India Foreign Policy Crisis : भारत की विदेश नीति इस समय एक बड़े मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के भीतर ‘विश्वगुरु’ का दावा करते हैं, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति लगातार कमजोर होती दिख रही है। वेनेजुएला से तेल बंद, ईरान से तेल बंद, अब रूस से भी तेल खरीदना रोक दिया गया और चाबहार पोर्ट से भी भारत बाहर हो गया है।
यह सब कुछ अमेरिका के एक इशारे पर हुआ है। सवाल यह है कि क्या 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला भारत वाकई इतना मजबूत है जितना बताया जाता है?
वेनेजुएला, ईरान और रूस – तीनों से तेल बंद
एक वक्त था जब भारत वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदता था। साल 2019 में अमेरिका ने वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगाया और भारत ने तुरंत तेल खरीदना बंद कर दिया।
यही कहानी ईरान के साथ भी दोहराई गई। 2019 में ही अमेरिकी प्रतिबंध के बाद भारत ने ईरान से भी तेल आयात रोक दिया।
सबसे ताजा मामला रूस का है। भारत दुनिया के बाजार भाव से 30% कम कीमत पर रूस से तेल खरीद रहा था। लेकिन जैसे ही अमेरिका ने 50% टैरिफ की धमकी दी, भारत ने यह सौदा भी बंद कर दिया।
चाबहार पोर्ट से बाहर होना – सबसे बड़ा झटका
भारत ने 2016 में ईरान और अफगानिस्तान के साथ मिलकर चाबहार बंदरगाह को लेकर एक ऐतिहासिक समझौता किया था। इसमें 700 करोड़ रुपये एक टर्मिनल के लिए और 1250 करोड़ रुपये बंदरगाह विकास के लिए कर्ज देने का ऐलान हुआ था।
यह समझौता पाकिस्तान को बायपास करके मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंचने का भारत का सपना था। लगभग 7200 किलोमीटर की मल्टी-मोड ट्रांसपोर्ट परियोजना थी जो भारत, ईरान, अफगानिस्तान, अर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप को जोड़ती।
लेकिन अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाया और 26 अप्रैल 2026 तक भारत को दी गई छूट खत्म होने का संकेत दिया। नतीजा यह हुआ कि भारत ने एक झटके में अपने हाथ खींच लिए।
चीन के साथ अलग बर्ताव क्यों?
यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। चीन अकेला देश है जो ईरान से सबसे ज्यादा सस्ता तेल खरीदता है। लेकिन अमेरिका ने कभी चीन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया।
चीन पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट भी चला रहा है और रूस से भी तेल खरीद रहा है। तुर्की भी रूस से भारत से ज्यादा तेल खरीद रहा है और उस पर भी अमेरिका ने कभी सख्ती नहीं की। तो फिर वह कौन सी परिस्थिति है जिसमें सिर्फ भारत को झुकना पड़ता है?
BRICS में भी पीछे हटना पड़ा
जब BRICS देशों ने डॉलर के मुकाबले एक समानांतर करेंसी की बात की तो भारत ने शुरू में सहमति जताई। अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में हुई बैठक में भारत भी शामिल था। लेकिन जैसे ही अमेरिकी दबाव बढ़ा, भारत ने अपने हाथ खींच लिए।
इसके अलावा BRICS देशों ने जब साझा नौसैनिक अभ्यास का फैसला किया जिसमें चीन, रूस, ईरान और साउथ अफ्रीका शामिल होने वाले थे, तो भारत ने इसमें भी हिस्सा लेने से मना कर दिया।
पुतिन का नया रुख – बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव से दोस्ती
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अब खुलेआम कहा है कि वह बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव के साथ नए आर्थिक रास्ते बनाने को तैयार हैं।
ये वही देश हैं जिनके साथ भारत के संबंध इस समय तनावपूर्ण हैं। बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच संबंध प्रगाढ़ हो गए हैं। पाकिस्तान और चीन पहले से ही करीब हैं।
यानी जो रूस भारत का पुराना दोस्त माना जाता था, वह भी अब भारत के विरोधियों के साथ संबंध बना रहा है।
4 ट्रिलियन बनाम 20 और 30 ट्रिलियन
भारत 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था होने का दावा करता है। लेकिन हकीकत यह है कि भारत के दरवाजे पर 20 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला चीन खड़ा है।
और 30 ट्रिलियन डॉलर की महाशक्ति अमेरिका भारत को लगातार झुकने के लिए कह रहा है। एक रिपोर्ट में तो यहां तक लिखा गया कि “उसने झुकने को कहा, ये रेंगने लगे।”
चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा पहली बार 100 बिलियन डॉलर यानी लगभग 9 लाख करोड़ रुपये को पार कर चुका है। भारत की ‘मेक इन इंडिया’ पहल चीनी कच्चे माल पर निर्भर है।
विदेश मंत्री जयशंकर पर सवाल
विदेश मंत्री एस. जयशंकर 1977 में भारतीय विदेश सेवा में आए थे। वह सिंगापुर में हाई कमिश्नर रहे, चेक रिपब्लिक और चीन में राजदूत रहे, अमेरिका में भी रहे।
लेकिन सवाल यह है कि वह एक राजनेता नहीं बल्कि नौकरशाह हैं। और नौकरशाही हमेशा बीच का रास्ता ढूंढती है जिससे वह खुद बनी रहे।
क्या भारत की पूरी विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति उस नौकरशाही के हवाले हो गई है जो सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने की जद्दोजहद में सब कुछ चला रही है?
ऑपरेशन सिंदूर में भी सवाल
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने पाकिस्तान की मदद की। भारत के सेना अध्यक्ष ने खुद इसकी पुष्टि की है कि चीन ने हथियारों और नेटवर्किंग के जरिए पाकिस्तान का साथ दिया।
उस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीच में आकर कहा कि “मैंने रुकवा दिया।” भारत ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया।
भारत कहां खड़ा है?
भारत SCO में है जिसकी अगुवाई चीन करता है। भारत BRICS में है। भारत QUAD में है। भारत ASEAN में है। भारत G20 और G7 में भी है। लेकिन सवाल यह है कि भारत वाकई किसके साथ है?
हर जगह से भारत को नुकसान हो रहा है। ईरान का चाबहार गया। रूस से तेल बंद। वेनेजुएला से तेल बंद। चीन पर निर्भरता बढ़ रही है। अमेरिका की हर मांग मानी जा रही है।
क्या है पृष्ठभूमि
बीते 10 वर्षों में भारत लगातार अमेरिका के जियोपॉलिटिकल नेटवर्क में घुसने की कोशिश करता रहा। एक समय ऐसा लगा जैसे भारत कहीं NATO का सदस्य न बन जाए।
प्रधानमंत्री मोदी ने 2024 के अमेरिकी चुनाव में भी एक पक्ष के साथ खड़े होने जैसा रुख दिखाया। लेकिन अमेरिका ने कभी भारत को अपने नेतृत्व वाले किसी गठबंधन में स्वतंत्र भूमिका नहीं दी। चाहे बाइडन का दौर हो, ओबामा का दौर हो या ट्रंप का – भारत को हमेशा झुकना ही पड़ा।
मुख्य बातें (Key Points)
- भारत ने अमेरिकी दबाव में वेनेजुएला, ईरान और रूस से तेल खरीदना बंद किया
- चाबहार पोर्ट से भारत का बाहर होना एक बड़ा रणनीतिक नुकसान है
- चीन के साथ व्यापार घाटा 100 बिलियन डॉलर पार कर गया है
- BRICS की करेंसी और नौसैनिक अभ्यास से भी भारत पीछे हट गया
- रूस अब बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव के साथ नए संबंध बना रहा है
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न








