उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा के मार्ग पर दुकानों पर ‘नेम प्लेट’ लगाने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया है कि यह आदेश समाज में विभाजन उत्पन्न कर रहा है और अल्पसंख्यकों के आर्थिक बहिष्कार की स्थिति पैदा कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की पूछताछ
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि क्या यह आदेश एक प्रेस वक्तव्य था या सरकारी आदेश। याचिकाकर्ताओं के वकील ने बताया कि पहले एक प्रेस बयान जारी किया गया था, लेकिन बाद में इसे सख्ती से लागू किया गया। वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि स्वेच्छा के नाम पर जबरन आदेश लागू किया जा रहा है, जो कि अल्पसंख्यक दुकानदारों के लिए आर्थिक बहिष्कार के समान है।
वेजिटेरियन के साथ धोखा- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई शाकाहारी व्यक्ति है, तो उसे यह जानने का अधिकार है कि वह किस प्रकार की दुकान में भोजन कर रहा है। जस्टिस भट्टी ने याचिकाकर्ताओं के वकील से कहा कि वे मामले को जमीनी हकीकत के अनुसार ही प्रस्तुत करें और इसे बढ़ा-चढ़ाकर न बताएं।
जज का निजी अनुभव
सुप्रीम कोर्ट के जज ने अपने निजी अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि केरल में एक वेजिटेरियन होटल में भोजन करते समय उन्हें बाद में पता चला कि वह मुस्लिम का था। याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि यूपी प्रशासन दुकानदारों पर नाम और मोबाइल नंबर लिखने का दबाव डाल रहा है, जो कि केवल ढाबा तक सीमित नहीं है, बल्कि रेहड़ी पटरी वालों पर भी लागू हो रहा है।
आदेश की वैधानिकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आदेश स्वैच्छिक है और अनिवार्य नहीं। वकील ने कहा कि हरिद्वार पुलिस ने इसे सख्ती से लागू किया है और मध्य प्रदेश में भी ऐसा करने की बात की जा रही है। वकील ने बताया कि प्रेस रिलीज में लिखा गया है कि कांवड़ यात्रियों को गलत चीजें खिला दी गईं, इसलिए विक्रेता का नाम लिखना अनिवार्य किया जा रहा है।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
सिंघवी ने कहा कि दुकानदारों और कर्मचारियों के नाम लिखने का आदेश पहचान के आधार पर बहिष्कार का कारण बन रहा है। नाम न लिखने पर व्यापार बंद हो सकता है, और लिखने पर बिक्री प्रभावित होती है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह आदेश विक्रेताओं के लिए आर्थिक मौत के समान है।
सरकार की स्थिति
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या सरकार ने इस बारे में कोई औपचारिक आदेश पारित किया है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सरकार अप्रत्यक्ष रूप से इसे लागू कर रही है और पुलिस कमिश्नर इस प्रकार के निर्देश जारी कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा, मानक और धर्मनिरपेक्षता तीनों ही महत्वपूर्ण हैं।
याचिका और प्रतिक्रिया
एनजीओ ‘एसोसिएशन ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स’ ने यूपी सरकार के फैसले को चुनौती दी है और इस आदेश को रद्द करने की मांग की है। इसके अलावा, प्रोफेसर अपूर्वानंद, आकार पटेल और टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इस आदेश के खिलाफ याचिका दायर की है। सरकार ने कहा कि कांवड़ यात्रियों की आस्था की पवित्रता बनाए रखने के लिए यह फैसला लिया गया है।
सरकार का आदेश
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने कांवड़ रूट की सभी दुकानों पर नेम प्लेट लगाने का आदेश जारी किया था। आदेश में कहा गया था कि दुकानों पर मालिक का नाम और पता लिखना अनिवार्य होगा। इस फैसले पर विपक्षी दलों और सरकार के सहयोगी दलों ने भी विरोध जताया है।
स्वास्थ्य और स्वच्छता का महत्व
पवित्र सावन माह की शुरुआत 22 जुलाई से हो रही है। सावन का समापन 19 अगस्त को होगा। इस समय में स्वास्थ्य और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। मानसून में बीमारियां या बैक्टीरियल इंफेक्शन आम बात है, लेकिन इम्यूनिटी को मजबूत कर हम खुद को स्वस्थ रख सकते हैं और इम्यूनिटी के लिए सबसे बेस्ट ऑप्शन है 40 से भी ज्यादा हर्ब्स वाला डाबर च्यवनप्राश।








