Red Alert Iran: मस्कट में ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते को लेकर दूसरे दौर की बातचीत चल रही है, लेकिन इसी बीच अमेरिका ने अपने नागरिकों को ईरान तुरंत छोड़ने का आदेश जारी कर दिया है। इसके तुरंत बाद चीन ने भी अपने नागरिकों से ईरान छोड़ने को कहा है। क्या यह युद्ध की आहट है या फिर एक नई अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की ऐसी परिस्थिति है जिसमें पहली बार अमेरिका ही फंस गया है? सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने खुलकर स्वीकार किया है कि ईरान की अर्थव्यवस्था को तबाह करना, वहां के बैंकों को ढहाना, महंगाई बढ़ाना और प्रदर्शनकारियों को सड़कों पर लाना – यह सब अमेरिका की योजना का हिस्सा था। और इन सबके बीच ईरान ने बातचीत के दौरान ही अपनी हाइपरसोनिक बैलेस्टिक मिसाइल खरीम शहर का परीक्षण कर दिया, जो 2000 किलोमीटर तक मार कर सकती है और इजराइल तक चंद मिनटों में पहुंच सकती है।
दुनिया यह मानकर चल रही थी कि मस्कट में बातचीत के बाद या तो युद्ध होगा या शांति होगी। या तो ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ेगा या फिर पूरे तरीके से हथियारों को नष्ट कर देगा। लेकिन इन सबके बीच ईरान, इजराइल, अमेरिका और मिडिल ईस्ट से जो संकेत अलग-अलग तरीके से आ रहे हैं, वो चौंकाने वाले हैं।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव का बड़ा खुलासा
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने खुलकर कहा है कि ईरान में जो डॉलर की कमी पैदा हुई, उसके पीछे अमेरिका है। वहां के बैंक ढह गए, पीछे अमेरिका है। वहां की मुद्रा बुरी तरीके से गिरती चली गई, पीछे अमेरिका है। महंगाई विस्फोटक स्तर पर पहुंची, पीछे अमेरिका है। और ईरानी जनता सड़कों पर उतर आई, इन सबके पीछे अमेरिका की योजना थी।
बेसेंट ने कहा, “हमने देखा कि ईरान की अर्थव्यवस्था ढह गई। सबसे बड़ा बैंक फेल हो गया। मुद्रास्फीति विस्फोटक स्तर पर पहुंच गई। और ईरानी लोग सड़कों पर उतर आए।”
उन्होंने आगे कहा, “हमने देखा कि ईरान की लीडरशिप देश से पैसा निकालकर बाहर भाग रही है। चूहे जहाज छोड़ रहे हैं। यह एक अच्छा संकेत है। उन्हें पता है कि अंत करीब है।”
तो क्या वाकई ईरान को पूरे तरीके से अस्थिर करने के लिए अमेरिका पॉलिसी बना रहा था? पेंटागन में अलग-अलग तरीके से ईरान की घेराबंदी हो रही थी? इजराइल उसी तर्ज पर खड़ा हो रहा था?
अमेरिका और चीन ने नागरिकों को दिया ईरान छोड़ने का आदेश
अमेरिका ने बकायदा एक नोटिस जारी कर अपने नागरिकों से कहा कि अब मुश्किल हालात हैं और किसी भी हालत में ईरान से बाहर निकल जाएं। उसके लिए बकायदा उन्होंने एक प्रोटोकॉल बता दिया कि आप इस स्थिति में निकलिए। आपको अगर निकलना है तो आर्मेनिया या तुर्की के रास्ते निकल जाइए। स्थितियां नाजुक हैं। ईरान छोड़ दीजिए। यहां तक कि कह दिया कि अपने मोबाइल फोन को भी चार्ज करके निकलिए। स्थितियां वाकई नाजुक हैं।
लेकिन अमेरिका की इस चेतावनी के तुरंत बाद चीन की तरफ से भी यह बात निकल कर आई कि चीनी नागरिक भी ईरान छोड़ दें। यानी ईरान युद्ध की दिशा में जा रहा है। यह मैसेज अमेरिका दे रहा है। यह मैसेज चीन दे रहा है।
बातचीत के बीच ईरान ने किया हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण
और ईरान ने इन सबके बीच बैलेस्टिक मिसाइल का परीक्षण कर लिया। यानी जो कल्पना की नहीं थी कि जब आप बातचीत कर रहे हैं तो ऐसी परिस्थिति आनी नहीं चाहिए जहां पर आप सुपरसोनिक बैलेस्टिक मिसाइल, जिसका नाम है खरीम शहर-4, बैलेस्टिक मिसाइल जो कि सीधे तौर पर इजराइल तक तो चंद मिनटों में पहुंच जाएगी। 2000 किलोमीटर तक उसकी पहुंच और पकड़ है और उसको रोक पाना मुश्किल है।
इस हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण ठीक उसी समय होता है जब मस्कट में शांति वार्ता चल रही है। यानी बातचीत की टेबल पर ईरान की मिसाइल खड़ी हुई। बातचीत हो रही है कि आप अपने परमाणु हथियारों को खत्म कीजिए, मिसाइलों को खत्म कीजिए और यहां पर ईरान यह मैसेज दे रहा है – हम तैयार हैं अपने बचाव के लिए।
मस्कट में दूसरे दौर की वार्ता
मस्कट में दूसरे राउंड की बातचीत में ओमान के विदेश मंत्री बदर बुसाईडी भी मौजूद हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अगराची तो मौजूद हैं ही और अमेरिका की तरफ से आए विशेष दूत स्टीव विटकफ के साथ जारेड कुशनर भी मौजूद हैं, जो कि डोनाल्ड ट्रंप के दामाद हैं।
लगातार बातचीत का सिलसिला पहले राउंड में कुछ निकला नहीं। इन सबके बीच जब पहले राउंड की बातचीत खत्म हुई, उसके बाद दूसरे राउंड की बातचीत की दिशा में उन देशों की भी भागीदारी शुरू हुई जो मिडिल ईस्ट के देश हैं और वह नहीं चाहते हैं कि युद्ध किसी भी तरीके से होना चाहिए।
अमेरिका कह रहा है कि अगर यह बातचीत विफल हुई तो हम दुश्मन के खिलाफ सैन्य कारवाई करेंगे। और हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि ईरान अपने मिसाइल प्रोडक्शन को बंद कर दे। हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ वह कोई कारवाई ना करे। हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि जो भी ईरान समर्थित मिलीशिया है, उनको ईरान मदद करना बंद कर दे।
ईरान का जवाब: पहले आर्थिक संकट का समाधान दो
लेकिन ईरान कह रहा है कि हमारी आर्थिक परिस्थितियों को जो आपने डामाडोल किया, क्या उन परिस्थितियों को पटरी पर लाने के लिए आप हमारी मदद करेंगे? यह एक बिल्कुल नया डिप्लोमेटिक टोन है। बात युद्ध की हो रही है और होते-होते बात उन आर्थिक परिस्थितियों की दिशा में चली गई।
ईरान का कहना है कि दो चीजें नहीं चल सकती हैं। एक तरफ आप तख्तापलट चाहते हैं या दूसरी तरफ आप परमाणु हथियारों का खत्म होना चाहते हैं जो हमारे पास है ही नहीं।
यह वाकई बड़ी रोचक परिस्थिति है अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में। बातचीत के टेबल पर जो मुद्दे हैं, वह मुद्दे हैं नहीं। और जिन मुद्दों पर बहस ईरान चाहता है, उन मुद्दों के साथ-साथ युद्ध की धमकी भी है।
चीन की मौजूदगी और चाबहार पोर्ट का मुद्दा
इन सबके बीच जब चीन ने अपने नागरिकों से भी कहा कि आप छोड़ दें ईरान, तो ईरान के भीतर चीन के हथियारों की मौजूदगी पहली बार अमेरिका के हथियारों को चुनौती देने के लिए मौजूद हो चली है। यह मैसेज बहुत खतरनाक है।
दिल्ली में जो ईरान के एंबेसडर हैं, जो राजदूत हैं, उन्होंने उसी वक्त दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और उन्होंने कहा कि हां, हमें इंतजार हो रहा है कि सेकंड राउंड की बातचीत में क्या परिणाम निकलते हैं। लेकिन उसके बाद का सवाल उन्होंने एक झटके में भारत को भी जोड़ दिया।
यह कहते हुए जोड़ दिया कि चाबहार में अमेरिका ने कहा है। हमने तो कुछ नहीं कहा। हम तो चाहते हैं कि भारत की मौजूदगी चाबहार पोर्ट पर रहे। और चाबहार पोर्ट जो है, एक अल्टरनेटिव इकॉनमी का रास्ता है।
ईरानी राजदूत ने कहा, “चाबहार पोर्ट एक महत्वपूर्ण पोर्ट है और अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए अच्छी भूमिका निभा सकता है। हमारे कुछ देशों, विशेष रूप से भारत के साथ अच्छे संबंध हैं और हमें विश्वास है कि हमें इस मुद्दे पर अपने संबंधों को बढ़ावा देना चाहिए और विस्तार करना चाहिए।”
इजराइल की चिंता और नेतन्याहू का रुख
इजराइल की सबसे बड़ी मुश्किल है कि अगर अमेरिका इस युद्ध में अपने हाथ जलाने को तैयार नहीं होगा और अगर ईरान अपने परमाणु हथियारों को लेकर जो परीक्षण का जिक्र है, तो फिर जो इससे पहले पिछले बरस जब युद्ध हुआ था और इजराइल और अमेरिका ने खुले तौर पर कह दिया था कि हमने पूरे तरीके से नष्ट कर दिया परमाणु प्रोग्राम जो ईरान के भीतर जगह-जगह पर चल रहा था, तो वो सारी बातें गलत भी होंगी।
और अपने ही देश में ईरान को लेकर अमेरिका की तो नहीं, लेकिन इजराइल की साख और नेतन्याहू की साख डामाडोल हो जाएगी। इसीलिए नेतन्याहू अपने तौर पर यह कहने से अब चूक नहीं रहे हैं कि किसी भी हालत में ईरान को बख्शा नहीं जाएगा।
तीन स्पष्ट संदेश
हमें लगता है यहां तीन चीजें आपको अब समझनी होंगी:
पहला: अमेरिका अपने नागरिकों को बाहर करके मैसेज दुनिया को दे रहा है – युद्ध हो सकता है, अमेरिकी नागरिक छोड़ दें। घेराबंदी बता रही है कि हां, यह स्थिति हो रही है।
दूसरा: ईरान मैसेज दे रहा है बैलेस्टिक मिसाइल का जो सुपरसोनिक है, उसका परीक्षण करके – हम तैयार हैं। और इस तैयारी का मतलब यह है कि आपने अगर कुछ भी हमारे खिलाफ अनुचित मांग की, अनुचित कारवाई की, सोची तो हम खुद का बचाव करेंगे।
तीसरा: चीन की मौजूदगी और उसका अपने नागरिकों से ईरान छोड़ने को कहना – यह संकेत है कि चीन भी इस संघर्ष में शामिल हो सकता है।
मिडिल ईस्ट की दुविधा
मिडिल ईस्ट के देशों के भीतर का संकट यह है कि उन्होंने अपने देश में अलग-अलग जगहों पर अमेरिकी सैन्य अड्डों को इजाजत भी दे रखी है और अमेरिका की पूरी घेराबंदी जो ईरान को लेकर है, उसमें मिडिल ईस्ट के देशों की जमीन बड़ी मायने रखती है।
लेकिन अब मिडिल ईस्ट के सामने उससे भी बड़ा संकट है। उन्हीं की जमीन से अगर मिसाइल या युद्धक विमानों ने उड़ान भरी ईरान की तरफ और ईरान जो कि अपने तौर पर एक बैलेस्टिक मिसाइल का परीक्षण उसी वक्त कर रहा है, और इससे पहले वो मैसेज दे चुका है कि उसने अंडरग्राउंड तौर पे कितने हजार मिसाइलों को तैनात किया है जो एक झटके में जहां-जहां अमेरिकी अड्डे हैं, वहां-वहां वो हमला करेंगे।
यानी वो अमेरिका जाने की जरूरत नहीं है। वो कतर हो सकता है। वह ओमान हो सकता है। वह सऊदी अरब हो सकता है। वो यूनाइटेड अरब अमीरात हो सकता है। वह बहरीन हो सकता है। तमाम जगहों पर अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं।
नई कूटनीति का उदय
यह वाकई बड़ा महत्वपूर्ण है कि इस दौर में सिर्फ अमेरिका ही नहीं, अब दुनिया के तमाम देश अपने देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए दुनिया के उन-उन देशों के साथ नए तरीके से द्विपक्षीय व्यापार करने को तैयार हो चले हैं जो इससे पहले संभव नहीं था।
भारत के साथ फ्री ट्रेड किन-किन देशों ने किया और यूरोपीय यूनियन तक ने किया। उसके बाद अमेरिकी डील जो अमेरिका को सहूलियत और मुनाफा दे रही है। और इन सबके बीच मिडिल ईस्ट की कंट्रीज भी हैं, ईरान भी है, चीन भी है, रशिया भी है और भारत भी है।
तीन स्पष्ट मैसेज
पहली बार जो नई कूटनीति ईरान के इर्द-गिर्द उभर कर आई है, उसके तीन मैसेज बहुत साफ हैं:
पहला मैसेज: अमेरिका पीछे हट नहीं सकता है। लेकिन अमेरिका युद्ध कर भी नहीं सकता है।
दूसरा मैसेज: इजराइल बिना अमेरिका के युद्ध में कूदेगा नहीं। लेकिन इजराइल युद्ध की परिस्थितियों को पैदा कर भी सकता है।
तीसरा मैसेज: ईरान अपने बचाव के लिए हर चीज करने को तैयार है और उसका अपना बचाव पहली बार चीन की इकॉनमी से भी जुड़ गया है। और चीन इस हकीकत को समझ रहा है कि दरअसल उसकी मौजूदगी अंतरराष्ट्रीय तौर पर अपने हथियारों के साथ अगर वह ईरान की सुरक्षा में खड़ा हो जाए तो मैसेज दुनिया के भीतर जाएगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- अमेरिका और चीन ने अपने नागरिकों को ईरान तुरंत छोड़ने का आदेश दिया
- अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने स्वीकार किया कि ईरान की अर्थव्यवस्था तबाह करना अमेरिका की योजना थी
- मस्कट में दूसरे दौर की शांति वार्ता चल रही है
- ईरान ने बातचीत के दौरान खरीम शहर-4 हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण किया
- यह मिसाइल 2000 किलोमीटर तक मार कर सकती है और इजराइल तक चंद मिनटों में पहुंच सकती है
- ईरान कह रहा है पहले आर्थिक संकट का समाधान दो, फिर परमाणु कार्यक्रम की बात करो
- चीन के हथियार ईरान में अमेरिकी हथियारों को चुनौती देने के लिए मौजूद
- ईरानी राजदूत ने भारत के चाबहार पोर्ट पर बने रहने का समर्थन किया
- मिडिल ईस्ट के देश युद्ध नहीं चाहते लेकिन उनकी जमीन पर अमेरिकी अड्डे हैं
- इजराइल और नेतन्याहू की साख दांव पर लगी है








