Supreme Court strict action on RERA ने देश भर के लाखों घर खरीददारों को एक बार फिर से निराश और हैरान कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार 12 फरवरी 2026 को रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) के काम करने के तरीके पर इतनी कड़ी नाराजगी जताई कि कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि इस संस्था को बंद कर देना ही बेहतर होगा। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉय माल्या बागची की पीठ ने साफ कहा कि रेरा अब आम जनता की मददगार नहीं, बल्कि डिफॉल्टर बिल्डरों की ढाल बन चुका है।
हिमाचल में ऑफिस शिफ्टिंग का मामला, सुनवाई के दौरान फटकार
यह पूरा मामला हिमाचल प्रदेश से जुड़ा है। राज्य सरकार ने रेरा के कार्यालय को शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित (शिफ्ट) करने का फैसला किया था। लेकिन जून 2025 में हिमाचल हाईकोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट ने तर्क दिया था कि धर्मशाला में वैकल्पिक जगह का इंतजाम नहीं है और 18 आउटसोर्स कर्मचारियों को परेशानी हो सकती है, जिससे रेरा का कामकाज ठप हो जाएगा।
इसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 12 फरवरी को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने हाईकोर्ट की रोक हटाते हुए सरकार को ऑफिस शिफ्ट करने की इजाजत दे दी। साथ ही कोर्ट ने अपीलेट ट्रिब्यूनल को भी धर्मशाला ले जाने का निर्देश दिया ताकि आम जनता को किसी तरह की परेशानी न हो।
जब सिस्टम ही बन जाए सवाल, तो संस्था का क्या मतलब?
रेरा कानून 2016 में इसीलिए लाया गया था ताकि रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता आए और मकान खरीदने वालों का पैसा सुरक्षित रहे। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट की बेंच को यह कहने की नौबत आ गई कि यह संस्था बंद कर दी जाए। यह सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि पिछले 9 सालों में रेरा की पूरी कार्यप्रणाली पर लगा वो टिप्पणी है, जो हर उस आम आदमी की पीड़ा को बयां करता है जिसने अपनी जिंदगी की कमाई एक सपने के नाम पर बिल्डर को सौंप दी और अब सिर्फ कागजों पर मकान देख रहा है। जब संस्था ही शिकायतकर्ता के खिलाफ हो जाए, तो न्याय की उम्मीद कहां से करें?
‘रेरा को बंद करो, हमें कोई ऐतराज नहीं’- चीफ जस्टिस का तीखा हमला
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने रेरा की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, “रेरा अब जनता के लिए नहीं बचा है। यह डिफॉल्टर बिल्डरों को सुविधा देने के अलावा कुछ नहीं कर रहा। ऐसे में बेहतर यही होगा कि इस संस्था को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए।”
कोर्ट ने आगे कहा, “हमें कोई ऐतराज नहीं होगा। सभी राज्यों को अब यह सोचना चाहिए कि रेरा आखिर किसके लिए बनाई गई थी? लोगों के लिए या बिल्डरों के लिए? आज यह सिर्फ डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों को राहत दे रही है।”
यह टिप्पणी इसलिए और भी अहम हो जाती है क्योंकि यह देश की सबसे बड़ी अदालत के मुखिया ने खुद की है। यह सिर्फ हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में रेरा के कामकाज पर गहरा सवाल है।
2016 में बना था कानून, आज हो रहा है ‘उल्टा’ इस्तेमाल
गौरतलब है कि रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 को संसद ने इसलिए पारित किया था ताकि रियल एस्टेट सेक्टर को विनियमित किया जा सके। इस कानून का मकसद था:
घर खरीददारों के हितों की रक्षा करना।
बिल्डरों द्वारा समय पर प्रोजेक्ट पूरे करना सुनिश्चित करना।
पारदर्शिता लाना और निवेशकों का भरोसा बहाल करना।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट की मानें तो आज यही कानून और इसके तहत बनी संस्था अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है। कोर्ट ने कहा कि रेरा को बनाया गया था घर खरीदने वालों को प्रोटेक्ट करने और ट्रांसपेरेंसी लाने के लिए, लेकिन अब इसका उल्टा उपयोग हो रहा है।
आम आदमी पर क्या असर?
इस फैसले और टिप्पणी का सीधा असर देश के करोड़ों मकान खरीददारों पर पड़ता है। अगर सुप्रीम कोर्ट खुद कह रहा है कि रेरा बिल्डरों की मदद कर रहा है, तो आम आदमी के पास शिकायत करने के लिए क्या बचता है?
आम पाठक पर असर: अगर आपने कोई फ्लैट या प्लॉट बुक कराया है और बिल्डर डिलीवरी में देरी कर रहा है, तो रेरा को आपकी उम्मीद की आखिरी कड़ी माना जाता था। लेकिन अदालत की इस टिप्पणी के बाद साफ है कि वहां भी आपको न्याय मिलना मुश्किल हो सकता है। यह उन लाखों परिवारों के लिए झटका है जिन्होंने रेरा में दर्ज शिकायतों से राहत की उम्मीद लगाई थी।
‘जानें पूरा मामला’
रेरा कानून 1 मई 2016 से लागू हुआ था। यह कानून रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता लाने और घर खरीददारों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया था। इसके तहत हर राज्य में एक रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी का गठन हुआ। इसका उद्देश्य बिल्डरों और खरीददारों के बीच संतुलन बनाना था। हिमाचल प्रदेश में रेरा का कार्यालय शिमला में स्थापित किया गया था। अब राज्य सरकार इसे धर्मशाला शिफ्ट करना चाहती है। हाईकोर्ट ने जहां इस पर रोक लगाई, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ रोक हटाई, बल्कि पूरे रेरा तंत्र की कार्यशैली पर ही सवाल उठा दिए।
मुख्य बातें (Key Points)
सुप्रीम कोर्ट ने रेरा की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए उसे ‘बंद करने’ तक की बात कही।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि रेरा अब डिफॉल्टर बिल्डरों की मददगार बन चुका है, जनता का नहीं।
हिमाचल प्रदेश में रेरा ऑफिस शिमला से धर्मशाला शिफ्ट करने को सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दी।
कोर्ट ने राज्य सरकार को अपीलेट ट्रिब्यूनल भी धर्मशाला शिफ्ट करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से रेरा की उपयोगिता पर दोबारा विचार करने को कहा।








