SC On OBC Reservation को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जो करोड़ों OBC उम्मीदवारों की जिंदगी बदल सकता है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC का कोई भी उम्मीदवार Creamy Layer में आता है या नॉन क्रीमीलेयर में, इसका निर्धारण सिर्फ उसके माता-पिता के वेतन से होने वाली आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार की सभी अपीलें खारिज कर दीं।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
SC On OBC Reservation के इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि OBC Creamy Layer का दर्जा तय करते समय उम्मीदवार के माता-पिता की स्थिति और उनके पद की श्रेणी, दोनों ही महत्वपूर्ण कारक हैं। कोर्ट ने कहा कि उनके स्टेटस और सेवा श्रेणी पर विचार किए बिना केवल उनकी आय के आधार पर OBC आरक्षण के लिए क्रीमीलेयर का दर्जा निर्धारित करना कानूनी रूप से गलत है।
सीधे शब्दों में कहें तो अगर किसी OBC उम्मीदवार के माता-पिता की सैलरी एक तय सीमा से ज्यादा है, तो सिर्फ इसी आधार पर उसे क्रीमीलेयर में डालकर आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। उनके माता-पिता किस पद पर हैं, किस श्रेणी के संगठन में काम करते हैं, यह सब भी देखना जरूरी है।
1993 के ऑफिस मेमोरेंडम की अनदेखी पर लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम यानी कार्यालय ज्ञापन का विशेष जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि इस ज्ञापन में पदों की श्रेणियों और स्टेटस के जो मापदंड तय किए गए हैं, उनके संदर्भ के बिना केवल उम्मीदवार के माता-पिता की आय के आधार पर क्रीमीलेयर का दर्जा तय करना कानूनी रूप से गलत है। यह OBC Reservation के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।
दरअसल, 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम में क्रीमीलेयर तय करने के लिए माता-पिता के वेतन को शामिल नहीं किया गया था। वेतन को आय का हिस्सा मानकर क्रीमीलेयर तय करना इस ज्ञापन की मूल भावना के विपरीत है और सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को बहुत स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया।
निजी कंपनी और PSU कर्मचारियों के बच्चों से भेदभाव गलत
SC On OBC Reservation के इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक और अहम बात कही जो लाखों परिवारों को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। कोर्ट ने कहा कि OBC आरक्षण की पात्रता का निर्धारण करते समय निजी कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के कर्मचारियों के बच्चों को सरकारी कर्मचारियों के बच्चों से अलग मानना भेदभावपूर्ण है।
इसका मतलब यह है कि अगर किसी OBC उम्मीदवार के माता-पिता किसी PSU बैंक या निजी कंपनी में काम करते हैं, तो उन्हें सरकारी कर्मचारियों के बच्चों से अलग श्रेणी में रखकर क्रीमीलेयर का दर्जा देना संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
सिविल सेवा परीक्षा के उम्मीदवारों को मिली बड़ी राहत
यह पूरा मामला सिविल सेवा परीक्षा के कई उम्मीदवारों से जुड़ा हुआ था। इन उम्मीदवारों ने OBC श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा किया था। लेकिन जब उनकी पात्रता का सत्यापन हुआ तो कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने उनके माता-पिता के वेतन को देखते हुए उन्हें क्रीमीलेयर में मान लिया और OBC आरक्षण का लाभ देने से मना कर दिया।
इनमें से कई उम्मीदवारों के माता-पिता PSU बैंक या अन्य प्रतिष्ठानों में कर्मचारी थे। सिविल सेवा जैसी कठिन परीक्षा पास करने के बावजूद इन उम्मीदवारों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया, जो उनके लिए गहरी निराशा का कारण बना। अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से इन सभी उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिली है।
हाईकोर्ट ने दी थी राहत, केंद्र ने दी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
जब इन उम्मीदवारों को OBC आरक्षण से वंचित किया गया तो उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट, केरल हाईकोर्ट और कैट (CAT) में इसे चुनौती दी। उम्मीदवारों की दलील थी कि केवल इनकम टेस्ट लागू करना 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम के खिलाफ है, जिसमें क्रीमीलेयर का दर्जा तय करने के लिए माता-पिता के वेतन को शामिल नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने इन उम्मीदवारों के दावे को स्वीकार कर लिया और माना कि PSU बैंक या निजी कंपनियों में काम करने वाले माता-पिता की आय को आधार मानकर उन्हें गलत तरीके से क्रीमीलेयर का मानकर आरक्षण लाभ से वंचित किया गया। इसके बाद केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट के इन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
केंद्र सरकार ने क्या दी थी दलील
केंद्र सरकार ने अपनी अपील में 14 अक्टूबर 2004 को जारी स्पष्टीकरण पत्र का हवाला दिया। इस पत्र में कहा गया था कि जहां सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के पदों और सरकारी पदों के बीच समानता निर्धारित नहीं की गई है, वहां आय-संपत्ति यानी इनकम-वेल्थ टेस्ट के तहत वेतन आय पर अलग से विचार किया जा सकता है।
केंद्र का तर्क था कि क्रीमीलेयर का नियम इसलिए लागू है ताकि वास्तविक रूप से पिछड़े लोगों को ही आरक्षण का लाभ मिल सके। इसी आधार पर जिन उम्मीदवारों के माता-पिता की आय निर्धारित सीमा से ज्यादा थी, उन्हें OBC आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की इस दलील को खारिज कर दिया।
स्टेटस आधारित मानदंड की जगह आय परीक्षण लागू करना गलत: कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संबंधित अथॉरिटी ने OBC Creamy Layer में उम्मीदवारों की पात्रता निर्धारित करने के लिए निर्धारित स्टेटस आधारित मानदंड के बजाय आय या संपत्ति आधारित परीक्षण को गलत तरीके से लागू करके कई योग्य उम्मीदवारों को आरक्षण लाभ से बाहर कर दिया। यह कानूनी रूप से अनुचित था और इसने OBC आरक्षण की मूल भावना को कमजोर किया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ इनकम के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई उम्मीदवार क्रीमीलेयर में आता है या नहीं। उम्मीदवार के माता-पिता किस संगठन में किस पद पर कार्यरत हैं, उनका सामाजिक स्टेटस क्या है, यह सब कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
6 महीने के भीतर लागू करने का आदेश
SC On OBC Reservation के इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ केंद्र सरकार की अपीलें खारिज नहीं कीं, बल्कि एक स्पष्ट आदेश भी दिया। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसलों में उसे कोई खामी नजर नहीं आती। साथ ही आदेश दिया कि प्रतिवादी उम्मीदवारों और हस्तक्षेप अर्जीकर्ताओं के दावों पर इस फैसले में तय किए गए सिद्धांतों के अनुसार विचार किया जाए और इसे 6 महीने के भीतर लागू किया जाए।
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब केंद्र सरकार को तय समयसीमा में इन सिद्धांतों को व्यवहार में लाना होगा। जिन उम्मीदवारों को गलत तरीके से क्रीमीलेयर का दर्जा देकर आरक्षण से वंचित किया गया था, उन्हें अब न्याय मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
आम OBC उम्मीदवारों के लिए क्या बदलेगा
इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन OBC परिवारों पर पड़ेगा जहां माता-पिता PSU बैंकों, सार्वजनिक उपक्रमों या निजी कंपनियों में अच्छे वेतन पर कार्यरत हैं। अब तक ऐसे परिवारों के बच्चों को सिर्फ माता-पिता की सैलरी देखकर क्रीमीलेयर में डाल दिया जाता था, भले ही उनके माता-पिता का पद या सामाजिक स्टेटस ऊंचा न हो। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब ऐसे उम्मीदवारों को राहत मिलेगी। उनकी पात्रता का निर्धारण अब एक व्यापक और न्यायसंगत मानदंड के आधार पर होगा, जिसमें पद की श्रेणी और स्टेटस को भी बराबर का महत्व दिया जाएगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि OBC Creamy Layer का दर्जा केवल माता-पिता के वेतन से होने वाली आय के आधार पर तय नहीं हो सकता, पद और स्टेटस भी देखना जरूरी है।
- 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम के मापदंडों की अनदेखी कर सिर्फ आय के आधार पर क्रीमीलेयर तय करना कानूनी रूप से गलत है।
- PSU, निजी कंपनी और सरकारी कर्मचारियों के बच्चों में भेदभाव करना संविधान विरुद्ध है।
- जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार की अपीलें खारिज कीं और 6 महीने में लागू करने का आदेश दिया।








