Rare Earth Minerals : दुनिया में ताकत का अगला मैदान अब हथियार नहीं, बल्कि खनिज बन चुके हैं। रेयर अर्थ, लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे संसाधन आज इलेक्ट्रिक वाहन, मोबाइल फोन, मिसाइल सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की रीढ़ हैं। इसी रणनीतिक लड़ाई के बीच भारत ने एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव वाशिंगटन डीसी पहुंचे हैं, जहां वह अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के नेतृत्व में हो रही क्रिटिकल मिनरल्स मीटिंग में हिस्सा ले रहे हैं।
चीन की मोनोपोली तोड़ने की तैयारी
इस बैठक का मकसद साफ है—रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन में चीन के दबदबे को तोड़ना। दुनिया की करीब 70 प्रतिशत रिफाइनिंग क्षमता पर चीन का कब्जा है। मोबाइल फोन से लेकर फाइटर जेट और सैटेलाइट तक, हर हाईटेक तकनीक के लिए दुनिया आज चीन पर निर्भर है। यही वजह है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश अब इस निर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मान रहे हैं।

अमेरिका का साफ संदेश और भारत की भूमिका
अमेरिकी प्रशासन पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि प्रतिकूल विदेशी शक्तियों पर खनिज निर्भरता उसकी सुरक्षा के लिए जोखिम है। नाम लिए बिना यह सीधा इशारा चीन की ओर है। ऐसे में भारत की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। भारत के पास रेयर अर्थ के बड़े भंडार मौजूद हैं, लेकिन अब तक माइनिंग और रिफाइनिंग में पर्याप्त निवेश नहीं हो पाया है।
भारत का मास्टर प्लान क्या है
सरकार की योजना बिल्कुल स्पष्ट है। 100 से ज्यादा मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी, ₹280 करोड़ का बजट, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूत करना और विदेशी साझेदारी बढ़ाना। अगर यह योजना जमीन पर उतरती है, तो भारत सिर्फ उपभोक्ता नहीं बल्कि ग्लोबल सप्लायर बन सकता है। यह बदलाव सीधे तौर पर चीन की रणनीतिक बढ़त को कमजोर करेगा।
चीन को क्यों लगेगा सबसे बड़ा झटका
अब तक चीन रेयर अर्थ को जियोपॉलिटिकल हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है। कभी जापान पर रोक, कभी अमेरिका को चेतावनी। लेकिन अगर भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और G7 देश मिलकर अलग सप्लाई चेन बना लेते हैं, तो चीन की मोनोपोली टूट जाएगी। इससे कीमतों पर उसका कंट्रोल खत्म होगा और वैश्विक बातचीत में उसकी पकड़ कमजोर पड़ेगी।
भारत को मिलने वाले बड़े फायदे
इस रणनीति से भारत को कई स्तरों पर लाभ होगा। ‘मेक इन इंडिया’ को बूस्ट मिलेगा, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल और डिफेंस इंडस्ट्री को कच्चा माल मिलेगा, आयात पर खर्च घटेगा और लाखों रोजगार के अवसर पैदा होंगे। यही वजह है कि भारत रूस, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीकी देशों के साथ भी जॉइंट प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है।
किन देशों और कंपनियों की बढ़ेगी मुश्किल
अगर यह डील सफल होती है, तो परेशानी सिर्फ चीन तक सीमित नहीं रहेगी। वे अफ्रीकी देश जो चीन पर निर्भर हैं और वे कंपनियां जो चीनी सप्लाई चेन से जुड़ी हैं, उनके बिजनेस मॉडल पर भी असर पड़ेगा। साफ है कि यह जंग सिर्फ खनिजों की नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभुत्व की है।
क्या है पृष्ठभूमि
रेयर अर्थ अब सिर्फ खनिज नहीं, बल्कि भविष्य की सत्ता बन चुके हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देश चीन पर निर्भरता खत्म करने की रणनीति पर तेजी से काम कर रहे हैं। इसी कड़ी में वाशिंगटन में हो रही यह बैठक वैश्विक पावर शिफ्ट की नींव मानी जा रही है।
मुख्य बातें (Key Points)
- अश्विनी वैष्णव क्रिटिकल मिनरल्स मीटिंग के लिए वाशिंगटन पहुंचे।
- बैठक का उद्देश्य चीन की रेयर अर्थ मोनोपोली तोड़ना है।
- भारत 100+ मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी और निवेश की तैयारी में है।
- सफल योजना से भारत ग्लोबल सप्लायर बन सकता है।








