Pakistan Role Iran Attack US Cooperation का वो काला सच अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है जिसे इस्लामाबाद ने बड़ी चतुराई से ढका हुआ था। एक तरफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या पर शोक जता रहे हैं और अंतर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की निंदा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पर्दे के पीछे पाकिस्तानी ज़मीन और खुफिया जानकारी का इस्तेमाल उसी हमले को अंजाम देने में हुआ जिसकी वो सार्वजनिक रूप से आलोचना कर रहा है। जियोपॉलिटिक्स में यही दोहरा चेहरा असली खेल होता है।
‘जियोपॉलिटिक्स में नैतिकता सिर्फ कागज़ पर होती है’
जियोपॉलिटिक्स की दुनिया में जब भी दो देश संयुक्त बयान जारी करते हैं, तो उसमें नैतिकता और अंतर्राष्ट्रीय कानून का ज़िक्र ज़रूर होता है। लेकिन असलियत यह है कि कोई भी देश वास्तव में उन नैतिक सिद्धांतों पर नहीं चलता। यह सिर्फ पाकिस्तान की बात नहीं है, दुनिया का हर देश अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखता है। अगर कोई देश केवल नैतिकता के आधार पर फैसले करने लगे, तो वह खुद को कमज़ोर कर लेगा।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने खुद एक समय यह स्वीकार किया था कि अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल टॉयलेट पेपर की तरह किया और फिर फेंक दिया। यह जानते हुए भी पाकिस्तान बार-बार अमेरिका के पास जाता है क्योंकि उसके पास कोई और विकल्प नहीं है।
‘ईरान पर हमले में पाकिस्तान का असली रोल क्या था?’
पाकिस्तान का आधिकारिक रुख यह था कि ईरान पर हमला अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है और विवाद को संवाद से सुलझाया जाना चाहिए। शहबाज शरीफ ने ट्वीट कर कहा कि पाकिस्तान की जनता ईरान के दुख में शामिल है और राष्ट्राध्यक्षों को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।
लेकिन असलियत यह है कि ईरान के अंदर जिस तरह से अमेरिकी Unmanned Aerial Vehicles और हथियारों का इस्तेमाल किया गया, उसके लिए पाकिस्तानी ज़मीन पर मौजूद बेसों का उपयोग किया गया। इसके साथ ही ईरान में कहाँ-कहाँ निशाना बनाया जा सकता है, इस बारे में पाकिस्तान ने अमेरिका को खुफिया जानकारी मुहैया कराई। यह Covert Operational Cooperation का स्पष्ट उदाहरण है जहाँ सार्वजनिक रूप से विरोध किया जाता है लेकिन पर्दे के पीछे सहयोग जारी रहता है।
‘अमेरिका के साथ Strategic Alignment: पाकिस्तान की असली मंशा’
Pakistan Role Iran Attack US Cooperation के पीछे पाकिस्तान की सबसे बड़ी मंशा यह है कि दक्षिण एशिया में अमेरिका को जब भी किसी देश की ज़रूरत हो, वह भारत के बजाय पाकिस्तान के पास आए। पाकिस्तान खुद को न केवल अफगान गलियारे में, बल्कि पूरे क्षेत्र में अमेरिका का अपरिहार्य साझेदार साबित करना चाहता है।
इस रणनीति के पीछे एक और ठोस कारण है। अगर कभी भारत के साथ कोई संघर्ष होता है, तो पाकिस्तान चाहता है कि अमेरिका उसकी तरफ खड़ा हो। इसी सुरक्षा गारंटी के लिए पाकिस्तान अमेरिकी हितों को साधने में अपनी ऊर्जा लगाता है।
डोनाल्ड ट्रंप लगातार आसिम मुनीर पर दबाव बनाते रहे हैं और शहबाज शरीफ ट्रंप के सामने झुकते रहे हैं, यह दर्शाता है कि इस रिश्ते में असंतुलन है लेकिन पाकिस्तान को इसकी कीमत चुकानी ही है।
‘सऊदी अरब से नज़दीकी: Sunni Alignment का बड़ा फायदा’
पाकिस्तान एक सुन्नी बहुसंख्यक देश है और ईरान एक शिया बहुसंख्यक देश, जहाँ 85-90% आबादी शिया मुसलमान है। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश भी सुन्नी बहुसंख्यक हैं और वे ईरान को पसंद नहीं करते।
पिछले साल सऊदी अरब ने परमाणु-सशस्त्र पाकिस्तान के साथ एक Mutual Defense Pact पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें यह तय किया गया कि दोनों में से किसी एक पर हमला दूसरे पर हमला माना जाएगा। ईरान पर हुए हमले में चुप रहकर या परोक्ष सहयोग देकर पाकिस्तान ने सऊदी और अन्य खाड़ी देशों के साथ अपनी नज़दीकी को और मज़बूत किया है। पाकिस्तान को इन देशों से निवेश और वित्तीय सहायता चाहिए क्योंकि वह गंभीर आर्थिक संकट से गुज़र रहा है।
‘2024 की Missile Exchange: ईरान-पाकिस्तान रिश्ते पहले ही टूट चुके थे’
ऐतिहासिक रूप से 1979 की इस्लामिक क्रांति से पहले और बाद में कई वर्षों तक पाकिस्तान और ईरान करीबी साझेदार रहे। लेकिन जैसे-जैसे पाकिस्तान अमेरिका के करीब जाता गया, ईरान के सर्वोच्च नेता खमेनई को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया।
2024 में दोनों देशों के बीच मिसाइलों का आदान-प्रदान हुआ था। पाकिस्तान ने ईरान के अंदर बलूचिस्तान से संचालित आतंकी ठिकानों पर हमले किए थे और ईरान ने भी पाकिस्तानी इलाके में जवाबी कार्रवाई की थी। इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच की पुरानी करीबी लगभग खत्म हो गई थी। इसी खाई का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ सहयोग करने का रास्ता चुना।
‘कराची में US Consulate पर हमला: पाकिस्तान के अंदर का खतरनाक बँटवारा’
पाकिस्तान की यह दोहरी नीति उसकी अपनी घरेलू राजनीति के लिए भी बड़ा खतरा बन रही है। कराची में जब अमेरिकी कांसुलेट के बाहर प्रदर्शन हुए तो भीड़ परिसर के अंदर घुस गई। अमेरिकी कमांडोज़ को फायरिंग करनी पड़ी और 12 से अधिक लोगों की मौत हो गई।
यह घटना बताती है कि पाकिस्तान की जनता का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका के इस ऑपरेशन के विरुद्ध है। इसीलिए पाकिस्तान सरकार कभी भी सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहेगी कि उसने अमेरिका का साथ दिया। यह Societal Division पाकिस्तान की सरकार और उसकी जनता के बीच बढ़ती खाई को दर्शाता है।
‘पाकिस्तान को क्या मिलेगा और क्या है बड़ा खतरा?’
पाकिस्तान को इस Covert Cooperation से कई फायदे मिलने की उम्मीद है। खाड़ी देशों से निवेश और वित्तीय सहायता, सऊदी अरब के साथ और मज़बूत रक्षा सहयोग, अमेरिका से Intelligence Sharing और Military Partnership, दक्षिण एशिया में कूटनीतिक प्रभाव बढ़ाना और भारत के प्रति Strategic Bargaining Power में वृद्धि जैसे लाभ पाकिस्तान को हासिल हो सकते हैं।
लेकिन खतरे भी उतने ही बड़े हैं। अगर ईरान ने पाकिस्तान की इस भूमिका को खुलकर सामने रखा और पलटवार किया तो पाकिस्तान पर सीधा सैन्य दबाव आ सकता है। तालिबान नियंत्रित अफगानिस्तान के साथ पहले से बिगड़े रिश्ते, बलूचिस्तान में जारी विद्रोह और सांप्रदायिक हिंसा के बीच एक और मोर्चा खुलना पाकिस्तान के लिए विनाशकारी हो सकता है।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
- पाकिस्तान ने सार्वजनिक रूप से ईरान पर हमले की निंदा की लेकिन पर्दे के पीछे अमेरिकी UAVs के लिए अपनी ज़मीन और खुफिया जानकारी मुहैया कराई।
- पाकिस्तान की रणनीति है कि दक्षिण एशिया में अमेरिका का सबसे भरोसेमंद साझेदार बनकर भारत के खिलाफ Strategic Leverage हासिल किया जाए।
- सऊदी अरब के साथ 2024 में हुए Mutual Defense Pact और Sunni Alignment के चलते पाकिस्तान ईरान-विरोधी खेमे में खड़ा है।
- 2024 में हुई ईरान-पाकिस्तान Missile Exchange के बाद दोनों देशों के बीच की पुरानी नज़दीकी पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
- कराची में अमेरिकी कांसुलेट पर हुई हिंसा और 12 से अधिक मौतें पाकिस्तान के भीतर की Societal Division को उजागर करती हैं।








