से यह बात और भी पुख़्ता होती नज़र आ रही है। वहीं एक स्तर पर जाट और नॉन जाट का कनेक्शन भी सामने आ रहा है।

आंदोलन के लिए सही नहीं है रणनीति

हरियाणा की राजनीति को यदि ऐसे बांट कर देखें तो जिस बदलाव की बात किसान नेता कर रहे हैं, वह संभव नहीं है। राजनीतिक समीक्षक वीरेंद्र सिंह के अनुसार यह किसान आंदोलन के लिए भी ठीक नहीं माना जा सकता। यह सही है कि इनेलो उम्मीदवार अभय सिंह चौटाला ने तीन कृषि क़ानूनों के विरोध में अपना पद छोड़ा। यदि किसान नेताओं को लगता है कि उन्हें अभय चौटाला के त्याग का मान्यता देनी है तो पहले ही दिन अभय चौटाला को अपना समर्थन देते। दो क़दम आगे चार क़दम पीछे कर किसान नेताओं की रणनीति उनके आंदोलन के लिए सही नहीं मानी जा सकती। बहरहाल ऐलनाबाद उप चुनाव के दौरान किसान नेता राकेश टिकैत और गुरनाम चढूनी के बीच राजनीतिक मतभेद स्पष्ट नज़र आया। भविष्य में उनके इस सियासी नज़रिये का हरियाणा की राजनीति और किसान आंदोलन पर गहरा असर नज़र आ सकता है।

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