तालिबानी बर्बरता दुनिया की कायरता

Sandeep-Pandit
पंडित संदीप

हवाई जहाज के पहियों से लिपट चिथड़े होती हवा में लहू लहू होती अफगानी जवानी, जिगर के टुकड़ों को आँचल से निकाल अंजान सैनिकों को सौंप चैन से मरने को तैयार होती माँ, मस्जिदों से गूंजते नारे अपनी बेटियां सौंप दे इनसे निकाह करेंगे लड़ाके हमारे… जिस्म, जान, जहान सब लूट रहा है तालिबान और तमाशबीन बनी देख रही है दुनिया। मुट्ठी भर बंदूकधारी पूरी दुनिया की आँखों में आँसू की धार बहा रहे हैं और सन्न बैठी सहमी खामोश देख रही है दुनिया दर्द की ये दहला देने वाली दास्तां। इससे ज्यादा शर्मसार करने वाली तस्वीर कोई हो ही नहीं सकती मानवता मर रही है, लुट रही है, कट रही है, रौंदी जा रही है और ताकतवर देश कायर बन कतार में खड़ा इंसानियत के कत्ल का मूक गवाह बन सहमा खड़ा है।

दर्द के मंजर और खंजर की नोक पर लूटी जा रही सहमी बेटियों की आबरू, बम के धमाके और सीने पर संगीनों से घिरी अफगानी जवानों की जलती सुलगती तड़पती जवानी, माँ के आंचल से महरूम हो अनजान वर्दी से पनाह मांगते दूधमुँहे नौनिहाल रहम की भीख मदद की गुहार सलामत रहने की दुआ आज अफगानी तराना बन दुनिया भर में गूंज रहा है और बहरी दुनिया के बहादुर मुल्क इस आह कराह चीख पुकार को सुन कर भी अनसुना कर किस इंसानियत की पहरेदारी कर रही है सवाल इन कायरों की बहादुरी को सदा दागदार करता रहेगा और पूछता रहेगा जब जुल्म की आंधी अफगान की जमीन पर लहू की बारिश बन मौत बांट रही थी तब तोप जहाज मिसाइलों का छाता बना ताकतवर देश दुनिया के किस कोने में तालीबानी खौफ से डरे मुँह छुपाए खड़े थे।

मजार ए शरीफ की एक लाचार आवाज चैनल पर सुनाई दे रही है तीन लाख अफगानी सैनिक एक लाख तालिबानियों के आगे घुटने कैसे टिका कर बैठ गए। महज एक लाख तालिबानी अफगानी सेना पर इतनी भारी कैसे साबित हुई। सोचने की बात है एक लाख मामूली लड़ाकों की तालिबान सेना, कुशल शस्त्र से लैस चप्पे-चप्पे अफगान पर फैली जमीं की निगरानी करने वाले अफगानी सैनिकों को कैसे हरा दिया। कारण साफ है इन सैनिकों का सेनापति अफगानी राष्ट्रपति भगोड़ा निकला और तालिबानियों का कमांडर लड़ाका बन डट गया। एक भगोड़े नेता ने अफगानियों को मरने, बेटियों को लुटने के लिए छोड़ दिया और वहीं दूसरी ओर अपनों को ही मारने, अपनों को ही लुटने अपने देश की बेटियों की आबरू को तार तार करने के लिए कंधे पर बंदूक लिए तालिबानी दैत्य आ डटे। सवाल लाजिम है कैसे किसी भगोड़े राष्ट्रपति को अपनी जान बचाने के लिए मरती हुई जिंदगियां चैन से सोने देंगी? कैसे कोई राष्ट्र का नायक भगोड़ा हो देश को लुटने के लिए छोड़ सकता है? गनी तो अफगानी नजरों से गिर ही गए पर कहाँ है पहरेदारी की दीवार ढहा चले गए जो बिडेन? आज रसिया, चाइना, फ्रांस, इंग्लैंड, जापान सब तमाशबीन से ज्यादा कुछ हैसियत नहीं रखते। यह वो महाशक्तियां हैं जो शक्ति होने पर भी लाचार बनी मरती मानवता के कत्ल की मूक गवाह बने सिमटे, सिसके, ठिठके दूर खड़ा हो तमाशा देख रहे हैं।

वो बम वर्षक हवाई जहाज, वो दूर तक मार करने वाली तोपें, वो हजारों हजार मिल सफर तय कर दुश्मन को नेस्तनाबूद करने वाली मिसाइलें, वो जांबाज जवानों की सेना आखिर किस काम की? जो इंसानियत को निगलते राक्षसों का ही संहार ना कर सके। अफगानिस्तान की जमीन पर शर्मसार मानवता की ये कालिख दुनिया के उन दबंग मुल्कों के मुँह पर लग गई है, जिनका परचम इस बात से बुलंद है कि उनकी बाहों में महफूज है मानवता। जुल्म के खिलाफ समुद्र में पोत उतार जंगी जहाज रवाना करने वालों की, अफगान वालों की अफगान छोड़ रवानगी उनके खैरख़्वाह होने के ढोंग के ढोल की पोल खोलने के लिए काफी है। यह मरता हुआ अफगानिस्तान, रोता हुआ अफगानिस्तान, यह तड़पता हुआ अफगानिस्तान, तार-तार होता अफगानिस्तान दुनिया को बता रहा है कि वह ताकत किसी काम की नहीं जो जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत भी न जुटा सके, जुल्म को कुचलने के लिए आगे ना बढ़ सके।

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