Magh Mela 2026 Controversy : 21 जनवरी से पहले माघ मेला अपने सबसे बड़े स्नान पर्व मौनी अमावस्या की ओर बढ़ रहा था, लेकिन प्रयागराज के संगम पर आस्था के इस महापर्व में उस वक्त विवाद खड़ा हो गया, जब स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की शोभा यात्रा को पुलिस ने रोक दिया। 18 जनवरी को हुई इस घटना ने माघ मेले को धार्मिक आस्था और प्रशासनिक नियमों की सीधी टकराहट में ला खड़ा किया।
माघ मेला हमेशा से संगम, साधु-संतों और महास्नान के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन इस बार श्रद्धा के साथ विवाद भी बहता नजर आया। मौनी अमावस्या के दिन लाखों श्रद्धालुओं के संगम में डुबकी लगाने की तैयारी के बीच यह मामला तेजी से तूल पकड़ गया।
शोभा यात्रा पर रोक से शुरू हुआ विवाद
18 जनवरी को स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने शिविर से पहिया लगी पालकी में सवार होकर शिष्यों के साथ संगम नोज की ओर निकले थे। योजना थी कि शोभा यात्रा के साथ महास्नान किया जाएगा। रास्ते में पुलिस ने यात्रा रोक दी और तर्क दिया कि संगम नोज पर अत्यधिक भीड़ है और पहियों वाली पालकी से भगदड़ का खतरा हो सकता है।
पुलिस और शिष्यों के बीच झड़प के आरोप
शोभा यात्रा रोके जाने के बाद शिष्य आक्रोशित हो गए। आरोप है कि बैरिकेडिंग टूटी और पुलिस व शिष्यों के बीच झड़प हुई। पुलिस ने कुछ शिष्यों को हिरासत में लिया। वहीं स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने पुलिस पर दुर्व्यवहार और मारपीट के आरोप लगाए। इस घटना से आहत होकर वे अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए।
प्रशासन का पक्ष क्या है
प्रशासन ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि स्वामी को स्नान से नहीं रोका गया था। मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि आपत्ति केवल पहिया लगी पालकी पर थी, क्योंकि उस समय संगम नोज की स्थिति बेहद संवेदनशील थी और सुरक्षा सर्वोपरि थी।
शंकराचार्य पद को लेकर नया नोटिस
मामला यहीं नहीं रुका। माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को एक नया नोटिस जारी किया। नोटिस में सवाल उठाया गया कि जब ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और उस पर रोक लगी है, तो वे अपने नाम के आगे “शंकराचार्य” क्यों लिख रहे हैं। प्राधिकरण ने इसे नियमों का उल्लंघन बताते हुए 24 घंटे के भीतर नाम में सुधार और स्पष्टीकरण देने को कहा।
स्वामी का जवाब: आस्था और सम्मान का प्रश्न
स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि यह सिर्फ पद का मामला नहीं, बल्कि उनकी गरिमा और सम्मान से जुड़ा प्रश्न है। उनके अनुसार, यह कार्रवाई सीधे तौर पर उनकी धार्मिक पहचान और आस्था पर प्रहार है।
आस्था बनाम प्रशासन की टकराहट
यह पूरा विवाद अब सुरक्षा बनाम धार्मिक अधिकार की बहस में बदल चुका है। एक तरफ प्रशासन नियमों और भीड़ प्रबंधन की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ स्वामी और उनके समर्थक इसे आस्था पर हमला बता रहे हैं।
विश्लेषण: माघ मेले की छवि पर असर
माघ मेला जैसे विशाल धार्मिक आयोजन में सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन संतों और परंपराओं की भूमिका भी उतनी ही संवेदनशील है। यह विवाद दिखाता है कि नियमों के सख्त पालन और धार्मिक भावनाओं के सम्मान के बीच संतुलन कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है। 24 घंटे की मोहलत और सुप्रीम कोर्ट से जुड़े संदर्भ इस मामले को और गंभीर बना रहे हैं।
आम श्रद्धालुओं पर असर
इस विवाद का सीधा असर आम श्रद्धालुओं की भावना पर पड़ता है। जहां एक ओर वे शांतिपूर्ण स्नान और दर्शन की उम्मीद लेकर आते हैं, वहीं ऐसे टकराव मेले के माहौल को तनावपूर्ण बना देते हैं।
जानें पूरा मामला
मौनी अमावस्या माघ मेले का सबसे बड़ा स्नान पर्व है। इसी दिन संगम नोज पर भारी भीड़ उमड़ती है। शोभा यात्रा, पालकी और शंकराचार्य पद से जुड़े इस विवाद ने मेले को धार्मिक आस्था, कानूनी स्थिति और प्रशासनिक नियमों के चौराहे पर खड़ा कर दिया है।
मुख्य बातें (Key Points)
- मौनी अमावस्या से पहले माघ मेला विवादों में घिरा
- शोभा यात्रा रोके जाने से पुलिस-शिष्यों में टकराव
- शंकराचार्य पद को लेकर माघ मेला प्राधिकरण का नोटिस
- आस्था, सुरक्षा और नियमों की सीधी टकराहट








