Supreme Court Landmark Judgments 2026 : नया साल 2026 दस्तक दे चुका है और इसके साथ ही देश की सबसे बड़ी अदालत उन फाइलों को खोलने जा रही है जो सीधे आपके अधिकारों से जुड़ी हैं। चाहे वह आपके वोट डालने का अधिकार हो, महिलाओं का धार्मिक स्थलों में प्रवेश हो या फिर राजद्रोह का कानून—सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले भारत की सामाजिक और कानूनी दशा और दिशा दोनों बदल सकते हैं।
मतदाता सूची और SIR पर महा-सुनवाई
साल की शुरुआत में ही सबसे बड़ी सुनवाई मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर होने वाली है। Election Commission of India द्वारा कराई जा रही इस प्रक्रिया को लेकर विपक्ष ने जोरदार हंगामा किया था।
Supreme Court में इस वक्त जो याचिकाएं लंबित हैं, उनमें सीधा सवाल यह उठाया गया है कि क्या चुनाव आयोग के पास इस तरह की जांच का अधिकार है? क्या यह प्रक्रिया संवैधानिक है? इसकी आधी सुनवाई हो चुकी है और जनवरी में ही कोर्ट फिर से बैठेगी। यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे यह तय होगा कि देश भर में चल रही एसआईआर की प्रक्रिया का भविष्य क्या होगा।
धार्मिक स्थलों में महिलाओं का प्रवेश: 9 जजों की अग्निपरीक्षा
दूसरा सबसे संवेदनशील मामला धर्म और आस्था से जुड़ा है। मामला सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह एक बड़ी बहस बन चुका है क्या धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक सही है?
यह मामला अब 9 जजों की संविधान पीठ के पास है। इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के धार्मिक स्थलों में महिलाओं की एंट्री का मुद्दा शामिल है। यद्यपि 2018 में सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी मिल गई थी, लेकिन पुनर्विचार याचिकाओं ने इस मुद्दे को फिर से जिंदा कर दिया है। अब कोर्ट को यह तय करना है कि क्या आस्था के नाम पर लिंग आधारित भेदभाव (Gender Discrimination) जारी रह सकता है।
नया राजद्रोह कानून: पुराना शराब, नई बोतल?
मोदी सरकार ने अंग्रेजों के जमाने के कानूनों को बदलकर भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू की थी, लेकिन विवाद अभी थमा नहीं है। BNS की धारा 152, जो देश की संप्रभुता और एकता को खतरे में डालने वाले कार्यों को अपराध मानती है, अब सुप्रीम कोर्ट की रडार पर है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह नया कानून पुराने ‘राजद्रोह कानून’ (Sedition Law) का ही दूसरा रूप है। कोर्ट ने पहले ही पुराने कानून पर रोक लगा दी थी और इसे औपनिवेशिक बताया था। अब देखना होगा कि क्या नया कानून सुप्रीम कोर्ट की कसौटी पर खरा उतर पाएगा या इसे भी पुराने कानून की तरह रोक का सामना करना पड़ेगा।
धर्मांतरण और तलाक के तरीकों पर कड़ा रुख
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों द्वारा बनाए गए ‘मतांतरण विरोधी कानूनों’ (Anti-Conversion Laws) की वैधता को भी चुनौती दी गई है। राज्य सरकारों का कहना है कि यह जबरन धर्म परिवर्तन रोकने के लिए है, जबकि याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इसका इस्तेमाल एक विशेष समुदाय को प्रताड़ित करने के लिए हो रहा है।
इसके अलावा, तीन तलाक पर बैन लगने के बाद भी मुसलमानों में तलाक के अन्य मनमाने तरीकों (जैसे व्हाट्सएप के जरिए तलाक) पर भी कोर्ट सुनवाई करेगा। यह फैसला मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है।
आम आदमी से जुड़े अन्य मुद्दे
सिर्फ बड़े राजनीतिक मुद्दे ही नहीं, आपकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी परेशानियां भी कोर्ट की सूची में हैं।
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आवारा कुत्तों का आतंक: गलियों में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या पर भी कोर्ट सुनवाई कर रहा है।
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ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल अरेस्ट: साइबर दुनिया के खतरों और गेमिंग के नियमों पर भी स्पष्टता आने की उम्मीद है।
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वक्फ कानून: वक्फ संशोधन कानून की वैधता पर भी फैसला आना बाकी है।
जानें पूरा मामला (Context)
दरअसल, पिछले कुछ सालों में देश में कई ऐसे कानून बने या संशोधन हुए हैं, जिन पर समाज का एक बड़ा तबका सवाल उठा रहा था। चाहे वह नागरिकता से जुड़े मुद्दे हों या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से, ये मामले अलग-अलग समय पर कोर्ट पहुंचे। चूंकि ये मामले संविधान की मूल भावना से जुड़े हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें गंभीरता से लिया है। 2026 इसलिए खास है क्योंकि इन सभी लंबे समय से लंबित मामलों पर अंतिम फैसला आने की प्रबल संभावना है।








