लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (संशोधन) बिल संसद में हुआ पास, बिजनेस करना अब होगा और आसान


नई दिल्ली, 9 अगस्त (The News Air)
राज्यसभा ने 5 अगस्त को सीमित देयता भागीदारी संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी, जिसका उद्देश्य सरकार के ईज ऑफ़ डूइंग बिजनेस अभियान को तेज़ करना है और इस सेगमेंट के लिए अन्य बड़ी कंपनियों के समान नियम लाना है। इस विधेयक को इससे पहले लोकसभा पास कर चुकी है। इसलिए अब संसदीय मंजूरी से यह राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद क़ानून बन जाएगा।
लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (संशोधन) बिल, 2021 लेगा 2008 के क़ानून की जगह- लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (संशोधन) बिल, 2021 को राज्यसभा में 30 जुलाई, 2021 को पेश किया गया। बिल लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप एक्ट, 2008 में संशोधन करता है। एक्ट लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप्स (एलएलपी) के रेगुलेशन का भी प्रावधान करता है। एलएलपी परंपरागत पार्टनरशिप फर्म्स का वैकल्पिक कॉर्पोरेट निकाय होती हैं। एलएलपी के अंतर्गत पार्टनरशिप की देयता कारोबार में उनके निवेश तक सीमित होती है। बिल कुछ अपराधों को सिविल डिफॉल्ट में बदलता है और इन अपराधों के लिए सज़ा की प्रकृति को भी बदलता है। यह बिल छोटे एलएलपी को भी परिभाषित करता है, कुछ न्याय निर्णायक (एडजुडिकेटिंग) अधिकारियों की नियुक्ति और विशेष अदालतों की स्थापना का प्रावधान करता है।
कुछ अपराधों को गैर आपराधिक श्रेणी में लाया जाएगा- एक्ट में एलएलपीज के काम करने के तरीक़े को निर्दिष्ट किया गया है और यह प्रावधान करता है कि इन शर्तों का उल्लंघन करने पर जुर्माना लगाया जाएगा। यह जुर्माना दो हज़ार रुपए से लेकर पांच लाख रुपए के बीच होगा। इन शर्तों में निम्नलिखित बिंदु शामिल होंगे (i) एलएलपी के पार्टनर्स में बदलाव, (ii) रजिस्टर्ड कार्यालय में बदलाव, (iii) स्टेटमेंट ऑफ़ एकाउंट और सॉल्वेंसी तथा वार्षिक रिटर्न को फाइल करना, और (iv) एलएलपी और उसके क्रेडिटर्स या पार्टनर्स के बीच समझौता और एलएलपी का रिकंस्ट्रक्शन या विलय। बिल इन प्रावधानों को अपराध से मुक्त करता है और इन पर सिर्फ़ जुर्माना लगाता है।

एलएलपी के नाम में बदलाव- एक्ट कहता है कि केंद्र सरकार एलएलपी को कुछ स्थितियों में अपना नाम बदलने का निर्देश दे सकती है। इस निर्देश का पालन न करने पर 10,000 रुपए से लेकर पांच लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ता है। बिल इनमें से कुछ स्थितियों को हटाता है और केंद्र सरकार को यह शक्ति देता है कि वह एलएलपी पर जुर्माना लगाने की बजाय उसे नया नाम दे सकती है।
धोखाधड़ी की सज़ा- एक्ट के अंतर्गत अगर एक एलएलपी या उसके पार्टनर्स अपने क्रेडिटर्स को धोखा देने के लिए या धोखाधड़ी के किसी अन्य उद्देश्य से कोई कार्य करती है, तो जानबूझकर ऐसा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को दो साल तक की क़ैद होगी और 50,000 रुपए से लेकर पांच लाख रुपए तक का जुर्माना भरना होगा। यह बिल क़ैद की अधिकतम सज़ा को दो वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष करता है।
अपीलीय ट्रिब्यूनल के आदेशों का पालन न करने पर नहीं होगी सज़ा- एक्ट के अंतर्गत राष्ट्रीय कंपनी क़ानून अपीलीय ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) के आदेश का पालन न करने पर छह महीने तक की क़ैद होती है, और 50,000 रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ता है। बिल इस अपराध को हटाता है।
अपराधों की कंपाउंडिंग- 2008 के एक्ट के अंतर्गत केंद्र सरकार उन अपराधों को कंपाउंड कर सकती है, जिस पर सिर्फ़ जुर्माना लगता है। कंपाउंडिंग की राशि उस अपराध के लिए तय अधिकतम राशि से अधिक नहीं हो सकती। बिल इसमें संशोधन करता है और प्रावधान करता है कि केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त क्षेत्रीय निदेशक (या उससे ऊंचे रैंक का कोई अधिकारी) इन अपराधों की कंपाउंडिंग कर सकता है। कंपाउंडिंग की राशि उस अपराध के लिए न्यूनतम और अधिकतम जुर्माने के बीच होगी। अगर एलएलपी या उसके पार्टनर्स के किसी अपराध को कंपाउंड किया जाता है, तो ऐसे ही किसी अपराध को तीन वर्ष की अवधि के बीच कंपाउंड नहीं किया जा सकता।
न्याय निर्णायक अधिकारी के फ़ैसलों को दी सकती है चुनौती- बिल के अंतर्गत केंद्र सरकार न्याय निर्णायक अधिकारियों की नियुक्ति कर सकती है, जो एक्ट के अंतर्गत सज़ा देते हैं। ये केंद्र सरकार के अधिकारी होंगे जो रजिस्ट्रार के रैंक से नीचे के रैंक के नहीं होंगे। न्याय निर्णायक अधिकारियों के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ क्षेत्रीय निदेशक से अपील की जाएगी।
विशेष अदालतें की होगी स्थापना- एक्ट के अंतर्गत अपराधों की त्वरित सुनवाई को सुनिश्चित करने के लिए बिल केंद्र सरकार को विशेष अदालतों की स्थापना की अनुमति देता है। विशेष अदालत में निम्नलिखित बिंदु शामिल होंगे (i) तीन वर्ष या उससे अधिक की क़ैद से दंडनीय अपराधों के लिए सत्र न्यायाधीश या अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, और (ii) अन्य अपराधों के लिए मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट या ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट। इनकी नियुक्तियां उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से की जाएगी। इन विशेष अदालतों के आदेशों के ख़िलाफ़ उच्च न्यायालयों में अपील की जा सकती है।
अपीलीय ट्रिब्यूनल में भी की जा सकेगी अपील- एक्ट के अंतर्गत राष्ट्रीय कंपनी क़ानून ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के आदेशों के ख़िलाफ़ एनसीएलएटी में अपील की जाती है। बिल कहता है कि अगर आदेश, पक्षों की सहमति से दिया गया है तो उन आदेशों के ख़िलाफ़ अपील नहीं की जा सकती। आदेश के 60 दिनों के भीतर अपील की जानी चाहिए। जिसे 60 दिनों के लिए बढ़ाया जा सकता है।
एकाउंटिंग के स्टैंडर्ड्स केंद्र सरकार तय कर सकती है- बिल के अंतर्गत केंद्र सरकार राष्ट्रीय फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी की सलाह से एलएलपीज की श्रेणियों के लिए एकाउंटिंग और ऑडिटिंग के मानदंड तय कर सकती है।


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