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The News Air - Breaking News - Mamata Banerjee ने Supreme Court में की बहस, SIR पर आयोग बेजवाब

Mamata Banerjee ने Supreme Court में की बहस, SIR पर आयोग बेजवाब

तीन दिन की लड़ाई के बाद कोर्ट ने दी अनुमति, 58 लाख वोटर्स के नाम काटने पर सवाल

The News Air Team by The News Air Team
बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
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Mamata Banerjee
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Mamata Banerjee Supreme Court SIR – पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार 4 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के खिलाफ जमकर दलील रखी और चुनाव आयोग की धज्जियां उड़ा दीं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने ममता को बोलने की अनुमति दी और उन्होंने जिस तरह से तथ्य रखे, आयोग के पास कोई जवाब नहीं था। तीन दिनों से दिल्ली में तूफान की तरह SIR के मुद्दे को उठाने वाली ममता बनर्जी ने आखिरकार कोर्ट में अपनी बात रखने में सफलता पाई।

2 फरवरी को चुनाव आयोग के दफ्तर, 3 फरवरी को दिल्ली के मीडिया के सामने और 4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में – ममता बनर्जी ने हर मोर्चे पर SIR के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा कि सब कुछ खत्म हो चुका है, कहीं इंसाफ नहीं मिल रहा और इंसाफ दरवाजे के पीछे रो रहा है। चुनाव आयोग को “WhatsApp आयोग” बताते हुए ममता ने कहा कि उन्होंने छह पत्र लिखे लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

“मैं अपनी पार्टी के लिए नहीं, लोगों के लिए लड़ रही हूं”

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच के सामने ममता बनर्जी ने कहा, “मैं अपनी पार्टी के लिए नहीं लड़ रही हूं। मैं अपने राज्य के लोगों के लिए लड़ रही हूं।” यह कहते हुए उन्होंने आखिरी गुहार की तरह अपनी बात रखी।

ममता बनर्जी ने बताया कि चुनाव से ठीक पहले बंगाल को टारगेट किया जा रहा है। चार राज्यों में चुनाव होने हैं। 24 साल के बाद 3 महीने में SIR करने की क्या जल्दी है? जिस काम में 2 साल लगते हैं, उसे 3 महीने में क्यों किया जा रहा है? जब फसल काटने का समय है, जब लोग यहां से वहां सफर कर रहे हैं, तब यह सब क्यों किया जा रहा है?

58 लाख वोटर्स के नाम काटे गए, 1.30 करोड़ खतरे में

ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 58 लाख वोटर के नाम पहले ही काट दिए गए हैं। इन्हें अपना बचाव करने का मौका नहीं दिया गया। इसके अलावा 1 करोड़ 4 लाख वोटर को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर नोटिस दिया गया है और उनके नाम भी कट जाने का खतरा है।

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उन्होंने कहा कि बंगाल में टाइटल की स्पेलिंग अलग-अलग होती है। ममता बनर्जी को बंगाली में ममता बंदोपाध्याय लिखा जाता है। चटर्जी को चट्टोपाध्याय लिखा जाता है। इसी आधार पर लाखों नाम काट दिए गए। एआई को बैठाकर जिन बेटियों की शादी हुई और वे ससुराल गईं, उनका एड्रेस शिफ्ट हुआ तो नाम कैंसिल कर दिया। जिन महिलाओं ने शादी के बाद टाइटल चेंज किया, पति के साथ सरनेम लिया, उनके नाम भी कैंसिल कर दिए गए।

जिंदा लोगों को मृतक घोषित किया गया

ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कई लोग ऐसे हैं जो जिंदा हैं लेकिन उनके नाम काट दिए गए क्योंकि उन्हें मृतक घोषित कर दिया गया। 3 फरवरी को उन्होंने ऐसे लोगों को प्रेस कॉन्फ्रेंस में बुलाया था और उनसे हाथ उठाकर दिखाने को कहा था कि किसे किसे मृतक घोषित किया गया है।

ममता ने कहा कि यह प्रक्रिया महिला विरोधी है। युवा पीढ़ी को निशाना बनाया जा रहा है। माइनॉरिटीज को पूरा निकाल दिया गया। उन्होंने SC, ST और माइनॉरिटी समुदाय के कई लोगों के नाम गिनाए जिनके नाम काट दिए गए हैं।

चीफ जस्टिस ने कहा – “ऐसा नहीं हो सकता”

जब ममता बनर्जी ने बताया कि किस तरह स्पेलिंग और टाइटल बदलने के आधार पर नोटिस दिए जा रहे हैं और नाम काटे जा रहे हैं, तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत हैरान हो गए। उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं हो सकता।”

चीफ जस्टिस ने ममता बनर्जी का शुक्रिया अदा किया कि उन्होंने यह बताया कि उच्चारण या डायलेक्ट यानी बोली के कारण नामों में आने वाले बदलावों को एआई ठीक से रजिस्टर नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि अगर यह हो रहा है तो इसका उपाय निकालना ही होगा। आयोग इस जिम्मेदारी से भागेगा नहीं। इस तरह की गलती के कारण वैध वोटर बाहर नहीं होने चाहिए।

आयोग ने मांगा एक हफ्ते का समय, कोर्ट ने कहा – नहीं

आयोग के वकील डी एस नायडू ने कहा, “हमें इन दलीलों की जानकारी नहीं है। हम एक हफ्ते में इस पर आदेश लेकर पेश होंगे।”

जवाब में चीफ जस्टिस ने साफ कहा कि एक हफ्ता बहुत लेट हो जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया की एक टाइमलाइन है। हमने 10 दिन का विस्तार दिया था। 4 दिन ही बाकी हैं। उसके बाद सिर्फ 11 दिन का समय है। हम आपको एक हफ्ते की लग्जरी नहीं दे सकते। अगर बोली के कारण इस तरह की गड़बड़ी हो रही है तो सैद्धांतिक रूप से आपको इसका उपाय खोजना होगा।

माइक्रो ऑब्जर्वर्स का विवादास्पद रोल

ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में माइक्रो ऑब्जर्वर का मामला भी उठाया। उन्होंने कहा कि ईआरओ (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) की सारी शक्तियां माइक्रो ऑब्जर्वर ने ले ली हैं। ये माइक्रो ऑब्जर्वर बीजेपी शासित प्रदेशों से भेजे गए हैं जो ऑफिस में बैठकर नाम काट रहे हैं।

ममता ने कहा, “मेरे पास कंक्रीट एविडेंस है। मेरे पास वीडियो है। जहां पर माइक्रो ऑब्जर्वर्स का पोर्टल और लॉगिन आईडी क्रिएट किया गया है। अगर ईआरओ माइक्रो ऑब्जर्वर के कमेंट और ऑब्जरवेशन से अग्री करता है तो नाम ऑटोमेटिकली डिलीट हो जाता है।”

उन्होंने कहा कि डीईओ (डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर) नामों को क्लियर तक नहीं कर पा रहे। एआई से नाम डिलीट हो रहे हैं। उन्हें फॉर्म सिक्स अपलोड नहीं करने दिया जा रहा है।

कोर्ट के तीन बड़े आदेश – ममता की जीत

चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर जरूरत हुई तो हम आदेश देंगे कि हर कागज पर निर्धारित बीएलओ अपना साइन करेगा। उन्होंने आयोग के वकील से कहा कि नाम की स्पेलिंग में मिसमैच हो तो हियरिंग के नोटिस नहीं दिए जाएं। अपने अफसरों से कहिए कि वे संवेदनशीलता से पेश आएं।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने राज्य सरकार से कहा है कि उन अधिकारियों की सूची दीजिए जिन्हें तैनात किया जा सकता है। एक बार वे आ गए तो हो सकता है माइक्रो ऑब्जर्वर की जरूरत ना पड़े।

कोर्ट के यह तीन आदेश ममता बनर्जी के लिए बड़ी जीत हैं। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है और 10 फरवरी तक जवाब मांगा है। अगली सुनवाई सोमवार 9 फरवरी को तय की गई है।

2 फरवरी को चुनाव आयोग में क्या हुआ?

2 फरवरी को जब ममता बनर्जी अपनी पार्टी के सांसदों के साथ चुनाव आयोग के दफ्तर गईं, तब उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त पर अपमानित करने का आरोप लगाया। वह बैठक से उठकर चली आईं और बाहर प्रेस से बात करते हुए अपना आपा भी खो बैठीं।

ममता ने कहा, “ये चुनाव आयोग से हमारा कुछ उम्मीद नहीं है। ये बीजेपी का पूरा दलाल है। वो ऐसे एटीट्यूड लेकर बात करते हैं जैसे वे जमींदार हैं और हम लोग सब नौकर हैं।”

उन्होंने कहा कि चुनाव आयुक्त ने उन्हें धमकाया। ममता ने सवाल किया कि जब बीजेपी चुनाव आयोग से मिलती है तो प्रेस मीडिया को अंदर क्यों अनुमति दी जाती है? लेकिन जब हम मिलने गए तो प्रेस को अंदर क्यों नहीं आने दिया गया?

3 फरवरी को मीडिया के सामने सवा घंटे तक बैठीं

3 फरवरी को ममता बनर्जी SIR से प्रभावित लोगों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठ गईं। इनमें से कई लोग जिंदा थे लेकिन उनके नाम काट दिए गए थे। करीब सवा घंटे तक ममता बनर्जी मीडिया के सामने बैठी रहीं और एक-एक सवाल का जवाब देती रहीं।

ममता ने विस्तार से प्रेस को बताया कि ऐसे लाखों मतदाताओं को वे दिल्ली ला सकती हैं जिनके नाम एआई के इस्तेमाल से डिलीट किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रेस कॉन्फ्रेंस भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 साल में एक भी नहीं कर पाए हैं।

TMC सीटों पर 40-70 हजार, BJP सीटों पर 3-11 हजार नाम कटे

ममता बनर्जी ने अपने ही विधानसभा क्षेत्र भवानीपुर का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जिन सीटों पर तृणमूल कांग्रेस जीतती रही है, वहां पर 40 से 70 हजार वोटर के नाम काटे गए। जिन सीटों पर बीजेपी जीतती रही है, वहां 3 से 11,000 ही नाम कटे।

उन्होंने कहा, “मेरी कॉन्स्टिट्यूएंसी भवानीपुर में पहले 40,000 नाम यूनिलैटरली डिलीट कर दिए। उसके बाद लॉजिकल मिसमैच और मिसमैप के नाम पर हर तृणमूल कांग्रेस की सीट पर 70,000 से 1 लाख वोटर्स के नाम डिलीट किए जा रहे हैं। अगर बीजेपी की सीट है तो 2000, 3000, 11000 नाम कटे हैं।”

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को दी भ्रामक जानकारी?

18 जनवरी को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया था कि पश्चिम बंगाल में ऑटोमेटिक सिस्टम द्वारा नोटिस भेजने में एआई का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। ईआरओ की निगरानी में उनकी जांच परख के बाद ही नोटिस भेजे जा रहे हैं।

लेकिन रिपोर्टर्स कलेक्टिव की आयुषी कार ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को भ्रामक जानकारी दी है। पश्चिम बंगाल में हो रहे SIR में लॉजिकल गड़बड़ी के मामलों में ऑन मास यानी व्यापक रूप से केंद्रीय स्तर के बिना टेस्ट किए गए एल्गोरिदम्स द्वारा ऑटोमेटिक सिस्टम से नोटिस भेजे जा रहे हैं।

ईआरओ की निगरानी में नोटिस नहीं जा पा रहे हैं क्योंकि उन्हें एक ही दिन में कई हजार नोटिस पर साइन करने होते हैं। इसलिए ईआरओ के पास ऑटोमेटिक सिस्टम से नोटिस भेजने के अलावा कोई चारा नहीं।

150 BLO की मौत का दावा

ममता बनर्जी ने दावा किया कि SIR के दौरान पश्चिम बंगाल में 150 से अधिक बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) की मौत हुई। काम के दबाव को कारण बताया जा रहा है। बीएलओ को WhatsApp से जानकारी दी जाती है जिससे जमीन पर अफरातफरी का माहौल रहता है।

ममता ने कहा, “150 से अधिक लोग पहले ही मर चुके हैं। कुछ ने सुसाइड किया, कुछ को स्ट्रोक आया। बहुत सारे लोग अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं। यह NRC से भी ज्यादा खतरनाक है।”

असम में SIR क्यों नहीं?

ममता बनर्जी ने बार-बार सवाल उठाया कि असम में SIR क्यों नहीं हो रहा है? पश्चिम बंगाल के साथ इस साल असम में भी चुनाव होने हैं। अगर आयोग का इरादा SIR के मकसद से जुड़ा होता तो SIR असम में भी होता। असम और बंगाल दोनों राज्यों के चुनाव एक साथ होंगे मगर बंगाल में SIR हो रहा है और असम में नहीं। यह राजनीति नहीं तो क्या है?

UP, MP, गुजरात में भी नाम कटे

ममता बनर्जी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में 6 जनवरी को SIR का पहला ड्राफ्ट जारी हुआ और 2 करोड़ 89 लाख लोगों के नाम कट गए। मध्य प्रदेश और गुजरात से भी वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने की खबरें आ रही हैं। फॉर्म सेवन का सियासी इस्तेमाल किया जा रहा है।

उन्होंने सहारनपुर का उदाहरण दिया। सहारनपुर में सात विधानसभाएं हैं। नगर विधानसभा की सीट पर 1 लाख से अधिक नाम कट गए। देवबंद विधानसभा सीट पर 50,839 मतदाता लिस्ट से हट चुके हैं। नकुड़ विधानसभा में करीब 44,000 मतदाता ड्राफ्ट लिस्ट से हटा दिए गए हैं।

घुसपैठिए कहां हैं?

ममता बनर्जी ने सवाल किया कि कितने घुसपैठिए मिले हैं? जितने नाम कटे हैं उनमें से कितने रोहिंग्या मिले हैं? उन्होंने कहा कि सीमाओं की सुरक्षा केंद्र सरकार के हाथ में है। बॉर्डर BSF के हाथ में है। पोर्ट CISF के हाथ में है। एविएशन कस्टम्स एंड एविएशन मिनिस्ट्री के हाथ में है। रेलवे केंद्र के हाथ में है।

ममता ने कहा, “अगर घुसपैठिए बंगाल में हैं तो आप लोगों ने क्या किया? हमारे हाथ में तो कुछ नहीं है। पहले तो यह लोग बाहर से जो आते थे उसका डाटा शेयर करते थे। लेकिन 10 साल से बंद कर दिया। मैंने बहुत बार रिक्वेस्ट किया था। हमको कोई डाटा शेयर नहीं करता है।”

मीडिया ने कवरेज नहीं दिया

ममता बनर्जी ने कहा कि मीडिया ने इस मुद्दे को कवरेज नहीं दिया। वे कहती रहीं कि SIR मुद्दा नहीं है। उन्होंने कहा, “बंगाल मीडिया सब कुछ जानती है लेकिन आम लोगों को नहीं बताती क्योंकि नेगेटिव नैरेटिव चल रहा है। सोशल मीडिया के जरिए नेगेटिव पब्लिसिटी हो रही है। कभी झारखंड की तस्वीर बंगाल के नाम पर दिखाते हैं। बांग्लादेश की तस्वीर बंगाल के नाम पर दिखाते हैं। यूपी की तस्वीर बंगाल के नाम पर दिखाते हैं। यह बिल्कुल फेक है।”

ममता ने कहा, “हम हर दरवाजा खटखटा रहे हैं। अगर हमें इंसाफ नहीं मिलता है तो मीडिया भी एक बड़ा स्तंभ है। इसलिए हम आपसे मिलने आए हैं। हम कुछ सिंबॉलिक विक्टिम्स को साथ लाए हैं ताकि आप अपनी आंखों से देख सकें।”

वोटर लिस्ट बन गई नया हथियार

ममता बनर्जी की प्रेस कॉन्फ्रेंस को सुनकर यही लगा कि उनकी सुनवाई चारों तरफ बंद हो चुकी है। वो बार-बार कहती रहीं – कहां जाकर कहें, किससे बोलें, कोई सुनता नहीं। एक मुख्यमंत्री की यह हालत कर दी गई।

ममता ने कहा कि वोटर लिस्ट नया हथियार बनने लगा है। SIR से जुड़े कई गंभीर सवालों के जवाब आश्वस्त नहीं करते हैं और मिलते भी नहीं। ऐसा लगता है कि चुनाव में अब मतदान से पहले ही वोटर लिस्ट के बहाने कोई बड़ा खेल होने जा रहा है।

अभिषेक बनर्जी ने समझाया माइक्रो ऑब्जर्वर का रोल

3 फरवरी को अभिषेक बनर्जी ने माइक्रो ऑब्जर्वर की भूमिका पर विस्तार से मीडिया को समझाया था। उन्होंने बताया कि SIR का जो नोटिफिकेशन है 27 तारीख का, उसमें फाइव ए5 बी है जहां पर साफ लिखा गया है कि ईआरओ फाइनल अथॉरिटी हैं। वे क्वाजी जुडिशियल अथॉरिटीज हैं।

अभिषेक ने कहा, “अब ईआरओ को सुपरसीड करने के लिए माइक्रो ऑब्जर्वर्स को बिठाकर इनके बैक एंड से लॉग इन खुलवाया गया है कि मुझे जो चीज मन करेगा मैं केस को डिसमिस कर दूंगा, डिलीट कर दूंगा, किसी को पता नहीं चलेगा।”

उन्होंने बताया कि ECI नेट वाली वेबसाइट में दो अलग कॉलम डाल दिए गए हैं। एक है माइक्रो ऑब्जर्वर्स ऑब्जरवेशन, एक है रोल ऑब्जर्वर्स ऑब्जरवेशन। जैसे ही माइक्रो ऑब्जर्वर ऑब्जरवेशन देता है और ईआरओ उससे अग्री नहीं करता तो ईआरओ के पास लॉग इन जाता है। वहां पर दो ऑप्शन आते हैं – “I agree with the micro observer” या “I don’t agree with the micro observer”।

अभिषेक ने कहा, “अगर ईआरओ गलती से ‘I agree with the micro observer’ पर क्लिक कर देता है तो नाम ऑटोमेटिकली डिलीट हो जाता है। यह पूरी एक्सरसाइज के एसेंस के लिए बिल्कुल हानिकारक है।”

मुख्य बातें (Key Points)
  • ममता बनर्जी ने 4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में SIR के खिलाफ दलील रखी, चुनाव आयोग को “WhatsApp आयोग” बताया
  • 58 लाख वोटर्स के नाम पहले ही काटे गए, 1.30 करोड़ वोटर्स के नाम कटने का खतरा
  • TMC सीटों पर 40-70 हजार नाम कटे, BJP सीटों पर केवल 3-11 हजार नाम कटे
  • माइक्रो ऑब्जर्वर्स बीजेपी शासित राज्यों से भेजे गए, ईआरओ की शक्तियां ओवरराइड कर रहे
  • चीफ जस्टिस ने कहा – बोली के कारण नाम नहीं कटने चाहिए, वैध वोटर बाहर नहीं होने चाहिए
  • 150 BLO की मौत का दावा, काम के दबाव को कारण बताया गया
  • सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को 10 फरवरी तक जवाब देने का आदेश दिया, अगली सुनवाई 9 फरवरी को
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