Skin Perfume Deodorant Safety: क्या आप भी परफ्यूम या डिओडोरेंट की खुशबू को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए इसे सीधे अपनी गर्दन, हाथों या अंडरआर्म्स पर लगाते हैं? तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। त्वचा रोग विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह आदत आपकी त्वचा के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है।
Dr. Chandani Jain Gupta, Head of Dermatology, Elantis Healthcare, Delhi ने बताया कि परफ्यूम को सीधे स्किन पर लगाने से न केवल त्वचा को नुकसान पहुंचता है, बल्कि लंबे समय में गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं।
परफ्यूम सीधे स्किन पर क्यों नहीं लगाना चाहिए?
डॉ. चांदनी कहती हैं, “स्किन पर परफ्यूम या डिओडोरेंट्स नहीं लगाना चाहिए या फिर यह देखकर लगाना चाहिए कि वो स्किन के लिए सूटेबल है या नहीं।” उन्होंने बताया कि हाई कंसंट्रेशन वाले परफ्यूम स्किन पर लगाने से इरिटेशन होने की संभावना रहती है।
जिन लोगों को एग्जिमा या डर्मेटाइटिस की समस्या है, उनकी परेशानी और बढ़ सकती है। इससे खुजली, लाली और जलन जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।
गर्दन पर परफ्यूम लगाना सबसे ज्यादा रिस्की
डॉ. चांदनी ने खासतौर पर गर्दन पर परफ्यूम लगाने को लेकर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा, “गले पर परफ्यूम लगाना रिस्की इसलिए हो जाता है क्योंकि गला एक सन एक्सपोज्ड साइट है।”
गर्दन पर परफ्यूम लगाने से वह जगह फोटोसेंसिटिव बन सकती है। इससे खुजली, जलन, लाली या ब्लिस्टर्स बन सकते हैं। आगे चलकर पिगमेंटेशन यानी काले धब्बे भी हो सकते हैं।
लंबे समय में त्वचा को होता है यह नुकसान
डॉक्टर ने बताया कि स्किन पर डिओडोरेंट या परफ्यूम लगाने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि लंबे समय में त्वचा बेहद फोटोसेंसिटिव हो जाती है।
चेहरे, गले और अंडरआर्म की स्किन बहुत पतली होती है। इन जगहों पर नॉर्मल परफ्यूम लगाने से पिगमेंटेशन आ सकता है और एग्जिमा होने की संभावना बढ़ जाती है।
अगर स्किन पर परफ्यूम लगाना जरूरी है तो वह डिओडोरेंट होना चाहिए, जो स्किन के लिए सूटेबल हो। खरीदते समय स्पेसिफिकेशन जरूर चेक करें।
क्या परफ्यूम से कैंसर का खतरा?
इस सवाल पर डॉ. चांदनी ने स्पष्ट किया, “अभी तक ऐसी कोई साइंस नहीं है जिसने प्रूफ किया हो कि परफ्यूम से या डिओडोरेंट लगाने से स्किन कैंसर्स हो सकते हैं।”
हालांकि, ब्रेस्ट कैंसर पर एक एसोसिएशन स्टडी हुई थी जिसमें देखा गया कि परफ्यूम में मौजूद केमिकल्स हॉर्मोन्स की तरह काम करते हैं। लेकिन यह संबंध नगण्य पाया गया। दोनों के बीच कोई सीधा रिश्ता नहीं मिला।
परफ्यूम और डिओडोरेंट लगाते समय इन बातों का रखें ध्यान
डॉ. चांदनी ने कुछ जरूरी सावधानियां बताई हैं:
सबसे पहले एक्सपायरी डेट चेक करें। एक्सपायर्ड प्रोडक्ट से रेडनेस या बर्निंग होने की संभावना बहुत ज्यादा होती है।
यह देखें कि प्रोडक्ट स्किन के लिए सूटेबल है या कपड़ों के लिए। परफ्यूम कपड़ों के लिए सूटेबल होता है, जबकि डिओडोरेंट स्किन के लिए।
जहां पतली स्किन हो जैसे आंखों के पास, गले के पास या अंडरआर्म में, वहां बहुत सावधानी से लगाएं क्योंकि इन जगहों पर इरिटेशन होने की संभावना ज्यादा होती है।
कोई नया परफ्यूम या डिओडोरेंट लगाना शुरू करें तो पहले पैच टेस्ट जरूर करें। अगर स्किन से जुड़ी कोई भी दिक्कत हो तो उसे लगाना तुरंत बंद कर दें।
भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की बिक्री चिंताजनक
देश में एक और बड़ी स्वास्थ्य समस्या तेजी से बढ़ रही है। Economic Survey 2025-26 के मुताबिक, भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की बिक्री में 150% से भी ज्यादा का उछाल देखा गया है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 29 जनवरी 2026 को संसद में यह सर्वे पेश किया। सर्वे से पता चला कि 2006 में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की बिक्री 0.9 अरब डॉलर थी, जो 2019 तक बढ़कर 38 अरब डॉलर हो गई। यानी करीब 40 गुना ज्यादा।
मोटापे के आंकड़े डराने वाले
इस दौरान महिलाओं और पुरुषों में मोटापा लगभग डबल हो गया। National Family Health Survey 2019-2021 के मुताबिक, 24% भारतीय महिलाएं और 23% पुरुष ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त हैं।
सबसे ज्यादा चिंता की बात है बच्चों में बढ़ता मोटापा। 2015-16 में 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मोटापे की दर 2% से ज्यादा थी। यह 2019-21 में बढ़कर करीब 3.5% हो गई।
साल 2020 में 3 करोड़ से ज्यादा बच्चे मोटापे से ग्रस्त थे। अनुमान है कि 2035 तक यह संख्या बढ़कर 8 करोड़ से ज्यादा हो सकती है।
क्या होते हैं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स वे खाने-पीने की चीजें हैं जिन्हें बनाते समय बहुत ज्यादा प्रोसेसिंग की जाती है। इनमें फूड कलर, प्रिजर्वेटिव, स्वीटनर्स, बहुत ज्यादा फैट और नमक डाला जाता है।
बिस्किट, नमकीन, ब्रेड, चिप्स, कैंडी, चॉकलेट, पैकेज्ड सूप, सीरियल्स, चिकन नगेट्स, हॉट डॉग, फ्रेंच फ्राइज, रेडी टू ईट फूड, सॉफ्ट ड्रिंक्स, चॉकलेट मिल्क, पैक्ड लस्सी, पिज्जा, बर्गर और नूडल्स – यह सब अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आइटम्स हैं।
इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, ये हमारे पारंपरिक खाने-पीने जैसे दाल, सब्जी, रोटी की जगह ले रहे हैं। इस वजह से हमारी डाइट खराब हो रही है और कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स से कौन सी बीमारियां?
The Lancet जर्नल में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स एंड ह्यूमन हेल्थ पर एक सीरीज प्रकाशित हुई है। इसमें दुनियाभर के शोधकर्ताओं ने काम किया है।
इन अध्ययनों से पता चलता है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स कई बीमारियों का खतरा बढ़ा देते हैं – मोटापा, दिल की बीमारियां, सांस से जुड़ी बीमारियां, डायबिटीज और मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर्स।
इनसे जेब पर भी भार पड़ता है। जो व्यक्ति इन्हें बहुत ज्यादा खाता है, वह बीमार पड़ता है। उसका लंबा इलाज चलता है। उसकी काम करने की क्षमता भी घट जाती है। सरकार और समाज पर भी आर्थिक दबाव पड़ता है।
डॉक्टर ने बताया कैसे बीमार बनाते हैं ये फूड्स
Dr. Mukesh Nandal, Senior Consultant, Gastroenterology, Narayana Hospital, Gurugram ने बताया कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स में फाइबर, विटामिन्स और मिनरल्स जैसे जरूरी पोषक तत्व नहीं होते। उल्टा फैट और शुगर भर-भरकर डाले जाते हैं।
इनसे मोटापा बढ़ता है। मोटापे से डायबिटीज का रिस्क बढ़ता है। इसके अलावा इनमें सोडियम का खूब इस्तेमाल होता है। ज्यादा नमक की वजह से ब्लड प्रेशर हाई रहता है। हाई बीपी यानी दिल की बीमारियों का खतरा। ज्यादा सोडियम से किडनियों को भी नुकसान पहुंचता है।
हेल्दी के नाम पर बेची जा रही अनहेल्दी चीजें
कई अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स को हेल्दी कहकर बेचा जाता है। जैसे कि लस्सी। कहने को तो लस्सी हेल्दी है, पर अगर यह पैक्ड मिल रही है तो नुकसानदेह है।
180 मिलीलीटर पैक्ड लस्सी में करीब 25 ग्राम चीनी होती है। यह किसी भी एंगल से हेल्दी नहीं है।
कैंसर का खतरा भी बढ़ाते हैं प्रिजर्वेटिव्स
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स से कैंसर का भी रिस्क बढ़ता है। दरअसल इनमें प्रिजर्वेटिव्स डाले जाते हैं जो खाने की शेल्फ लाइफ बढ़ाते हैं।
लेकिन ये प्रिजर्वेटिव्स लंबे समय तक शरीर में जमा होकर सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं और कैंसर का रिस्क बढ़ा सकते हैं।
कुछ फूड प्रिजर्वेटिव्स में पोटेशियम सोर्बेट नाम का केमिकल होता है। इससे कैंसर का रिस्क 12% बढ़ जाता है। वहीं ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क 23 से 24% तक बढ़ सकता है।
कई फूड प्रिजर्वेटिव्स में पोटेशियम नाइट्रेट डाला जाता है। इसके ज्यादा सेवन से कैंसर का खतरा 12 से 15% तक बढ़ जाता है।
खाने के कई पैकेट्स में सोडियम नाइट्रेट लिखा होता है। इसके ज्यादा इस्तेमाल से प्रोस्टेट कैंसर का रिस्क 32% तक बढ़ जाता है।
सरकार ने क्या सुझाव दिए?
इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, अब तक पॉलिसीज का फोकस लोगों को जागरूक करने पर रहा है। लेकिन सिर्फ लोगों की आदतें बदलने से बात नहीं बनेगी।
इसके लिए ऐसे नियम बनाने होंगे जो अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स के प्रोडक्शन, बिक्री और मार्केटिंग को कंट्रोल करें। साथ ही हेल्दी खाने को बढ़ावा दें।
सर्वे में सुझाव दिया गया है कि सुबह 6:00 से रात 11:00 बजे तक सभी मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स के विज्ञापन न दिखाए जाएं।
सभी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स पर वार्निंग लेबल लगाए जाएं। जिस प्रोडक्ट में चीनी, नमक या फैट तय सीमा से ज्यादा हो, उस पर ज्यादा टैक्स लगाया जाए।
Health Ministry ने देश भर के सभी केंद्रीय संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे ऑयल और शुगर बोर्ड लगाएं। ये बोर्ड लोगों को साफ-साफ बताएंगे कि उनके स्नैक्स में कितना फैट और कितनी शक्कर डाली गई है।
सरसों के बीज – सेहत का खजाना
Dr. Anshul Singh, Team Lead, Clinical Nutrition & Dietetics, Artemis Hospitals ने सरसों के बीज के फायदों के बारे में विस्तार से बताया।
डॉ. अंशुल कहती हैं कि सरसों के बीज में डाइटरी फाइबर और नेचुरल एंजाइम्स होते हैं। यह पेट में गैस्ट्रिक जूस को एक्टिव करते हैं। इनसे खाना जल्दी पचता है। पेट भारी नहीं लगता। गैस और कब्ज की समस्या से भी राहत मिलती है।
मेटाबॉलिज्म बढ़ाएं और वजन घटाएं
सरसों के बीज में ग्लूकोसिनोलेट्स और थर्मोजेनिक कंपाउंड होते हैं। ये शरीर के मेटाबॉलिज्म को तेज करते हैं।
मेटाबॉलिज्म यानी हम जो खाना खाते हैं उसे एनर्जी में बदलने, नए सेल्स बनाने और पुराने को बचाए रखने का पूरा प्रोसेस। मेटाबॉलिज्म बढ़ने पर शरीर ज्यादा कैलोरीज खर्च करता है। इससे वजन कंट्रोल करने में मदद मिलती है।
ठंड के मौसम में मेटाबॉलिज्म बढ़ाने के लिए सरसों के बीज खासतौर पर फायदेमंद होते हैं।
दिल की सेहत के लिए बेहतरीन
सरसों के बीज में ओमेगा-3 फैटी एसिड और मोनो-अनसैचुरेटेड फैट पाए जाते हैं। यह बैड कोलेस्ट्रॉल कम करते हैं और दिल की नसों में ब्लॉकेज बनने से बचाते हैं।
रोज थोड़े सरसों के बीज का इस्तेमाल दिल को हेल्दी रखने में मदद करता है।
जोड़ों के दर्द में राहत
सरसों के बीज में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं। एंटी-इंफ्लेमेटरी यानी अंदरूनी सूजन घटाने वाले। इससे जोड़ों के दर्द, मांसपेशियों की जकड़न और पुराने दर्द में राहत मिलती है।
इसी वजह से सरसों का तेल मालिश के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
स्किन और बालों के लिए फायदेमंद
सरसों के बीज में विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। यह स्किन और बालों के लिए बहुत फायदेमंद हैं।
डाइट में कैसे शामिल करें सरसों के बीज?
इसका इस्तेमाल दाल, सब्जी, खिचड़ी और सांभर में तड़के के रूप में कर सकते हैं। सरसों को अक्सर आम, नींबू और हरी मिर्च के अचार में भी डाला जाता है। तो रोज थोड़ा अचार भी खा सकते हैं।
सरसों को पीसकर सलाद, छाछ और दही में भी मिलाया जा सकता है। इसके अलावा इसकी चटनी भी खाई जा सकती है।
इन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए
जिन्हें अक्सर एसिडिटी होती है, पेट में दर्द, जलन या मरोड़ उठती है या फिर अल्सर है, उन्हें सरसों के बीज कम ही खाने चाहिए।
जिन लोगों को हाइपोथायरॉइडिज्म है, उन्हें भी ज्यादा सरसों या कच्ची सरसों खाने से बचना चाहिए। जिन्हें पाइल्स और फिशर की शिकायत है, उन्हें भी सरसों कम ही खाना चाहिए।
मुख्य बातें (Key Points)
- परफ्यूम को सीधे त्वचा पर नहीं लगाना चाहिए, खासकर गर्दन पर क्योंकि यह फोटोसेंसिटिव हो सकती है और पिगमेंटेशन का कारण बन सकती है
- भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की बिक्री 2006 से 2019 के बीच 40 गुना बढ़ गई है, जिससे मोटापा और कई बीमारियों का खतरा बढ़ा है
- सरसों के बीज पाचन, मेटाबॉलिज्म, हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं और इन्हें तड़के, अचार या चटनी के रूप में खाया जा सकता है
- एक्सपायर्ड परफ्यूम या डिओडोरेंट का इस्तेमाल कभी न करें और नया प्रोडक्ट लगाने से पहले पैच टेस्ट जरूर करें








