Modi Political Crisis: जिस सरकार में कभी कोई इस्तीफा होता नहीं है, जिस सरकार के भीतर कोई भी कैबिनेट मिनिस्टर कितनी भी बड़ी गलती कर दे, इस्तीफा लिया नहीं जाता है, उस सरकार के भीतर क्या पहली बार कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल का इस्तीफा होगा? क्या वाकई अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील भारत सरकार के गले की फांस बन चुकी है? जहां उसे लगने लगा है कि अगर उसने परिस्थितियों को नहीं संभाला तो इस देश के भीतर किसान और मजदूर जिस दिन सड़क पर उतर आएंगे, उसके बाद इस देश में विपक्ष की राजनीति सुलग उठेगी।
वह भी उन परिस्थितियों में जब बार-बार किसान को लेकर, खेती को लेकर, इस देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर प्रधानमंत्री मोदी गाहे-बगाहे हर बार इसका जिक्र करते हैं कि कैसे इस देश में लाभार्थियों की कतार में सबसे ज्यादा लाभ इस देश के किसानों को होता है, मजदूरों को होता है और ग्रामीण भारत को होता है।
विदेश मंत्री और कॉमर्स मिनिस्टर ने पल्ला झाड़ा
शुरुआती दौर में कच्चे तेल को लेकर सवाल उभरे थे। उस वक्त विदेश मंत्री ने पल्ला झाड़ लिया इस पूरी डील को लेकर। कॉमर्स मिनिस्ट्री ने या कॉमर्स मिनिस्टर ने कच्चे तेल जो रूस से आता था, उसको लेकर पल्ला झाड़ लिया और सब कुछ सौंप दिया विदेश मंत्रालय के तहत। यानी जिम्मा किसी ने नहीं लिया। सब ने जिम्मा एक-दूसरे पर छोड़ने का काम ही किया।
लेकिन अब सवाल तो किसानों का है, कपास का है, टेक्सटाइल इंडस्ट्री का है। इसके साथ उन तमाम एक्सपोर्ट से जुड़ी हुई इंडस्ट्रीज का है जिसमें ट्रेड डील में वह दूसरे देशों के साथ कैसे प्रतिस्पर्धा कर पाएगी। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण इस दौर में जब बांग्लादेश का ही उभरकर सामने आ चुका है तो सरकार के भीतर हर किसी के हाथ-पांव फूल चुके हैं।
रात के 12 बजे भी जागे कॉमर्स मिनिस्टर
इसीलिए रात के 12:00 बजे भी कॉमर्स मिनिस्टर उठते हैं, एक वीडियो बनाते हैं और कहते हैं जो ट्रेड डील हुई वह सबसे बेस्ट है। उनकी जुबान पर राहुल गांधी को लेकर अपशब्द आ ही जाते हैं – किसने बना दिया इन्हें विपक्ष का नेता?
सुबह होती है। एक बार फिर कॉमर्स मिनिस्टर जागते हैं और कहते हैं कि यह परंपरा तो बहुत पुरानी है। कहीं से कच्चा माल खरीद लीजिए, उसको प्रोसेस कीजिए, उसके बाद उसको एक्सपोर्ट कर दीजिए। रातों की नींद गायब है और दिन का चैन गायब हो चला है कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल को लेकर।
राहुल गांधी के निशाने पर सरकार के तीन मंत्री
परिस्थितियां यहीं नहीं थमती हैं। मसला तो यह है कि इन सबके बीच अब राहुल गांधी जब तथ्यों के साथ सामने उन परिस्थिति को रखने से चूक नहीं रहे कि इस देश के भीतर क्या स्थिति होने वाली है, तो एक झटके में राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए – वो चाहे कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल हों, चाहे कैबिनेट मिनिस्टर एग्रीकल्चर मिनिस्टर शिवराज सिंह चौहान हों। अब तो खुद गृह मंत्री अमित शाह भी मैदान में कूद पड़े हैं।
तमाम मंत्री, तमाम नेताओं के निशाने पर राहुल गांधी हैं और राहुल गांधी द्वारा बोले गए शब्द या तथ्यों को खारिज करने के लिए कॉमर्स मिनिस्ट्री और एग्रीकल्चर मिनिस्ट्री लग गई है। प्रधानमंत्री खामोश हैं। प्रधानमंत्री तो असम दौरे पर आज भी हैं। रोड शो चल रहा है।
एक साल पहले वाशिंगटन में खींची गई लकीर
जिस ट्रेड डील को लेकर सरकार फंस चुकी है, उस ट्रेड डील की हकीकत एक बरस पहले – फरवरी 2025 का साल – प्रधानमंत्री मोदी वाशिंगटन में थे और भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते कैसे होंगे, इसको लेकर चर्चाएं हो रही थी।
उसी चर्चा में तीन बातें निकलकर आई थीं। पहली बात भारत के एनर्जी को लेकर थी – वो एनर्जी जो अभी तक भारत रूस से सबसे ज्यादा ले रहा था, लेकिन अब उसे वेनेजुएला और अमेरिका की तरफ शिफ्ट होना है क्योंकि ट्रंप चाहते हैं।
डिफेंस सर्किल को लेकर चर्चा हो रही थी कि वही डिफेंस जिसमें भारत दुनिया के दूसरे देशों से जो हथियार खरीदता है, वो अगले 10 वर्षों में धीरे-धीरे शिफ्ट हो जाए अमेरिका की तरफ। और इन दो परिस्थितियों के अलावा भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते 500 बिलियन डॉलर तक कैसे और किस तेजी से पहुंच जाएंगे, इसको लेकर भी चर्चा हो रही थी।
मोदी का वादा: 500 बिलियन डॉलर तक पहुंचाएंगे व्यापार
साल भर पहले दुनिया भर के मीडिया के सामने वाशिंगटन में वाइट हाउस के बीच प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों का खुला जिक्र कर रहे थे। उस वक्त डील का कोई जिक्र नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था – “आज हमने द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक दो गुना से भी अधिक बढ़ाकर 500 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। हमारी टीमें एक पारस्परिक लाभकारी ट्रेड एग्रीमेंट को शीघ्र संपन्न करने पर काम करेंगी।”
6 फरवरी की हिस्टोरिक डील पर प्रधानमंत्री की खामोशी
लेकिन डील में मौजूदा वक्त में जो 6 फरवरी को भारत और अमेरिका के बीच जो हिस्टोरिक डील हुई है, उसमें जिन बातों का जिक्र किया गया है – 6 फरवरी से लेकर आज तक प्रधानमंत्री ने अमेरिका के साथ हुई इस डील पर कुछ भी नहीं कहा।
अगर कहा तो वह सोशल मीडिया या कहें Twitter के जरिए या X पर जो लिखा, उसमें अमेरिकी राष्ट्रपति को बधाई दी कि चलिए यह डील हो गई, बहुत शानदार है। ना वो ऑयल इंपोर्ट को लेकर कुछ कह पाए, ना ही वह डिफेंस सेक्टर को लेकर कह पाए, ना ही एग्रीकल्चर सेक्टर को लेकर कह पाए। ना ही टेक्सटाइल सेक्टर के मद्देनजर जो नया सवाल बांग्लादेश को लेकर उभर रहा है, उस पर वह कुछ भी कह पाए।
पीयूष गोयल का रात 12:24 का ट्वीट
कल रात 12:00 बज रहे थे और रात के 12:24 पर एक ट्वीट करते हैं खुद कॉमर्स मिनिस्टर। शुरुआत में ही गाली देते हैं विपक्ष के नेता राहुल गांधी को – कैसे व्यक्ति को एलओपी बना दिया गया है।
पीयूष गोयल ने ट्वीट में लिखा – “मिस्टर राहुल गांधी हैज वंस अगेन रोल आउट अ स्टेज मैनेज्ड, मोस्ट आर्टिफिशियल एंड फेक नैरेटिव। मैं आज तक ये समझ नहीं पाया हूं कि राहुल गांधी जी को, इतने नासमझ व्यक्ति को लीडर ऑफ अपोजिशन कैसे बनाया गया है।”
बांग्लादेश से भारत का कपास व्यापार खत्म
सुबह होती है। सुबह होने पर वो समझाना शुरू करते हैं – “भारत की तो कॉटन की क्षमता भी बढ़ेगी। कॉटन की रिक्वायरमेंट भी बढ़ेगी और यह जो नीति है – आयात करके प्रोसेस करके निर्यात करना – यह फॉरेन ट्रेड पॉलिसी में सदियों से चले आ रही है।”
मुश्किल यह है कि अगर आप एक बरस पहले के आंकड़े को समझें भारत और बांग्लादेश के, और इस डील को समझें तो इस डील में व्यवस्था की गई है कि जो अमेरिका से फाइबर लेगा यानी जो कपास फाइबर है या जो सूती धागा जिसको कॉटन यार्न कहते हैं जो लेगा वहां से, और इसके साथ-साथ जो सूती बुना हुआ कपड़ा भी लेगा – वह जब उसको प्रोसेस करके अमेरिका को भेजेगा तो उसको 0% ही वहां पर टैरिफ देनी होगी।
बांग्लादेश का व्यापार: 655 मिलियन डॉलर का झटका
दरअसल बांग्लादेश भारत से जो कपास फाइबर होता है, पूरे वर्ल्ड से वो लगभग 2.5 बिलियन डॉलर का कॉटन फाइबर वो खरीदता है यानी इंपोर्ट करता है। उसमें भारत सबसे ज्यादा है – 655 मिलियन डॉलर का भारत एक्सपोर्ट करता है कॉटन फाइबर। दूसरे नंबर पर ब्राजील है जो 604 मिलियन डॉलर का करता है। तीसरे नंबर पर अमेरिका है जो 255 मिलियन डॉलर का करता है। तो यह कपास फाइबर जो भारत भेज रहा था 655 मिलियन डॉलर का, अब वो बंद हो गया।
इसके बाद आइए कॉटन यार्न जिसको सूती धागा कहते हैं। यह तकरीबन बांग्लादेश जो इंपोर्ट करता है, वह 1.8 बिलियन डॉलर का है। उसमें सबसे ज्यादा भारत का ही सूती धागा बांग्लादेश जाता है जो तकरीबन 1.6 बिलियन डॉलर है। यानी 90% से ज्यादा सूती धागा भारत का ही बांग्लादेश जाता है। यह भी बंद हो गया।
राहुल गांधी का सीधा सवाल
तीसरी परिस्थिति आती है वूवन कॉटन फैब्रिक यानी सूती बुना हुआ कपड़ा। बांग्लादेश इंपोर्ट करता है 1.3 बिलियन डॉलर जिसमें भारत 194 मिलियन डॉलर का देता है। मैक्सिमम चाइना देता है 601 मिलियन डॉलर का। भारत का रास्ता यहां भी बंद हो गया। अमेरिका से उसने सामान मंगा लिया।
राहुल गांधी ने पीयूष गोयल का नाम लेकर कहा – “पीयूष गोयल जी झूठ मत बोलिए। इसलिए मैं इसको सरेंडर कहता हूं क्योंकि यह डील या तो कपास के किसान को मारेगा या टेक्सटाइल इंडस्ट्री को मारेगा या फिर दोनों को उड़ा देगा। इनके मंत्री को यह भी नहीं मालूम कि बांग्लादेश अब हिंदुस्तान से कपास नहीं खरीदेगा और उन्होंने निर्णय ले लिया है कि वो यूएस से कॉटन इंपोर्ट करेंगे। यह है यूएस डील, नरेंद्र मोदी जी की डील।”
अडानी और एप्सटीन फाइल: तीन मोर्चे पर सरकार
यहीं से राजनीति की शुरुआत होती है और अंतरराष्ट्रीय डील वह भी यूएस डील को लेकर भारत की अंदरूनी राजनीति का तापमान गर्म होना शुरू हो जाता है। तब यह सवाल खड़ा होता है कि क्या वाकई भारत ने जो अमेरिका के साथ डील की है, उसमें भारत सरकार की गर्दन अमेरिका ने पकड़ रखी है।
जो मामले इस दौर में उभरकर सामने आ रहे हैं या आने वाले हैं – उसमें अमेरिकी अदालत में फंसा हुआ अडानी का मामला हो जिसका जिक्र राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी से जोड़ देते हैं, और दूसरी तरफ एप्सटीन फाइल जिसमें अभी बहुत सारे कच्चे चिट्ठे आने वाले हैं।
साल भर पहले वाइट हाउस में असहज करने वाला सवाल
बरस भर पहले पहली बार जब फरवरी 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री मोदी खड़े थे, उस वक्त एक असहज करने वाला सवाल भी पूछा गया। अमेरिकन जर्नलिस्ट ने जब यह सवाल उठाया था – “हैव यू आस्क्ड द प्रेसिडेंट टू टेक एक्शन ऑन दैट केस?” – तो प्रधानमंत्री की तरफ से जो जवाब आया था:
“पहली बात है – भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हमारे संस्कार हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की है। हम पूरे विश्व को अपना एक परिवार मानते हैं। हर भारतीय को मैं अपना मानता हूं। दूसरी बात है – ऐसे व्यक्तिगत मामलों के लिए दो देश के मुखिया ना मिलते हैं, ना बैठते हैं, ना बात करते हैं।”
तीन मोर्चों पर सरकार की परीक्षा
यह सवाल तीन बातों की तरफ इंगित करता है जो बरस भर के बाद भारत की राजनीति, भारत के भीतर राजनीतिक तौर पर उथल-पुथल मचा चुकी है। सरकार के सामने एक ऐसा त्रिकोण है जिसमें वह खुद फंस चुकी है – अडानी का मामला, ट्रेड डील का मामला और तीसरा मामला एप्सटीन का मामला है। इन तीनों की परिस्थिति के साथ किसी न किसी रूप में प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी है।
उनकी छवि तारतार न हो जाए, इसको, उस राजनीति को बचाना है जो इस वक्त सत्ताधारी है। तो ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रेड डील पर पूरे तरीके से खामोशी पर्त ली। एप्सटीन फाइल में जब पहली बार जिक्र हुआ तो हरदीप पुरी तो सामने आ गए।
शिवराज सिंह चौहान और अमित शाह का हमला
एग्रीकल्चर मिनिस्टर हो, चाहे होम मिनिस्टर हो। शिवराज सिंह चौहान ने कहा – “राहुल गांधी लगातार झूठ बोल रहे हैं। बार-बार बोल रहे हैं। बेशर्मी से झूठ बोल रहे हैं और वीडियो से भी उनका झूठ साफ नजर आता है।”
अमित शाह ने भी कहा – “भाइयों बहनों, कांग्रेस के नेता राहुल गांधी हर रोज झूठ बोलने की एक नई परंपरा शुरू करें।”
यानी सरकार ट्रेड डील को लेकर जवाब नहीं दे रही है। ट्रेड डील के ऊपर जो शख्स कह रहा है, उस शख्स को निशाने पर लेकर कह रही है कि हम सही हैं।
बलि का बकरा कौन बनेगा?
राजनीति के इस मोड़ का मतलब सिर्फ और सिर्फ दो ही परिस्थिति होती है। पहली परिस्थिति – सरकार अंदरूनी राजनीति में पहली बार संकट में है। दूसरी परिस्थिति – अंतरराष्ट्रीय तौर पर जो ताकतें भारत के साथ डील कर रही थी, डील कर रही है या भारत की जो पूरी 10-11 बरस की राजनीति जिस अमेरिका के साथ चल रही थी, उस अमेरिका को क्या अब लगने लगा कि जितना उपयोग होना था वो मौजूदा राजनीतिक सत्ता का हो गया।
क्या वाकई ऐसी स्थिति है कि जितना पा सकते थे पा लिए? अब इसके बाद यह काम तो कोई भी करेगा लेकिन वह नए नजरिए से करेगा।
11 वर्षों में पहली बार इस्तीफे की बात
बीते 11 वर्षों में कभी किसी का इस्तीफा अगर नहीं हुआ तो क्या किसी इस्तीफे से कोई ऑक्सीजन मिल सकता है या नहीं मिल सकता है? मैसेज तो यह भी है कि डील तो हो गई और डील तो होगी। घेराबंदी तो हो चुकी है। घेराबंदी तो कर चुके हैं।
क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया के भीतर भारत की वो राजनीति ही डगमगा गई जो अपने पड़ोसी देशों को लेकर अभी तक चल रही थी – वो बांग्लादेश या पाकिस्तान या चीन ही क्यों न हो। इस पूरी प्रक्रिया में भारत की जो वैचारिक और विरासत की परिस्थिति में जो अंतरराष्ट्रीय संबंध रूस के साथ थे, ईरान के साथ थे, वह भी तो डगमगा गए।
प्रधानमंत्री असम में, मंत्री मैदान में
इसीलिए प्रधानमंत्री खामोश तो हैं, लेकिन वह जानते हैं कि असल ऊर्जा तो चुनावी जीत से ही तय होती है। इसीलिए तो आज वो असम की सड़कों पर नजर आए।
यानी भारत की सत्ता का चुनावी जीत का नजरिया और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अमेरिका का भारत की सत्ता को लेकर नजरिया – दोनों दो अलग-अलग रास्तों पर निकल चुका है। सवाल सिर्फ इतना है – इसकी उम्र कितनी होगी?
मुख्य बातें (Key Points)
- कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल रात 12:24 बजे ट्वीट करके राहुल गांधी पर हमला करते हैं, सुबह फिर सफाई देते हैं – नींद और चैन गायब है।
- बांग्लादेश ने भारत से कपास खरीदना बंद किया – 655 मिलियन डॉलर का कॉटन फाइबर, 1.6 बिलियन डॉलर का सूती धागा का नुकसान।
- US ट्रेड डील के तहत जो अमेरिका से कच्चा माल लेगा उसे 0% टैरिफ मिलेगा, भारतीय कच्चे माल पर 18% टैरिफ लगेगा – किसान या टेक्सटाइल इंडस्ट्री, किसी एक को नुकसान पक्का।
- सरकार तीन मोर्चों पर फंसी – अडानी केस, ट्रेड डील और एप्सटीन फाइल, प्रधानमंत्री खामोश, मंत्री मैदान में।








