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Indore Water Crisis : स्मार्ट सिटी में ज़हरीला पानी, 14 मौतें, सरकार कटघरे में!

देश की नंबर 1 स्मार्ट सिटी इंदौर में दूषित पानी से मौतों का सिलसिला, ₹1.64 लाख करोड़ की स्मार्ट सिटी योजना पर उठे गंभीर सवाल

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 2 जनवरी 2026
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Indore Water Crisis
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Indore Water Crisis : इंदौर में दूषित पानी से 12 से 14 लोगों की मौत हो गई है और 200 से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हैं, जिनमें से 2 अभी भी वेंटिलेटर पर हैं। यह वही इंदौर है जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी योजना में नंबर 1 का दर्जा हासिल है और जिसे भारत का सबसे स्वच्छ शहर माना जाता है। सवाल यह है कि ₹1,64,000 करोड़ खर्च करने के बाद भी इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर वाले इस शहर में लोग साफ पानी के लिए तरस रहे हैं।


स्मार्ट सिटी में मौत का तांडव

इंदौर के एक मोहल्ले में जो हुआ वह किसी त्रासदी से कम नहीं है क्योंकि टैप वाटर के साथ गंदा पानी मिला और लोग पीते चले गए जिसका नतीजा यह हुआ कि मौत का सिलसिला शुरू हो गया। सैकड़ों लोगों को अस्पताल जाना पड़ा और इलाज भी ठीक से नहीं मिला जबकि हालात इतने खराब थे कि परिवार के परिवार प्रभावित हो गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस मोहल्ले के लोगों ने पहले से शिकायत की थी लेकिन किसी ने नहीं सुनी और चार महीने तक लगातार शिकायतें होती रहीं पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।


मुआवजा लेने से इनकार, जनता का आक्रोश

हालात इतने बुरे हो गए कि पीड़ित परिवारों ने मुआवजा लेने से इनकार कर दिया क्योंकि उनका दर्द पैसों से कहीं बड़ा था। एक परिवार का दर्द देखिए जिन्होंने कहा कि “पापा का निधन हुआ है, 30 तारीख को हुआ है, वो उल्टी के बाद गए हैं और उन्हें कोई हार्ट अटैक या कोई कुछ नहीं आया है।” यह आवाज उन लोगों की है जो अपने परिजनों को खो चुके हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें साफ पानी नहीं मिला और यह उस शहर में हुआ जहां सरकार दावा करती है कि सब कुछ बेहतरीन है।


10 साल पुराना वादा, 100 स्मार्ट सिटी का सपना

25 जून 2015 को प्रधानमंत्री मोदी ने स्मार्ट सिटी मिशन की शुरुआत की थी और उन्होंने कहा था कि देखते-देखते इस देश में 100 स्मार्ट सिटी खड़े हो जाएंगे। 10 साल बाद 24 जून 2025 को प्रधानमंत्री ने कहा कि 100 स्मार्ट सिटी बन गई हैं और हरदीप सिंह पुरी जो अर्बन डेवलपमेंट मिनिस्टर हैं उन्होंने भी यही दावा किया।

सरकार के मुताबिक 8000 से ज्यादा प्रोजेक्ट इसके साथ जुड़े और ₹1,64,000 करोड़ खर्च हो गए जिसमें 7755 प्रोजेक्ट पूरे हो गए और 512 बचे हुए हैं। लेकिन सवाल यह है कि इतना पैसा खर्च करने के बाद भी लोगों को पीने का साफ पानी क्यों नहीं मिल रहा और जो बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए थीं वो कहां गईं?


इंटीग्रेटेड कमांड सेंटर का दावा, जमीनी हकीकत कुछ और

सरकार का दावा है कि इंदौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट के जरिए एक ऐसा मैनेजमेंट सिस्टम है जिसमें किसी भी हालत में शहर में कोई परेशानी हो ही नहीं सकती है। स्मार्ट रोड बनाए गए, साइकिल ट्रैक बनाए गए, क्लासरूम बनाए गए और हेल्थ सेंटर बनाए गए जिससे पानी, बिजली और सड़क की सुविधाएं सबसे सुविधापूर्ण तरीके से लोगों को स्वच्छ तरीके से उपलब्ध हो जाएं।

सरकार ने बताया कि 28 शहरों में ड्रिंकिंग वाटर ट्रीटमेंट कैपेसिटी लगभग 2900 मिलियन लीटर प्रति दिन की है और 1726 किलोमीटर वाटर सप्लाई सिस्टम मॉनिटर किया जा रहा है। लेकिन जब गंदा पानी टैप से आया और लोग मरने लगे तो यह पूरा सिस्टम कोलैप्स क्यों हो गया यह सवाल अब हर किसी के जहन में है।


जिम्मेदार कौन? नामों की लंबी लिस्ट

इस त्रासदी के लिए कई अधिकारी और जनप्रतिनिधि जिम्मेदार बताए जा रहे हैं और इनमें सबसे पहला नाम है दिलीप यादव जो निगम आयुक्त हैं और जिन्होंने गंदे पानी की शिकायत की अनदेखी की तथा पाइपलाइन की टेंडर प्रक्रिया पर नजर नहीं रखी। दूसरे जिम्मेदार रोहित सिसोनिया हैं जो अपर आयुक्त हैं और जिन्होंने अगस्त में हुए टेंडर को रोककर रखा तथा शिकायतों की अनदेखी कर दी।

कमल वाघेला जो पार्षद हैं उन्होंने 4 महीने तक क्षेत्र की परेशानी पर कोई त्वरित निर्णय नहीं लिया जबकि पुष्पमित्र भार्गव जो महापौर हैं उनके पास लगातार शिकायत आ रही थी पर उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया। बबलू शर्मा जो जल कार्य प्रभारी हैं उन्होंने दूषित पानी सप्लाई होने के बावजूद ध्यान नहीं दिया और संजीव श्रीवास्तव जो प्रभारी थे वे गंदे पानी की शिकायत पर लीकेज खोजने निकल पड़े।

इसी कड़ी में शुभम श्रीवास्तव उपयंत्री हैं और जोन 4 में जहां यह मौत हुई है वहां दूषित जल का निराकरण करना था लेकिन नहीं किया जबकि योगेश जोशी सहायक यंत्री हैं और इंदौर 311 हेल्पलाइन पर जो शिकायत आती है उसको आगे बढ़ाना था पर इन्होंने कोई जिम्मेदारी नहीं निभाई।


कैलाश विजयवर्गीय का विवादित बयान

कैलाश विजयवर्गीय जो केंद्रीय मंत्री हैं और इंदौर के ही हैं उनका व्यवहार भी सवालों के घेरे में है। 1983 में वे इंदौर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में बतौर कॉरपोरेटर जीते थे और 2000 में मेयर बने तथा फिर बीजेपी के जनरल सेक्रेटरी, केंद्रीय मंत्री और बंगाल के प्रभारी तक का सफर तय किया।

जब एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल NDTV के रिपोर्टर ने उनसे सवाल किया कि लोगों को मुआवजा नहीं मिला और पीने के पानी की व्यवस्था ठीक से नहीं है तो उनका जवाब था “छोड़ो यार तुम फोकट प्रश्न मत पूछो” और “घंटा हो गया बात”। जब रिपोर्टर ने उनके शब्दों पर आपत्ति जताई तो उन्होंने कहा “लहजा इनको सुधारने का, ये इतने सीनियर मंत्री हैं, घंटा-घंटा क्या बोलते रहते हैं, बात करने की तमीज नहीं है।”


जनता का गुस्सा, मंत्री की सफाई

जब कैलाश विजयवर्गीय उस मोहल्ले में पहुंचे तो महिलाओं ने शिकायतों का अंबार लगा दिया और उनका गुस्सा साफ दिख रहा था क्योंकि उन्होंने कॉरपोरेटर, मेयर, एमएलए, एमपी सबको चुना है और सब बीजेपी के हैं फिर भी उनकी आवाज कोई नहीं सुन रहा। यह वही जनता है जिसने अपने नुमाइंदों को यह सोचकर चुना था कि इससे बेहतर तो कुछ नहीं लेकिन उनकी जिंदगी के हिस्से में जो कुछ आया उसके बाद उनके सवालों का जवाब कौन देगा।

एक स्थानीय अस्पताल से जानकारी मिली कि मरीजों का आना अभी भी जारी है और सुबह 4 डायरिया के पेशेंट आए जिन्हें भंडारी हॉस्पिटल भेज दिया गया। कल से परसों तक 200 लोग भर्ती थे और 1400 लोग इन्फेक्टेड पाए गए जो बताता है कि यह समस्या कितनी गंभीर है।


एक पार्टी का कब्जा, कोई आवाज नहीं

इस पूरी त्रासदी का एक पहलू यह भी है कि इंदौर में हर स्तर पर बीजेपी का कब्जा है जिसमें कॉरपोरेटर बीजेपी का है, मेयर बीजेपी का है, विधायक बीजेपी का है, सांसद बीजेपी का है, राज्य का मुख्यमंत्री बीजेपी का है और देश का प्रधानमंत्री भी बीजेपी का है। 2024 के लोकसभा चुनाव में तो एक उम्मीदवार इसलिए निर्विरोध चुनकर आ गया क्योंकि विपक्ष के कैंडिडेट ने अपना नाम वापस ले लिया और निर्दलीयों ने भी नाम वापस ले लिए।

जब कोई दूसरी आवाज ही नहीं है तो सरकार पर दबाव कौन बनाएगा यह सवाल बेहद अहम है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका इसीलिए महत्वपूर्ण होती है कि वह सत्ता पर नजर रखे और जवाबदेही तय करे लेकिन जहां कोई विपक्ष ही न हो वहां शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं जैसा कि इंदौर में हुआ।


172 सरकारी योजनाएं, ₹22 लाख करोड़ का खर्च

स्मार्ट सिटी सिर्फ एक उदाहरण है क्योंकि मौजूदा वक्त में केंद्र सरकार की 172 ऐसी योजनाएं चल रही हैं जो इसी तरह से लोगों को राहत देने के लिए बनाई गई हैं। 2014 से अब तक इन पर लगभग ₹22 लाख करोड़ खर्च हो चुके हैं और इसमें 22 मंत्रालयों की हिस्सेदारी है।

चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें से लगभग ₹6.5 से 7 लाख करोड़ सिर्फ प्रचार-प्रसार पर खर्च हुए हैं जिसमें प्रधानमंत्री की तस्वीर चस्पा होती है और अलग-अलग जगहों पर विज्ञापन दिखाई देते हैं। जैसे गंगा की सफाई का मसला था तो जितना पैसा सफाई में खर्च नहीं हुआ उससे ज्यादा प्रधानमंत्री की फोटो के साथ प्रचार पूरे देश में हो गया।

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25% से भी कम काम, पूरा प्रचार

कई सरकारी योजनाएं ऐसी हैं जिनमें 10 साल बीतने के बाद भी 25% काम भी नहीं हुआ है और इनमें राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, कृषोन्नति योजना, राष्ट्रीय आयुष मिशन, समग्र शिक्षा, प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण, प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया और प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान जैसी योजनाएं शामिल हैं।

इसके अलावा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री आवास योजना, ग्राम सड़क योजना, पीएमई बस सेवा स्कीम, नदियों को आपस में जोड़ना, अटल भूजल योजना, ई न्यायालय और खेलो इंडिया भी इसी श्रेणी में आते हैं। यह सूची बहुत लंबी है और इसमें 175 से ज्यादा योजनाएं शामिल हैं जिनका ऐलान तो बड़े-बड़े मंचों से होता है लेकिन जमीन पर काम नहीं दिखता।


प्रधानमंत्री की खामोशी पर सवाल

जब देश में ऐसी घटनाएं होती हैं तो प्रधानमंत्री खामोश रहते हैं और वे हर उस मुद्दे पर बोलते हैं जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव की दिशा में ले जाए। लेकिन जब जिले, गांव, शहर, मोहल्ले और आम जनता से जुड़े सवाल आते हैं तो खामोशी बरत ली जाती है और 2047 के विकसित भारत के सपने को सामने रख दिया जाता है।

इस बीच प्रधानमंत्री अर्थशास्त्रियों के साथ बैठकर 2047 में विकसित भारत कैसे बनेगा इस पर चिंतन-मनन कर रहे हैं। लेकिन विकसित भारत की कुंजी अगर इन 100 स्मार्ट सिटी में छुपी है और सबसे स्मार्ट शहर में ही लोग पानी से मर रहे हैं तो सपना कैसे पूरा होगा यह सवाल हर टैक्सपेयर को पूछना चाहिए।


विश्लेषण: लोकतंत्र और जवाबदेही का सवाल

इंदौर की यह त्रासदी सिर्फ पानी की समस्या नहीं है बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है जहां एक ही पार्टी का हर स्तर पर कब्जा हो और कोई विपक्ष न हो। जब कोई दूसरी आवाज नहीं होती तो शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं और यही इंदौर में हुआ जहां 4 महीने तक लगातार शिकायतें होती रहीं पर किसी ने नहीं सुनी।

₹1,64,000 करोड़ खर्च करके बनाई गई स्मार्ट सिटी में अगर साफ पानी नहीं मिल सकता तो फिर 2047 का विकसित भारत का सपना कितना यथार्थवादी है। यह सवाल हर टैक्सपेयर को पूछना चाहिए क्योंकि यह उनका पैसा है जो खर्च हो रहा है और उन्हें यह जानने का हक है कि उनका पैसा कहां जा रहा है और क्यों बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल पा रहीं।


‘मुख्य बातें (Key Points)’
  • इंदौर में दूषित पानी से 12-14 लोगों की मौत हुई और 200 से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हैं जबकि 2 वेंटिलेटर पर हैं। यह देश की नंबर 1 स्मार्ट सिटी में हुआ जहां ₹3000 करोड़ खर्च किए गए थे।
  • ₹1,64,000 करोड़ खर्च करने के बाद भी 100 स्मार्ट सिटी में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं और इंटीग्रेटेड कमांड सेंटर होने के बावजूद सिस्टम पूरी तरह फेल हो गया।
  • 4 महीने तक शिकायतें अनसुनी रहीं और निगम आयुक्त से लेकर महापौर तक किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की जिसके चलते यह त्रासदी हुई।
  • 172 सरकारी योजनाओं पर ₹22 लाख करोड़ खर्च हुए जिसमें से ₹6.5-7 लाख करोड़ सिर्फ प्रचार पर गए और कई योजनाओं में 25% काम भी नहीं हुआ।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: इंदौर में दूषित पानी से कितने लोगों की मौत हुई?

सरकार के मुताबिक 12 मौतें हुई हैं जबकि मंत्री 9 बता रहे हैं और पत्रकारों के अनुसार यह संख्या 14 है। 200 से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हुए और 1400 लोग इन्फेक्टेड पाए गए जबकि 2 लोग अभी भी वेंटिलेटर पर हैं।

Q2: स्मार्ट सिटी मिशन पर कितना खर्च हुआ?

स्मार्ट सिटी मिशन पर कुल ₹1,64,000 करोड़ खर्च किए गए हैं जिसमें 100 शहरों को शामिल किया गया और 7755 प्रोजेक्ट पूरे हुए जबकि 512 अभी बाकी हैं। अकेले इंदौर में लगभग ₹3000 करोड़ खर्च हुए।

Q3: इंदौर में पानी की समस्या की शिकायत कब से हो रही थी?

इंदौर के प्रभावित मोहल्ले से 4 महीने से लगातार दूषित पानी की शिकायतें आ रही थीं और इंदौर 311 हेल्पलाइन पर भी शिकायतें दर्ज हुईं लेकिन किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की।

Q4: स्मार्ट सिटी मिशन की शुरुआत कब हुई थी?

स्मार्ट सिटी मिशन की शुरुआत 25 जून 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी और 10 साल पूरे होने पर 24 जून 2025 को सरकार ने दावा किया कि 100 स्मार्ट सिटी बन चुकी हैं।

Q5: कैलाश विजयवर्गीय कौन हैं और उन्होंने क्या कहा?

कैलाश विजयवर्गीय केंद्रीय मंत्री हैं और इंदौर के ही रहने वाले हैं जो 1983 में कॉरपोरेटर बने और 2000 में मेयर तथा फिर बीजेपी के जनरल सेक्रेटरी तक पहुंचे। इस मामले पर पूछे गए सवालों पर उन्होंने कहा “फोकट प्रश्न मत पूछो” और “घंटा हो गया बात”।

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