India US Trade Deal : फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका के बीच हुई व्यापार डील ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। अमेरिका ने भारतीय सामान पर टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया, लेकिन बदले में भारत को रूस से तेल खरीदना बंद करना होगा और अगले 5 साल में $500 बिलियन यानी करीब 45-46 लाख करोड़ रुपये का अमेरिकी सामान खरीदना होगा।
डील की शर्तें – अमेरिका के हाथ में पूरी कमान
वाइट हाउस से जारी कार्यकारी आदेश 14329 में साफ लिखा है कि भारत ने रूसी फेडरेशन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तेल आयात बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है। भारत ने कहा है कि वह अमेरिका से ऊर्जा उत्पाद खरीदेगा यानी एनर्जी अमेरिका से लेगा। इसके अलावा अगले 10 सालों में रक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए अमेरिका के साथ एक समझौते पर भारत ने सहमति जताई है।
लेकिन इस डील का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यह है कि अमेरिका की कॉमर्स मिनिस्ट्री, फॉरेन मिनिस्ट्री, फाइनेंस सेक्रेटरी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ समन्वय में निगरानी रखेंगे भारत पर। यानी अमेरिका के चार डिपार्टमेंट यह देखेंगे कि क्या भारत ने रूसी तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर आयात कहीं फिर से शुरू तो नहीं कर दिया।
अगर भारत डील तोड़े तो क्या होगा?
ऑर्डर में यह भी लिखा है कि अगर कॉमर्स मिनिस्टर यह पाते हैं कि भारत ने रूसी तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आयात फिर से शुरू कर दिया तो वहां के विदेश, वित्त, वाणिज्य, गृह, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के लिए राष्ट्रपति के सहायक तथा आर्थिक नीति के लिए राष्ट्रपति के सहायक के साथ परामर्श करेंगे। और वह सिफारिश करेंगे कि भारत के संबंध में अब अतिरिक्त कारवाई क्या करनी चाहिए और किस सीमा तक जानी चाहिए।
यानी मसला सिर्फ 25% टैरिफ का नहीं है। अमेरिका यह तय करेगा कि सजा को किस सीमा तक ले जाना है।
कैबिनेट मंत्रियों में भ्रम – कौन जिम्मेदार?
जब भारत के कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल से यह सवाल किया गया कि रूस से हम तेल लेंगे या नहीं लेंगे, तो उन्होंने पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने कहा कि वह इस बारे में कुछ नहीं जानते। इसकी जानकारी एक्सटर्नल अफेयर्स मिनिस्ट्री से मिलेगी। यानी विदेश मंत्री जयशंकर इसकी जानकारी देंगे।
लेकिन 36 घंटे पहले अमेरिका में विदेश मंत्री जयशंकर से पूछा गया था कि जो डील हो रही है उसमें तेल को लेकर आपका क्या कहना है, तो उन्होंने कहा था कि वह कुछ नहीं जानते। वह इस डील में उस रूप में शामिल नहीं हैं। यह सारी डील कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल कर रहे हैं।
यानी भारत का कोई कैबिनेट मिनिस्टर इस डील को लेकर उस जगह पर अपने हाथ जलाने को तैयार नहीं है जहां पर भारत और अमेरिका से हटकर किसी तीसरे देश का जिक्र हो।
NSA अजीत डोबाल की भूमिका पर विवाद
दो दिन पहले Bloomberg ने एक स्टोरी निकाली जिसमें कहा गया कि दरअसल यह पूरी डील के पीछे जो दिमाग है वो नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजीत डोबाल का है। उन्होंने ही अमेरिका को चेताया था कि भारत तो डील करेगा नहीं और भारत के अनुकूल डील नहीं होगी तो भारत इंतजार करेगा जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का कार्यकाल पूरा हो जाए यानी 2028 तक हम इंतजार कर सकते हैं।
लेकिन 24 घंटे के भीतर उस स्टोरी को हटाना पड़ गया। अमेरिका के भीतर से कहा गया कि यह क्या है?
कृषि क्षेत्र में नॉन-टैरिफ बाधाएं खत्म
ऑर्डर में यह भी लिखा गया है कि भारत ने कृषि उत्पादों पर टैरिफ खत्म करने या कम करने की प्रतिबद्धता जताई है और लंबे समय से चली आ रही नॉन-टैरिफ बाधाओं को दूर करने का वादा भी किया है।
नॉन-टैरिफ बाधा का मतलब यह होता है कि जब कोई सामान भारत के बाजार में आए – वह चाहे भोजन से जुड़ा हुआ हो, चाहे पशु के भोजन से जुड़ा हुआ हो, चाहे वह भारत में आने वाला खाने का तेल ही क्यों ना हो – वो कोई भी प्रोडक्ट क्यों ना हो, उसका परीक्षण यहां पर भारत की टीम करके बताती है कि हां यह सामान भारत के बाजार में बेचा जा सकता है।
लेकिन पहली बार उससे मुक्ति दी जा रही है अमेरिका के तमाम सामानों को लेकर। यानी अब अमेरिकी सामान पर कोई प्रतिबंध, नियम या मापदंड का कोई प्रतिबंध नहीं है। अमेरिकी सामान नदी की धारा की तरह भारत के बाजार में बहता चला जाएगा।
टैरिफ घटा, लेकिन नुकसान ज्यादा
अमेरिका ने टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया। लेकिन यह कोई नहीं बतला रहा है कि 2024 तक 2 से 3% टैरिफ था जो बढ़कर 18% तक चला गया। यानी भारत के बिजनेसमैन, भारत के कॉर्पोरेट हाउसेस जो एक्सपोर्ट की दिशा में जाते हैं उनका प्रॉफिट रेंज कम हो जाएगा।
तीन बड़े सवाल हैं। पहला – रूस से तेल खरीदने पर जो 25% टैक्स लगा था वह न खरीदने पर हट गया। लेकिन रूस से तेल नहीं लेने पर 30% का नुकसान सीधे हो गया क्योंकि रूस बाजार की तुलना में 30% सस्ते में कच्चा तेल दे रहा था।
दूसरा – अमेरिकन और रशियन डिफेंस के क्षेत्र में कीमतों का आदान-प्रदान लगभग ढाई गुना ज्यादा अमेरिका के साथ जुड़ने पर भुगतना पड़ेगा।
तीसरा – वेनेजुएला से तेल कैसे आएगा यह किसी को नहीं पता।
भारत को क्या खरीदना होगा?
अगले 5 वर्ष के भीतर भारत को अमेरिका से 45-46 लाख करोड़ का उत्पादन खरीदना है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि अमेरिका ने लगभग 30 ट्रिलियन डॉलर का मार्केट खोल दिया। 30 ट्रिलियन डॉलर का मतलब होता है 27 लाख करोड़।
लेकिन उस 30 ट्रिलियन डॉलर के मार्केट में हर कोई है। यूरोपीय यूनियन भी है, जापान भी है, ऑस्ट्रेलिया भी है, न्यूजीलैंड भी है, वियतनाम भी है, इंडोनेशिया भी है, बांग्लादेश भी है। कोई भारत के लिए स्पेशल नहीं खुला हुआ है। लेकिन बाकियों पर यह दबाव नहीं है जिस तरीके से भारत पर है।
पिछले साल का निर्यात आंकड़ा
पिछले साल 86.5 बिलियन डॉलर का सामान भारत ने अमेरिका में भेजा है। उसमें से लगभग आधा सामान सिर्फ चार सेक्टर में है। पहली इंडस्ट्री है इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट की जो तकरीबन 12.3 बिलियन डॉलर का सामान भेजा गया। दूसरे नंबर पर डायमंड और हीरे-जवाहरात आते हैं – 9.5 बिलियन। फार्मा प्रोडक्ट लगभग 9 बिलियन डॉलर। टेक्सटाइल से जुड़े सभी प्रोडक्ट्स मिलाकर लगभग 6 बिलियन डॉलर से कुछ ज्यादा।
रूस का क्या होगा?
अब सवाल यह है कि रूस भारत पर भरोसा करेगा या नहीं करेगा। जनवरी के महीने में भी भारत ने रूस से तेल लिया था। लेकिन 7 फरवरी 2026 से यह ऑर्डर इम्प्लीमेंट हो गया तो अब यह पूरे तरीके से जीरो हो जाना चाहिए।
जाहिर है ऐसे में अगला सवाल यह भी होगा कि आने वाले वक्त में चीन भी भारत को लेकर सिर्फ व्यापारिक लाभ देखेगा। इस बरस जब भारत अगुवाई कर रहा है BRICS की तो जिस तरीके से करेंसी और डिजिटल करेंसी का जिक्र RBI तक ने कर दिया, अगर भारत उससे पीछे हटता है तो फिर चीन आने वाले वक्त में जिन-जिन संगठनों में उसकी मौजूदगी है – वह सिर्फ BRICS में नहीं है, वह ASEAN में भी है, उसकी मौजूदगी SCO में भी है।
ईरान के साथ तनाव और भारत की स्थिति
भारत की डील उस मौके पर हुई है जिस मौके पर अमेरिका ने प्रतिबंध थोड़ा और बढ़ा दिया ईरान को लेकर। Oman की बैठक में कोई रास्ता निकला नहीं। ईरान ने यूरेनियम एनरिचमेंट रोकने से पूरी तरीके से इंकार कर दिया।
ईरान इस दौर में भारत को अपना निकट बता रहा है। लेकिन उसी दौर में समझौता हो गया। अमेरिका भी समझ रहा है इस पूरे इलाके में कौन बड़ा प्लेयर है और किस बड़े प्लेयर के जरिए किस शहमात का खेल कैसे खेला जा सकता है।
अमेरिका ने भारत का नक्शा जारी किया
आज अमेरिका ने एक भारत का मैप भी जारी किया जिसमें POK भी भारत का और अक्साई चीन भी भारत का दिखाया गया। भारत का मीडिया खुश हो गया, लोग खुश हो गए। लेकिन अगर कल वो कोई दूसरा मैप जारी कर देता है तो क्या यह खुशी काफूर हो जाएगी?
पांच बड़े सवाल
पहला सवाल – डॉलर से जुड़ा है। जिस दौर में भारत की करेंसी डॉलर के मुकाबले डामाडोल होती चली गई, क्या उसी का दबाव है? भारत का शेयर बाजार डूबने लगा। भारत के बड़े बिजनेसमैन और कॉर्पोरेट की जड़ें हिलने लगीं। भारत के टॉप दो कॉर्पोरेट जो सत्ता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं, उन दोनों के भीतर भी हड़कंप मच गई। यह रास्ता कहां ले जाएगा?
दूसरा सवाल – विपक्ष लगातार यह कहकर आरोप लगा रहा है कि दरअसल यह Epstein Files का जिक्र है जिसमें प्रधानमंत्री का भी नाम है।
तीसरा सवाल – ऐसे मौके पर जब भारत की करेंसी डामाडोल, भारत का मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्शन सेक्टर नीचे, रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं, किसान-मजदूर की जिम्मेदारी सिवाय इसके कि लाभार्थी के तर्ज पर कुछ दे दिया जाए इससे हटकर कोई बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं – क्या भारत के भीतर बेरोजगारी की परिस्थितियां और व्यापक होने वाली हैं?
चौथा सवाल – अंतरराष्ट्रीय तौर पर भारत की जो महत्ता इस दौर में चेक एंड बैलेंस के बीच खड़े होकर दुनिया के सामने अपनी ताकत को दिखाने की थी, क्या उसका एक तरफ झुकना भारत की स्थिति को अंतरराष्ट्रीय तौर पर अब कमजोर भी करेगा?
पांचवां सवाल – क्या वाकई अमेरिका भारत को चलाने की दिशा में बढ़ रहा है?
ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी स्थिति?
अमेरिका कोई ईस्ट इंडिया कंपनी की तर्ज पर नहीं है और भारत भी उस दौर के राजे-रजवाड़ों का देश नहीं है। लेकिन इस दौर में कमोबेश हर देश की राजनीति उस बाजार, व्यापार और व्यापारिक कार्यों के जरिए अपनी राजनीतिक महत्ता को दुनिया के दूसरे तमाम देशों के साथ जोड़कर बताने से नहीं हिचकती है।
यह ठीक वाकई वैसा ही है जैसे एक वक्त ईस्ट इंडिया कंपनी आई थी और यहां के राजे-रजवाड़ों के दरबारों में बैठकर वो समझौता करती थी। उसके बाद जब ब्रिटिश शासन आ गया तो उसने यहां के राजे-रजवाड़ों को प्रीवी पर्स दे दिया यह कहकर कि अब आप चुप रहिए, आपके लिए हमने तय कर दिया है इतनी रकम आपको मिलेगी, जनता को हमारे भरोसे छोड़ दीजिए।
जानें पूरा मामला
Second World War के बाद बने World Order से हटकर एक नए World Order की दिशा में दुनिया बढ़ रही है। जिसमें चेक एंड बैलेंस कौन करेगा इसको लेकर नए-नए आर्थिक नीतियों पर गठबंधन बन रहे हैं और भारत इसमें चेक एंड बैलेंस की जगह पर आकर खड़ा है।
लेकिन इस डील के बाद सवाल यह है कि क्या भारत की संप्रभुता, भारत की स्वतंत्रता कोई मायने नहीं रखती है? भारत की अपनी इकॉनमी जिन आधारों पर खुद को स्वावलंबी बनाती और जिसका जिक्र प्रधानमंत्री मोदी ने कई मौकों पर स्वदेशी या Vocal For Local का किया, वो तमाम बातें एक झटके में धरी की धरी रह गईं।
इस डील का नजरिया बहुत साफ है। इस डील की पूरी कमान अमेरिका के हाथ में है। वो बता भी रहा है, निर्देश भी दे रहा है और निर्देश का पालन ना करने पर सजा भी वही तय कर रहा है।
मुख्य बातें (Key Points)
• भारत ने रूस से तेल आयात बंद करने की प्रतिबद्धता जताई, अमेरिका के चार डिपार्टमेंट रखेंगे निगरानी • अमेरिका ने टैरिफ 50% से घटाकर 18% किया, लेकिन 2024 में यह सिर्फ 2-3% था • भारत को अगले 5 साल में $500 बिलियन (45-46 लाख करोड़) का अमेरिकी सामान खरीदना होगा • रूसी तेल 30% सस्ता था, अमेरिकी रक्षा उपकरण ढाई गुना महंगे होंगे • विदेश मंत्री जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं








