Iran USA Talks Failed: अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में लगभग 21 घंटे तक चली मैराथॉन शांति बातचीत बिना किसी समझौते के खत्म हो गई है। अमेरिका के वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने साफ कर दिया कि वाशिंगटन ने अपना सर्वश्रेष्ठ और आखिरी प्रस्ताव दे दिया है, जबकि ईरान ने इशारा किया है कि इस पर और चर्चा की जरूरत हो सकती है। इस नाकामयाबी ने दो हफ्ते की युद्ध विराम की मजबूती पर शक पैदा कर दिया है और वैश्विक वित्तीय बाजारों में हलचल तेज कर दी है।
Crude Oil की कीमतों में भारी उछाल तय
बाजार के एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि बातचीत नाकाम होने के बाद कच्चे तेल यानी Crude Oil की कीमतों में बड़ी तेजी से उछाल आना तय है। स्ट्रेट ऑफ हार्मुज जहां से दुनिया के करीब 20% तेल की आपूर्ति होती है, उसे लेकर अनिश्चितता एक बार फिर लौट आई है। भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने या आपूर्ति में और दिक्कत आने की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ज्यादा जा सकती हैं। यह भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि भारत अपनी करीब 90% कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरा करता है।
शेयर बाजार में 3 से 5% गिरावट का अनुमान
युद्ध विराम की घोषणा के बाद बाजार में जो सतर्क आशावाद बना था, वह अब खत्म होता दिख रहा है। तेल बाजारों में भारी उछाल की उम्मीद है, लेकिन शेयर बाजारों के लिए दृष्टिकोण थोड़ा अलग है। बाजार में चढ़ाव-उतार निश्चित रूप से देखने को मिलेगा, लेकिन एक्सपर्ट्स कहते हैं कि फिलहाल किसी भारी या निरंतर गिरावट की संभावना कम है। 3 से 5% की गिरावट जरूर आ सकती है, जिसका इस्तेमाल निवेशकों को इक्विटी आवंटन बढ़ाने के लिए करना चाहिए। हालांकि धीरे-धीरे निवेश करने की सलाह दी जा रही है।
किन सेक्टर्स को होगा नुकसान, किन्हें फायदा?
महंगे तेल का सीधा असर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों, विमानन यानी एविएशन सेक्टर और पेंट कंपनियों के शेयरों पर पड़ेगा। ये सेक्टर कच्चे तेल की कीमतों पर सीधे निर्भर हैं और बढ़ती कीमतों से इनके मुनाफे पर भारी दबाव आएगा। वहीं दूसरी तरफ अपस्ट्रीम तेल उत्पादक और ऊर्जा कंपनियों को इस उछाल से फायदा मिल सकता है। जिन कंपनियों का कारोबार तेल उत्पादन और बिक्री से जुड़ा है, उनके शेयरों में तेजी देखने को मिल सकती है।
भारतीय रुपये और महंगाई पर सीधा दबाव
Crude Oil यानी कच्चे तेल की कीमतों में निरंतर बढ़ोतरी से घरेलू महंगाई दर पर सीधा असर पड़ सकता है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से ट्रांसपोर्टेशन महंगा होगा, जिसका असर खाने-पीने की चीजों से लेकर हर रोजमर्रा की जरूरत पर दिखेगा। भारतीय रुपये में निकट अवधि में दबाव और अस्थिरता देखने को मिल सकती है। चूंकि कच्चा तेल डॉलर में खरीदा जाता है, इसलिए रुपये की कमजोरी से आयात बिल और बढ़ जाएगा।
क्या कूटनीति के दरवाजे बंद हो गए?
बातचीत के इस दौर के नाकाम होने का मतलब यह नहीं कि कूटनीति के दरवाजे पूरी तरह बंद हैं, लेकिन इससे समाधान की समय सीमा जरूर बढ़ गई है। जब तक दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बनती, बाजार असमंजस में ही रहेगा। अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत मीरा शंकर ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी को भी बातचीत के एक ही दौर में समझौते की उम्मीद नहीं थी। ऐसा प्रतीत होता है कि यह आखिरी बातचीत नहीं होगी, क्योंकि दोनों पक्षों ने साफ नहीं किया कि वे भविष्य में इसे कैसे आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसलिए अभी भी सभी विकल्प खुले हैं।
आम आदमी की जेब पर क्या होगा असर?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर भारत के आम नागरिक की जेब पर पड़ सकता है। अगर कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाता है और लंबे समय तक वहीं बना रहता है, तो सरकार के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतें नियंत्रित रखना मुश्किल हो जाएगा। एक्साइज ड्यूटी में कटौती जैसे उपाय एक सीमा तक ही कारगर होते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कच्चा तेल 110 डॉलर प्रति बैरल के पार जाता है, तो मौजूदा बफर अपर्याप्त हो जाएंगे और उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ना तय है।
मुख्य बातें (Key Points)
- इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान के बीच 21 घंटे की मैराथॉन बातचीत बिना समझौते के खत्म
- JD Vance ने कहा: सर्वश्रेष्ठ और आखिरी प्रस्ताव दे दिया, ईरान ने और चर्चा की मांग की
- Crude Oil 100 डॉलर प्रति बैरल पार जाने की आशंका, भारतीय रुपये और महंगाई पर दबाव
- शेयर बाजार में 3-5% गिरावट का अनुमान, ऑयल मार्केटिंग और एविएशन सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर











