SGPC Punjab Holy Scriptures Bill 2025 को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की 15 सदस्यीय उच्चस्तरीय उप-समिति की बैठक 27 मार्च को चंडीगढ़ स्थित SGPC उप-कार्यालय में हुई, जिसमें पंजाब सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए गए। उप-समिति के अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) मोहिंदर मोहन सिंह बेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान का हालिया बयान “Punjab Prevention of Offences Against Holy Scriptures Bill 2025” और “The Jagat Jyot Sri Guru Granth Sahib Satkar Act 2008” के बीच भ्रम पैदा कर रहा है, और सरकार ने SGPC द्वारा बार-बार मांगी गई जरूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है।

बैठक में कौन-कौन रहे मौजूद?
SGPC Punjab Holy Scriptures Bill 2025 पर बनी इस उप-समिति की बैठक में कई प्रतिष्ठित हस्तियां शामिल हुईं। जस्टिस (सेवानिवृत्त) मोहिंदर मोहन सिंह बेदी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में वरिष्ठ अधिवक्ता पूरन सिंह हुंडल, पूर्व जिला अटॉर्नी अधिवक्ता बलतेज सिंह ढिल्लों, पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के पूर्व चेयरमैन केहर सिंह, सिख इतिहास अनुसंधान बोर्ड के सदस्य डॉ. परमवीर सिंह और बीबी प्रभजोत कौर मौजूद रहीं।
इसके अलावा SGPC सदस्य अधिवक्ता भगवंत सिंह सियालका, अधिवक्ता अमरदीप सिंह धरनी, अधिवक्ता बरजिंदर सिंह सोढी, SGPC कानूनी सलाहकार अमनबीर सिंह सियाली और सहायक सचिव लखवीर सिंह (समन्वयक) भी इस अहम बैठक में शामिल हुए। बैठक में मुख्यमंत्री के हालिया प्रेस बयान, उप-समिति की पिछली बैठकों और विधानसभा भवन में सेलेक्ट कमेटी के साथ हुई बैठक पर विस्तार से चर्चा की गई।
CM मान के बयान से पैदा हो रहा भ्रम: जस्टिस बेदी
बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए जस्टिस (सेवानिवृत्त) मोहिंदर मोहन सिंह बेदी ने कहा कि उप-समिति के सभी सदस्यों को लगता है कि मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान का श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी रोकने के लिए सख्त कानून बनाने संबंधी बयान भ्रम की स्थिति पैदा कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि CM मान ने 22 मार्च को जो बयान दिया वह “The Jagat Jyot Sri Guru Granth Sahib Satkar Act 2008” से संबंधित है, जो श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की छपाई, प्रकाशन, वितरण और आपूर्ति से जुड़ा कानून है।
जबकि SGPC की उप-समिति जिस विषय पर काम कर रही है, वह प्रस्तावित “Punjab Prevention of Offences Against Holy Scriptures Bill 2025” है, जो सभी धर्मों के धार्मिक ग्रंथों के विरुद्ध अपराधों से संबंधित है। जस्टिस बेदी ने कहा कि मुख्यमंत्री के बयान दोनों कानूनों के बीच भ्रम पैदा कर रहे हैं, जो गंभीर चिंता का विषय है। यह भ्रम न सिर्फ कानूनी बल्कि सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से भी नुकसानदायक है क्योंकि आम लोग यह समझ ही नहीं पा रहे कि सरकार वास्तव में किस कानून पर काम कर रही है।
SGPC से न संपर्क, न ड्राफ्ट साझा: सरकार पर गंभीर आरोप
SGPC Punjab Holy Scriptures Bill 2025 विवाद में सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि मुख्यमंत्री ने कहा था कि “The Jagat Jyot Sri Guru Granth Sahib Satkar Act 2008” में संशोधन प्रतिष्ठित वकीलों और धार्मिक संस्थाओं से सलाह-मशविरा करके किए जाएंगे। लेकिन जस्टिस बेदी ने बताया कि SGPC सिखों की प्रतिनिधि संस्था होने के बावजूद पंजाब सरकार ने अब तक न तो SGPC से कोई संपर्क किया है और न ही प्रस्तावित संशोधनों का कोई ड्राफ्ट साझा किया गया है।
उन्होंने कहा कि सरकार की मंशा इस बात से भी साफ हो जाती है कि बेअदबी के खिलाफ बनाए जाने वाले कानून को लेकर SGPC ने विभिन्न पत्रों के जरिए जो जानकारी बार-बार मांगी, वह पंजाब सरकार द्वारा साझा नहीं की जा रही है। सेलेक्ट कमेटी, विधानसभा सचिवालय और पंजाब सरकार जानबूझकर मांगे गए दस्तावेज और जानकारी देने से बच रही है।
सेलेक्ट कमेटी ने खुद मांगे थे सुझाव, लेकिन जानकारी नहीं दी
जस्टिस बेदी ने बताया कि पंजाब विधानसभा की सेलेक्ट कमेटी ने 19 अगस्त 2025 को पत्र संख्या 11291 के जरिए SGPC से प्रस्तावित SGPC Punjab Holy Scriptures Bill 2025 पर सुझाव मांगे थे। इसके जवाब में SGPC ने प्रतिष्ठित वकीलों, विद्वानों और सामाजिक हस्तियों की 15 सदस्यीय उप-समिति गठित की। उप-समिति ने समय-समय पर हुई बैठकों में प्रस्तावित कानून के संवैधानिक, धार्मिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक पहलुओं की गहराई से जांच की।
इस सिलसिले में उप-समिति के कुछ सदस्य 3 सितंबर 2025 को पंजाब विधानसभा सचिवालय गए और सेलेक्ट कमेटी के अध्यक्ष को एक पत्र सौंपकर कुछ अहम जानकारियां मांगीं।
SGPC ने सरकार से क्या-क्या जानकारी मांगी?
उप-समिति ने सरकार से जो जानकारियां मांगी हैं, वे बेहद अहम हैं। पहला सवाल यह था कि पंजाब विधानसभा द्वारा 2016 और 2018 में पारित विधेयकों में क्या कमियां थीं, जिन्हें इस नए बिल के जरिए दूर करने का प्रस्ताव है। दूसरा, केंद्र सरकार ने उन विधेयकों पर क्या आपत्तियां उठाई थीं। तीसरा, उन आपत्तियों को दूर करने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाने का प्रस्ताव रखा है। और चौथा, प्रस्तावित कानून के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं।
इसके साथ ही SGPC ने यह भी बताया कि बिल के पंजाबी अनुवाद में गंभीर त्रुटियां हैं और इसे भाषा विशेषज्ञों से जांच कराना चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति अस्पष्टता का फायदा उठाकर कानून का दुरुपयोग न कर सके। यह भी कहा गया कि बिल के कुछ प्रावधान कानूनी रूप से अस्पष्ट हैं, जिनसे दुरुपयोग हो सकता है और कानूनी प्रक्रिया में बाधा आ सकती है।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 200 का हवाला
जस्टिस बेदी ने कहा कि SGPC ने जो जानकारी मांगी है, वह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत कानून की तर्कसंगतता (Reasonableness) की अनिवार्य शर्त को पूरा करने के लिए जरूरी है। इसके बावजूद कई बार अलग-अलग समय पर पत्र लिखने के बाद भी पंजाब विधानसभा और पंजाब सरकार ने न तो मांगी गई जानकारी दी और न ही उन पत्रों का कोई जवाब दिया। सरकार ने SGPC या उसकी उप-समिति के साथ कोई संवाद भी स्थापित नहीं किया।
उन्होंने यह भी बताया कि SGPC ने पंजाब गृह विभाग को कई अनुस्मारक (Reminders) भी लिखे हैं, जिनमें संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत 2016 और 2018 में पारित विधेयकों को लेकर केंद्र सरकार के साथ हुए पत्र-व्यवहार, केंद्र सरकार या भारतीय संसद द्वारा उठाए गए कदमों, सुझावों और लिए गए फैसलों की जानकारी मांगी गई है।
बिना जानकारी सुझाव देना संभव नहीं: उप-समिति
उप-समिति ने स्पष्ट कहा कि पंजाब सरकार, गृह विभाग और विधानसभा द्वारा रिकॉर्ड और जानकारी उपलब्ध न कराने के कारण SGPC Punjab Holy Scriptures Bill 2025 पर सुझाव देना संभव नहीं है। उप-समिति का कहना है कि 2016 और 2018 में धारा 295A और दंड प्रक्रिया संहिता में प्रस्तावित संशोधनों तथा धारा 295A के तहत सजा बढ़ाने के प्रस्तावों पर केंद्र सरकार द्वारा उठाई गई आपत्तियों और सुझावों की जांच किए बिना कोई सार्थक सुझाव नहीं दिया जा सकता।
इसका सीधा मतलब यह है कि अगर सरकार वाकई में बेअदबी के खिलाफ एक मजबूत और संवैधानिक रूप से टिकने वाला कानून बनाना चाहती है, तो उसे SGPC जैसी प्रतिनिधि संस्थाओं के साथ पारदर्शी संवाद करना होगा। बिना पिछले विधेयकों की कमियों और केंद्र की आपत्तियों को समझे नया कानून बनाना उसी गलती को दोहराने जैसा होगा।
भारतीय समाज की विविधता का रखना होगा ध्यान
बैठक में उप-समिति ने इस बात पर भी गहन चर्चा की कि भारतीय समाज ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टिकोण से बेहद विविधतापूर्ण है। यह विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और विश्वासों का मिश्रण है। सभी समुदायों में धार्मिक ग्रंथों, पूजा के तरीकों, सामाजिक रीति-रिवाजों और धार्मिक ग्रंथों के प्रति सम्मान के मानदंड अलग-अलग हैं।
उप-समिति के सदस्यों का मानना है कि भारत में धर्म केवल आस्था का मामला नहीं बल्कि एक सामाजिक संस्था है, जो किसी व्यक्ति की पहचान, नैतिकता और पूरे जीवन को प्रभावित करती है। अलग-अलग धर्मों के अनुयायियों में पवित्र ग्रंथों के प्रति सम्मान की भावना सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं, मान्यता प्राप्त दर्शनों और विश्वास प्रणालियों के विकास का परिणाम है। इसलिए धार्मिक भावनाएं एकसमान नहीं होतीं और यही बात इस कानून को बनाते समय ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।
SGPC ने कहा: सरकार का रवैया महज खानापूर्ति
जस्टिस बेदी ने सबसे सख्त शब्दों में कहा कि SGPC द्वारा बार-बार पत्र लिखने के बावजूद सरकार का जानबूझकर मांगी गई जानकारी और दस्तावेज उपलब्ध न कराना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि सरकार का यह रवैया इस बात की ओर इशारा करता है कि सेलेक्ट कमेटी द्वारा SGPC से सुझाव मांगने वाला पत्र महज एक खानापूर्ति है और सरकार की वास्तविक मंशा SGPC से सार्थक सलाह-मशविरा करने की नहीं है।
यह टिप्पणी बेहद गंभीर है क्योंकि SGPC सिख समुदाय की सबसे बड़ी प्रतिनिधि संस्था है और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी पंजाब में अत्यंत संवेदनशील मुद्दा रहा है। अगर सरकार सचमुच में एक प्रभावी और संवैधानिक कानून बनाना चाहती है, तो SGPC जैसी संस्थाओं की उपेक्षा करना न सिर्फ राजनीतिक रूप से बल्कि कानूनी रूप से भी नुकसानदायक साबित हो सकता है। 2016 और 2018 में पारित विधेयक पहले ही केंद्र सरकार की आपत्तियों के कारण अटके हुए हैं और बिना पिछली गलतियों से सबक लिए नया कानून बनाने का प्रयास उसी रास्ते पर ले जा सकता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- SGPC की 15 सदस्यीय उप-समिति ने कहा कि CM भगवंत सिंह मान का बयानPunjab Holy Scriptures Bill 2025 और Jagat Jyot Sri Guru Granth Sahib Satkar Act 2008 के बीच भ्रम पैदा कर रहा है।
- SGPC ने बार-बार पत्र लिखकर जानकारी मांगी लेकिन पंजाब सरकार, गृह विभाग और विधानसभा सचिवालय ने कोई जवाब नहीं दिया।
- उप-समिति का कहना है कि 2016 और 2018 में पारित विधेयकों पर केंद्र की आपत्तियों की जानकारी के बिना नए बिल पर सुझाव देना संभव नहीं।
- SGPC ने सरकार के रवैये को “महज खानापूर्ति” करार दिया और कहा कि सिखों की प्रतिनिधि संस्था के साथ कोई संवाद नहीं किया जा रहा।








