Trump Tariff India: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर एक के बाद एक टैरिफ थोप रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी को खुलेआम टारगेट कर रहे हैं। पाकिस्तान के साथ युद्ध रुकवाने का क्रेडिट ले रहे हैं। भारतीयों को हथकड़ी पहनाकर वापस भेज रहे हैं। लेकिन इन सबके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जुबान पर ताला लगा हुआ है।
जो नेता “मजबूत” और “56 इंच के सीने” के लिए जाने जाते हैं, वो ट्रंप का नाम तक नहीं ले पा रहे। जबकि ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों के प्रधानमंत्री खुलकर ट्रंप की आलोचना कर रहे हैं। सवाल यह है कि भारत की विदेश नीति आखिर कौन तय कर रहा है – दिल्ली या वाशिंगटन?
चाबहार प्रोजेक्ट: सबसे बड़ी उपलब्धि अब खतरे में
ईरान का चाबहार पोर्ट प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता था। चुनावी रैलियों में इसे बड़ी कामयाबी बताया गया था। कहा गया था कि यह चीन के ग्वादर पोर्ट का जवाब है। लेकिन आज जब इसके भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं, तब प्रधानमंत्री का एक बयान तक नहीं आया है।
ट्रंप ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया है। अक्टूबर 2024 में अमेरिका ने भारत को 6 महीने की छूट दी थी। खबरें आ रही हैं कि यह छूट इसलिए मिली क्योंकि भारत ने वादा किया था कि 6 महीने में चाबहार से बाहर हो जाएगा।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि अमेरिका से मिली छूट “बिना शर्त” थी और यह अप्रैल 2026 के अंत तक जारी रहेगी। लेकिन असली सवाल यह है कि भारत ने साफ-साफ क्यों नहीं कहा कि वह चाबहार प्रोजेक्ट से नहीं निकलेगा? क्या भारत अपने हितों का फैसला हर छह महीने अमेरिका से पूछकर करेगा?
रूस का तेल: दबाव में झुकता भारत
यह पहली बार नहीं है जब भारत अमेरिकी दबाव में झुका हो। 2019 में अमेरिका के दबाव में ईरान और वेनेजुएला से तेल लेना बंद किया गया। 2025 में फिर से अमेरिकी दबाव में रूस से तेल लेना कम किया गया। अब भारत की कंपनियां फिर से वेनेजुएला की तरफ दौड़ लगाने वाली हैं।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर खुद कह रहे हैं कि भारत को “सेलेक्टिव टारगेटिंग” का शिकार बनाया जा रहा है। लेकिन नाम लेकर नहीं बोल रहे कि यह कौन कर रहा है। पोलैंड के उप प्रधानमंत्री ने तो खुशी जताई कि भारत ने रूस से तेल खरीदना कम किया। यह खुशी पोलैंड के लिए क्यों है, यह समझना मुश्किल नहीं है।
BRICS नौसैनिक अभ्यास: भारत अकेला गायब
जनवरी 2026 में ब्रिक्स देशों का एक साझा नौसैनिक अभ्यास हुआ जिसका नाम था “विल फॉर पीस 2026″। इसमें रूस, चीन, ईरान, ब्राजील, इथोपिया, इंडोनेशिया, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात की नौसेनाएं शामिल हुईं। 10 सदस्य देशों में से केवल एक देश शामिल नहीं हुआ – और वो था भारत।
विदेश मंत्रालय की तरफ से अजीब सी सफाई दी गई कि यह “व्यवस्थागत ड्रिल” नहीं थी। लेकिन सच यह है कि भारत के अलावा ब्रिक्स का हर देश इसमें शामिल हुआ। यूएई पर भी अमेरिका का दबाव काम करता होगा, उनके देश में अमेरिका का सैनिक अड्डा भी है, फिर भी वो शामिल हुए। इथोपिया जैसा छोटा देश भी शामिल हुआ। केवल भारत गायब रहा।
यूरोप के नेता बोल रहे, भारत चुप
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने साफ कहा कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और अगर इसके लिए टैरिफ लगाया जा रहा है तो यह गलत है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि ट्रंप ने टैरिफ लगाकर ठीक नहीं किया और यूरोपीय देश इसका सामूहिक जवाब देंगे।
ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, फिनलैंड, नॉर्वे, स्वीडन, नीदरलैंड और डेनमार्क की सेनाओं ने साझा सैनिक अभ्यास भी किया। लेकिन भारत के प्रधानमंत्री इन सब पर चुप हैं। ग्रीनलैंड की संप्रभुता भारत के लिए कोई मायने नहीं रखती? यूरोप के छोटे-छोटे देश बोल रहे हैं और भारत जैसा बड़ा देश खामोश है।
ट्रंप के अपमान पर भारत का जवाब कहां?
ट्रंप ने पाकिस्तान के साथ युद्ध रुकवाने का बार-बार क्रेडिट लिया। प्रधानमंत्री मोदी को खुलेआम टारगेट किया। लोकसभा में राहुल गांधी के चैलेंज के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी ट्रंप का नाम लेकर नहीं बोल पाए।
सबसे शर्मनाक बात तो यह रही कि ट्रंप ने भारतीयों को हथकड़ी और बेड़ियां पहनाकर अमेरिकी सेना के विमान से भारत की जमीन पर उतारा। भारत ताकता रहा। न बीजेपी ने ट्रंप के खिलाफ कोई प्रदर्शन किया, न आरएसएस ने, और न ही भारत की जनता ने। जबकि ग्रीनलैंड और डेनमार्क की जनता सड़कों पर उतरकर अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध कर रही है।
बोर्ड ऑफ पीस: पैसे से बिकती सदस्यता
ट्रंप ने 60 देशों को “बोर्ड ऑफ पीस” में न्योता दिया है। इसमें पाकिस्तान भी शामिल है, तो भारत के लिए इसमें कुछ भी खास नहीं है। स्थाई सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर देने होंगे, नहीं तो अस्थाई सदस्यता मिलेगी।
यह सरासर अपमानजनक है। देश के रुतबे के हिसाब से नहीं, पैसे के हिसाब से सदस्यता तय होगी। अस्थाई सदस्य बनेंगे तो दूर से दिखेगा कि इन लोगों ने पैसे नहीं दिए इसलिए छोटी कुर्सी पर बैठे हैं। भारत इस पर भी चुप है।
पाकिस्तान को मुख्यधारा में लाया ट्रंप ने
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच रक्षा समझौता होने जा रहा है। ट्रंप ने पाकिस्तान को मुख्यधारा में ला दिया है। पाकिस्तान पर लगा आतंकवाद का धब्बा धीरे-धीरे धूमिल होता जा रहा है। लेकिन इस पर भी प्रधानमंत्री मोदी की कोई राय सामने नहीं आई है।
विदेशी निवेशकों का पलायन
भारत की आर्थिक स्थिति पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है। पिछले साल विदेशी निवेशकों ने भारत से लगभग 1 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए। इस साल जनवरी के पहले पखवाड़े में ही 22,000 करोड़ से अधिक की रकम निकाल चुके हैं। यह आम भारतीयों की जेब पर सीधा असर डालता है।
विदेश नीति शोभा यात्रा बनी
प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश नीति को शोभा यात्रा में बदल दिया है। इसमें आपको रंगीन झांकियां तो दिखेंगी लेकिन वक्त पड़ने पर एक भी काम का बयान नहीं दिखेगा। विदेश यात्राओं में पिछले 12 साल का सघन निवेश किया गया, अरबों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जब असली परीक्षा की घड़ी आई तो वही नेतृत्व गायब हो गया।
द हिंदू ने अपने संपादकीय में साफ लिखा है कि अमेरिका के सामने भारत की कमजोरी पूरी दुनिया देख रही है। यह तभी दूर होगी जब प्रधानमंत्री मोदी बोलना शुरू करेंगे और ग्लोबल मंच पर सक्रिय नजर आएंगे।
मुख्य बातें (Key Points)
• ट्रंप की टैरिफ नीतियों पर PM मोदी की चुप्पी ने भारत की विदेश नीति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं
• चाबहार प्रोजेक्ट का भविष्य अधर में है और अमेरिकी दबाव में भारत पीछे हटता दिख रहा है
• BRICS नौसैनिक अभ्यास में भारत की गैरहाजिरी ने कूटनीतिक कमजोरी उजागर की है
• विदेशी निवेशकों ने जनवरी में ही 22,000 करोड़ रुपये भारत से निकाल लिए हैं
• यूरोपीय नेता खुलकर ट्रंप का विरोध कर रहे हैं जबकि भारत के प्रधानमंत्री खामोश हैं








