Noora Tantray Encounter भारतीय सुरक्षा बलों की उन सबसे बड़ी कामयाबियों में से एक है जिसने जैश-ए-मोहम्मद के कश्मीर नेटवर्क की कमर तोड़कर रख दी। सिर्फ 3 फीट 7 इंच का कद, लंगड़ाकर चलने वाला, भीड़ में कोई शक भी न करे, लेकिन भारत की सुरक्षा एजेंसियां उसे “सिक्योरिटी हेडेक” कहती थीं। दिल्ली की स्पेशल पोटा कोर्ट ने उसे “मर्चेंट ऑफ डेथ” करार दिया था। 25 दिसंबर 2017 की रात पुलवामा के संबूरा इलाके में जम्मू-कश्मीर पुलिस, राष्ट्रीय राइफल्स और सीआरपीएफ के जवानों ने मिलकर ऑपरेशन शुरू किया और 26 दिसंबर की सुबह करीब 4 बजे तक इस 3 फुट के खूंखार आतंकी का खात्मा कर दिया गया। ऑपरेशन ऑल आउट की हिट लिस्ट में सबसे ऊपर रखे गए नूर मोहम्मद तांत्रे का अंत भारत की खुफिया एजेंसियों की तकनीकी और मानवीय खुफिया जानकारी की शानदार जीत थी।
कौन था नूरा तांत्रे: 3 फुट का वो आतंकी जिस पर कोई शक नहीं करता था
Noora Tantray Encounter की पूरी कहानी समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर यह शख्स था कौन। 1970 में कश्मीर के पुलवामा जिले के तराल इलाके में जन्मा नूर मोहम्मद तांत्रे, जिसे जिहादी हलकों में “नूरा त्राली”, “छोटा नूरा” या “बौना मुजाहिद” कहा जाता था।
तराल का यह इलाका कश्मीर में जब से उग्रवाद शुरू हुआ तभी से आतंकवादियों की “नर्सरी” माना जाता रहा है। घने जंगल, पहाड़ी रास्ते, ऐसी भौगोलिक बनावट जहां आतंकी आसानी से छिप सकते हैं, आवागमन कर सकते हैं। इसी माहौल में पला-बढ़ा था नूर मोहम्मद तांत्रे। 1989 के बाद जब कश्मीर में उग्रवाद अपने चरम पर पहुंचा तो तांत्रे भी इसकी तरफ खिंचता चला गया।
साल 2000 आते-आते उसकी उम्र 30 साल हो चुकी थी लेकिन कद नहीं बढ़ा था। बमुश्किल साढ़े तीन फीट। लोग उसे “बौना मुजाहिद” कहने लगे थे। लेकिन यही छोटा कद आगे चलकर उसका सबसे बड़ा हथियार बन गया।
जैश-ए-मोहम्मद ने क्यों चुना इस बौने आतंकी को
2000 के शुरुआती सालों में कश्मीर का उग्रवाद स्थानीय गुटों से हटकर पाकिस्तान के नवगठित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद की तरफ शिफ्ट होने लगा था। जैश के कई आतंकवादी कश्मीर में घुसपैठ करते थे, यहां बसते थे।
जैश-ए-मोहम्मद की नजर तांत्रे पर इसलिए पड़ी क्योंकि उसकी छोटी कद-काठी उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। जहां बाकी आतंकवादी ब्रेनवॉश होकर बंदूक उठाते थे और सुरक्षा बलों की नजर में तुरंत आ जाते थे, वहीं तांत्रे का 3 फुट का कद किसी के लिए भी खतरे का संकेत नहीं था। वो भीड़ में आसानी से घुलमिल जाता था। चेक पोस्ट बेरोकटोक पार कर लेता था। सुरक्षा बल कभी इस छोटे कद के आदमी को शक की निगाह से देखते ही नहीं थे।
यही वजह थी कि जैश-ए-मोहम्मद ने उसे अपने नेटवर्क में शामिल कर लिया। शुरुआत में उसे लॉजिस्टिकल सपोर्ट का काम दिया गया: पैसे यहां से वहां पहुंचाना, आतंकवादियों को रहने की जगह देना, कश्मीर के भीतर उनकी आवाजाही मैनेज करना। एक ओवर ग्राउंड वर्कर (OGW) के तौर पर उसने काम करना शुरू किया।
मुल्ला उमर से मुलाकात: जब बौने आतंकी का कद बढ़ गया
Noora Tantray Encounter तक पहुंचने से पहले तांत्रे का सफर कितना खतरनाक था, यह उसके अफगानिस्तान दौरे से समझा जा सकता है। 2000 के शुरुआती सालों में तांत्रे अफगानिस्तान गया और वहां तालिबान के तत्कालीन प्रमुख मुल्ला उमर से मुलाकात की।
इस मुलाकात ने तांत्रे की पूरी तस्वीर बदल दी। वापस लौटने पर वो न सिर्फ पाकिस्तानी हैंडलर्स और जैश-ए-मोहम्मद के आकाओं की नजरों में एक भरोसेमंद सहयोगी बन गया, बल्कि उसे एक वैचारिक वैधता भी मिल गई। अब वो सिर्फ एक स्थानीय सुविधा प्रदाता नहीं रहा, बल्कि कश्मीर के स्थानीय कैडर और बड़े अंतरराष्ट्रीय जिहादी नेटवर्क के बीच एक संपर्क सूत्र (लायज़न) बन गया।
पार्लियामेंट अटैक का कनेक्शन: गाजी बाबा का करीबी
तांत्रे की जैश-ए-मोहम्मद में बढ़ती अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस दौर के जैश के टॉप ऑपरेशनल कमांडर गाजी बाबा ने उसे अपना सबसे करीबी और भरोसेमंद सहयोगी बना लिया। गाजी बाबा वही शख्स था जिसने दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हमले की मास्टरमाइंडिंग की थी। जब गाजी बाबा ने संसद हमले की योजना बनाई तो तांत्रे उसके साथ ही था और अप्रत्यक्ष रूप से इसमें शामिल भी पाया गया था।
2003: दिल्ली की सदर बाजार में धरा गया बौना आतंकी
अगस्त 2003 तक जैश-ए-मोहम्मद अपने ऑपरेशन कश्मीर से आगे बढ़ाकर पूरे भारत में फैलाने की फिराक में था और दिल्ली उसके निशाने पर थी। इसी दौरान भारतीय खुफिया एजेंसियों को एक बेहद अहम इंटेलिजेंस इनपुट मिला कि जैश-ए-मोहम्मद के कुछ आतंकवादी एक ट्रक में हथियार और गोला-बारूद छिपाकर कश्मीर से दिल्ली ला रहे हैं। ट्रक में ऊपर से फल और सब्जियां भरी हुई थीं, लेकिन उनके नीचे हथियार छिपाए गए थे। वापसी में यही ट्रक दिल्ली से हवाला का पैसा कश्मीर ले जाने वाला था।
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को ट्रक का रजिस्ट्रेशन नंबर JK 03 0153 तक की स्पेसिफिक जानकारी दी गई। 28 अगस्त 2003 को यह ट्रक दिल्ली के आजादपुर मंडी इलाके में पहुंचा। 30 अगस्त की शाम करीब 7:45 बजे कुतुब रोड पार्किंग लॉट में एक सब-इंस्पेक्टर ने देखा कि एक बेहद छोटे कद का आदमी इस ट्रक के ड्राइवर परवेज अहमद मीर और क्लीनर फारूक अहमद से मिलने आया है।
दिल्ली पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। ट्रक की तलाशी में लकड़ी के डिब्बों के नीचे 10 हैंड ग्रेनेड, ग्रेनेड के शेल्स, एक अंडर बैरल ग्रेनेड लॉन्चर (UBGL), भारी मात्रा में असला-बारूद और करीब डेढ़ लाख रुपये की नकदी बरामद हुई। तांत्रे समेत तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसी गिरफ्तारी के बाद इंद्रप्रस्थ पार्क में दो और आतंकवादी ज़हूर और हबीब का एनकाउंटर हुआ और कुल पांच आतंकवादी पकड़े या मारे गए।
मर्चेंट ऑफ डेथ: कोर्ट ने दिया था यह खौफनाक नाम
तांत्रे पर पोटा 2002 के तहत मुकदमा चलाया गया। दिल्ली की स्पेशल पोटा कोर्ट में जब सुनवाई हुई तो न्यायाधीशों ने उसके आतंकी रिकॉर्ड को इतना गंभीर माना कि फैसले में उसे “मर्चेंट ऑफ डेथ” यानी “मौत का सौदागर” कहा गया। जनवरी 2011 में करीब 8 साल तिहाड़ जेल में रहने के बाद उसे “भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने की आपराधिक साजिश” के आरोपों में दोषी पाया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
जेल में भी चलाता रहा आतंक का कारोबार
2015 में तांत्रे को तिहाड़ जेल से श्रीनगर जेल में शिफ्ट कर दिया गया। सुरक्षा एजेंसियां मान रही थीं कि 12 साल जेल में रहने के बाद तांत्रे के आतंकी दिन अब खत्म हो चुके हैं। लेकिन वे गलत थीं।
तांत्रे ने जेल को अपने नेटवर्क को फिर से खड़ा करने का अड्डा बना लिया। श्रीनगर जेल में उसने जैश-ए-मोहम्मद की कश्मीर नेतृत्व से दोबारा संपर्क स्थापित किए। जेल से बाहर निकलने की योजना बनाई और सबसे खतरनाक बात यह कि उसने बाकी कैदियों को भी कट्टरपंथी बनाना शुरू कर दिया। वो अपने छोटे कद का हवाला देकर कहता था कि “देखो ऊपर वाले ने मुझे 3 फुट का बनाया, फिर भी मैं इतने बड़े काम कर सकता हूं” और इस तरह दूसरे कैदियों को जैश-ए-मोहम्मद के लिए तैयार करता था।
पैरोल से भागा: और फिर बन गया जैश का डिवीजनल कमांडर
2015 में तांत्रे को पैरोल पर छोड़ दिया गया। पहले वो अपने घर तराल गया जहां पुलिस की नजर उस पर थी। लेकिन धीरे-धीरे उसने अपना पुराना नेटवर्क फिर से सक्रिय करना शुरू कर दिया। इस बीच 2016 में बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद कश्मीर घाटी में जो गुस्सा और अशांति फैली, तांत्रे ने उसे जैश-ए-मोहम्मद के फायदे के लिए भुनाना शुरू कर दिया।
जुलाई 2017 में तराल के अरीपाल इलाके में तीन जैश-ए-मोहम्मद आतंकवादियों का एनकाउंटर हुआ। तांत्रे को पता चला कि ये वही आतंकी हैं जिन्हें उसने पनाह दी थी। पुलिस की नजर अब उस तक पहुंच सकती थी। उसी रात तांत्रे अपने घर से निकला और कश्मीर के जंगलों में गायब हो गया। पैरोल का उल्लंघन करके वो पूरी तरह अंडरग्राउंड हो चुका था।
जब अगली बार सुरक्षा एजेंसियों को उसके बारे में जानकारी मिली तो पता चला कि अब वो जैश-ए-मोहम्मद का डिवीजनल कमांडर बन चुका है। 47 साल की उम्र, दशकों का अनुभव और पाकिस्तानी आतंकी नेतृत्व का अटूट भरोसा, इन सबकी वजह से उसे यह पद दिया गया था। वो दक्षिण और मध्य कश्मीर में जैश-ए-मोहम्मद के पुनरुत्थान का “मुख्य वास्तुकार” बन गया था।
तीन महीने, तीन हमले: तांत्रे का खूनी सिलसिला
Noora Tantray Encounter से पहले के तीन महीने भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए बेहद दर्दनाक थे। तांत्रे ने 2017 में पाकिस्तान से आए 20 फिदायीन आतंकवादियों को कश्मीर में रिसीव किया, उन्हें ठिकाना दिया, रेकी कराई और एक के बाद एक तीन बड़े हमलों को अंजाम दिलाया।
अगस्त 2017 में पुलवामा की डिस्ट्रिक्ट पुलिस लाइंस (DPL) पर जैश-ए-मोहम्मद के एक फिदायीन हमलावर ने भीषण हमला किया। इस हमले में 8 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। जांच में मास्टरमाइंड के रूप में तांत्रे का नाम सामने आया।
सितंबर 2017 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्य मंत्री नईम अख्तर के काफिले पर तराल में ग्रेनेड हमला किया गया। मंत्री तो बच गए लेकिन एक 17 साल की लड़की सहित तीन नागरिकों की जान गई और 30 से 40 लोग घायल हुए। अक्टूबर में गिरफ्तार आतंकवादी गुलजार अहमद डार ने पूछताछ में कबूल किया कि ग्रेनेड फेंकने का आदेश तांत्रे ने दिया था।
अक्टूबर 2017 में श्रीनगर एयरपोर्ट के पास बीएसएफ की 182 बटालियन के कैंप पर सुबह 3:30 से 4:00 बजे के बीच तीन भारी हथियारों से लैस जैश-ए-मोहम्मद के फिदायीन ने हमला किया। 9 घंटे तक गोलीबारी चली। सुरक्षा बलों ने तीनों को मार गिराया लेकिन बीएसएफ के एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर शहीद हुए और तीन-चार जवान गंभीर रूप से घायल हुए। इस हमले का मास्टरमाइंड भी तांत्रे ही निकला।
पुलवामा जैसा हमला दो साल पहले ही प्लान कर चुका था तांत्रे
Noora Tantray Encounter की कहानी का सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाला हिस्सा यह है कि दिसंबर 2017 में सुरक्षा एजेंसियों को जो इनपुट मिला उसके मुताबिक तांत्रे श्रीनगर-जम्मू नेशनल हाईवे पर सुरक्षा बलों के काफिले पर एक बहुत बड़ा हमला करने की योजना बना रहा था। यह ठीक वैसा ही हमला था जैसा 14 फरवरी 2019 को पुलवामा हमले में हुआ। तांत्रे ने दो साल पहले ही पुलवामा जैसे हमले का खाका तैयार कर लिया था। अगर सुरक्षा बलों ने समय रहते कार्रवाई नहीं की होती तो 2019 से पहले ही ऐसा भयानक हमला हो चुका होता।
25 दिसंबर की रात: ऑपरेशन ऑल आउट का आखिरी शिकार
ऑपरेशन ऑल आउट की 2017 की हिट लिस्ट में सबसे ऊपर तांत्रे का नाम था। आईबी, जम्मू-कश्मीर पुलिस का स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप और सैन्य खुफिया एजेंसियों ने मिलकर उसकी हर हरकत पर नजर रखनी शुरू कर दी थी।
ह्यूमन इंटेलिजेंस के जरिए सूत्रों ने बताया कि तांत्रे पुलवामा-श्रीनगर कॉरिडोर में संबूरा और तराल के बीच सक्रिय है। 25 दिसंबर 2017, क्रिसमस का दिन, सोमवार की शाम को जम्मू-कश्मीर पुलिस को स्पेसिफिक टिप-ऑफ मिला कि तांत्रे पुलवामा के संबूरा इलाके में एक घर में मौजूद है।
तुरंत जम्मू-कश्मीर पुलिस, राष्ट्रीय राइफल्स और सीआरपीएफ का संयुक्त ऑपरेशन शुरू किया गया। पूरे इलाके की घेराबंदी की गई और कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशन चलाया गया। एक-एक घर की तलाशी ली जा रही थी कि अचानक एक घर से भीषण गोलीबारी शुरू हो गई। तांत्रे के साथ दो पाकिस्तानी आतंकवादी भी उस घर में मौजूद थे।
25 दिसंबर की रात से लेकर 26 दिसंबर की सुबह तक रातभर गोलियां चलती रहीं। सुबह करीब 4 बजे के आसपास अंदर से गोलीबारी बंद हुई। जब सुरक्षा बलों ने अंदर जाकर देखा तो दोनों पाकिस्तानी आतंकवादी भाग चुके थे। लेकिन तांत्रे, जो हमेशा अपने छोटे कद की वजह से छिपने में माहिर था, इस बार अपनी ही कमजोरी का शिकार बन गया। लंगड़ाकर चलने की वजह से वो भाग नहीं पाया और एक भारी मलबे के नीचे दबा मिला। उसका हथियार पास में पड़ा था। नूर मोहम्मद तांत्रे, वो 3 फुट का “मर्चेंट ऑफ डेथ”, आखिरकार ढेर कर दिया गया।
मरने के बाद भी आए चौंकाने वाले खुलासे
तांत्रे की मौत के बाद दो बड़े खुलासे हुए जिन्होंने सुरक्षा एजेंसियों को भी चौंका दिया। पहला खुलासा यह हुआ कि दिसंबर 2017 में ही कश्मीर के लेथपुरा में सुरक्षा बलों पर जो हमला हुआ, उसकी रेकी तांत्रे ने ही उसी दौरान की थी जब वो लगातार तीन महीनों में तीन हमलों की प्लानिंग कर रहा था। यानी उसकी मौत के बाद भी उसकी पुरानी योजनाएं अमल में लाई जा रही थीं।
दूसरा और सबसे बड़ा खुलासा 14 फरवरी 2019 के पुलवामा हमले की जांच में सामने आया। जांच में पता चला कि पुलवामा हमले का एक प्रमुख साजिशकर्ता मुदस्सिर अहमद खान को सबसे पहले ओवर ग्राउंड वर्कर बनाने वाला, जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर से मिलाने वाला, उसके लिए हथियार जुटाने वाला और उसे जैश की सैन्य श्रेणी तक पहुंचाने वाला कोई और नहीं बल्कि नूर मोहम्मद तांत्रे ही था। यानी पुलवामा हमले की जड़ें तांत्रे तक जाती थीं।
भारत की सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी कामयाबी
Noora Tantray Encounter ने यह साबित कर दिया कि भारतीय सुरक्षा बल किसी भी आतंकी को, चाहे वो कितना भी चालाक हो, कितना भी छिपने में माहिर हो, अंततः ढूंढ निकालते हैं और उसका खात्मा करते हैं। तांत्रे जैसा आतंकवादी जो अपने छोटे कद को ढाल बनाकर दशकों तक सुरक्षा बलों को चकमा देता रहा, जेल से भी अपना नेटवर्क चलाता रहा, पैरोल से भागकर फिर से आतंक का साम्राज्य खड़ा करने लगा, उसका अंत भारतीय खुफिया तंत्र की तकनीकी सटीकता और जमीनी जानकारी की जीत है। उन सभी सुरक्षाकर्मियों को सलाम जिन्होंने 25 दिसंबर की ठंडी रात से 26 दिसंबर की सुबह तक लड़कर इस “मौत के सौदागर” का हिसाब चुकता किया।
मुख्य बातें (Key Points)
- नूर मोहम्मद तांत्रे महज 3 फीट 7 इंच का आतंकवादी था, जिसने अपने छोटे कद को ढाल बनाकर दशकों तक जैश-ए-मोहम्मद के लिए काम किया, दिल्ली की पोटा कोर्ट ने उसे “मर्चेंट ऑफ डेथ” कहा था।
- 2003 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने हथियार तस्करी के दौरान उसे सदर बाजार से गिरफ्तार किया, 8 साल तिहाड़ जेल में रहा, आजीवन कारावास की सजा हुई लेकिन 2015 में पैरोल पर आकर भाग गया और जैश का डिवीजनल कमांडर बन गया।
- तीन महीने में तीन बड़े हमले: अगस्त 2017 में DPL पुलवामा (8 शहीद), सितंबर 2017 में मंत्री के काफिले पर ग्रेनेड हमला (3 नागरिक मृत), अक्टूबर 2017 में BSF कैंप पर फिदायीन हमला, तीनों का मास्टरमाइंड तांत्रे ही था।
- 25-26 दिसंबर 2017 को पुलवामा के संबूरा में जम्मू-कश्मीर पुलिस, राष्ट्रीय राइफल्स और CRPF के संयुक्त ऑपरेशन में रातभर की मुठभेड़ के बाद तांत्रे को मार गिराया गया, उसकी मौत के बाद पुलवामा 2019 हमले से भी उसका कनेक्शन सामने आया।







