Republic Day 2026 : आज़ादी के 75 साल बाद, छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के 41 गांवों में 77वें गणतंत्र दिवस पर पहली बार खुले आसमान के नीचे तिरंगा फहराया गया। ये वही गांव हैं जहां दशकों तक न तो गणतंत्र दिवस मनाया गया और न ही स्वतंत्रता दिवस, क्योंकि पूरा इलाका लाल आतंक और माओवादी हिंसा के साए में जीता रहा। आज यह सिर्फ झंडारोहण नहीं, बल्कि भरोसे की वापसी और डर से आज़ादी की तस्वीर बन गया।
क्यों खास है यह गणतंत्र दिवस
बस्तर के जिन 41 गांवों में पहली बार राष्ट्रीय पर्व मनाया गया, उनमें 13 गांव बीजापुर जिले के, 18 गांव नारायणपुर जिले के और 10 गांव सुकमा जिले के हैं। आज़ादी के बाद पहली बार इन गांवों ने संविधान और लोकतंत्र का उत्सव मनाया, जो अपने आप में ऐतिहासिक क्षण है।
लाल आतंक से भरोसे तक का सफर
दशकों तक इन इलाकों में माओवाद का डर इतना गहरा था कि राष्ट्रीय पर्व मनाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। हालात तब बदले जब सुरक्षा कैंपों की स्थापना हुई। बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी के मुताबिक, सुरक्षा कैंप इस बदलाव का टर्निंग पॉइंट बने। इससे न सिर्फ प्रशासन मजबूत हुआ, बल्कि लोगों का भरोसा भी लौटा और देश से उनका जुड़ाव बढ़ा।
15 अगस्त से 26 जनवरी तक बदली तस्वीर
पिछले साल 15 अगस्त को बस्तर के 13 गांवों में पहली बार तिरंगा फहराया गया था। अब 77वें गणतंत्र दिवस पर 41 और गांव जुड़ गए। इस तरह कुल 54 गांवों में पहली बार राष्ट्रीय पर्व मनाया गया, जो बताता है कि बदलाव की रफ्तार तेज हुई है।
उग्रवाद की कमर कैसे टूटी
आईजी सुंदरराज पी के अनुसार, अबूझमाड़ और नेशनल पार्क क्षेत्र में वरिष्ठ माओवादी नेताओं के निष्प्रभावी होने से उग्रवाद की कमर टूट गई। बसवराजू, रामचंद्र रेड्डी, सुधाकर और कट्टा सत्यनारायण रेड्डी जैसे नाम, जो कभी डर की पहचान थे, अब अतीत बन चुके हैं। आज इन इलाकों में डर की जगह उम्मीद ने ले ली है।
विकास की दस्तक
सरकार की ‘नियद नेल्लानार, आपका अच्छा गांव’ योजना के तहत आदिवासी इलाकों तक सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंच रही हैं। जो चीजें कभी सपना थीं, अब हकीकत बन रही हैं। गणतंत्र दिवस का आयोजन इसी बदलाव का सबसे मजबूत प्रतीक बनकर सामने आया है।
राज्यभर में गणतंत्र दिवस का उत्सव
पूरे छत्तीसगढ़ में गणतंत्र दिवस धूमधाम से मनाया गया। राज्यपाल रमन डेका ने रायपुर में ध्वजारोहण किया, जबकि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बिलासपुर में तिरंगा फहराया। लेकिन बस्तर के इन गांवों में लहराता तिरंगा पूरे राज्य के लिए खास संदेश लेकर आया।
आम लोगों पर असर
इन गांवों के लोगों के लिए यह गणतंत्र दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि डर पर जीत का प्रतीक है। पहली बार बच्चों, बुजुर्गों और युवाओं ने बिना भय के राष्ट्रीय पर्व मनाया, जिसने लोकतंत्र पर भरोसे को और मजबूत किया।
क्या है पृष्ठभूमि
बस्तर लंबे समय तक माओवादी हिंसा से प्रभावित रहा, जहां विकास और प्रशासन की पहुंच सीमित थी। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने और योजनाओं के असर से हालात बदले और अब वही इलाका संविधान, लोकतंत्र और कानून के शासन का उत्सव मनाता दिख रहा है।
मुख्य बातें (Key Points)
- बस्तर के 41 गांवों में पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया गया।
- दशकों तक माओवादी डर के कारण राष्ट्रीय पर्व नहीं मनाए गए थे।
- सुरक्षा कैंपों की स्थापना बदलाव का टर्निंग पॉइंट बनी।
- तिरंगा अब डर नहीं, बल्कि उम्मीद और विकास का प्रतीक है।








