Medical Education Crisis India : सरकार जोर-शोर से कहती है कि MBBS की सीटें 1 लाख 37 हजार कर दी गई हैं। मेडिकल कॉलेजों की संख्या 818 हो गई है। लेकिन संसद की स्थाई समिति की रिपोर्ट एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने रखती है – प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई का खर्चा एक करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। देशभर के 21 एम्स में 2500 से अधिक टीचिंग पोस्ट खाली पड़ी हैं। पीजी की 18,000 सीटें खाली रह गई हैं। सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ संख्या बढ़ा रहे हैं या असल में डॉक्टर तैयार कर रहे हैं?
मेडिकल का खर्चा हर साल 10 से 15 प्रतिशत बढ़ जाता है। इस बार के बजट में स्वास्थ्य का बजट 92,925 करोड़ रुपए रखा गया है, लेकिन जीडीपी के प्रतिशत के हिसाब से यह पिछले साल से भी कम है। भारत सरकार अभी भी जीडीपी का 1% भी स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करती, जबकि टारगेट 2.5% का है।
21 एम्स में 2500 टीचिंग पोस्ट खाली
स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रताप राव जाधव ने पिछले साल अगस्त में संसद में जानकारी दी कि देशभर के 21 एम्स में ढाई हजार से अधिक टीचिंग पोस्ट खाली हैं। यह 4 साल में सबसे अधिक वैकेंसी है। 40% स्वीकृत पद खाली पड़े हैं। 2561 पद पर कोई टीचर ही नहीं है।
अकेले एम्स दिल्ली में 462 पद खाली हैं। एम्स जोधपुर में 186, एम्स ऋषिकेश में 147, एम्स मंगलागिरी में 158 (51.1% वैकेंसी), एम्स भुवनेश्वर में 103 और एम्स गोरखपुर में 98 पद खाली हैं। कुछ संस्थानों में तो 50% से अधिक फैकल्टी की कमी है – एम्स अवंतीपोरा में 100% पद खाली हैं, एम्स मदुरै में 73.2%, एम्स राजकोट में 58.5%।
जनवरी 2026 में RTI के जरिए मिली जानकारी के अनुसार 11 एम्स में लगभग 40% फैकल्टी पोस्ट खाली हैं, यानी 4,099 में से 1,600 पद। ढाई हजार टीचर नहीं हैं तो छात्र क्या पढ़ते होंगे? कैसे पढ़ते होंगे?
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की हालत
24 जनवरी 2026 को रायपुर से पत्रिका की रिपोर्ट आई – छत्तीसगढ़ के 10 सरकारी मेडिकल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के 332 पद खाली हैं। इन्हें भरने के लिए विज्ञापन निकाला गया है, नहीं तो अगले सत्र के लिए मेडिकल सीटों को मान्यता नहीं मिलेगी।
19 नवंबर 2025 को दैनिक भास्कर में शशांक अवस्थी की रिपोर्ट छपी – मध्य प्रदेश में मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था चरमरा गई है। 19 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में केवल सात में छात्रों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त संख्या में टीचर हैं। 12 कॉलेजों में शिक्षकों की भयंकर कमी है।
शिवपुरी और सिंगौली में नया मेडिकल कॉलेज बना है, वहां 90% पद खाली हैं। सागर और छिंदवाड़ा के मेडिकल कॉलेज में 50% पोस्ट खाली हैं। यह हाल है भारत के मेडिकल कॉलेजों का – बिना प्रोफेसर के, बिना असिस्टेंट प्रोफेसर के।
प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एक करोड़ की फीस
संसद की स्थाई समिति ने कहा है कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई का खर्चा एक करोड़ रुपए तक चला गया है, उससे भी ज्यादा। 2026 के लिए प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में सालाना ट्यूशन फीस 8 लाख से 25 लाख रुपए के बीच है। कुछ कॉलेज 7 लाख से 30 लाख रुपए या उससे भी अधिक सालाना चार्ज करते हैं।
पूरे MBBS कोर्स (5.5 साल) का कुल खर्चा 40 लाख से 1.25 करोड़ रुपए तक हो सकता है। NRI कोटा की सीटें और भी महंगी हैं – कर्नाटक जैसे राज्यों में NRI कोटा में सालाना 45 लाख रुपए तक फीस है।
कुछ संस्थानों के उदाहरण – नवी मुंबई के D.Y. Patil Medical College में लगभग 1.4 करोड़ रुपए और चेन्नई के Sri Ramachandra Medical College में लगभग 1.1 करोड़ रुपए पूरे MBBS प्रोग्राम के लिए फीस है।
पीजी की 18,000 सीटें खाली क्यों?
पीजी की सीटें 68,000 हैं और योग्य छात्र 2 लाख से अधिक। फिर भी 18,000 सीटें खाली रह गई हैं। कारण साफ है – करोड़ों की फीस और खराब क्वालिटी की पढ़ाई। MBBS कराकर भी आधा डॉक्टर बनाए रखना चाहते हैं।
भारत में 10 लाख लोगों पर MBBS की औसतन सिर्फ 75 सीटें हैं। कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह आंकड़ा 150 के ऊपर है। लेकिन बिहार में 10 लाख लोगों पर सिर्फ 21 सीटें हैं। जिस बिहार में 20 साल से एक ही व्यक्ति मुख्यमंत्री हैं, वहां मेडिकल शिक्षा का यह हाल है।
छात्रों का सर्वे: क्या कहते हैं आंकड़े?
फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (FAIMA) ने 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक सर्वे किया। सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले 2000 छात्रों से पूछा गया। इनमें से 90% से अधिक छात्र सरकारी कॉलेजों के थे।
नतीजे चौंकाने वाले हैं:
- सिर्फ 71% ने कहा उन्हें मरीजों को देखने का पर्याप्त मौका मिलता है
- सिर्फ 54% छात्रों ने कहा नियमित रूप से क्लास लगती है
- आधे छात्रों को समय पर स्टाइपेंड तक नहीं मिलता
- 55% छात्रों ने कहा स्टाफ की कमी है
- 74% ने माना कि वे ओवरवर्क्ड हैं
मतलब 45% छात्रों का मानना है कि नियमित क्लास नहीं होती। यह हाल है मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई का।
दिल्ली के अस्पतालों का बजट कम
टाइम्स ऑफ इंडिया की रेमा नागराजन ने दिखाया है कि दिल्ली और आसपास के जिन अस्पतालों को आम लोग ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, उनका बजट कम कर दिया गया है:
- सफदरजंग अस्पताल का बजट 7 करोड़ 83 लाख कम
- राम मनोहर लोहिया का 7 करोड़ 47 लाख कम
- LHMC का 4.1 करोड़ कम
- कलावती शरण का 94 लाख कम
यह तब है जब मेडिकल इन्फ्लेशन हर साल 10 से 15% बढ़ जाता है। इतनी तो मिडिल क्लास की सैलरी नहीं बढ़ती।
हेल्थ बजट: जीडीपी का 1% भी नहीं
इस बार के बजट में हेल्थ का बजट 92,925 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। लेकिन जीडीपी के प्रतिशत के हिसाब से देखें तो पिछले साल के बजट की तुलना में कुछ कमी आई है। अभी भारत सरकार जीडीपी का 1% भी हेल्थ पर खर्च नहीं करती। जबकि टारगेट है कभी 2.5% खर्च करेगी।
इस समय जीडीपी का 1.9% हिस्सा हेल्थ पर खर्च होता है। टारगेट था 2.5% करने का। मेडिकल रिसर्च का भी हाल बुरा है। अमेरिका अपनी जीडीपी का 0.65% हिस्सा हेल्थ केयर रिसर्च पर खर्च करता है, ब्रिटेन 0.44%। भारत में सिर्फ 0.02% – यानी 0.1% से भी कम।
कैंसर का इलाज: आम आदमी की पहुंच से दूर
लैंसेट की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में कैंसर का बोझ बढ़ता जा रहा है। साथ-साथ मरीजों पर पड़ने वाला वित्तीय भार भी। भारत में कैंसर के मरीज को हर बार प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होने पर 39 से 93,000 रुपए तक का खर्चा खुद से देना पड़ता है।
भारत में मजदूरी से होने वाली महीने की औसत कमाई सवा 25,000 रुपए है। ऐसे में अगर कैंसर के इलाज के लिए एक बार में 40,000 रुपए देना पड़े तो इलाज की उम्मीद खत्म हो जाती है। हर साल कैंसर से भारत में 74,000 लोग मर जाते हैं।
डॉक्टरों की सैलरी कम, प्राइवेट में भागे
नीति आयोग ने एक अनुमान लगाया है कि सरकारी अस्पतालों में फैकल्टी की सैलरी प्राइवेट वालों की तुलना में 30 से 50% कम है। पैसा कम मिलता है तो डॉक्टर नौकरी छोड़कर प्राइवेट अस्पताल चले जाते हैं।
लेकिन बात केवल सैलरी की नहीं है। डॉक्टर इसलिए भी प्राइवेट अस्पताल चला जाता है कि डॉक्टर की तरह काम करने का माहौल अब सरकारी अस्पतालों में कम होता जा रहा है। इसके बाद भी बहुत सारे डॉक्टर ऐसे हैं जो कम सैलरी की नौकरी करते हैं, करोड़ों रुपए कमाने का अवसर छोड़कर मामूली वेतन पर घंटों काम करते हैं।
करीब 25,000 युवा विदेश में पढ़ने जाते हैं
हर साल करीब 25,000 युवा विदेश में मेडिकल एजुकेशन के लिए जाते हैं। ऐसे देशों में जाना पड़ रहा है जहां की शिक्षा व्यवस्था भारत से बेहतर नहीं है। लेकिन भारत में सीटों की कमी और करोड़ों की फीस के कारण विदेश जाना पड़ता है।
प्रत्येक 22 नीट यूजी आवेदकों में से केवल एक को ही भारत के मेडिकल कॉलेजों में सीट मिलती है। यह प्रतिस्पर्धा इतनी अधिक है कि कई छात्र विदेश में पढ़ाई करने को मजबूर होते हैं।
मेडिकल कॉलेज बनाने का फॉर्मूला
12 साल में 157 जिला और रेफरल अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज बना दिया गया। लेकिन इनमें से 137 ही काम कर रहे हैं। एक सरकारी अस्पताल में कुछ उपकरण, कुछ फर्नीचर, कुछ कमरे बना दो – मेडिकल कॉलेज बना दो।
पिछले साल अप्रैल में संसद में कहा गया कि स्वास्थ्य मंत्रालय MBBS सीटों को बढ़ाने के लिए मौजूदा सरकारी मेडिकल कॉलेजों का उन्नयन करने के लिए केंद्रीय प्रायोजित योजना संचालित करता है। इस योजना के अंतर्गत प्रति सीट ₹1 करोड़ 20 लाख की लागत सीमा के साथ सिविल कार्यों, उपकरण और फर्नीचर के लिए सहायता प्रदान की जाती है।
10 साल पहले दरभंगा एम्स की घोषणा हुई। अब जाकर इसका मुख्य द्वार बना है, जिसे लेकर सोशल मीडिया में मजाक चल रहा है।
नियम बदले: अनुभव नहीं तो भी प्रोफेसर
अब तो नियम बदल गए हैं कि जिन डॉक्टरों को पढ़ाने का अनुभव नहीं, उन्हें भी एसोसिएट प्रोफेसर बनाया जाएगा। अगर कोई 2 साल से काम कर रहा है तो उसे बिना सीनियर रेजिडेंसी के असिस्टेंट प्रोफेसर बना दिया जा सकता है।
कुछ दिन बाद यह हालत होगी कि MBBS फर्स्ट ईयर के छात्र को कोई लाइब्रेरी में पढ़ता हुआ देख लेगा तो पकड़कर प्रोफेसर बना देगा। इनकी यह हालत रही तो एंबुलेंस को भी मेडिकल कॉलेज का दर्जा दे देंगे।
मुख्य बातें (Key Points)
- देशभर के 21 एम्स में 2500 से अधिक टीचिंग पोस्ट खाली, 40% स्वीकृत पद रिक्त
- प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में MBBS की फीस एक करोड़ रुपए तक, NRI कोटा में और भी महंगी
- पीजी की 18,000 सीटें खाली, करोड़ों की फीस और खराब क्वालिटी की पढ़ाई के कारण
- भारत सरकार जीडीपी का 1% भी हेल्थ पर खर्च नहीं करती, टारगेट 2.5% का है
- 10 लाख लोगों पर MBBS की औसतन सिर्फ 75 सीटें, बिहार में सिर्फ 21 सीटें








