India Press Freedom Ranking : भारतीय मीडिया पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कभी सनसनीखेज रिपोर्टिंग का आरोप लगता है तो कभी सरकार समर्थक होने का। लेकिन जब विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) में भारत की रैंकिंग सामने आती है, तो बहस एक नए मोड़ पर पहुंच जाती है। भारत को 180 देशों में 157वां स्थान मिला है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह रैंकिंग पाकिस्तान (158वें स्थान) से केवल एक स्थान ऊपर है और फिलिस्तीन (156वें स्थान) से भी नीचे है।
हाल ही में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे की यात्रा पर गए, तो वहां की मीडिया ने उनसे सवाल पूछने का प्रयास किया। इसके बाद से यह बहस तेज हो गई कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति क्या है। नॉर्वेजियन मीडिया ने अपनी रैंकिंग (प्रथम स्थान) का हवाला देते हुए कहा कि वे दुनिया के सबसे स्वतंत्र प्रेस हैं और मोदी उनकी बात नहीं सुन रहे।
लेकिन सवाल यह है – क्या इस रैंकिंग को हथियार की तरह इस्तेमाल करना उचित है? क्या यह सूचकांक पूरी तरह निष्पक्ष और तार्किक है? आइए दोनों पक्षों की बात करें और आप खुद तय करें।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक क्या है?
यह सूचकांक रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (Reporters Without Borders – RSF) द्वारा तैयार किया जाता है, जिसका मुख्यालय पेरिस में है। यह संगठन लगभग 5,000 से अधिक पत्रकारों और विशेषज्ञों से बात करके 180 देशों को रैंक करता है।
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सूचकांक की स्कोरिंग:
- 85-100: सर्वश्रेष्ठ स्थिति
- 0-40: सबसे खराब स्थिति
भारत इस सूचकांक में 0-40 की श्रेणी में आता है, जो अत्यंत खराब माना जाता है।
मुख्य उद्देश्य: यह सूचकांक पत्रकारिता की गुणवत्ता नहीं, बल्कि पत्रकारिता के माहौल की स्वतंत्रता को मापता है। यानी पत्रकार कितनी अच्छी रिपोर्टिंग कर रहे हैं यह नहीं, बल्कि पत्रकारों के लिए काम करने का माहौल कैसा है – यह देखा जाता है।
किन पांच आधारों पर होती है रैंकिंग?
RSF पांच प्रमुख स्तंभों पर देशों का मूल्यांकन करता है:
| स्तंभ | विवरण |
|---|---|
| सुरक्षा | पत्रकार शारीरिक रूप से सुरक्षित हैं या नहीं, हत्याएं, धमकियां |
| सामाजिक स्वीकार्यता | समाज में मीडिया की स्वीकृति, धर्म-जाति आधारित हमले |
| कानूनी ढांचा | UAPA जैसे कठोर कानून, राजद्रोह के मामले |
| आर्थिक स्वामित्व | मीडिया का स्वामित्व किसके पास है, केंद्रीकरण |
| राजनीतिक दबाव | सरकारी सेंसरशिप, मीडिया पर नियंत्रण |
देखा जाए तो ये मानदंड काफी व्यापक हैं और किसी भी देश की प्रेस स्वतंत्रता का वास्तविक चित्र पेश करते हैं।
दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति
जब हम दक्षिण एशियाई देशों की तुलना करते हैं, तो तस्वीर और भी चिंताजनक हो जाती है:
- नेपाल: 90वां स्थान
- मालदीव: 104वां स्थान
- श्रीलंका: 149वां स्थान
- बांग्लादेश: 149वां स्थान
- फिलिस्तीन: 156वां स्थान
- भारत: 157वां स्थान
- पाकिस्तान: 158वां स्थान
हैरान करने वाली बात यह है कि फिलिस्तीन, जो वर्षों से सैन्य संघर्ष झेल रहा है, वहां भी प्रेस की स्थिति भारत से बेहतर मानी गई है। यह निश्चित रूप से गंभीर चिंता का विषय है।
क्यों है भारत की रैंकिंग इतनी खराब?
अगर गौर करें तो कई कारण हैं जो भारत की खराब रैंकिंग के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं:
1. आतंकवाद विरोधी कानूनों का दुरुपयोग
2014 के बाद लगभग 36 पत्रकारों पर UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) लगाया गया है। यह कानून बेहद कठोर है और आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखा जा सकता है।
मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) का भी उपयोग पत्रकारों पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।
2. चिलिंग इफेक्ट (डर का माहौल)
बहुत से पत्रकार अब वह राय नहीं देते जो वे पहले देते थे। एंटी-एस्टैब्लिशमेंट (सत्ता विरोधी) रिपोर्टिंग काफी कम हो गई है। कानूनों के डर से पत्रकार स्वयं आलोचनात्मक रिपोर्टिंग से बच रहे हैं या गुमनाम रूप से काम कर रहे हैं।
3. सूचना प्रौद्योगिकी नियम (IT Rules)
25,000 से अधिक ऑनलाइन सामग्री हटाने के आदेश जारी किए गए। फैक्ट चेक यूनिट बनाई गई (जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया)। यह सब मीडिया पर अंकुश लगाने के प्रयास माने जाते हैं।
4. राजद्रोह कानून
औपनिवेशिक काल का यह कानून अभी भी लागू है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इसके दुरुपयोग पर चिंता जताई है, लेकिन पत्रकारों पर राजद्रोह के मामले दर्ज होते रहते हैं।
स्वतंत्र पत्रकारिता पर कॉर्पोरेट कब्जा
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि लगभग 70% मीडिया आउटलेट कॉर्पोरेट घरानों के नियंत्रण में हैं जो सत्ता से जुड़े हैं।
उदाहरण:
- NDTV: लगभग 65% शेयर अदाणी समूह के पास
- Reliance: अंबानी समूह के पास लगभग 72 टीवी चैनलों पर नियंत्रण
क्रॉस-मीडिया स्वामित्व को रोकने के लिए कोई कानून नहीं है। इस कारण एक ही समूह रेडियो, टीवी, अखबार, डिजिटल – सब पर हावी हो जाता है।
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सरकारी विज्ञापन: सबसे बड़ा हथियार
नीलसन रिपोर्ट के अनुसार, सरकार देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाता है। अगर सरकार किसी चैनल को विज्ञापन देना बंद कर दे, तो वह चैनल आर्थिक रूप से डूब सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि इसी डर के कारण कई मीडिया हाउस वही दिखाते हैं जो सरकार देखना चाहती है या जनता को दिखाना चाहती है। लाइसेंस रद्द करने का डर, IT सेल की ट्रोलिंग और विज्ञापन बंद होने का खतरा – ये तीनों मिलकर एक अदृश्य सेंसरशिप का काम करते हैं।
RSF का मानना है कि स्वामित्व की अत्यधिक एकाग्रता और राजनीतिक संरेखण भारतीय प्रेस संकट का सबसे बड़ा कारण है।
कानूनी दमन के कुछ उदाहरण
सिद्दीक कप्पन केस: हाथरस दलित मामले में खुलकर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार सिद्दीक कप्पन को UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया। उन्होंने 28 महीने जेल में बिताए। 2023 में उन्हें जमानत मिली।
प्रवीण पुरकायस्थ केस: न्यूज़क्लिक पोर्टल के संपादक को UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया। 2024 में सुप्रीम कोर्ट के कड़े हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया।
मोहम्मद जुबैर केस: ऑल्ट न्यूज़ के फैक्ट-चेकर मोहम्मद जुबैर पर कई FIR दर्ज हुए। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देते हुए कहा कि ऐसे किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
विदेशी पत्रकारों को भी निशाना
विदेशी पत्रकार भी इससे अछूते नहीं रहे। ABC की अवनी दास और फ्रांसीसी पत्रकार वेनेजार्ड डुगनेक जैसे पत्रकारों के वीजा नहीं दिए गए या रद्द कर दिए गए क्योंकि उन्होंने संभवतः एंटी-एस्टैब्लिशमेंट रिपोर्टिंग की थी।
ये मामले दर्शाते हैं कि जहां धुआं है, वहां आग भी है।
लेकिन सूचकांक की सीमाएं भी हैं
समझने वाली बात यह है कि हर सूचकांक की अपनी सीमाएं होती हैं। इस रैंकिंग के साथ भी कुछ गंभीर समस्याएं हैं:
1. व्यक्तिपरक मूल्यांकन
यह सूचकांक पूरी तरह विशेषज्ञों की राय पर निर्भर है, वास्तविक डेटा पर नहीं। अगर उन विशेषज्ञों में पूर्वाग्रह (bias) है, तो रैंकिंग प्रभावित होगी।
2. पश्चिमी मानदंड
पश्चिमी मीडिया के मानक भारत जैसे विविधतापूर्ण देश पर लागू करना कितना उचित है? नस्लवादी और भ्रामक रिपोर्टिंग करने वाले पश्चिमी प्रेस को भी स्वतंत्र माना जाता है यदि उस पर सरकारी नियंत्रण नहीं है।
3. चयनात्मक तुलना
कुवैत, जहां स्वतंत्र चुनाव नहीं होते, उसे भारत से ऊपर रखा गया है। यह कैसे तार्किक है?
दोहरे मापदंड का आरोप
एक लेखक ने द हिंदू में लिखा: “हम ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग का जश्न मनाते हैं लेकिन वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स को खारिज कर देते हैं। यह सुविधानुसार अस्वीकरण बौद्धिक रूप से अनैतिक है।”
उनका तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय सूचकांक को हम तभी स्वीकारते हैं जब वह हमारे पक्ष में हो। जब वही मानक हमारे खिलाफ जाए, तो उसे खारिज कर देते हैं।
यह निश्चित रूप से सोचने वाली बात है।
तुलना की असंगति
अब आते हैं सबसे महत्वपूर्ण बिंदु पर – क्या नॉर्वे और भारत की तुलना उचित है?
जनसंख्या:
- नॉर्वे: 55 लाख (दिल्ली की आबादी से भी कम)
- भारत: 140 करोड़
सामाजिक संरचना:
- नॉर्वे: 95% लोग एक ही भाषा बोलते हैं, 60% एक ही चर्च से जुड़े हैं (समरूप समाज)
- भारत: 22+ मान्यता प्राप्त भाषाएं, असंख्य धर्म-जाति (बहुलवादी समाज)
राजनीतिक-सामाजिक गतिशीलता:
- नॉर्वे: समरूप समाज में आम सहमति स्वाभाविक है, राज्य से टकराव न के बराबर
- भारत: बहुलवादी समाज में लगातार टकराव, विविध मत
एक छोटे, समरूप देश के मानकों से एक विशाल, विविधतापूर्ण लोकतंत्र को मापना सूचकांक की सबसे बड़ी पद्धतिगत विफलता है।
भारत सरकार का दृष्टिकोण
भारत सरकार का तर्क है:
1. मीडिया की बहुलता:
- 900+ निजी टीवी चैनल
- 140,000+ पंजीकृत प्रकाशन
सरकार का कहना है कि यह विशाल संख्या नियंत्रण नहीं बल्कि मीडिया की बहुलता का प्रमाण है।
2. संवैधानिक गारंटी:
- अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है
- मुख्यधारा में विपक्ष समर्थक मीडिया सक्रिय है (खासकर YouTube पर)
3. विदेशी एजेंडा:
सरकार का आरोप है कि RSF की कार्यप्रणाली और फंडिंग संदिग्ध है। यह पश्चिमी पूर्वाग्रह से प्रेरित है और भारत की छवि खराब करने का प्रयास है।
न्यायपालिका की भूमिका
भारतीय न्यायपालिका ने कई बार प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा की है:
रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950):
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आधारशिला है।”
बेनेट कोलमैन केस:
प्रेस की स्वतंत्रता पर महत्वपूर्ण निर्णय।
श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ:
IT एक्ट की धारा 66A को असंवैधानिक घोषित किया गया।
एसजी वोम्बटकेरे बनाम भारत संघ:
राजद्रोह कानून के दुरुपयोग पर ऐतिहासिक अंतरिम रोक लगाई गई।
ये निर्णय दर्शाते हैं कि न्यायपालिका सतर्क है और जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप करती है।
आगे की राह क्या हो?
विशेषज्ञों के सुझाव:
1. औपनिवेशिक कानूनों को समाप्त करें:
राजद्रोह जैसे कानून हटाए जाएं।
2. UAPA में सुधार:
मानवाधिकारों के अनुपालन को सुनिश्चित करें।
3. प्रेस काउंसिल को स्वायत्तता:
वित्तीय और प्रशासनिक स्वतंत्रता दें।
4. कॉर्पोरेट एकाधिकार रोकें:
क्रॉस-मीडिया स्वामित्व नियंत्रण के लिए कानून बनाएं।
5. सरकारी विज्ञापन में पारदर्शिता:
RTI के माध्यम से विज्ञापन आवंटन की जानकारी सार्वजनिक करें।
6. मीडिया स्वामित्व का खुलासा:
किसके पास कितनी हिस्सेदारी है, यह सार्वजनिक हो।
निष्कर्ष: संतुलित दृष्टिकोण जरूरी
इस पूरे विमर्श से क्या निष्कर्ष निकलता है?
रैंकिंग को न तो पूरी तरह निरर्थक माना जा सकता है, न ही पूर्णतः सत्य। यह एक उपकरण है जो व्यापक प्रवृत्तियों को पहचानने में उपयोगी है, लेकिन इसे सटीक या अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
भारतीय मीडिया में निश्चित रूप से समस्याएं हैं – कॉर्पोरेट नियंत्रण, सरकारी दबाव, सनसनीखेज रिपोर्टिंग। लेकिन साथ ही, भारत में हजारों स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया हाउस भी हैं जो बेहतरीन काम कर रहे हैं।
सवाल उठता है – क्या हम एक छोटे, समरूप यूरोपीय देश के मानकों से अपने विशाल, जटिल लोकतंत्र की तुलना कर सकते हैं? शायद नहीं।
लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि हमें सुधार की जरूरत नहीं? बिल्कुल नहीं।
स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र का शत्रु नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा रक्षक है – बशर्ते उसका सही उपयोग हो।
मुख्य बातें (Key Points)
- विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 157वें स्थान पर
- पाकिस्तान से केवल 1 स्थान ऊपर, फिलिस्तीन से नीचे
- UAPA, PMLA जैसे कानूनों का दुरुपयोग
- 70% मीडिया कॉर्पोरेट घरानों के नियंत्रण में
- सरकार सबसे बड़ी विज्ञापनदाता, आर्थिक दबाव का खतरा
- लेकिन सूचकांक में पश्चिमी पूर्वाग्रह भी
- नॉर्वे और भारत की तुलना असंगत
- न्यायपालिका ने कई बार प्रेस की रक्षा की













