शिक्षक दिवस और शिक्षा का स्वरूप, शिक्षक का रूप

Sandeep-Pandit
पंडित संदीप

मनाने के लिए ही मनाना है तो क्या हासिल होगा? मानने के लिए मनाने से मंगल होगा… जीवन एक लकीर नहीं सीख है और सीखने सिखाने का शिखर शिक्षक है। आराधना, साधना कर ज्ञान की लौ बना शिक्षक कागजों की खोज, फाइलों के बोझ, चाटुकारों की फौज तले दबा, कुचला, हारा, लड़ता, पिछ्ड़ता, बिछड़ता नजर आ रहा है। जिनको अधिकार सिखा सभ्य नागरिक बनाने की जिम्मेदारी है, उनके अधिकार अधिकारियों के पैरों तले दबे पड़े हैं, दफ्तरों में बैठे बाबुओं की हेकड़ी में अध्यापकों के माथे से गिरता पसीना, आँखों से छलकते आँसू, वेदना से भरा कलेजा काश कोई देख पाता, समझ पाता अध्यापक कोई वस्तु नहीं जो सुशोभित कर स्थापित कर दिया जाए, अध्यापक भाव है जिसका आदर ही समाज का दायित्व है। अफसोस आज का अध्यापक यह हक समाज, सरकार, सहयोगी में तलाशता सहम गया है और इतना भयभीत है कि मुँह में जुबान तक ना रही। बोलने का साहस खोए खड़ा अध्यापक वीरों की सेना, ईमानदारों की कतार, सच पर मर मिटने वाले नागरिक बना पाएगा यह सोच कर देखिए रोम-रोम पिघल जाएगा।
गुरुजनों की शान में आज कसीदे पढ़े जाएंगे गुरु ही भगवान है, भगवान ही नहीं उससे भी बड़ा है, पारस है, दीपक है, सूर्य है, ज्ञान की गंगा है। उपमाओं के अंबार से लदा अध्यापक सच मायने में क्या है यह उसका वजूद खुद ही बताने के लिए काफी है। जब चाटुकार उपहार पा उसका उपहास उड़ाते श्रेष्ठ से सर्वश्रेष्ठ का ठप्पा लगा सामने आ खड़े होते हैं। सच्चाई को मात दे मान बटोर लाते हैं, फिर मुँह बंद कर काले बोर्ड पर सफेद लिखता उम्र घिसता, समाज में पिसता अध्यापक वेदना की अग्नि में चिता से पहले कितनी बार जल कर धधक जाता है उसे खुद भी याद कहाँ रहता है? शिक्षक की स्थिति दयनीय है कारण उसका खुद का खुद के लिए बनाया खौफ का जाल है। जिसने उसकी जुबां पर ताला जड़ दिया है, ये न बोल पाने की कायरता और झूठ को स्वीकारने की विवशता ही अध्यापक के मान का दीमक है। अध्यापक को ही जब अपने सम्मान की परवाह नहीं है तो कोई सरकार, समाज, संस्था क्यों फिक्र करें? और क्यों किसी को करनी भी चाहिए?
शिक्षा व्यवस्था सच कोरोना काल में चकनाचूर हो गई है। बच्चे मोबाईल पर आँखें गड़ाए रोशनी खो रहे हैं, चिड़चिड़े और लड़ाकू हो रहे हैं। माता-पिता मोबाईल को ही माँ सरस्वती मान बच्चों के हाथ में थमा इतिश्री कर रहे हैं। दूर बैठा अध्यापक जब तक बोलता है बच्चे सुनते रहते हैं, जब पूछते हैं तो बोल पड़ते हैं आवाज नहीं आ रही है। दूरी जो बढ़ गई है शिक्षा की दुर्गति कर रही है, बिना परिचय का संवाद जो संभव ही नहीं था उस संभावना को मोबाईल पटल पर उतारने की जद्दोजहद जारी है। राह भी कोई शेष नहीं है शायद चाह भी कोई बची नहीं है। यह मोबीलिया ज्ञान की पाठशाला मजबूरी बन खड़ी है इससे मुक्ति की राह तलाशनी होगी शिक्षा का स्वरूप निखारने के लिए। बीमारी जिस्म को ही नहीं शिक्षा को भी लगी है उपचार के साधन शिक्षा हित में भी तलाशने होंगे, नवाचार की संभावनाओं को जोड़ना होगा, शिक्षा प्रचार प्रसार के नए तंत्र को लुभावना आकर्षक बनाना ही होगा।
शिक्षा सबका अधिकार है, इसी प्रकार शिक्षकों के अधिकार की भी चिंता करनी होगी। आदेशों के अनचाहे बोझ, राशन बांटने की सेवा, सर्वे करने की जिम्मेदारी, जनगणना का नायक, मतदान का प्रहरी, आपातकाल योद्धा बनाने बाबू के टेबल पर दबी फाइल मुक्त कराने के लिए जद्दोजहद से शिक्षकों को आजादी दिलाना ही शिक्षा दिवस के मान महत्व को बढ़ाएगा। सम्मान का चयन सम्मानित होने वालों के आचरण सम्मान को सम्मानित करें ऐसे चमकदार चेहरे को तलाशना होगा। मेरी मर्जी, मेरी पसंद, मेरी सिफारिश, मेरा अध्यापक नहीं बल्कि समाज का चहेता शिक्षा के सच्चे सारथी को सुन चुन जब तक मंच नहीं सजेगा तब तक यह प्रपंच ही बना रहेगा। शिक्षक की पीर को, शिक्षक के अनायास बोझ, पढ़ाई की राह में खड़ी हर बाधा को दूर करने का साहस सरकार जब तक नहीं करती तब तक दिवस विशेष की गरिमा गौरवान्वित नहीं होगी।
सिंगापुर, इंग्लैंड, फिनलैंड, अमेरिका शिक्षकों को भेज खानापूर्ति से बात नहीं बनेगी वहाँ की सरकार शिक्षकों को कैसे सत्कार करती है, उनके अधिकारों की कैसे रक्षा करती है, अध्यापकों के मान को कैसे बढ़ाती है? शिक्षकों का महत्व कितना महत्वपूर्ण होता है? यह भी सीखना होगा। शिक्षक तैयार है हर हाल में हर अवसर में हर चुनौती को स्वीकार कर आगे बढ़ने को, शिक्षकों को आजादी मिलेगी, शिक्षकों को सम्मान मिलेगा तो देश बढ़ेगा, नहीं तो शिक्षक दिवस मुबारक हो एक स्लोगन बन दोहराया जाता रहेगा।

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